आजकल यहां श्रावस्ती में हमरी सुबहचर्या अपने रूटीन-वे पर है, दरअसल शुक्ला जी सवा पांच बजे से साढ़े पांच के बीच फोन कर देते हैं, उनका फोन सुनते ही आलस को धत् तेरे की कहकर उठना ही पड़ता है। दरअसल उन्हें स्टेडियम में बैडमिंटन खेलना होता है। हम भी साथ में निकल लेते हैं। जबकि पहले मेरी टहलाई सड़क पर ही होती थी। स्टेडियम जाकर पता चला कि यहां से सुबह की बेला खुशनुमा दिखाई देती है। हरी घास का मैदान आंखों को बहुत लुभाता है। यहां आने के बाद जैसे पछतावा-सा हुआ, कि अब तक इस खुशनुमा सुबह से महरूम रहा।
वैसे स्टेडियम जाकर लौटने में बत्तीस सौ कदम तो हो ही जाते हैं। बाकी बाॅलीबाल भी खेल लेते हैं। यह खेल मैंने कभी नहीं खेला। बचपन में फुटबॉल जरूर खेले हैं।
खैर पहले तो इस खेल में शामिल होने से मैं हिचका लेकिन जब मुझे खेलने के लिए प्रोत्साहित किया गया तो मैं भी उनके साथ खेलने के लिए तैयार हो गया। कुछ बहुत अच्छा खेलते हैं। तो अब स्टेडियम से घर वापस आने तक सात बज जाते हैं।
आज के इस लिखे में कोई खास बात नहीं मिलेगी। लेकिन इस लेख को पढ़कर कुछ तो महसूस हुआ होगा!
#चलते_चलते
खास बातों का ही नहीं, बे-खास चीजें भी महत्वपूर्ण होती हैं। इनमें कोई न कोई गहरा अर्थ छिपा होता है। आज जिनका जन्मदिन पड़ रहा है उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।
#सुबहचर्या
(१.८.१९)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें