शनिवार, 9 मई 2026

विचारों का मैन्यूप्युलेशन

       प्रातःकालीन परिदृश्य जैसे कुछ कह रहा होता है। इसे समझने के लिए मन का खाली और बेलाग होना जरूरी है। और सुबह-सुबह मन कुछ ऐसा ही होता है। इसीलिए सुबहचर्या में मैं दुनियाँ से टकराता हूँ। संवेदित हो उठता हूँ, नवीन विचार प्रस्फुटित होते हैं, लिखास जागती है, और इसे फेसबुक पर अभिव्यक्त करता हूँ। 

       लेकिन कभी-कभी मन 'स्टैग्नेशन' जैसी विरामावस्था में आ जाता है। न कुछ सोच पाता है और न कुछ समझता है। ऐसा मन तब जीवन में रमा हुआ-सा होता है, विचार स्वत:स्फूर्त नहीं होते बल्कि विचारों को ‘मैन्यूप्युलेट’ करना होता है। यदि विचार मैन्यूप्युलेट हों तो इससे स्वाभाविक लेखन नहीं हो पाता। क्योंकि तब पाठक को मात्र प्रभावित करने की इच्छा होती है न! 

       दूसरी स्थिति यह भी बन सकती है विचार सृजन के लिए जब मन को अंतस की दुनियाँ में ढकेलता हूँ, तो वहाँ की दुनिया भी भाव-अभाव से मुक्त मिलती है.. विचार रूखे ही रह जाते हैं! या विचार नहीं निकलते।

          अरे हाँ..! क्या किसी "साहित्य" का सृजन विचारों या कल्पनाओं को बिना "मैन्यूप्युलेट" किए हुए लिखा जा सकता है… और लिख भी दिया गया तो क्या उस लिखे में, उस विषय की आत्मा भी प्रतिष्ठित होती है? मैं मानता हूँ नहीं, क्योंकि संवेदना को कभी "मैन्यूप्युलेट" नहीं किया जा सकता.. हाँ अभिव्यक्ति को तो किया जा सकता है! मतलब सुंदर मूर्तियां तो गढ़ी जा सकती है लेकिन बिना संवेदना के इन मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकती! बिना संवेदना की आंच के शब्द और वाक्य केवल बेजान मूर्तियां ही गढ़ते हैं, और पाठक भी इसे वैसे ही विसर्जित कर देता है।

         आजकल लोग अपनी लिखास मिटा रहे हैं लेखक बन रहे हैं; लेखकों के लिए ही लिख रहे हैं, और लेखकों का लिखा लेखक ही समझ रहे हैं या फिर स्वयं ही अपना लिखा समझते होंगे । 

      मेरी पत्नी मुझे पढ़कर अकसर यही कहती हैं, "तुम्हीं लिखो तुम्हीं समझो या फिर कोई लेखक ही तुम्हारा लिखा समझता होगा।" मैं पत्नी को कभी-कभी अपना पाठक मान लेने के भ्रम में होता हूँ लेकिन इस कथन के बाद यह भ्रम भी जाता रहा..

         आज सुबह टहलने का मन हो आया था, लेकिन ध्यान हो आया कि जूता अभी सूखा ही नहीं है और हवाई चप्पल में ठंड लगती। असल में दो दिन पहले जूता धुल दिया था। वैसे इस समय अन्य क्षेत्रों में मौसम खुश्क हो चुका होगा लेकिन तराई जैसे क्षेत्र में शायद आर्द्रता बनी रहती है, वैसे भी भिनगा में जंगल होने से यहाँ आर्द्रता की मात्रा कुछ ज्यादा ही है। इसीलिए कपड़े वगैरह दिनभर में भी नहीं सूखते, जूता तो खैर कैनवास का है ही। 

       लेकिन आज Morning walk की इच्छा बलवती हो चुकी थी और गीले जूते को पाँव में डाल कर निकल लिया। कुछ देर के बाद अचानक जूते पर ध्यान गया। देखा, जूते के कैनवास के ऊपर साबुन का झाग निकलकर फैल चुका है। शायद यह ठीक से नहीं धुल पाया था! खैर चलतेे हुए इस झाग को हटाने की कोशिश भी करता रहा। क्योंकि यह कुछ अजीब लगता था! 

        यूँ ही चलते-चलते एक कार्यक्रम में नारी सशक्तिकरण पर दिया अपना भाषण याद आया! भाषण स्वभाविक नहीं, बल्कि इसपर अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर बोल रहा था। कि सामने बैठे लोग मेरे भाषण से प्रभावित हो जाएं! श्रोता के रूप में सामने स्त्रियाँ ही थी, मंच पर केवल और केवल पुरूष थे। मतलब उस भाषण में मेरी ‘आत्मा’ नहीं बोल रही थी।

      खैर टहल कर लौटा तो उसी तरह से चाय बनाया और अखबार पढ़ा। अखबार में "असली नारी सशक्तिकरण" पर कोई संपादकीय था, लेकिन नहीं पढ़ा। पढ़ा इसलिए नहीं कि वही घिसी-पिटी बातें, इन बातों को क्या पढ़ना! वैसे पर इस विषय पर घिसी-पिटी बातें ही की जाती हैं!

       इस सुबहचर्या को अभी रात में लिख रहा हूँ, तो दिन में एक और अखबार में एक लेख पढ़ लिया था उस लेख में एक हृदयविदारक घटना का जिक्र था, दिल्ली जैसे शहर में एक पढ़े-लिखे परिवार में एक दादी अपनी पोती को पानी की टंकी में इसलि विचारों का मैन्यूप्युलेशन  ए डुबोकर मार डालती है, क्योंकि वह पहले बच्चे के रूप में पोता चाहती थी। वहीं किसी दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में बी ए की पढ़ाई पूरी करने की इच्छा रखने वाली बहू को कोई सास उसे ही सुनाकर कहती है "बड़ी आई हो अंगर्रा-बीयर्रा करने"। 

      तो इन भाषणों से क्या होने वाला? 

     और यहां मैं सुबह की बातें रात में लिखने के लिए अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर रहा हूँ...

  #चलते_चलते

       "मैन्यूप्युलेशन" उतना बुरा नहीं होता जितना मैं इसे बता रहा हूँ..शरीर को प्रकृति ने "मैन्यूप्युलेट" किया हुआ है, लेकिन इसमें आत्मा डालकर!! तो यह मैन्यूप्युलेशन भी कलात्मक पुनर्सृजन है!

        #सुबहचर्या 

        (22.11.18)

लोकतंत्र: शादी का लड्डू

       दिनभर मानसिक और शारीरिक थकान बनी रहे तो अलसुबह उठना थोड़ा मुश्किल होता है। बस कुछ देर और सो लेने के बहाने आराम करने का मन होता है। ऐसी स्थिति में अकसर टहलना स्थगित हो जाता है। लेकिन आज की सुबह अलसाए मन को चपत लगाया। समय पर उठ गया। टहलते-टहलते उस पहाड़ी पर चढ़ता गया जिसपर विकास भवन है। दूर से यह विकास भवन जैसे पर्यटक-गृह लगता है। वैसे पहाड़ की ऊँचाई पर यह नहीं बनना चाहिए था। क्योंकि विकास धरातल पर हो तभी फायदेमंद होता है। तो भवन भी धरातल पर होना चाहिए। ऊँचाई पर होने से यहां फरियादियों की आवाजाही कम रहती है। 

         वैसे तो इस पहाड़ी पर चढ़ने में बढ़िया एक्सरसाइज भी हो जाती है। इसीलिए यहाँ शहर के लोग भी सुबह-सुबह टहलने आ जाते हैं और विकास भवन के चारों ओर बनी कोलतार की सड़क पर चक्कर लगाते हैं‌। मैं भी इसी सड़क पर टहलने लगा था। खैर.. 

         इस सड़क पर टहलते कुछ लोग आपस में बतिया रहे थे। कोई कह रहा था,

       "अपने समाज के लोगों से कह दिया गया है कि यदि कोई वोट मांगने आए तो साफ बता दें कि हमारा समाज तय कर चुका है कि कहाँ वोट देना है..अब हम कुछ नहीं कर सकते..हमारा भी वोट वहीं जाएगा।" 

           यह बात मन को कुरेद गई। मुझे याद आया। एक बार मैंने एक कार में लिफ्ट लिया था। उस कार का ड्राइवर कम पढ़ा-लिखा लगा था। वह गँवई था। लेकिन उसकी बातों से लगा कि काम धंधे के चक्कर में उसे दुनियादारी का बखूबी ज्ञान हो चला है। बातचीत में उसने कहा था - 

      "साहब जी, विधायकों और सांसदों को ही मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार होना चाहिए।" 

         उसकी बात पर मैंने जब कहा कि "यही चुनते हैं" तो उसने अपनी बात का मतलब समझाया - 

          "नहीं सर जी, मेरा मतलब यह है कि पार्टी-शार्टी की व्यवस्था (राजनीतिक दल) खतम होनी चाहिए.. लोग अपने दम पर चुनाव लड़ें.. इनमें जो अच्छा हो, वह जीते… और फिर यही जीते हुए विधायक या सांसद मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का चुनाव करें.. ऐसी व्यवस्था में, ये मंत्री-संन्त्री जो चुनाव प्रचार के लिए निकलते हैं और इससे जनता का जो जी हलकान होता है, वह नहीं होगा.. सब अपना-अपना ही प्रचार करेंगे.. सरकार को भी कोई व्यवस्था नहीं करनी होगी और व्यर्थ का सरकारी ताम-झाम भी नहीं रहेगा, पैसा भी बचेगा..."  

       यह बात मुझे भी काफी-कुछ जमीं थी! रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझा आम आदमी चाहे जितने दंद-फंद से घिरा हो, तमाम समस्याओं पर सोचता वह भी अंततः सकारात्मक ही है! 

          अब तक विकास भवन का मेरा दो चक्कर हो चुका था। लौटने को हुआ तो एक क्षण के लिए विकास-भवन की इस पहाड़ी से ऊपर पूरब दिशा में क्षितिज को निहारा..दूर स्लेटी रंग की पहाड़ियों के ऊपर सूरज की हलकी-हलकी लालिमा बिखरनी शुरू हो चुकी थी.. मन जैसे आनंदित हो उठा! इधर नीचे महोबा शहर की लाइटें सुन्दर नजारा पेश कर रहीं थी। ईश्वर को धन्यवाद दिया कि भले ही तुम्हारी बनाई दुनियाँ निरुद्देश्य सी हो लेकिन मेरी ये अनुभूतियाँ तो सच्ची ही हैं।

        टहलकर मैं वापस आया था। चाय बनाया, चाय की चुस्कियों के बीच अखबार पढ़ने लगा। 

     सम्पादकीय "वोट डालने निकले" पर ध्यान गया। फिर घर से बात की "श्रीमती जी ने कहा वोट डालने क्या जाएं! ये वोट लेने वाले केवल भ्रमित ही तो करते हैं।" इस बात पर उनसे कुछ नहीं कहा। 

      लोकतंत्र मुझे शादी के लड्डू जैसा लगा। जो खाए वो भी पछताए, और जो न खाए वह भी!! 

#सुबहचर्या