रविवार, 7 जून 2026

पोरबंदर और समुद्र का किनारा

 आज सुबह हुई फिर भी नहीं जागा। देर तक सोता रहा। उठा तो घड़ी में सात बज रहे थे। लेकिन वास्तविक समय यही कोई छह पैंतालीस था। दरअसल घड़ी दस-बारह मिनट तेज चलती है। इसे तेज चलने भी देता हूं। बाहर बारिश हो रही है, छत, पत्तों और धरती पर हुई बूँदें कानों में धीमे, सधे हुए संगीत की तरह उतर रही हैं। अभी सावन तो नहीं आया लेकिन यह बारिश सावन की बरसात जैसी ही है।

टहलने का कार्यक्रम स्थगित कर कुर्सी खींचकर दरवाजे पर किया। सुरसुरी-सी ठंडी हवाओं का आनंद लेते हुए मैं टपकती बूंदों को देखने लगा। वे बुलबुले बनाती और अगले ही पल फूट जाती। यहीं बैठे-बैठे मैंने चाय की चुस्कियां लीं और अखबार भी पढ़ता रहा।

पिछले दिनों मैं गुजरात में था, काठियावाड़ क्षेत्र में तो पानी ही नहीं बरसता। पत्नी ने कहा था, 'पानी नहीं बरसता तो क्या हुआ, यहां समुद्र तो है! शायद लोग यही देखकर खुश हो लेते होंगे।' खैर, उन्होंने यह बातें मजाक के अंदाज में ही कहा था गई थी। लेकिन वाकई, कुदरत का अपना भी एक अंदाज होता है। जब तक समुद्र बूंद न बनकर बरसे उसके पानी का क्या आनंद? समुद्र की विराटता से ज्यादा आनंद बारिश की इन नन्हीं बूंदों में है! विराट तो हमारा यह अनंत ब्रह्मांड भी है, लेकिन जीवन इस नन्हीं-सी धरती पर ही है!!

पोरबंदर पहुंचते ही मन में गांधी जी के जन्मस्थान को देखने की इच्छा जाग उठी। हमने अपनी इनोवा उसी दिशा में मुड़वा ली। बचपन में छह या सात पढ़ता था, जब पहली बार महात्मा गांधी की जीवनी पढ़ी। तभी से पोरबंदर नाम से परिचित हूँ, आज संयोग देखिए कि उसी पोरबंदर शहर की गलियों में खड़ा था। 

पोरबंदर शहर के एक पुराने, साफ-सुथरे मुहल्ले में वह घर था, जहां महात्मा गाँधी का जन्म हुआ था। उस घर को देख लेने के बाद हम लोग पोरबंदर के समुद्री किनारे पर आए! यहां समुद्र की लगातार उठती-गिरती लहरें थीं, उन लहरों का आनंद लिया। 

मैंने देखा एक कामगार जैसा आदमी, समुद्र की ओर मुंह किए अकेला बैठा था। वह हरहराकर उठती-गिरती लहरों को ऐसी तल्लीनता से निहार रहा था, जैसे ध्यानमग्न अवस्था में बैठा समुद्र से संवाद कर रहा हो। 

उसका वह दार्शनिक-सा अंदाज मुझे हिंदी फिल्मों के उन नायक की याद दिला गया, जो समुद्र किनारे बैठ अपने भीतर की उथल-पुथल को उठती-गिरती लहरों में टटोलते दिखाई देते हैं। मैंने उससे कुछ बातें की, कि कहीं वह कोई सिरफिरा आदमी तो नहीं। लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला। उसने सामने की ओर इशारा करते हुए नेवी का स्टेशन और पोरबंदर के बंदरगाह को दिखाया। मुझे लगा जहाजों और किनारों के साथ लहरों से उसकी आत्मीयता है। खैर..

पोरबंदर से हम लोग सोमनाथ की ओर चल पड़े थे।

#चलते_चलते

        वाकई! आदमी की महत्वाकांक्षाओं को भी किनारा चाहिए। अन्यथा, उफनकर सिमटना भी होता है, वह समझ भी नहीं पाएगा।

#सुबहचर्या

(२४.७.१९)

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