दिमाग में कई दिनों से जेन जी-जेन जी नाच रहा था। दिमाग में जेन जी के छाए होने का कारण भी था। क्योंकि कहा जा रहा है कि जेन जी हर उस स्थापित विचारधारा की चूलें हिलाने पर आमादा है, जिसकी जड़े कभी अडिग मानी जाती थीं। और यह भी कि जेन जी किसी भी अवधारणा, स्थापित विचारधारा या आदर्श को अंतिम सत्य मानने को तैयार नहीं। मानो हर बने-बनाए गढ़ को ढहाकर ही ये दम लेना चाहते हों।
खैर, समस्या जेन जी को नहीं है, हो सकता है उनमें लफंटूसई हो। लेकिन समस्या उनके लिए है जो अवधारणा, विचारधारा और आदर्श रचते हैं। समस्या ऐसे लोगों की रोजी-रोटी पर है जिनकी पूरी जीविका ही विचार, आदर्श और अवधारणाएँ गढ़ने पर टिकी है। सोचिए, यदि भारत जैसे देश की सबसे बड़ी आबादी ही आपके वैचारिक उत्पाद खरीदने से इंकार कर दे तो कौन होगा आपका गुणग्राहक, कैसे चलेगी आपकी दुकान?
हाँ नेताओं की चिंता मत करिए। वे मौसम वैज्ञानिक होते हैं हवा चली नहीं कि उसका रुख पहचान लेते हैं। उनकी नेताई फौरन जेन-जी का अवतार धारण कर लेगी और उन्हीं के गुट में शामिल हों जाएंगे। लेकिन बिगड़ेगा तो उनका जो उम्र-भर, रात-दिन अवधारणा, विचार और आदर्श गढ़ते रहे हैं, उनको कौन पूछेगा? उनकी दुकान फीकी होकर बंद हो जाएगी, और इनकी दुकानों पर ताला लग जाएगा।
चलिए उदाहरण दे दें, आजकल सबसे बड़ी जमात लेखकों की है। ये लोग सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया पर खूब हाथ अजमा रहे हैं और कमोवेश हर ऐसा लेखक अपने-अपने प्रकाशन के माध्यम से कालजयी साहित्यिक सृजन परोस रहे हैं। लेकिन जरा कल्पना कीजिए क्या जेन जी को ‘बंधन में डालने वाले’ ऐसे साहित्य पसंद आएंगे? नहीं।
मैं नहीं कहता कि प्रेमचंद, निराला या दूसरे बड़े साहित्यकार अप्रासंगिक हो गए हैं लेकिन इन जैसे साहित्यकारों की बातों पर अब जेन जी का ध्यान टिकेगा? विद्वान विश्लेषक जेन जी के मन:स्थिति की जैसी व्याख्या कर रहे हैं उसके अनुसार तो लगता है जेन जी इस तरह की साहित्यिक वाली परिस्थितियों, कथानकों से बाहर निकल चुके हैं। हाँ इसके साथ ही सबसे बड़ी बात यह कि अब ये वही घिसी-पिटी अनुभूतियां नहीं चाहते, इन्हें तो अब हर पल कुछ नया चाहिए। जो नया देगा, ये उसी ओर लपक पड़ेंगे।
अब भला सोचिए! इस माहौल में साहित्य और साहित्यकारों की कौन सुनेगा?
साहित्यकारों या लेखकों को छोड़िए, यही हश्र बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की भी होने वाली है, अब तक तो सभी की दुकानें चल गई लेकिन आगे अब नहीं चलने वाली।
क्योंकि कहते हैं कि यह जेन जी किसी लीक को नहीं पकड़ कर चल रहे। उन्हें तो बस मोबाइल की स्क्रीन स्क्रॉल करते रहना है। एक बात पर उँगली रुकी नहीं कि दूसरी उसकी जगह लेने को तैयार मिलती है। एक बात पर थिर हुए नहीं की सामने दूसरी बात उसकी काट में आकर खड़ी हो गई! इसलिए ये बिना आगा-पीछा सोचे जो सामने है उसी को मानते हैं, जानते हैं।
इसलिए मेरा मानना है कि अब किसी भी सृजनकर्ता या रचनाकार को जेन जी को ओझल करके नहीं चलना चाहिए। कालजयी सृजन की बात तो दूर, आपकी रचना उनके अनंत स्क्रॉल में विलीन हो जाएगी।
तो भइया, आज लेखक, बुद्धिजीवी, पत्रकार, सभी को चाहिए की अपने-अपने ‘धनुहा-बाण’ धर कर जेन जी की शरण में चलें, अब सब उन्हीं की कसौटी पर हैं। जो इस कसौटी पर खरा उतरेगा, वही पढ़ा जाएगा; बाकी सब उनके अनंत स्क्रॉल में खो जाएंगे।
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