'बतकचरा' में कुछ बातों का संग्रह है, ये बातें किसी को सार्थक, तो किसी को निरर्थक प्रतीत हो सकती है। निरर्थक लगें तो यही मान लीजिएगा कि ये बातें हैं इन बातों का क्या..!
रविवार, 15 मार्च 2020
लिल्लीघोड़ी पर सवार कौवा
शुक्रवार, 6 मार्च 2020
आरे में आरा
टहल-वहल कर लौटा तो झाड़ू-वाड़ू भी लगा डाली, क्योंकि बाहर की खर-पतवार पर कई बार निगाह-सिगाह पड़ी थी। इसके बाद चाय-वाय पिया। अब इत्मीनान से बैठा हूँ। फेसबुक स्क्रॉल किया तो कुछ लिखकर पोस्ट करने के लिए मन ऐसे कुलबुलाया, जैसे अखाड़े को देखकर पहलवानी सूझे!
सोचा, यह पहलवानी कर ही दी जाए, सो लिखना-फिखना शुरू कर दिया। लेकिन क्या लिखना है और क्या लिखे जा रहे हैं, यह तय-फय किए बिना; यानी लिखने के दांव-पेंच पर कोई विचार-फिचार किए बगैर ही अखाड़े में उतर पड़ा और हाथ-पांव चलाने लगा।
हां चाय-फाय पीते समय अखबार भी पढ़ रहा था। उसके पन्ने-सन्ने पलट-फलट ही रहा था कि एक पन्ने के किनारे छपे संपादक महोदय के 'खेद प्रकाश' पर निगाह पड़ गई।
मजे की बात यह कि ‘खेद प्रकाश’ भी किस पर! एक सच्ची बात जो छप गई थी, उसी पर!
दरअसल खेद प्रकाश कुछ यूँ था, अखबार के पिछले अंक में "एक वाक्य के अंश के रूप में 'अच्छाई पर बुराई की जीत' छप गया है, जबकि इसके स्थान पर 'बुराई पर अच्छाई की जीत' होना चाहिए था।" संपादक महोदय ने लिखा था कि 'इस गलती का हमें खेद है।'
यह ‘खेद प्रकाश’ पढ़-सढ़ लेने के बाद मैं सोचने लगा कि संपादक महोदय को खेद शायद मुद्रण-त्रुटि का नहीं, बल्कि उससे निकल आए सच का था!
तो भइया, संपादक महोदय! इसपर खेद-फेद जताने की कोई जरूरत-फरूरत नहीं है। आजकल तो अच्छाई पर बुराई की जीत का ही जलवा है। और बुराई पर अच्छाई के जीतने की नौबत तब आती है, जब उस जीत-फीत का कोई खास अर्थ नहीं रह जाता!
आपने शायद ध्यान नहीं दिया, मेरी बात की पुष्टि आप चाहें तो अपने ही अखबार में आज छपी इस खबर से कर सकते हैं, "आरे में पेड़ों की कटाई पर रोक।” जब मतलब भर के पेड़ों पर आरा चल गया, तब यह रोक-फोक लगी।
देखा! पहले बुराई जीतती है, अच्छाई बाद में आती है; और यह अच्छाई भी अकसर जरूरत भर के लिए ही जीतती है। तब जीती हुई अच्छाई की हालत भी कुछ वैसी ही हो जाती है, ‘काम निकाल गया तो पहचानते नहीं।’ यानी वह नजरअंदाज करने लायक बनकर रह जाती है।!
तो, संपादक महोदय, खेद-फेद छोड़िए; गलती आपकी नहीं जमाने की है।
और यह जमाने वाले ही हैं कि अच्छाई और बुराई के पटका-पटकी के खेल में दोनों के लिए ताली बजता है! आरे में आरा चला तो विकास वाले ताली बजाए होंगे और जब आरा रुका तो पर्यावरण प्रेमी!
वैसे तो आप संपादक हैं, जानते ही होंगे कि अखबार भी आखिर बेचना ही होता है। व्यापार में अच्छाई और बुराई, दोनों को भुनाने का हुनर आपको भी खूब आता होगा! अब यहीं देखिए, आपके अखबार के पन्ने पलटते समय आपकी प्रस्तुति "आरती संग्रह" वाली पत्रिका फिसलकर जमीन पर गिर पड़ी। मेरी भक्ति भावना को जैसे ठेस लगी। मैंने बिना देर किए श्रद्धाभाव से उसे उठाया और उसके पन्ने पलटने लगा।
खैर, उसमें छपी आरती इतने बारीक अक्षरों में थी कि आंखें गड़ाकर भी उन्हें पढ़ना मुश्किल था। लेकिन उसी पत्रिका में प्रकाशित विज्ञापन इतने बड़े और चमकीले अक्षरों में थे कि कोई चाहे तो उन्हें एक फर्लांग दूर से भी आराम से पढ़ ले!
तो संपादक महोदय, जैसे भक्ति के कवर पेज की आड़ में दुनियादारी का कारोबार चलता है, वैसे ही अच्छाई की जीत का डंका भी शायद इसलिए पीटा जाता है कि बुराई इत्मीनान से अपना काम करती रहे, है न?
सच तो यह है कि 'अच्छाई' ने ही बड़ी चालाकी से आरे को जरूरत भर के पेड़ काट लेने दिए। इसीलिए वह बाद में प्रकट हुई और पूरे ठसके के साथ घोषणा की, "देखो, यह हुई न बुराई पर अच्छाई की जीत!"
अब इस जीत पर ढोल पीटो, दशहरा मनाओ और अच्छाई की जय-जयकार करो। लेकिन इस उत्सव के बीच यह समझ में नहीं आता कि बुराई हारकर भी आखिर जीत कैसे जाती है और अच्छाई जीतकर भी हार कैसे जाती है! शायद इसीलिए कि अंततः सीता को वनवास भोगना ही पड़ता है।
तो, मेरे समझ से अच्छाई और बुराई की इस नूराकुश्ती में हार-फार या जीत-फीत को कैजुअली-फैजुअली ही लेना चाहिए। इस पर न तो खेद-फेद जताने की जरूरत है और न ही खुशी-फुशी मनाने की।
यह बाजार और विकास, ये दोनों जुड़वा भाई ही तो हैं। अच्छाई और बुराई की इस पटका-पटकी के खेल के असली रेफरी भी यही हैं। ये जब चाहें, जिसकी चाहें, जीत पर सीटी बजा दें और हम दर्शकों को कभी रुलाएं, कभी हंसाए!
#चलते_चलते
तो भइया आज चलते-फलते मैं यही सलाह देता हूँ कि आप भी न, इस हार-जीत के चक्कर में ज्यादा न पड़ो आपको जिस बात में खुशी मिले, उसी पर खुशी मनाएं!
#सुबहचर्या
(८.१०.१९)
शपथ के मोड में!
एक गाना मुझे बहुत पसंद है वह कि "भगवान...सुन दर्द भरे मेरे नाले" शायद संविधान में जनता के इसी 'नाले' को सुनने की व्यवस्था की गई है, जिसके तहत शासकों को पद और गोपनीयता की शपथ खानी होती है और शपथ खाते शासकों पर मेरा ध्यान फोकस हो जाता है। आखिर ये देश की जनता के 'नाले' सुनने के लिए भगवान जो बन चुके होते हैं! ऐसे शपथी अकसर खानदानी टाइप के ही होते हैं। वैसे भी अपने देश में खानदानियों का ही जलवा रहता आया है। ये, येन-केन-प्रकारेण पद्धति वाली अपनी शक्ति के प्रयोग से, पीढ़ी दर पीढ़ी शपथ खाने से लेकर खिलाने तक की शक्ति रखते हैं और घुमा-फिराकर इसे खाने का जुगाड़ भी फिट कर लेते हैं। इस देश में क्या नेता, क्या जनता! सभी जुगाड़ से काम चलाते हैं।
लेकिन यहाँ की बेचारी जनता को जुगाड़ का भी उतना शऊर नहीं ! उसे अपने भक्ति-भाव पर ही ज्यादा भरोसा होता है, तभी तो भगवान को प्रसन्न करने के लिए वह हजारों वर्ष तपस्या कर सकती है। दूसरे, भगवान से वरदान पाने की यदि ज्यादा जल्दी हो, तो वह मनमाफिक भगवान भी खोज सकती है, मतलब "जाकी रही भावना जैसी हरि मूरत देखी तिन्ह तैसी' टाइप से। खैर, इस जमाने में राजाओं वाला 'राजत्व-गुण' खानदानियों में ही पाया जाता है। और, जनता भी अपने भक्ति-भाव संम्पृक्त सांस्कृतिक-दयालुता के वशीभूत खानदानियों को राजत्व-विहीन नहीं देख पाती तथा पुनि-पुनि सिंहासनारूढ़ कराती रहती है। वैसे भी यह जनता करे भी तो क्या करे? खानदानी टाइप के राजनीतिक लोग तो पैदाइशी मुँह में सोने का चम्मच लिए जैसे शपथ खाए धरती पर अवतरित हुए रहते हैं, शपथ खाना इनके लिए औपचारिकता भर होता है! बिना इसका डोज लिए हुए भी ये काम चला लेते हैं।
यदि किसी गैर-खानदानी ने, जनता को धता बताकर या भूले-भटके शपथ खा भी लिया हो तो, वह भी अपनी सात पुश्तों को खानदानी बना जाता है! क्योंकि खानदानीपन शक्ति के साथ राजत्व गुण मापने का भी पैमाना है और जिसके सामने जनता सिर झुकाती है। इस शक्ति को जनता कम न आंके, इसलिए शपथ अकेले में नहीं, खानदानी-खानदानी मिलकर स्टेज पर बाकायदे समारोह पूर्वक शपथ खा और खिलाकर अपने राजत्व गुण का प्रदर्शन करते हैं, आखिर उन्हें भी यह पता होता है कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा! दरअसल जनता को और कुछ पता हो या ना हो, उसे यह तो पता ही होता है कि कोई ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा नहीं, यही बड़े खानदानी लोग उसकी समस्या हल कर सकते है। क्या है कि जनता इन खानदानियों को समस्याओं से दुनियां को सजाते हुए देख चुकी होती है, खैर।
यहाँ उल्लेखनीय है भारत जैसे देश में 'किरपा' का बड़ा महत्व है, और घुरहू-कतवारू में किरपा बरसाने का गुण नहीं हो सकता, यह गुण राजा महाराजाओं से लेकर खानदानियों में ही रहा है। भारत की महती सभ्यता में माना गया है कि भगवान टाइप के लोग ही किरपा बरसा सकते हैं। इस प्रकार जो शपथ खा रहे होते हैं, मान लीजिए कि वे समस्याओं पर मुस्तैदी के साथ किरपा बरसाने जा रहे हैं और इनके शपथोपरांत सारी समस्याएं ठिकाने लग जएंगी। इसीलिए देशहित में समस्याओं के हलार्थ ये इतने चिंतित रहते हैं कि साल के तीन सौ पैंसठ दिन गुणे चौबीसों घंटे शपथ खाने के ही मोड में रहते हैं। मतलब बिना इसकी चिंता किए कि, हड़बड़-तड़बड़ में खाई गई चीज पचेगी भी या नहीं? ये आनन-फानन में भी शपथ खा लेते हैं। शपथ खाने के बाद जनता को राजत्व का बोध कराना और आसान हो जाता है।
अंत में इस बात पर और ध्यान फोकस कराना चाहता हूँ, जिसे मैं बचपन से ग्रहण करते हुए चला हूँ, यह कि कसम टूटने पर विद्या माई के प्रकोप से बचने के लिए स्कूली बस्ते को माथे से छुआ कर हम कहते जय विद्यामाई की। वैसे ही आज के लोकतांत्रिक भगवान 'भारत माता की जय' या फिर 'मंदिर गिरता फिर बन जाता' टाइप से बोलकर जनता के बीच उसके प्रकोप से बचते हुए अपने प्रति उसका आस जगाए रखते हैं।