शनिवार, 9 मई 2026

लोकतंत्र: शादी का लड्डू

       दिनभर मानसिक और शारीरिक थकान बनी रहे तो अलसुबह उठना थोड़ा मुश्किल होता है। बस कुछ देर और सो लेने के बहाने आराम करने का मन होता है। ऐसी स्थिति में अकसर टहलना स्थगित हो जाता है। लेकिन आज की सुबह अलसाए मन को चपत लगाया। समय पर उठ गया। टहलते-टहलते उस पहाड़ी पर चढ़ता गया जिसपर विकास भवन है। दूर से यह विकास भवन जैसे पर्यटक-गृह लगता है। वैसे पहाड़ की ऊँचाई पर यह नहीं बनना चाहिए था। क्योंकि विकास धरातल पर हो तभी फायदेमंद होता है। तो भवन भी धरातल पर होना चाहिए। ऊँचाई पर होने से यहां फरियादियों की आवाजाही कम रहती है। 

         वैसे तो इस पहाड़ी पर चढ़ने में बढ़िया एक्सरसाइज भी हो जाती है। इसीलिए यहाँ शहर के लोग भी सुबह-सुबह टहलने आ जाते हैं और विकास भवन के चारों ओर बनी कोलतार की सड़क पर चक्कर लगाते हैं‌। मैं भी इसी सड़क पर टहलने लगा था। खैर.. 

         इस सड़क पर टहलते कुछ लोग आपस में बतिया रहे थे। कोई कह रहा था,

       "अपने समाज के लोगों से कह दिया गया है कि यदि कोई वोट मांगने आए तो साफ बता दें कि हमारा समाज तय कर चुका है कि कहाँ वोट देना है..अब हम कुछ नहीं कर सकते..हमारा भी वोट वहीं जाएगा।" 

           यह बात मन को कुरेद गई। मुझे याद आया। एक बार मैंने एक कार में लिफ्ट लिया था। उस कार का ड्राइवर कम पढ़ा-लिखा लगा था। वह गँवई था। लेकिन उसकी बातों से लगा कि काम धंधे के चक्कर में उसे दुनियादारी का बखूबी ज्ञान हो चला है। बातचीत में उसने कहा था - 

      "साहब जी, विधायकों और सांसदों को ही मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार होना चाहिए।" 

         उसकी बात पर मैंने जब कहा कि "यही चुनते हैं" तो उसने अपनी बात का मतलब समझाया - 

          "नहीं सर जी, मेरा मतलब यह है कि पार्टी-शार्टी की व्यवस्था (राजनीतिक दल) खतम होनी चाहिए.. लोग अपने दम पर चुनाव लड़ें.. इनमें जो अच्छा हो, वह जीते… और फिर यही जीते हुए विधायक या सांसद मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का चुनाव करें.. ऐसी व्यवस्था में, ये मंत्री-संन्त्री जो चुनाव प्रचार के लिए निकलते हैं और इससे जनता का जो जी हलकान होता है, वह नहीं होगा.. सब अपना-अपना ही प्रचार करेंगे.. सरकार को भी कोई व्यवस्था नहीं करनी होगी और व्यर्थ का सरकारी ताम-झाम भी नहीं रहेगा, पैसा भी बचेगा..."  

       यह बात मुझे भी काफी-कुछ जमीं थी! रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझा आम आदमी चाहे जितने दंद-फंद से घिरा हो, तमाम समस्याओं पर सोचता वह भी अंततः सकारात्मक ही है! 

          अब तक विकास भवन का मेरा दो चक्कर हो चुका था। लौटने को हुआ तो एक क्षण के लिए विकास-भवन की इस पहाड़ी से ऊपर पूरब दिशा में क्षितिज को निहारा..दूर स्लेटी रंग की पहाड़ियों के ऊपर सूरज की हलकी-हलकी लालिमा बिखरनी शुरू हो चुकी थी.. मन जैसे आनंदित हो उठा! इधर नीचे महोबा शहर की लाइटें सुन्दर नजारा पेश कर रहीं थी। ईश्वर को धन्यवाद दिया कि भले ही तुम्हारी बनाई दुनियाँ निरुद्देश्य सी हो लेकिन मेरी ये अनुभूतियाँ तो सच्ची ही हैं।

        टहलकर मैं वापस आया था। चाय बनाया, चाय की चुस्कियों के बीच अखबार पढ़ने लगा। 

     सम्पादकीय "वोट डालने निकले" पर ध्यान गया। फिर घर से बात की "श्रीमती जी ने कहा वोट डालने क्या जाएं! ये वोट लेने वाले केवल भ्रमित ही तो करते हैं।" इस बात पर उनसे कुछ नहीं कहा। 

      लोकतंत्र मुझे शादी के लड्डू जैसा लगा। जो खाए वो भी पछताए, और जो न खाए वह भी!! 

#सुबहचर्या

  

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