सोमवार, 17 अगस्त 2026

जेन जी की कसौटी पर

दिमाग में क‌ई दिनों से जेन जी-जेन जी नाच रहा था। दिमाग में जेन जी के छाए होने का कारण भी था। क्योंकि कहा जा रहा है कि जेन जी हर उस स्थापित विचारधारा की चूलें हिलाने पर आमादा है, जिसकी जड़े कभी अडिग मानी जाती थीं। और यह भी कि जेन जी किसी भी अवधारणा, स्थापित विचारधारा या आदर्श को अंतिम सत्य मानने को तैयार नहीं। मानो हर बने-बनाए गढ़ को ढहाकर ही ये दम लेना चाहते हों।

खैर, समस्या जेन जी को नहीं है, हो सकता है उनमें लफंटूस‌ई हो। लेकिन समस्या उनके लिए है जो अवधारणा, विचारधारा और आदर्श रचते हैं। समस्या ऐसे लोगों की रोजी-रोटी पर है जिनकी पूरी जीविका ही विचार, आदर्श और अवधारणाएँ गढ़ने पर टिकी है। सोचिए, यदि भारत जैसे देश की सबसे बड़ी आबादी ही आपके वैचारिक उत्पाद खरीदने से इंकार कर दे तो कौन होगा आपका गुणग्राहक, कैसे चलेगी आपकी दुकान? 

हाँ नेताओं की चिंता मत करिए। वे मौसम वैज्ञानिक होते हैं हवा चली नहीं कि उसका रुख पहचान लेते हैं। उनकी नेताई फौरन जेन-जी का अवतार धारण कर लेगी और उन्हीं के गुट में शामिल हों जाएंगे। लेकिन बिगड़ेगा तो उनका जो उम्र-भर, रात-दिन अवधारणा, विचार और आदर्श गढ़ते रहे हैं, उनको कौन पूछेगा? उनकी दुकान फीकी होकर बंद हो जाएगी, और इनकी दुकानों पर ताला लग जाएगा।

चलिए उदाहरण दे दें, आजकल सबसे बड़ी जमात लेखकों की है। ये लोग सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया पर खूब हाथ अजमा रहे हैं और कमोवेश हर ऐसा लेखक अपने-अपने प्रकाशन के माध्यम से कालजयी साहित्यिक सृजन परोस रहे हैं। लेकिन जरा कल्पना कीजिए क्या जेन जी को ‘बंधन में डालने वाले’ ऐसे साहित्य पसंद आएंगे? नहीं। 

मैं नहीं कहता कि प्रेमचंद, निराला या दूसरे बड़े साहित्यकार अप्रासंगिक हो ग‌ए हैं लेकिन इन जैसे साहित्यकारों की बातों पर अब जेन जी का ध्यान टिकेगा? विद्वान विश्लेषक जेन जी के मन:स्थिति की जैसी व्याख्या कर रहे हैं उसके अनुसार तो लगता है जेन जी इस तरह की साहित्यिक वाली परिस्थितियों, कथानकों से बाहर निकल चुके हैं। हाँ इसके साथ ही सबसे बड़ी बात यह कि अब ये वही घिसी-पिटी अनुभूतियां नहीं चाहते, इन्हें तो अब हर पल कुछ नया चाहिए। जो नया देगा, ये उसी ओर लपक पड़ेंगे। 

अब भला सोचिए! इस माहौल में साहित्य और साहित्यकारों की कौन सुनेगा?

साहित्यकारों या लेखकों को छोड़िए, यही हश्र बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की भी होने वाली है, अब तक तो सभी की दुकानें चल गई लेकिन आगे अब नहीं चलने वाली। 

क्योंकि कहते हैं कि यह जेन जी किसी लीक को नहीं पकड़ कर चल रहे। उन्हें तो बस मोबाइल की स्क्रीन स्क्रॉल करते रहना है। एक बात पर उँगली रुकी नहीं कि दूसरी उसकी जगह लेने को तैयार मिलती है। एक बात पर थिर हुए नहीं की सामने दूसरी बात उसकी काट में आकर खड़ी हो गई! इसलिए ये बिना आगा-पीछा सोचे जो सामने है उसी को मानते हैं, जानते हैं।

इसलिए मेरा मानना है कि अब किसी भी सृजनकर्ता या रचनाकार को जेन जी को ओझल करके नहीं चलना चाहिए। कालजयी सृजन की बात तो दूर, आपकी रचना उनके अनंत स्क्रॉल में विलीन हो जाएगी।

तो भइया, आज लेखक, बुद्धिजीवी, पत्रकार, सभी को चाहिए की अपने-अपने ‘धनुहा-बाण’ धर कर जेन जी की शरण में चलें, अब सब उन्हीं की कसौटी पर हैं। जो इस कसौटी पर खरा उतरेगा, वही पढ़ा जाएगा; बाकी सब उनके अनंत स्क्रॉल में खो जाएंगे।

मंगलवार, 9 जून 2026

बे-खास बातें

आजकल यहां श्रावस्ती में हमरी सुबहचर्या अपने रूटीन-वे पर है, दर‌असल शुक्ला जी सवा पांच बजे से साढ़े पांच के बीच फोन कर देते हैं, उनका फोन सुनते ही आलस को धत् तेरे की कहकर उठना ही पड़ता है। दरअसल उन्हें स्टेडियम में बैडमिंटन खेलना होता है। हम भी साथ में निकल लेते हैं। जबकि पहले मेरी टहलाई सड़क पर ही होती थी। स्टेडियम जाकर पता चला कि यहां से सुबह की बेला खुशनुमा दिखाई देती है। हरी घास का मैदान आंखों को बहुत लुभाता है। यहां आने के बाद जैसे पछतावा-सा हुआ, कि अब तक इस खुशनुमा सुबह से महरूम रहा। 

वैसे स्टेडियम जाकर लौटने में बत्तीस सौ कदम तो हो ही जाते हैं। बाकी बाॅलीबाल भी खेल लेते हैं। यह खेल मैंने कभी नहीं खेला। बचपन में फुटबॉल जरूर खेले हैं। 

खैर पहले तो इस खेल में शामिल होने से मैं हिचका लेकिन जब मुझे खेलने के लिए प्रोत्साहित किया गया तो मैं भी उनके साथ खेलने के लिए तैयार हो गया। कुछ बहुत अच्छा खेलते हैं। तो अब स्टेडियम से घर वापस आने तक सात बज जाते हैं। 

आज के इस लिखे में कोई खास बात नहीं मिलेगी। लेकिन इस लेख को पढ़कर कुछ तो महसूस हुआ होगा! 

#चलते_चलते

खास बातों का ही नहीं, बे-खास चीजें भी महत्वपूर्ण होती हैं। इनमें कोई न कोई गहरा अर्थ छिपा होता है। आज जिनका जन्मदिन पड़ रहा है उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

#सुबहचर्या

(१.८.१९)

रविवार, 7 जून 2026

पोरबंदर और समुद्र का किनारा

 आज सुबह हुई फिर भी नहीं जागा। देर तक सोता रहा। उठा तो घड़ी में सात बज रहे थे। लेकिन वास्तविक समय यही कोई छह पैंतालीस था। दरअसल घड़ी दस-बारह मिनट तेज चलती है। इसे तेज चलने भी देता हूं। बाहर बारिश हो रही है, छत, पत्तों और धरती पर हुई बूँदें कानों में धीमे, सधे हुए संगीत की तरह उतर रही हैं। अभी सावन तो नहीं आया लेकिन यह बारिश सावन की बरसात जैसी ही है।

टहलने का कार्यक्रम स्थगित कर कुर्सी खींचकर दरवाजे पर किया। सुरसुरी-सी ठंडी हवाओं का आनंद लेते हुए मैं टपकती बूंदों को देखने लगा। वे बुलबुले बनाती और अगले ही पल फूट जाती। यहीं बैठे-बैठे मैंने चाय की चुस्कियां लीं और अखबार भी पढ़ता रहा।

पिछले दिनों मैं गुजरात में था, काठियावाड़ क्षेत्र में तो पानी ही नहीं बरसता। पत्नी ने कहा था, 'पानी नहीं बरसता तो क्या हुआ, यहां समुद्र तो है! शायद लोग यही देखकर खुश हो लेते होंगे।' खैर, उन्होंने यह बातें मजाक के अंदाज में ही कहा था गई थी। लेकिन वाकई, कुदरत का अपना भी एक अंदाज होता है। जब तक समुद्र बूंद न बनकर बरसे उसके पानी का क्या आनंद? समुद्र की विराटता से ज्यादा आनंद बारिश की इन नन्हीं बूंदों में है! विराट तो हमारा यह अनंत ब्रह्मांड भी है, लेकिन जीवन इस नन्हीं-सी धरती पर ही है!!

पोरबंदर पहुंचते ही मन में गांधी जी के जन्मस्थान को देखने की इच्छा जाग उठी। हमने अपनी इनोवा उसी दिशा में मुड़वा ली। बचपन में छह या सात पढ़ता था, जब पहली बार महात्मा गांधी की जीवनी पढ़ी। तभी से पोरबंदर नाम से परिचित हूँ, आज संयोग देखिए कि उसी पोरबंदर शहर की गलियों में खड़ा था। 

पोरबंदर शहर के एक पुराने, साफ-सुथरे मुहल्ले में वह घर था, जहां महात्मा गाँधी का जन्म हुआ था। उस घर को देख लेने के बाद हम लोग पोरबंदर के समुद्री किनारे पर आए! यहां समुद्र की लगातार उठती-गिरती लहरें थीं, उन लहरों का आनंद लिया। 

मैंने देखा एक कामगार जैसा आदमी, समुद्र की ओर मुंह किए अकेला बैठा था। वह हरहराकर उठती-गिरती लहरों को ऐसी तल्लीनता से निहार रहा था, जैसे ध्यानमग्न अवस्था में बैठा समुद्र से संवाद कर रहा हो। 

उसका वह दार्शनिक-सा अंदाज मुझे हिंदी फिल्मों के उन नायक की याद दिला गया, जो समुद्र किनारे बैठ अपने भीतर की उथल-पुथल को उठती-गिरती लहरों में टटोलते दिखाई देते हैं। मैंने उससे कुछ बातें की, कि कहीं वह कोई सिरफिरा आदमी तो नहीं। लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला। उसने सामने की ओर इशारा करते हुए नेवी का स्टेशन और पोरबंदर के बंदरगाह को दिखाया। मुझे लगा जहाजों और किनारों के साथ लहरों से उसकी आत्मीयता है। खैर..

पोरबंदर से हम लोग सोमनाथ की ओर चल पड़े थे।

#चलते_चलते

        वाकई! आदमी की महत्वाकांक्षाओं को भी किनारा चाहिए। अन्यथा, उफनकर सिमटना भी होता है, वह समझ भी नहीं पाएगा।

#सुबहचर्या

(२४.७.१९)

शनिवार, 9 मई 2026

विचारों का मैन्यूप्युलेशन

       प्रातःकालीन परिदृश्य जैसे कुछ कह रहा होता है। इसे समझने के लिए मन का खाली और बेलाग होना जरूरी है। और सुबह-सुबह मन कुछ ऐसा ही होता है। इसीलिए सुबहचर्या में मैं दुनियाँ से टकराता हूँ। संवेदित हो उठता हूँ, नवीन विचार प्रस्फुटित होते हैं, लिखास जागती है, और इसे फेसबुक पर अभिव्यक्त करता हूँ। 

       लेकिन कभी-कभी मन 'स्टैग्नेशन' जैसी विरामावस्था में आ जाता है। न कुछ सोच पाता है और न कुछ समझता है। ऐसा मन तब जीवन में रमा हुआ-सा होता है, विचार स्वत:स्फूर्त नहीं होते बल्कि विचारों को ‘मैन्यूप्युलेट’ करना होता है। यदि विचार मैन्यूप्युलेट हों तो इससे स्वाभाविक लेखन नहीं हो पाता। क्योंकि तब पाठक को मात्र प्रभावित करने की इच्छा होती है न! 

       दूसरी स्थिति यह भी बन सकती है विचार सृजन के लिए जब मन को अंतस की दुनियाँ में ढकेलता हूँ, तो वहाँ की दुनिया भी भाव-अभाव से मुक्त मिलती है.. विचार रूखे ही रह जाते हैं! या विचार नहीं निकलते।

          अरे हाँ..! क्या किसी "साहित्य" का सृजन विचारों या कल्पनाओं को बिना "मैन्यूप्युलेट" किए हुए लिखा जा सकता है… और लिख भी दिया गया तो क्या उस लिखे में, उस विषय की आत्मा भी प्रतिष्ठित होती है? मैं मानता हूँ नहीं, क्योंकि संवेदना को कभी "मैन्यूप्युलेट" नहीं किया जा सकता.. हाँ अभिव्यक्ति को तो किया जा सकता है! मतलब सुंदर मूर्तियां तो गढ़ी जा सकती है लेकिन बिना संवेदना के इन मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकती! बिना संवेदना की आंच के शब्द और वाक्य केवल बेजान मूर्तियां ही गढ़ते हैं, और पाठक भी इसे वैसे ही विसर्जित कर देता है।

         आजकल लोग अपनी लिखास मिटा रहे हैं लेखक बन रहे हैं; लेखकों के लिए ही लिख रहे हैं, और लेखकों का लिखा लेखक ही समझ रहे हैं या फिर स्वयं ही अपना लिखा समझते होंगे । 

      मेरी पत्नी मुझे पढ़कर अकसर यही कहती हैं, "तुम्हीं लिखो तुम्हीं समझो या फिर कोई लेखक ही तुम्हारा लिखा समझता होगा।" मैं पत्नी को कभी-कभी अपना पाठक मान लेने के भ्रम में होता हूँ लेकिन इस कथन के बाद यह भ्रम भी जाता रहा..

         आज सुबह टहलने का मन हो आया था, लेकिन ध्यान हो आया कि जूता अभी सूखा ही नहीं है और हवाई चप्पल में ठंड लगती। असल में दो दिन पहले जूता धुल दिया था। वैसे इस समय अन्य क्षेत्रों में मौसम खुश्क हो चुका होगा लेकिन तराई जैसे क्षेत्र में शायद आर्द्रता बनी रहती है, वैसे भी भिनगा में जंगल होने से यहाँ आर्द्रता की मात्रा कुछ ज्यादा ही है। इसीलिए कपड़े वगैरह दिनभर में भी नहीं सूखते, जूता तो खैर कैनवास का है ही। 

       लेकिन आज Morning walk की इच्छा बलवती हो चुकी थी और गीले जूते को पाँव में डाल कर निकल लिया। कुछ देर के बाद अचानक जूते पर ध्यान गया। देखा, जूते के कैनवास के ऊपर साबुन का झाग निकलकर फैल चुका है। शायद यह ठीक से नहीं धुल पाया था! खैर चलतेे हुए इस झाग को हटाने की कोशिश भी करता रहा। क्योंकि यह कुछ अजीब लगता था! 

        यूँ ही चलते-चलते एक कार्यक्रम में नारी सशक्तिकरण पर दिया अपना भाषण याद आया! भाषण स्वभाविक नहीं, बल्कि इसपर अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर बोल रहा था। कि सामने बैठे लोग मेरे भाषण से प्रभावित हो जाएं! श्रोता के रूप में सामने स्त्रियाँ ही थी, मंच पर केवल और केवल पुरूष थे। मतलब उस भाषण में मेरी ‘आत्मा’ नहीं बोल रही थी।

      खैर टहल कर लौटा तो उसी तरह से चाय बनाया और अखबार पढ़ा। अखबार में "असली नारी सशक्तिकरण" पर कोई संपादकीय था, लेकिन नहीं पढ़ा। पढ़ा इसलिए नहीं कि वही घिसी-पिटी बातें, इन बातों को क्या पढ़ना! वैसे पर इस विषय पर घिसी-पिटी बातें ही की जाती हैं!

       इस सुबहचर्या को अभी रात में लिख रहा हूँ, तो दिन में एक और अखबार में एक लेख पढ़ लिया था उस लेख में एक हृदयविदारक घटना का जिक्र था, दिल्ली जैसे शहर में एक पढ़े-लिखे परिवार में एक दादी अपनी पोती को पानी की टंकी में इसलि विचारों का मैन्यूप्युलेशन  ए डुबोकर मार डालती है, क्योंकि वह पहले बच्चे के रूप में पोता चाहती थी। वहीं किसी दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में बी ए की पढ़ाई पूरी करने की इच्छा रखने वाली बहू को कोई सास उसे ही सुनाकर कहती है "बड़ी आई हो अंगर्रा-बीयर्रा करने"। 

      तो इन भाषणों से क्या होने वाला? 

     और यहां मैं सुबह की बातें रात में लिखने के लिए अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर रहा हूँ...

  #चलते_चलते

       "मैन्यूप्युलेशन" उतना बुरा नहीं होता जितना मैं इसे बता रहा हूँ..शरीर को प्रकृति ने "मैन्यूप्युलेट" किया हुआ है, लेकिन इसमें आत्मा डालकर!! तो यह मैन्यूप्युलेशन भी कलात्मक पुनर्सृजन है!

        #सुबहचर्या 

        (22.11.18)