बुधवार, 23 जुलाई 2014

यह बदलाव....!!

         बहुत दिन बाद अपने गाँव जाना हुआ था..उस दिन फुर्सत का दिन था...! सूर्य अस्ताचल की ओर था..हाँ..याद आ गया कि इधर कई वर्षों से सीवान की ओर नहीं गया था..अपने खेतों को तो लगभग मैं भूल ही चुका था..मिट्टी से अपनेपन की लालसा जागी तो नहर की पटरी पकड़े सीवान की ओर चल दिया.. सीवानशब्द का प्रयोग तो केवल मैं अपनी इस लेखनी में कर रहा हूँ वैसे बचपन से हम उसे ताल ही कहते आये हैं..वह कई किलोमीटर में फैला निर्जन क्षेत्र है जहाँ लोगों के खेत हैं..आज...मैं सोचता हूँ कि उसे ‘ताल’ का संबोधन क्यों दिया गया था..तो..बचपन की स्मृतियों पर थोड़ा जोर डालना पड़ता है..तब उस ताल में आज के जैसे लोगों के खेत नहीं थे...उसका अधिकांश भाग परती हुआ करता था..और वर्षाकाल में उसका अधिकांश भाग जल से डूबा रहता था..जिसका जल उसके एक छोर से बहते नाले से धीरे-धीरे निकलता रहता था..यह क्रम वर्षाकाल समाप्त होने के बाद लगभग कुवार मास के अंत तक चलता रहता था...और आज मनरेगा से ड्रेन की ऐसी खुदाई की गई है कि पानी कब बरसा और कब उस ड्रेन से निकल गया पता ही नहीं चलता...जबकि भू-जल रिचार्ज का रोना रोया जाता है...हाँ...तब उस क्षेत्र में धान के आलावा यदा-कदा गेहूँ की फसलें ही हुआ करती थी..और वह भी उस ताल में स्थित छोटे-मोटे तालाबों में एकत्रित वर्षा-जल के सहारे..! लोग 'दुबले' के सहारे सिचाई करते थे..बचपन में एक बार मेरे परिवार के एक बुजुर्ग ने हम बच्चों को एक कहानी सुनाई थी कि कैसे उसी ताल में एक भूत के साथ उनके किसी पूर्वज ने रात भर दुबला चलाया था..! इस कहानी के याद आने पर मेरे चेहरे पर बरबस मुस्कुराहट तैर जाती है... 
     उस ताल के संबंध में एक बात और याद आती है..हाँ मोहन..! शायद यही नाम रहा होगा उसका..! अपनी बाल्यावस्था में मैंने प्रतिदिन प्रातः मोहन को पशुओं के एक बड़े समूह को उसी ताल में ले जाते हुए देखा करता था.....दादा जी कहते थे कि पशुओं को वह ताल में चराने ले जाता है.. और सायं इसी प्रकार वह पशुओं के समूह को लेकर वापस लौटता था..तब दादा जी उसे देखते हुए कहते थे कि देखो गोधूलि की बेला हो गयी है पशु अब लौट रहे है.. “गोधूलि” शब्द से मेरा परिचय बखूबी उसी समय हुआ था...तब दादा जी ने यह भी समझाया था कि शाम को लौटते पशुओं के खुरों से धूल उड़ती है इसीलिए सायंकाल को गोधूलि बेला कहते हैं...खैर..! अब न तो पशु बचे हैं और न वह ताल बचा है... 
            बाद में चक-बंदी आई..! तमाम विवादों के बाद उसी ताल में गाँव के लोगों के चक काटे गए...जहाँ गाँव के किसानों ने खेती प्रारंभ कर दिया..उसी समय यह नहर निकली थी.. तब हम बच्चे बड़े कौतूहल से इस नहर की खुदाई का कार्य देखते थे और खुदे हुए भाग में खूब दौड़ लगाते थे...अब वहाँ न कोई भूत आता है और न ही दुबला चलाने की जरुरत होती है....इसी नहर के कारण आज उस ताल में गेहूँ और धान की फसलें बराबर हुआ करती है...उसी नहर की पटरी से आज मैं सीवान की ओर चला जा रहा था..आचानक मेरी नजर नहर की पटरी पर पड़ी अब उस पर मनरेगा से खडंजा भी लगाया जा चुका था जो कुछ दूर नहर की पटरी से होते हुए गाँव की सीमा से थोड़ा बाहर मुसहरों की बस्ती की ओर घूम जाती हैं..मन में आया कि गाँव के प्रधान ने खडंजा लगा कर अच्छा कार्य किया है...दृष्टि मुसहरों की बस्ती की ओर घूमी..आज भी उस बस्ती का रंग ढंग नहीं बदला था...वही छोटे-छोटे छप्पर वाले घर..! हाँ इंदिरा आवास योजना से बने घर भी दिखाई दे रहे थे...लेकिन उस बस्ती में चहल-पहल झोपड़ियों की ओर ही थी...फिर...मैं नहर की पटरी पकड़े हुए आगे ताल की ओर बढ़ता रहा...
          हाँ...उस तालाब के पास मैं पहुँच गया था...जो इस नहर की पटरी के बायीं ओर स्थित है..उस तालाब को मै बहुत गौर से देखने लगा..तब नहर नहीं हुआ करती थी..मेरे बचपन के दिनों में उस तालाब में सिंघाड़े की खेती भी हुआ करती थी कई बार बचपन में लगभग दादागीरी तो कई बार चोरी के अंदाज में सिंघाड़े निकाल कर खाए थे..! खैर बाद में दादा जी के भय से सुधार हो गया..तो..उसके मालिक से सिघाड़े खरीद लिया करता था.. हाँ तालाब को देखने से एक बात और याद आ गई...तब इस तालाब के भीटों पर बहुत सारे नीम के पेड़ हुआ करते थे..और इन नीम के पेड़ों पर शाम के समय कौओं के इतने झुंड बैठा करते थे कि दूर घर से ये नीम के पेड़ काले नजर आते थे..तथा उनका काँव-काँव दूर घर तक सुनाई पड़ता था..! लेकिन..आज अब वे पेड़ ही नहीं बचे हैं, ले दे कर मात्र नीम के दो जर्जर पेड़ ही नजर आ रहे हैं वे भी पेड़ों के अवशेष जैसे लग रहे हैं..और कौवे तो एकदम नदारत..! हाँ..भीटों का भी अवशेष ही बचा है..! अरे..! इस तालाब से थोड़ी ही दूर एक बहुत पुराना भीटा भी था अब वह नहीं दिखाई दे रहा है...उसके बारे में बचपन में कई किवदंतियां भी सुनी है..शायद मिट्टी के माफियाओं ने उसकी मिट्टी को खोद कर बेंच दिया है..सोचा...सियार बेचारे अब अपनी माँद कहाँ बनायेंगे..! इन सब को देखते हुए मैं थोड़ा और आगे बढ़ गया...उस ताल के दूर..अंतिम छोर की ओर निगाहें चली गयी..देखा कई ऊँची-ऊँची चिमनियाँ घना काला धुँआ उगल रही थी..हाँ ये चिमनियाँ उस औद्योगिक क्षेत्र की हैं जो बीसेक वर्ष पूर्व वहां स्थापित हुआ था..जहाँ कई छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां स्थापित हो चुकी हैं...
        हाँ.. अब शाम थोड़ी गहराने लगी थी..उन चिमनियों और उस क्षेत्र के भवनों पर विजली की रोशनियाँ जगमगा रही थी..इन सब को देख पता नहीं मन क्यों नहीं खुश हुआ..फिर वापस लौटने को हो गया...तो उन महुओं के विशाल पेड़ों की ओर ध्यान चला गया...जो एक दूसरे तालाब के किनारे स्थित थे..हाँ..याद आ रहा है उसी तालाब पर गुड़ुई के त्यौहार (नागपंचमी) पर कई बार मैं अपनी बहनों के साथ दादा जी के बनाए रंगीन नीम के डंडे के साथ गुड़ुई पीटने आया था..और महुए के उन्हीं पेड़ों के नीचे कजरी के गीत गाते हुए बहनों की याद घनी हो गयी...पर अफ़सोस वे विशाल महुए के पेड़ अब नहीं थे...बल्कि उनके स्थान पर मनरेगा से एक बड़ा तालाब खुदवा दिया गया था...पता नहीं क्यों..आखें भर आई...! थोड़ा तालाब के पास जाकर देखा तो खुदाई से निकले मिट्टी के भीटों पर एक छोटी सी झोपड़ी दिखाई दी..सोचा इतने निर्जन में यह झोपड़ी कैसे तो ध्यान में आया अब इस तालाब में मछली पालन होने लगा है और यह झोपड़ी उसके रखवाले की है...अब वहाँ गुड़ुई नहीं पीटी जाती...और न ही बहनें कजरी गाने आती हैं...
       अब मैं लौट पड़ा पुरानी यादों को मन से झटक चुका था....अचानक थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर मेरी निगाह जमीन की ओर देखते हुए ठिठक पड़ी..कारण...वहाँ फावड़े से खुदा हुआ एक छोटा सा गड्ढा दिखा था..लगा जैसे कोई किसी बिल को खोद रहा होगा...देखा मुसहरों की बस्ती नजदीक थी..याद आ गया बचपन में मैंने कई बार मुसहरों को इसी तरह गेहूँ की फसलों के कटने के बाद खेतों में बिलों को खोदते हुए देखा था...और उनसे चूहों को पकड़ते हुए भी देखा करता था..चूहों को वे पटक कर मार डालते और उसे अपने पास रख लेते थे..बाद में दादा जी ने बताया था कि वे इसे भून कर खाते है..इसी लिए इनका नाम 'मुसहर' पड़ा है... हाँ..तो क्या इतने वर्षों बाद भी उनकी वह पुरानी आदत नहीं गयी..? आज भी वे उसी तरह चूहे मार कर खाते हैं...? हाँ..आज भी उनमें कोई परिवर्तन नहीं आया है..मैंने आज तक नहीं सुना कि मेरे गाँव के उस मुसहर बस्ती का कोई बच्चा प्राथमिक शिक्षा को पार किया हो...बल्कि शायद ही कोई मुसहर का बच्चा हो जो उस बस्ती के थोड़ी ही दूर स्थित प्राइमरी विद्यालय में...जिसमें मैंने शिक्षा ग्रहण की थी...पढ़ने गया हो..! और तो और..उनके लिए बने इंदिरा आवास निर्जन पड़े हैं वे उसमें नहीं रहते..पता नहीं क्यों उन्हें अभी भी झोपड़ियों में ही रहना पसंद है...कई बार पूँछने पर किसी अज्ञात भय या भूत का डर मानते हुए वे उन बने इंदिरा आवासों में नहीं रहना चाहते...हाँ खेत उनके पास नहीं है..किसी-किसी मुसहर परिवार को एकाध विस्वा भूमि ग्रामसभा ने पट्टा कर रखा है...लेकिन उनमें वे खेती भी नहीं करते...हाँ आज भी रोज कुआं खोद कर पानी पीने जैसी उनकी पुरानी आदत बरकरार है...संचय की कोई प्रवृत्ति उनमें नहीं आ पाई है...
       हाँ याद आ गया आज ही तो पिता जी ने कहा था कि अरे..! धान की रोपाई के लिए खेत तैयार होना है लेकिन ‘हरी’ अभी तक नहीं आया है..हरी और कोई नहीं बल्कि तीसों साल से हमारे खेतों का काम देखने वाला पुराना...नौकर तो नहीं कहेंगे...और न ही हलवाहा..क्योंकि अब तो हल बैल तो है नही..हाँ उसका काम यही होता है कि वह समय-समय पर मजदूरों को पकड़ कर खेती का काम करा दिया करता है...और छिट-पुट अन्य छोटे-मोटे काम कर दिया करता है..कई बार जब पिता जी उसके काम की लापरवाही से नाराज होकर खेतों को बटाई पर दे देने की बात उससे कहते हैं तब वह कामों में थोड़ी तेजी दिखाने लगता है...लेकिन आजकल वह कुछ अधिक ही पीने लगा है...पीते-पीते अब वह अपने स्वास्थ्य के प्रति भी लापरवाह हो चुका है..पिता जी ने बताया कि उसमें अब चोरी करने की आदत भी पड़ चुकी है...बाद में जब उसने सुना कि मैं गाँव आया हूँ तो मुझसे मिलने आया था...मैंने उसे कुछ रुपये भी दिए हालाँकि पिता जी ने कहा था कि वह इन रुपयों को पीने में खर्च कर डालेगा..यह सब सुन कर मुझे बड़ा दुःख हुआ मेरे बचपन के दिनों में वह ऐसा नहीं था...सोचने लगा शायद यही कारण है कि ये अल्पायु में ही गुजर जाते हैं तभी तो मेरे देखते-देखते इसकी तीन पीढ़िया गुजर रही है...बाद में पिता जी ने बताया कि आजकल मनरेगा में काम करता है..कभी-कभी बिना काम किए भी पैसा पा जाता है..मेठगीरी भी करता है...और बी०पी०एल० का अनाज भी पाता है...तो मेहनत क्यों करेगा..!
     खैर..कुछ भी हो इन मुसहरों की स्थिति में आज भी कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है...वही आदिवासियों जैसा रहा-सहन किसी तरह की कोई आर्थिक सोच नहीं..जब तक झोपड़ी में खाने के लिए कुछ है तब तक काम पर भी जाने से कतराते हैं..बीमारी को आज भी भूतों का चक्कर मानते हैं...इनका विकास कैसे होगा..यह मनरेगा, अन्त्योदय,बी.पी.एल. आदि जैसी योजनाएँ इनमें बदलाव क्यों नहीं ला पाई हैं..
      सोचता जा रहा था...सरकारों ने इन्हें जनजाति का दर्जा क्यों नहीं दिया...साँझ अब गहरा चुकी थी..हाँ इनकी बस्तियों की ओर फिर निहारा..अँधेरा गहराया हुआ था...फैक्ट्री की चिमनियों के काले घने धूएँ इस मुसहर की बस्ती के ऊपर भी काले साए की तरह दिखाई देने लगे थे....दो-चार-एक बिजली के बल्व अपनी रोशनी वहाँ बिखेर रहे थे...और..कोई लाउडस्पीकर से बम्बइया फ़िल्मी गाने भी बजा रहा था...इनकी मनोवृत्ति कैसे बदलेगी इनकी इस स्थिति के लिए कौन दोषी है...सोचते-सोचते मैं घर की ओर बढ़ गया..
     कल जिले के आलाधिकारी मुसहरों के विकास के संबंध में एक बैठक करने वाले हैं उस बैठक की भी तैयारी करनी है..कुछ रिपोर्टें भी लेनी है...सोचता हूँ अब इस लेखनी को यहीं विराम दे दें...
       

शुक्रवार, 13 जून 2014

अरे इन दोऊ राह न पाई

            आज मन कुछ उदास था..अन्यमनस्कता में मन काम के प्रति एकाग्र नहीं हो पा रहा था..मन को कुरेदा..आखिर ऐसा क्यों? तो पता चला इधर कई दिन हो गए थे स्वजनों से मिले हुए..! मुझे अपनी मन:स्थिति का कारण समझ में आ गया...अकसर जीवन में एकरसता, वैचारिक उलझाव और इन सबसे बढ़कर अपनों से कटाव मन को उद्विग्न बनाकर उदासी की ओर ढकेल देता है, जो धीरे-धीरे अवसाद का भी कारण बन जाता हैं...खैर, ऐसी मनःस्थिति में मित्र महोदय से मिलना जरूरी था...क्योंकि...हम दोनों एक दूसरे के अकेलेपन के साथी भी हैं और इस अकेलेपन में आपसी कुरेदबाजी से हम अपनी समस्याओं का हल खोजकर मन को भी समझा लेते हैं..

           कुछ देर बाद मैं मित्र के घर के सामने था...घर के खुले दरवाजे के सामने मैं ठिठक पड़ा, उसी समय उनकी आवाज सुनायी पड़ी, “अन्दर आ जाओ भाई...!” मैं सीधे उनके कमरे में प्रवेश कर गया..देखा, वे अभी भी अपने बिस्तर पर आराम की मुद्रा में लेटे हुए हैं....थोड़ा एक ओर खिसकते हुए उन्होंने मुुझे भी उसी बिस्तर पर बैठने का संकेत किया...खैर मैं बैठा...कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उनके गंभीर मुखमुद्रा पर निगाह जमाते हुए मैं पूँछ बैठा, “क्या बात है..किसी चिंतन में लीन हैंं क्या..? या फिर यह अकेलेपन की समस्या है..?” मेरे इस प्रश्न पर बिस्तर पर थोड़ा उठते हुए पीठ को सिरहाने टिकाकर आराम की मुद्रा में बोले, “अरे यार..अभी तो मैं कल ही घर से आया हूँ...अकेला-फकेलापन वगैरह कुछ नहीं है...मुझे अकेलापन कभी नहीं सालता..! क्योंकि मेरा अकेेलापन मुझे स्वयं को सहेेजने के काम आता है.."  "फिर तो ऐसी मुखमुद्रा में आपको नहीं  होना चाहिए...?” मैंने विनोद भाव मेंं कहा। इसपर मेरी ओर ध्यान से देखा और बोल पड़े-

           “बस यार..आजकल अजीब सी असहमतियों का दौर चल निकला है..न जाने क्यों अब असहमतियाँ पीड़ादायी बनती जा रही हैं..असहमतियों के बीच में बातें बड़ी आसानी से गुम हो जाती हैं...चलो अच्छा संयोग है तुम आ गए..!"

            “अरे भाई अगर असहमतियाँ नहींं होंगी तो फिर बातें ही क्योंकर होगी..! लेकिन पीड़ादायी..! यह मैं समझा नहीं.." मुझे मित्र की बात में रुचि हो आई और कुछ देर के लिए ही सही मुझे उनकी बातों से अपनी अन्यमनस्क मनःस्थिति से निकल आने का मार्ग दिखाई दे गया..!

            “देखो यार तुम तो जानते ही हो, आज-कल मैं भी गाहे-बगाहे कुछ लिखने की कोशिश करता रहता हूँ...इस बार अभी जब मैं घर गया था..एक ऐसा ही अपना लिखा श्रीमती जी को सुनाने का प्रयास किया था...” कहते हुए मित्र ने मेरी ओर देखा..

           मैं तपाक से पूँछ बैठा, “तो क्या उनने सुनने से मना कर दिया...!”

           “नहीं यार..! जैसे उनकी सुनना मेरी मजबूरी, वैसे ही मेरी भी सुनना तो उनकी मजबूरी है..! और तुम तो जानते ही हो, पत्नी से बढ़िया श्रोता कम से कम कोई दूसरा नहीं हो सकता...बस उनकी इसी मजबूरी का फायदा मैंने उठाया और उनसे अपनी लेखकीय क्षमता की डींग मारना चाहा..क्योंकि उनकी नज़रों में मैं बेवकूफ ही हूँ...!”

           मेरी प्रतिक्रिया की परवाह न करते हुए मित्र महोदय ने आगे फिर जैसे अपनी व्यथा-कथा कहने के अंदाज में बोलते गए..

           “मैंने अपनी लिखी एक कहानी उन्हें सुनाई...जानते हो... जैसा एक लेखक करता है..एक थोड़े से यथार्थ में अपनी कल्पनाशक्ति का प्रयोग मैंने उस कहानी में किया था..कहानी सुनाने के बाद जब गर्वित भाव से मैंने श्रीमती जी की प्रतिक्रिया जाननी चाही...तो..!”

           “तो उनकी प्रतिक्रिया क्या थी...?” मैंने उनकी व्यथा टटोलने के प्रयास में पूँछा।

           “तो..उन्होंने उस कहानी की सच्चाई के बारे में पूँछा..मैंने उन्हें कहानी के यथार्थ पक्ष के बारे में बताया..जो मन को झकझोरने वाली एक घटना थी..फिर आत्मश्लाघा में मैं उन्हें समझाने भी लगा कि कैसे अपनी कल्पनाशक्ति का प्रयोग करते हुए मैंने इस कहानी को लिखा है..इस पर जानते हो उन्होंने क्या बोला...?” कहते हुए मित्र महोदय ने मेरी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा..! और मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना मेरी जिज्ञासा शान्त करते हुए फिर बोले..

          “कहानी के यथार्थ पक्ष और उसके कलात्मक पक्ष को सुनने के बाद श्रीमती जी कुछ देर तक तो मुझे मौन घूरती रहीं और फिर बोली कि हूँ....तो तुम इस कहानी के माध्यम से समाज को सन्देश देना चाहते हो...है न..? इसपर मैं भी कह बैठा...हाँ..हाँ तुमने सही पकड़ा...जानते हो इस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया रही..?”

          खैर, मित्र महोदय बोलते रहे-

          ‘पत्नी बोली...अच्छा..!! इतनी सीधी बात को इस तरह घुमा फिरा कर कहने की क्या जरुरत है..हाँ उनका इशारा मेरी कहानी की ओर था..उन्होंने कहा...अपनी बात सीधी तरह से भी तो कह सकते हो...लोगों पर इसका सीधा असर होता...! एक सीधी और सच्ची बात जब कहानी के रूप में कही जाएगी तो उसका यथार्थ गौण हो जाएगा...उसके कला-पक्ष की ही चर्चा अधिक होगी...जैसे शिल्प ऐसा है वैसा है आदि-आदि...समाज पर इस कहानी का क्या प्रभाव होगा सिवाय तुम्हारे थोड़ा चर्चित हो जाने के..! और फिर जानते हो उन्होंने क्या कहा...?”

             अपने इस लम्बे कथन के साथ मित्र ने मेरी ओर कातर भाव से देखा..लेकिन मैंने उनकी इस कातरता को नजरअंदाज करते हुए निष्ठुर-भाव से पूँछा, क्योंकि मुझे उनकी बातों में मजा आ रहा था-

             “आपकी पत्नी जी ने क्या कहा..?”

             “अरे यार उनको कहना क्या था जो उन्हें कहना था उसे उन्होंने कह ही दिया था लेकिन ऊपर से यह भी कह दिया कि कम से कम इसे कहीं छपने के लिए भेज दो ताकि कुछ पैसा मिले तो घर का खर्च भी चल जाए..!”

          मित्र की इस बात पर मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी जी ने मजाक किया होगा...छोड़ो इस बात को...हाँ, बात को सीधे ढंग से कहने की उनकी बात मुझे जम रही है...”

            “यही तो मेरी पीड़ा है तुम भी उन्हीं जैसी बात कर रहे हो...! ये बताओ, क्या यह कबीर का जमाना है...कि कोई अपनी बात सीधे और सपाट ढंग से कह दे..? वह पांच-छः सौ साल पुरानी बात है कि लोग सीधी और सपाट बातें सुन लेते थे..! आज कह कर देखो....! चौराहे पर खून बह जाएगा..! वह कबीर ही थे कि मुल्ला और पंडित दोनों की खिल्ली उड़ाई...आज किसी में है यह दम कहने और सुनने की..! और..कहते हो कि अपनी बात सीधे सपाट ढंग से कह दो..!” कहते हुए मित्र महोदय उत्तेजित हो चुके थे..!

            उनकी बात से मैंं थोड़ा शांत और चिंतन की मुद्रा में आ गया..लेकिन अगले ही पल मैं बोला, “यार बात तो ठीक ही कहते हो...हम कभी समझदार नहीं रहे..तभी तो कबीरदास जी ने कहा था...अरे इन दोऊ राह न पाई...अगर ऐसा होता तो छोटी-छोटी बातों मेंं किसी निर्दोष का खून न बहता..या फिर मात्र अपने विचारों के लिए
हम आपस में न लड़ रहे होते..!

             “अरे दोऊ नहीं भाई ! हम तो कहेंगे...कोऊ न राह पाई.. यार..! सब मरगिल्ले पागलों की भांति एक-दूसरे को मिटाने पर तुले हैं...तिस पर कोढ़ में खाज यह राजनीति...!!”

           इसी के साथ मित्र महोदय जैसे अपनी सारी व्यथा-कथा बयाँ कर चुके थे...मैंने उनके हलके होते मूड को भाँप लिया और कह बैठा,

            “यार आप की पत्नी जी समझती नहीं..आज के जमाने में कथन सीधे सपाट नहीं कलात्मक लहजे में ही होना चाहिए..आखिर..कहने वाले की सुरक्षा का भी तो प्रश्न है..!! लेकिन छपवाने की बात उन्होंने सही कही..क्योंकि घर चलाने के लिए पैसे भी तो चाहिए..कला बिकती है तो इसे बेंचने में क्या हर्ज...!! और समाज-वमाज भी अब व्यापारिक हो चला है, इसे व्यापारिक बातों से ही सुधरना है...सीधी सपाट बोली से नहीं..!!”

            यह सब बोल चुकने के बाद मैंने कहा, "यार, मुझे कुछ काम है अपनी वह अदरक वाली चाय पिलाओ तो चलें..." आजकल मित्र महोदय चाय बढ़िया बनाते हैं... चाय पीते हुए हम सब कुछ भूल चुके थे...

सोमवार, 31 मार्च 2014

झंडाबरदार..

                उस दिन मित्र से मेरी नेतृत्व कैसा हों चाहिए इस विषय पर बहस हो रही थी कि अचानक उनके मुँह से निकला,
            "किसी चीज का झंडाबरदार नहीं होना चाहिए। ऐसी स्थिति में हम कुछ नही कर पाते क्योंकि तब हम नारेबाजी के शिकार हो उठते है।"
           आगे उन्होंने फिर जोड़ा,
           "और आज यह इतना अधिक हो रहा है कि लोग व्यंगात्मक हंसी के साथ धीरे-धीरे महत्वहीन करार कर देते हैं।" 
             अब मैं मित्र महोदय से पूँछ बैठा,
             "लेकिन हमें किसी चीज का झंडाबरदार क्यों नहीं होना चाहिए ? आखिर किसी न किसी को तो आगे
आना ही होगा।"
              उन्होंने उत्तर दिया,
              "हाँ यह सत्य है.… किसी न किसी को तो आगे आना ही होगा…, लेकिन झंडाबरदार व्यक्ति के साथ अकसर एक समस्या हो जाया करती है....  क्योंकि अंत में उस व्यक्ति के हाथ में मात्र डंडा ही बचता है और झंडा गायब हो जाता है.... ऐसी स्थिति में व्यक्ति का ध्यान धीरे-धीरे डंडे पर ही अटक जाता है..... और झंडे के गायब होने से वह पथ से भटक जाता है, क्योंकि शक्ति का अकसर दुरूपयोग ही होते देखा गया है।  अतः गंतव्य को ही मंतव्य मानते हुए अत्यंत सावधानी पूर्वक पथ पर अग्रसर होना चाहिए तभी किसी आन्दोलन कि सार्थकता हो सकती है।"
             इतना कह मित्र महोदय आचानक उठ खड़े हुए जैसे उन्हें किसी चीज की याद आ गयी हो और पुनः आने का वादा कर चले गए। मैं भी मन मसोसकर रह गया कि आगे मित्र महोदय से डिटेल में इसपर बात करूंगा।   
 

शनिवार, 25 जनवरी 2014

केजरीवाल अब "अराजक" नहीं "राजक" उन्हें 'काफी-मशीन' की तरह काम करना चाहिए..

            स्वतंत्रता आन्दोलन की समाप्ति के बाद महात्मा गांधी ने कहा था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए। उनके इस कथन के पीछे जो भी कारण रहा हो लेकिन एक बात तो निश्चित है कि उन्हें इस बात का आभास रहा होगा कि आजादी की लड़ाई के लिए जिन आदर्शों को ग्रहण कर इस दल का गठन किया गया था वह भूमिका अब पूरी हो चुकी थी तथा आजादी के बाद एक राजनीतिक दल के रूप में इसकी भूमिका बदल जायेगी और एक नए मानक को अपनाना होगा। एक राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में केजरीवाल की बदली हुई भूमिकाओं की तुलना भी हम इस सन्दर्भ में कर सकते हैं। किसी भी राजनीतिक दल के लिए कुछ प्रतिबद्धताएं और उनका एक पक्ष होता है इसी प्रकार सिविल सोसायिटी के एक सदस्य के रूप में केजरीवाल की जो भूमिका थी वह एक राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में बदल गयी है। उन्हें अपने ‘आन्दोलनकारिता के तत्व’ को उसी अंदाज में एक सत्ताधारी राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में प्रयोग करने पर उसके किस तरह के परिणाम होंगे इस पर भी विचार करना होगा। 
        एक मुख्यमन्त्री के रूप में अपनी कुछ मांगों को लेकर धरने पर बैठने की काफी आलोचनाएँ हो रही है तथा इसके औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा किया जा रहा है, कुछ लोग तो इसे संविधान का उल्लंघन भी बता रहे हैं। यहाँ हमें दो प्रश्नों पर विचार करना होगा प्रथम उनका धरना किस बात को लेकर और किसके विरुद्ध था और दूसरा ‘आन्दोलनकारिता के तत्व’ का ऐसा प्रयोग उचित था या नहीं। हम पहले प्रश्न पर आते हैं; यहाँ दिल्ली सरकार का मुख्यमंत्री केन्द्र सरकार की एक व्यवस्था के विरूद्ध धरना दे रहा था और अपनी सीमा को समझाने का प्रयास कर रहा था। अपनी इस भूमिका में  केजरीवाल एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं बल्कि अपने से सशक्त एक व्यवस्था के विरूद्ध आम आदमी की भूमिका में थे। उनके इस रूप को हम पूरी तरह अनुचित तथा औचित्यहीन नहीं मान सकते। यहाँ इस बात पर ध्यान देंगे कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध हम अपने स्वतंत्रता आंदोलन को अराजकता की श्रेणी में नहीं रखते भले ही वह अंग्रेजों के लिए अराजक रहा हो। इसी तरह स्वतंत्रता के पश्चात तमाम मुद्दों पर सिविल सोसायिटी के आन्दोलनों को भी अराजकता की श्रेणी में नहीं रखा जाता। इसलिए केजरीवाल के धरने पर बैठने की भूमिका को भी हम अराजकता की श्रेणी में नहीं रख सकते। इस संबंध में महत्वपूर्ण यह है कि जिस तंत्र के विरुद्ध हम आंदोलनरत होते हैं उस तंत्र के लिए हम अराजक होते हैं; शायद इसीलिए केजरीवाल ने धरने की भूमिका में अपने को ‘अराजक’ कहा। 

       अब हम दूसरे प्रश्न विचार करते हैं कि केजरीवाल द्वारा ‘आन्दोलनकारिता के तत्व’ का प्रयोग एक मुख्यमंत्री के रूप में किया जाना क्या उसके औचित्य को सही ठहराता है; यहाँ पर केजरीवाल को यह समझना होगा कि अब वह ‘अराजक’ नहीं बल्कि ‘राजक’ हैं और एक व्यवस्था के अंग बन चुके हैं। अतः वह अपने ‘आन्दोलनकारिता के तत्व’ का प्रयोग उसी जाने पहचाने अंदाज में नहीं कर सकते क्योंकि प्रकारान्तर से इसमें ‘स्वयं का विरोध स्वयं के द्वारा’ नामक भाव छिपा है जो स्वयं के व्यक्तित्व को खंडित करती हैं और उन्हें इस व्यवस्थाजनित प्राप्त एक बड़ी भूमिका को छोटी भूमिका में बदल देती है, जिससे उनका उद्देश्य पूरा होता दिखाई नहीं देता। ‘आप’ के इस नेता को अपने उसी पुराने ‘मानसिक तत्व’ को बरकरार रखते हुए अब एक ‘काफी मशीन’ की तरह काम करना पड़ेगा अर्थात जिस तरह बिना सीधी लौ के केवल भाप की ऊष्मा से काफी गर्म हो जाती है उसी तरह अपने “आन्दोलनकारिता के तत्व” के लौ का सीधे तौर पर प्रयोग न कर इससे भाप जैसी ऊष्मा का निर्माण करना होगा जो ठंडेपन की व्यवस्था को बदल सके। इस संबंध में “आप” को कांग्रेस के गठन के इतिहास से भी सबक लेना होगा जब अंग्रजों ने बड़ी चालाकी से विदेशी शासन के प्रति भारतीयों के गुस्से को एक सेफ्टी वाल्व के माध्यम से निकल जाने के लिए कांग्रेस का गठन कराया था लेकिन उसी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत की आजादी में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। निश्चित रूप से यदि “आप” अपने “मानसिक तत्व” को बनाए रखने के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ने का प्रयास करती रहेगी तो पैंसठ सालों से प्रतीक्षित एक नयी गणतांत्रिक आजादी अवश्य आएगी। 
                              ---- गणतंत्र की शुभकामनाओं के साथ                        

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

"पॉलिसी मैटर"

           एक कहावत है कि ‘ईमानदारी सर्वोत्तम नीति होती है’ इस नीति के पालनकर्ता में क्या ईमानदारी का तत्व वास्तव में होता है..? या फिर उसकी ‘नीयत’ में कोई खोट होता है और ईमानदारी उसके लिए केवल ‘पालिसी मैटर’ तक ही सीमित होता है...| यह प्रश्न मन में इसलिए उठा है कि अभी-अभी राजनीति में उभरी एक नयी पार्टी ने अपने मुद्दों पर सरकार बनाने और इन्हीं मुद्दों की शर्त पर कुछ अन्य लोगों को उसे समर्थन देने की चुनौती दे डाली है...उसके मुद्दे इस नयी पार्टी को बेहद ईमानदार दिखाते है जो उसके ईमानदार नियत के प्रतीक हो सकते हैं..लेकिन संदेह इस बात का हो सकता है कि कहीं यह पार्टी का ‘पालिसी मैटर’ तो नहीं है..?
              इस संदेह का कारण राजनेताओं पर से उठता विश्वास, संतों-योगगुरुओं एवं तथाकथित भगवानों के कारनामें और इन सब से बढ़ कर ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता जिनसे पूरे देश को एक उम्मीद जगी...लेकिन उनसे भी टूटती उम्मीदें..! समाज के विभिन्न क्षेत्रों का नेतृत्व करने वाले हर उस व्यक्ति में बुराइयां नजर आने लगी हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों का मसीहा बनने का प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं...और तो और...कौन कितना बड़ा मसीहा है इसके लिए भी लड़ते हुए लोग..! हर तरफ जैसे एक तमाशे का मंच सा सजा हुआ है..! परिदृश्य में फिर भी निराशा...! हम किससे उम्मीद करे...! या फिर जिनसे उम्मीदें हैं वे परिदृश्य में ही नहीं हैं...! क्या यहीं पर ‘नीति’ और ‘नीयत’ का प्रश्न नहीं उठता...!

            कुछ लोगों ने नीति तो बनाई लेकिन नीयत को ठीक नहीं रखा तो कुछ के पास अपनी नीयत पर चलने के लिए नीति नहीं..या फिर नीयत पर ही संकट छा गया। ’ईमानदारी की सर्वोत्तम नीति’ वास्तव में ईमानदारी को एक साधन के रूप में स्वीकार करती है, यहाँ ईमानदारी अपने व्यापक स्वरुप में नहीं होती और साधन के रूप में इतर नीतियों को भी अपनाया जाता है जो साध्य के स्वरुप को भी बदल देता है| यही कारण है कि लोगों ने आज ‘जनकल्याण के लिए सत्ता’ को ‘सत्ता के लिए जनकल्याण’ में बदल दिया है, फलतः तमाम उम्मीदों के टूटते जाने के हम शिकार हो गए हैं| यदि कोई परिवर्तन लाना है तो हमें अपनी नीयत को सर्वोपरि रखना होगा और नीतियों को भी अपनी इसी ‘नीयत’ के लिए बनाना होगा नहीं तो एक बिछे हुए चौसर पर मात्र हम पासे फेंकते हुए ही नजर आएंगे.. आज हमें ‘ईमानदारी की नीति’ नहीं बल्कि एक ‘ईमानदार नीयत’ की आवश्यकता है |   

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

क्या संवैधानिक संस्थाएं किसी के सम्मान की मोहताज भी हो सकती हैं...?

           हमारी संवैधानिक संस्थाओं में जब किसी प्रतिष्ठित या शक्तिशाली राजनीतिक व्यक्ति के विरुद्ध कोई मामला जाता है तो प्रायः उस व्यक्ति द्वारा यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वह इस संस्था की इज्जत करता है इसलिए सम्बंधित संस्था को इसका उत्तर देगा, क्या प्रकारांतर से उसका यह कथन उसके इस अहं को नहीं दर्शाता कि वह चाहे तो इस संस्था को उत्तर ही न दे ? जैसे न्यायालय से कोई बड़ा सजायाफ्ता व्यक्ति यदि यह कहे कि वह न्यायालय के निर्णय का सम्मान करता है..और आगे इसे देखेगा...! क्या कोई एक कमजोर या गरीब व्यक्ति के मुँह से यही वाक्य निकलेगा..? अरे भाई..तुम न्यायालय या इसके जैसे किसी संवैधानिक संस्था की बातों का सम्मान करो या न करो लेकिन वह तुम्हारे सम्मान की मोहताज भी नहीं है..   

बुधवार, 20 नवंबर 2013

पत्रकारिता किसी के उल्लू को सीधा करने का काम न करे..

          लगता है हम सब अब राजनीतिक हो चले हैं इसके इतर जैसे हम कुछ सोचना ही नहीं चाहते...और हर राजनीतिक घटनाक्रम के साथ राजनीतिक वक्तव्य भी राजनीतिक खबर होती है..! बचपन में जब हम अख़बार पढ़ते थे तो प्रकाशित समाचार सूचनाएं हुआ करती थी जिनसे कुछ अस्तित्वमान तथ्यों का बोध हुआ करता था या घटनाएँ ही ख़बर होती थी लेकिन आज किसी के कथन को ही एक ख़बर के रूप में प्रकाशित कर दिया जाता है...खासकर राजनीतिक वक्तव्य को बहुधा खबर के रूप में जगह मिल जाती है...इसके साथ-साथ अन्य वक्तव्य जैसे यदि किसी समाचार-पत्र में 'भारत में गरीबी कम हुई' जैसी हेडलाइन प्रकाशित होती है तो इसको पढ़ते हुए हम इसे एक तथ्यात्मक सूचना मानने की भूल कर सकते हैं..क्योंकि समाचार-पत्र में प्रकाशित यह हेडलाइन मात्र किसी का कथन भर हो सकता है, और आज के समाचार-पत्रों में इस तरह के भ्रमात्मक समाचार शीर्षकों की भरमार होती है|
              आज का मजाकिया जैसा लगने वाला समाचारों का यह मीडिया इसी तरह राजनीतिक कथनों को ही खबरों के रूप में अधिक महत्व देने लगा है..परिणामस्वरूप कोई महान नेता बन रहा है, कोई महान समाजसुधारक बन रहा है तो कोई ईमानदार नेता की छवि गढ़ रहा है और तो और कोई महान संत बन भगवान का दर्जा भी प्राप्त कर रहा है..और शायद इन सब में भ्रमात्मक समाचार-शीर्षकों का विशेष योगदान रहता है...        
             हमें लगता है ऐसी ख़बरों का केन्द्र्विंदु बना व्यक्ति अपने वार-रूम में बैठा कुटिल मुस्कराहटों के साथ प्रकाशित अपने इन ख़बर रूपी वक्तव्यों का हम पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करता होगा...तथा समाचार-पत्रों के लिए एक नए वक्तव्य गढ़ने की तैयारी भी कर रहा होता है...और हम हैं कि अपने मन में ऐसे व्यक्तियों के लिए तमाम उपाधियों को तलाशते रहते हैं...तथा हम अपनी तमाम अपेक्षाओं, आकांक्षाओं को धुल-धूसरित होते हुए भी देखते हैं...हम किसे दोष दें...कहीं हम मूर्खों के साम्राज्य में तो नहीं रह रहे हैं...जहाँ केवल मूर्ख बनाने का खेल खेला जाता हो और कहीं कोई उल्लू सीधा हो रहा हो...लेकिन पत्रकारिता का एक काम तो लोगों को सजग करना भी तो होना चाहिए..!