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मंगलवार, 9 जून 2026

बे-खास बातें

आजकल यहां श्रावस्ती में हमरी सुबहचर्या अपने रूटीन-वे पर है, दर‌असल शुक्ला जी सवा पांच बजे से साढ़े पांच के बीच फोन कर देते हैं, उनका फोन सुनते ही आलस को धत् तेरे की कहकर उठना ही पड़ता है। दरअसल उन्हें स्टेडियम में बैडमिंटन खेलना होता है। हम भी साथ में निकल लेते हैं। जबकि पहले मेरी टहलाई सड़क पर ही होती थी। स्टेडियम जाकर पता चला कि यहां से सुबह की बेला खुशनुमा दिखाई देती है। हरी घास का मैदान आंखों को बहुत लुभाता है। यहां आने के बाद जैसे पछतावा-सा हुआ, कि अब तक इस खुशनुमा सुबह से महरूम रहा। 

वैसे स्टेडियम जाकर लौटने में बत्तीस सौ कदम तो हो ही जाते हैं। बाकी बाॅलीबाल भी खेल लेते हैं। यह खेल मैंने कभी नहीं खेला। बचपन में फुटबॉल जरूर खेले हैं। 

खैर पहले तो इस खेल में शामिल होने से मैं हिचका लेकिन जब मुझे खेलने के लिए प्रोत्साहित किया गया तो मैं भी उनके साथ खेलने के लिए तैयार हो गया। कुछ बहुत अच्छा खेलते हैं। तो अब स्टेडियम से घर वापस आने तक सात बज जाते हैं। 

आज के इस लिखे में कोई खास बात नहीं मिलेगी। लेकिन इस लेख को पढ़कर कुछ तो महसूस हुआ होगा! 

#चलते_चलते

खास बातों का ही नहीं, बे-खास चीजें भी महत्वपूर्ण होती हैं। इनमें कोई न कोई गहरा अर्थ छिपा होता है। आज जिनका जन्मदिन पड़ रहा है उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

#सुबहचर्या

(१.८.१९)

रविवार, 7 जून 2026

पोरबंदर और समुद्र का किनारा

 आज सुबह हुई फिर भी नहीं जागा। देर तक सोता रहा। उठा तो घड़ी में सात बज रहे थे। लेकिन वास्तविक समय यही कोई छह पैंतालीस था। दरअसल घड़ी दस-बारह मिनट तेज चलती है। इसे तेज चलने भी देता हूं। बाहर बारिश हो रही है, छत, पत्तों और धरती पर हुई बूँदें कानों में धीमे, सधे हुए संगीत की तरह उतर रही हैं। अभी सावन तो नहीं आया लेकिन यह बारिश सावन की बरसात जैसी ही है।

टहलने का कार्यक्रम स्थगित कर कुर्सी खींचकर दरवाजे पर किया। सुरसुरी-सी ठंडी हवाओं का आनंद लेते हुए मैं टपकती बूंदों को देखने लगा। वे बुलबुले बनाती और अगले ही पल फूट जाती। यहीं बैठे-बैठे मैंने चाय की चुस्कियां लीं और अखबार भी पढ़ता रहा।

पिछले दिनों मैं गुजरात में था, काठियावाड़ क्षेत्र में तो पानी ही नहीं बरसता। पत्नी ने कहा था, 'पानी नहीं बरसता तो क्या हुआ, यहां समुद्र तो है! शायद लोग यही देखकर खुश हो लेते होंगे।' खैर, उन्होंने यह बातें मजाक के अंदाज में ही कहा था गई थी। लेकिन वाकई, कुदरत का अपना भी एक अंदाज होता है। जब तक समुद्र बूंद न बनकर बरसे उसके पानी का क्या आनंद? समुद्र की विराटता से ज्यादा आनंद बारिश की इन नन्हीं बूंदों में है! विराट तो हमारा यह अनंत ब्रह्मांड भी है, लेकिन जीवन इस नन्हीं-सी धरती पर ही है!!

पोरबंदर पहुंचते ही मन में गांधी जी के जन्मस्थान को देखने की इच्छा जाग उठी। हमने अपनी इनोवा उसी दिशा में मुड़वा ली। बचपन में छह या सात पढ़ता था, जब पहली बार महात्मा गांधी की जीवनी पढ़ी। तभी से पोरबंदर नाम से परिचित हूँ, आज संयोग देखिए कि उसी पोरबंदर शहर की गलियों में खड़ा था। 

पोरबंदर शहर के एक पुराने, साफ-सुथरे मुहल्ले में वह घर था, जहां महात्मा गाँधी का जन्म हुआ था। उस घर को देख लेने के बाद हम लोग पोरबंदर के समुद्री किनारे पर आए! यहां समुद्र की लगातार उठती-गिरती लहरें थीं, उन लहरों का आनंद लिया। 

मैंने देखा एक कामगार जैसा आदमी, समुद्र की ओर मुंह किए अकेला बैठा था। वह हरहराकर उठती-गिरती लहरों को ऐसी तल्लीनता से निहार रहा था, जैसे ध्यानमग्न अवस्था में बैठा समुद्र से संवाद कर रहा हो। 

उसका वह दार्शनिक-सा अंदाज मुझे हिंदी फिल्मों के उन नायक की याद दिला गया, जो समुद्र किनारे बैठ अपने भीतर की उथल-पुथल को उठती-गिरती लहरों में टटोलते दिखाई देते हैं। मैंने उससे कुछ बातें की, कि कहीं वह कोई सिरफिरा आदमी तो नहीं। लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला। उसने सामने की ओर इशारा करते हुए नेवी का स्टेशन और पोरबंदर के बंदरगाह को दिखाया। मुझे लगा जहाजों और किनारों के साथ लहरों से उसकी आत्मीयता है। खैर..

पोरबंदर से हम लोग सोमनाथ की ओर चल पड़े थे।

#चलते_चलते

        वाकई! आदमी की महत्वाकांक्षाओं को भी किनारा चाहिए। अन्यथा, उफनकर सिमटना भी होता है, वह समझ भी नहीं पाएगा।

#सुबहचर्या

(२४.७.१९)

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

आरे में आरा

टहल-वहल कर लौटा तो झाड़ू-वाड़ू भी लगा डाली, क्योंकि बाहर की खर-पतवार पर क‌ई बार निगाह-सिगाह पड़ी थी। इसके बाद चाय-वाय पिया। अब इत्मीनान से बैठा हूँ। फेसबुक स्क्रॉल किया तो कुछ लिखकर पोस्ट करने के लिए मन ऐसे कुलबुलाया, जैसे अखाड़े को देखकर पहलवानी सूझे! 

सोचा, यह पहलवानी कर ही दी जाए, सो लिखना-फिखना शुरू कर दिया। लेकिन क्या लिखना है और क्या लिखे जा रहे हैं, यह तय-फय किए बिना; यानी लिखने के दांव-पेंच पर कोई विचार-फिचार किए बगैर ही अखाड़े में उतर पड़ा और हाथ-पांव चलाने लगा।

हां चाय-फाय पीते समय अखबार भी पढ़ रहा था। उसके पन्ने-सन्ने पलट-फलट ही रहा था कि एक पन्ने के किनारे छपे संपादक महोदय के 'खेद प्रकाश' पर निगाह पड़ गई।

मजे की बात यह कि ‘खेद प्रकाश’ भी किस पर! एक सच्ची बात जो छप गई थी, उसी पर!

दरअसल खेद प्रकाश कुछ यूँ था, अखबार के पिछले अंक में "एक वाक्य के अंश के रूप में 'अच्छाई पर बुराई की जीत' छप गया है, जबकि इसके स्थान पर 'बुराई पर अच्छाई की जीत' होना चाहिए था।"  संपादक महोदय ने लिखा था कि 'इस गलती का हमें खेद है।' 

यह ‘खेद प्रकाश’ पढ़-सढ़ लेने के बाद मैं सोचने लगा कि संपादक महोदय को खेद शायद मुद्रण-त्रुटि का नहीं, बल्कि उससे निकल आए सच का था!

तो भ‌इया, संपादक महोदय! इसपर खेद-फेद जताने की कोई जरूरत-फरूरत नहीं है। आजकल तो अच्छाई पर बुराई की जीत का ही जलवा है। और बुराई पर अच्छाई के जीतने की नौबत तब आती है, जब उस जीत-फीत का कोई खास अर्थ नहीं रह जाता! 

आपने शायद ध्यान नहीं दिया, मेरी बात की पुष्टि आप चाहें तो अपने ही अखबार में आज छपी इस खबर से कर सकते हैं, "आरे में पेड़ों की कटाई पर रोक।” जब मतलब भर के पेड़ों पर आरा चल गया, तब यह रोक-फोक लगी। 

देखा! पहले बुराई जीतती है, अच्छाई बाद में आती है; और यह अच्छाई भी अकसर जरूरत भर के लिए ही जीतती है। तब जीती हुई अच्छाई की हालत भी कुछ वैसी ही हो जाती है, ‘काम निकाल गया तो पहचानते नहीं।’ यानी वह नजर‌अंदाज करने लायक बनकर रह जाती है।!

तो, संपादक महोदय, खेद-फेद छोड़िए; गलती आपकी नहीं जमाने की है।

और यह जमाने वाले ही हैं कि अच्छाई और बुराई के पटका-पटकी के खेल में दोनों के लिए ताली बजता है! आरे में आरा चला तो विकास वाले ताली बजाए होंगे और जब आरा रुका तो पर्यावरण प्रेमी!

वैसे तो आप संपादक हैं, जानते ही होंगे कि अखबार भी आखिर बेचना ही होता है। व्यापार में अच्छाई और बुराई, दोनों को भुनाने का हुनर आपको भी खूब आता होगा! अब यहीं देखिए, आपके अखबार के पन्ने पलटते समय आपकी प्रस्तुति "आरती संग्रह" वाली पत्रिका फिसलकर जमीन पर गिर पड़ी। मेरी भक्ति भावना को जैसे ठेस लगी। मैंने बिना देर किए श्रद्धाभाव से उसे उठाया और उसके पन्ने पलटने लगा। 

खैर, उसमें छपी आरती इतने बारीक अक्षरों में थी कि आंखें गड़ाकर भी उन्हें पढ़ना मुश्किल था। लेकिन उसी पत्रिका में प्रकाशित विज्ञापन इतने बड़े और चमकीले अक्षरों में थे कि कोई चाहे तो उन्हें एक फर्लांग दूर से भी आराम से पढ़ ले!

तो संपादक महोदय, जैसे भक्ति के कवर पेज की आड़ में दुनियादारी का कारोबार चलता है, वैसे ही अच्छाई की जीत का डंका भी शायद इसलिए पीटा जाता है कि बुराई इत्मीनान से अपना काम करती रहे, है न?

सच तो यह है कि 'अच्छाई' ने ही बड़ी चालाकी से आरे को जरूरत भर के पेड़ काट लेने दिए। इसीलिए वह बाद में प्रकट हुई और पूरे ठसके के साथ घोषणा की, "देखो, यह हुई न बुराई पर अच्छाई की जीत!"

अब इस जीत पर ढोल पीटो, दशहरा मनाओ और अच्छाई की जय-जयकार करो। लेकिन इस उत्सव के बीच यह समझ में नहीं आता कि बुराई हारकर भी आखिर जीत कैसे जाती है और अच्छाई जीतकर भी हार कैसे जाती है! शायद इसीलिए कि अंततः सीता को वनवास भोगना ही पड़ता है।

तो, मेरे समझ से अच्छाई और बुराई की इस नूराकुश्ती में हार-फार या जीत-फीत को कैजुअली-फैजुअली ही लेना चाहिए। इस पर न तो खेद-फेद जताने की जरूरत है और न ही खुशी-फुशी मनाने की। 

यह बाजार और विकास, ये दोनों जुड़वा भाई ही तो हैं। अच्छाई और बुराई की इस पटका-पटकी के खेल के असली रेफरी भी यही हैं। ये जब चाहें, जिसकी चाहें, जीत पर सीटी बजा दें और हम दर्शकों को कभी रुलाएं, कभी हंसाए! 

#चलते_चलते

तो भ‌इया आज चलते-फलते मैं यही सलाह देता हूँ कि आप भी न, इस हार-जीत के चक्कर में ज्यादा न पड़ो आपको जिस बात में खुशी मिले, उसी पर खुशी मनाएं!

#सुबहचर्या

 (८.१०.१९)