रविवार, 29 मार्च 2015

दिमाग का स्क्रू ढीला होना कोई बुरी बात नहीं है....!!

            उस दिन श्रीमती जी से मैं अपने परिवार से पाए संस्कारों का डींग हाँके जा रहा था.. “देखो न मेरे दादा जी.., माता-पिता ने मुझे कितने अच्छे संस्कार दिए हैं कि जीवन के तमाम झंझावातों से टकराते-टकराते और अपने विचारों से कोई विशेष समझौता किए बिना आगे बढ़ा जा रहा हूँ..!” श्रीमती जी ने उस समय एक स्थिर और गहरी दृष्टि मुझ पर डाली और बोली, “एक बात कहूँ...?” तत्क्षण मैंने अपने डिग्रियों के लगभग गर्वोन्मत्त भाव से कहा, “हाँ..हाँ..कहो..कहो..क्या कहना चाहती हो...” श्रीमती जी ने लगभग धीमें एवं शान्त स्वर में मुझसे बोली, “तुम्हारा दिमाग नट-बोल्ट से बहुत ज्यादा कस दिया गया है..!” श्रीमती जी ने अपने इस कथन को मेरे लिए बहुत ही नकारात्मकता के अंदाज में कहा था...मैं सोचने लगा अगर उनके लिए ऐसी ही बात है तो उन्हें कहना चाहिए था कि ‘तुम्हारे दिमाग के स्क्रू बहुत ढीले हैं..” क्योंकि नासमझी की परिभाषा अभी तक तो मैं यही सुनते आया हूँ...अब दिमाग का नट-बोल्ट से कसे होने की नई परिभाषा कहाँ से आ गयी...!

       श्रीमती जी द्वारा दिमाग की दी गयी इस नई परिभाषा को समझने के उधेड़बुन में मैं फंस गया..! समझ में न आने पर मैंने श्रीमती जी से ही अपने दिमाग की इस कमजोरी को छिपाने की कोशिश करते हुए पूँछा, “आखिर तुम्हारे कहने का मतलब क्या है..?”
       अब श्रीमती जी ने मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखा, और बोली, “देखो तुम समझने की कोशिश करोगे तभी समझ पाओगे..!” मैं भी पति होने के अंदाज में आ गया और कहा, “पहेली मत बुझाओ मुझसे साफ़-साफ़ बात करो..” यह सुन श्रीमती जी थोड़ा गंभीर सी हो गयी और मुझसे बोली,
       “जब हम छोटे थे न तब भईया..चाचा..आदि जैसे परिवार के बड़े लोग हम बहनों को घर आए किसी नए मेहमान के सामने नहीं निकलने देते थे यहाँ तक कि गाँव में भी किसी के यहाँ कोई बारात आदि जैसे अवसरों पर भी हम लोगों का वहाँ जाना पसंद नहीं करते थे..और तो और जब मैं चौदह-पंद्रह साल की रही होउंगी तभी माँ ने हमें साड़ी पहनाना शुरू कर दिया था तथा कहीं निकलने पर माँ कहती ‘सर पर पल्लू रख लो..’ जरा सोचो...!! अगर हम वही सब पकड़ कर आज तक चल रही होती तो तुम जैसे व्यक्ति के साथ इतने बड़े शहर में बच्चों को लिए अकेले न रह पाते क्योंकि तुम अपने तरीके से अपनी नौकरी में ही व्यस्त रहते हो...!” मुझे यह सुनाते हुए श्रीमती जी मौन हो गयीं...और इधर मेरे लिए भी अब समझने के लिए कुछ बाकी नहीं रह गया था..
       ....मैं चुपचाप सोफे पर पसर टी.वी. देखने लगा था... ‘आप’ में चल रहे जबर्दस्त अंतर्कलह का सजीव प्रसारण चल रहा था...मुझे श्रीमती जी की कही बात याद हो आई...ये बेचारे प्रशांत भूषण...योगेन्द्र यादव...आनंद कुमार जैसे लोग अपने दिमाग को नट-बोल्ट से ज्यादा कस लिए हैं...जबकि देखो न केजरीवाल भी तो उन्हीं के रास्ते के खिलाड़ी थे...! लेकिन उनने अपने दिमाग के पेंच ढीले कर लिए हैं...मतलब साफ़ है..दिमाग का स्क्रू ढीला होना कोई बुरी बात नहीं है....!! 
          अंत में....जीवन में हमें एक विवेकपूर्ण स्पेस लेकर चलना चाहिए...       

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

सत्य और धर्म...!

         हम सब के मन में आज-कल एक प्रश्न घुमड़ पड़ता है कि आखिर आज के सन्दर्भों में सत्य और धर्म किसे माने...? कारण...! आज की तमाम दुनियावी आकांक्षाओं, प्रतिस्पर्धाओं में इन दो शब्दों का मानक बदलता हुआ प्रतीत हो रहा है....
         लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है कि क्या सत्य है; क्या धर्म है; इस विषय पर कन्फ्यूज हो सकते हैं...?
         इस विषय पर मेरा एक चिंतन है कि वास्तव में सत्य और धर्म आपके लिए कब महत्वपूर्ण होता है या फिर आपके जीवन के ये दो वैचारिक तत्व कब प्रकट होना चाहते है...या इनकी आवश्यकता आपको कब पड़ती है..? शायद उन्हीं क्षणों में इसका अर्थ पाया जा सकता है...युद्ध के क्षणों में विचलित अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता के ज्ञान से इसका अर्थ समझाया था...! ठीक उसी प्रकार जीवन के द्वंद्वात्मक क्षणों में सत्य और धर्म अपने आप स्पष्ट होने लगता है...जीन पॉल सार्त्र के आस्तित्ववाद के दर्शन से भी इस तथ्य को समझा जा सकता है...जब कोई व्यक्ति अपने को फेंका हुआ पाता है तो वह अपना अस्तित्व निर्मित करने लगता है...अन्य शब्दों में कहें तो उसके लिए उसका सत्य और धर्म निर्मित होने लगता है....!  
        एक अन्य तथ्य पर भी विचार कर सकते हैं..कल्पना करिए कि इस धरती पर आप एकदम अकेले हैं...उस परिस्थिति में आप के लिए सत्य और धर्म क्या होगा? ऐसी स्थिति में यह भी हो सकता है कि इस अकेलेपन में 'सत्य' और 'धर्म' की कोई आवश्यकता ही न पड़े। इस परिस्थिति में पड़ा व्यक्ति केवल जीना चाहेगा, और तब इसमें सहायक बातें ही उस व्यक्ति के लिए सत्य या धर्म होगा। लेकिन समूह या समाज के बीच व्यक्ति के इस जीने के उद्देश्य में भी परिवर्तन होता है और इसके बरक्स 'सत्य' और 'धर्म' का निर्धारण होने लगता है।..क्योंकि तब व्यक्ति और समाज दोनों का उद्देश्य अपने अस्तित्व को उच्चतम स्तर तक ले जाना होता है।
        इस क्रम में यह स्पष्ट है कि वास्तव में सत्य और धर्म कोई स्वतंत्र या स्थिर तत्व नहीं हैं; इसे व्यक्तिश: या सामूहिक जीवन जीने के परिपेक्ष्य में उसके उद्देश्यों के अनुसार ही परिभाषित किया जा सकता है। इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि प्रकृति के साथ व्यक्ति और समाज या तीनों के आपसी अन्तरक्रिया भी इसमें एक परिवर्तनकारी तत्व माना जा सकता है। अतः: सत्य और धर्म को निस्संग या निरपेक्ष तत्व के रूप में ग्रहण करना इसके प्रति एकांगी दृष्टिकोण होगा, जबकि इसका पैमाना व्यक्ति, समाज और प्रकृति के सापेक्ष ही तय हो सकता है। 
        
         मैं मानता हूं कि सत्य या धर्म की खोज करना एक तरह से मेनीप्यूलेशन है, क्योंकि यह खोज का विषय नहीं ! और न ही एक व्यक्ति का सत्य सबका सत्य बन सकता है। इस प्रकार सत्य कोई गणितीय सूत्र भी नहीं है। सत्य एक फेनामिना है अर्थात जो हमें दिखाई पड़े और समझ में आए वही हमारा सत्य है। जिस प्रकार हम कानून की किताबों को पढ़े बिना ही अपने आचरण को तय करते हैं कि हमारा यह कृत्य कानून का उल्लंघन करेगा या नहीं...उसी प्रकार हमारे लिए सत्य और धर्म भी है...यह स्वतः और सहज रूप में तय होता रहता है...और यह किसी व्यक्ति या समाज के लिए आपके द्वारा किये गए आचरण से स्वतः प्रकट हो जाता है...कानून और धर्म की किताबें तो केवल व्यकित या समाज के प्रति किए गए आपके गलत आचरण के दण्ड प्रक्रिया के लिए है..आप इसे पढ़ कर अपना आचरण तय नहीं कर सकते है...हाँ ये पुस्तक केवल धर्मगुरु या वकीलों के लिए अपने-अपने धंधे चमकाने के लिए उपयोगी हो सकते हैं..कहने का आशय मात्र यह है जब आप अपने व्यक्तिगत हित..आशा..आकांक्षाओं को ही लेकर चलते हैं तभी इन पुस्तकों की जरुरत पड़ती है...!!
       अंत में इतना कह सकते हैं कि आप अपने सत्य और धर्म को नकारात्मक उर्जा से मत निर्मित करें..आपका सत्य दूसरों का भी स्वतः सत्य बन जाए..आपका धर्म दूसरों का भी स्वधर्म बन जाए ऐसा ही सत्य और धर्म हो सकता है...!
 बहुत वर्षों पहले जब मैं अपने को इस जीवन में अपने को फेंका हुआ पाया था...तो इस जीवन के लिए अपनी भूमिका को तय करने की जद्दोजहद में उलझ गया था... “क्या कहूँ..?” का एक अंश...

मैं, मौन अपने में उदास,
देख रहा-
अंतर्तम का गह्वर,
आत्माभिव्यक्ति का पड़ा बीज,
खो रहा सत, निःशेष आवरण,
अनुर्वर भूमि, छीजता बीज,
संतुष्टि नहीं, अन्यत्र देख,
संभाव्य ईश्वरता का बीजांकुर
माल्यार्पण की नहीं अभिलाषा
ईश्वर बनने की आतुरता
पर, विस्मृति, यह कि
मानव हूँ, विवेक
बुद्धि का स्वामी हूँ
रहा न कोई
अब भाव सहज
अपना अपना सा
गढ़ रहा सत्य |

                                ----------------- विनय  

अन्ना के नाम पाती

         मैं मित्र महोदय से अन्ना के आन्दोलनों का बखान किए जा रहा था कि वह किस तरह सरकार को अपने फैंसले बदलने के लिए बाध्य कर देते है...लेकिन मित्र महोदय मेरी बातों पर कान ही नहीं दे रहे थे..धीरे से वे अपना हाथ तकिए के नीचे ले गए और जैसे छिपा कर रखे गए किसी चीज को मेरे सामने निकाल रहे हों...! हाँ उनके हाथ में एक पत्र जैसा मुड़ा कागज था..! उसे निर्विकार भाव से मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, “ज़रा इसे पढो..” मैंने उत्सुकतावश इसे पढ़ना शुरू किया....यह ‘अन्ना के नाम पाती’ थी...    

     “आदरणीय अन्ना जी प्रणाम,
          अभी-अभी हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी कानून के विरोध में दिल्ली में आप (पार्टी नहीं) ने धरना दिया था| उस धरने में लाल झंडा थामें इस कानून का विरोध करती महिलाओं के चेहरों पर क्या आपने गौर किया था..? ध्यान से आप देखते तो निश्चित रूप से वे भूमिहीन महिलायें ही रही होंगी..! यदि आप ने इसे नहीं देखा तो एक बार इनसे पूँछ ही लेते कि कितनी भूमि की मालिकान वे या उनके परिवार वाले है...? लेकिन आप ने इसे भी जरुरी नहीं समझा...! और उनका भी इस्तेमाल झंडा ढोने वाले के रूप में किया गया...आप मंच पर हुंकार भरने का तमाशा करते रहे..!!
          अन्ना जी..! देश के किसी भी सुदूर ग्रामीणांचल की गरीब बस्तियों में चले जाइए तो पायेंगे इन बेचारों के पास पैखाने के लिए अपनी जमीन भी नहीं है..और इसके लिए ये मैदान भी तलाशना चाहें तो जमींदार लट्ठ लिए खड़े मिलेंगे...! शायद इसी कारण इन बस्तियों की ओर जानेवाले मार्ग मल से पटे मिलेंगे..खैर...कहने का आशय यहाँ यह है कि आज भी इस कल्याणकारी राज्य और आपके होते यह गरीब समाज भूमिधरी होने के सुख से वंचित है..और..ये ‘मरजाद’ विहीन लोग खुले में शौच जाने के लिए भी अभिशप्त है..!! हाँ जमींदारी उन्मूलन कानून, विनोबा जी का भूदान आन्दोलन तथा इतने भूमि सुधारों सम्बन्धी कानून होने के बाद भी देश की बहुत बड़ी गरीब आबादी भूमि के एक टुकड़े के लिए तरस रही है और भूमि का मालिकान देश के कुछ प्रतिशत मुट्ठी भर लोगों के ही हाथ में आज भी है...! निश्चित रूप से प्रस्तावित भू-अधिग्रहण कानून का कोई प्रभाव इन पर पड़ने वाला नहीं था...
          हाँ अन्ना जी..! ऐसे में मुझे आश्चर्य होता है की जंतर-मंतर पर आप पता नहीं किसके लिए बैठते हैं...क्या एक बार भी आप ने इन वंचितों को भी कोई भू-अधिकार दिलाने के लिए आन्दोलन खड़ा किया..? मुझे तो अब आपका जंतर-मंतर पर बैठना बनावटी और दिखावटी ही अधिक लगता है...बल्कि जैसे यह किसी अन्य स्वार्थ सिद्धि हेतु प्रायोजित और लोगों को धोखा देने वाला हो...जैसे इस उदाहरण में देखा जा सकता है....
          “किसी विकास सम्बन्धी कार्यालय में सैकड़ों लोगों के नाम की सूची देते हुए कोई कहे कि इन लोगों को रोजगार से अभी तक वंचित रखा गया है और योजना होते हुए भी इन्हें कोई रोजगार नहीं दिया गया है...इस समूह के नेता के तौर पर ‘कोई’ कुछ गरीब मजदूर जैसे दिखने वालों के साथ धरने पर बैठ जाए...और..जब इस सूची की जांच की जाए तो पता चले कि सूची में सम्मिलित लोगों ने न कभी काम माँगा और न ही उन्होंने ऐसे किसी सूची पर हस्ताक्षर ही किये...और तो और...जब धरने में शामिल लोगों से उनकी समस्या पर बात की जाए तो रोजगार की बजाय वे आवास, राशन-कार्ड, पेंशन आदि का रोना रोने लगें..! अब इस आंदोलनरत धरने का नेतृत्व-कर्ता एक बरगलाए समूह का नेतृत्व करते हुए दिखा जिसके पीछे का उद्देश्य कुछ लोगों को ब्लैकमेल करना था और इसके पीछे क्षेत्र में अपनी नेतागीरी की धाक ज़माना भी था...”
          अन्ना जी देखा आप ने..! उक्त उदाहरण में नेतृत्व-कर्ता लोगों की वास्तविक समस्याओं के प्रति आन्दोलन-रत नहीं था बल्कि इसके पीछे उसके निहित उद्देश्य थे जो कम से कम उन गरीबों के वास्तविक हितों को साधता दिखाई नहीं दे रहा है...कम से कम आप से ऐसी आशा नहीं की जाती..!
         अन्ना जी...चीजों पर सार्थक बहस होनी चाहिए...हो सकता है भूमि अधिग्रहण कानून में कोई कमियाँ हो...लेकिन देश भी अब गुलाम नहीं है...जो नहीं समझेगा जनता तो उसे स्वयं अपने मताधिकार से पांच साल बाद कुर्सी से उतार देगी...कानून तो बनते-बिगड़ते रहेंगे...लेकिन किस परिस्थिति में एक दूसरी आजादी के आन्दोलन की बात आप कर रहे हैं...? अभी तो आप असली आजादी ही नहीं ला पाए हैं...इन व्यर्थ के आन्दोलनों से कुछ होने वाला नहीं है...!!
         अन्ना जी एक बात और है..आज शहरों का विकास हो रहा है नए-नए आवासीय क्षेत्र विकसित हो रहे हैं, किसानी के लिए सबसे अधिक उपजाऊ भूमि शहरी आवासीय क्षेत्र में बदलते जा रहे हैं...और..सुदूर ग्रामीणांचल का गरीब भूमिहीन मजदूर इन्हीं नव विकासमान क्षेत्रों में आ-आ कर मजदूरी कर अपनी ‘मरजाद’ बचाने में कामयाब हो पा रहा है...लेकिन फिर भी भूमि के लिए मर-कटने वाले किसान किस लालच में अपनी जमीनों को बेंच अपनी ‘मरजाद’ खो रहे हैं..? वास्तव में यह अर्थ-जगत बहुत ही रहस्यमय है...यहाँ ‘मरजाद’ और ‘भूँख’ बाजार में नीलाम होते हैं...और इस नीलामी में कोई न कोई नेता भी बनता रहता है..! प्लीज अन्ना जी..अगर किसी को बचाना है तो सभी को ऐसी नीलामी और इस तरह के नेता से बचाइए..!!
       अन्ना जी...एक बात और है, हो सकता है...आपको यह बात कड़वी लगे...चेहरे-मोहरे, ओढ़ने-पहनावे, टोपी आदि से आप तो शुद्ध रूप से पारंपरिक, सादगी से परिपूर्ण और सांस्कृतिक लगते हैं और इसी कारण आप में भारतीयों के लिए किसी आन्दोलन को खड़ा कर देने की क्षमता भी दिखाई देती है...लेकिन कभी आप ने यह गौर किया है कि यह सुरुचिपूर्ण सांस्कृतिकता, पारम्परिकता किसी देश के विकास में कितना योगदान दे सकती है..?
        हम अपने देश के प्रति इस बात पर गर्व करते हैं कि हम एक प्राचीन इतिहास वाले सांस्कृतिक रूप से संपन्न देश के लोग हैं...हाँ इसी प्रकार इंग्लैंड, यूरोप के लोग भी अपने ऊपर गर्व कर सकते है.. और...एक देश बेचारा अमेरिका है..! जिसके पास सत्रहवीं सदी के पूर्व का कोई गर्व करने वाला इतिहास या परम्पराएं नहीं है जिस पर वहाँ के लोग गौरवान्वित हों..! लेकिन वह सांस्कृतिक और परम्पराविहीन देश अमेरिका..! आज दुनिया का सिरमौर देश है और वहाँ के राष्ट्रपति का स्वागत हम पलक-पांवड़े विछा कर करते हैं...! जबकि पूर्वज-विहीन एक साधारण से व्यक्ति को वहाँ का जनमानस राष्ट्रपति बना देता है...क्यों..? क्योंकि वे अमेरिकी अपने सांस्कृतिक या ऐतिहासिक जीवन से सीखने की बजाय जीवन की व्यावहारिक और वास्तविक आवश्यकताओं को अपनी प्रगति के लिए अधिक उपयोगी मानते हैं..और इसी को विकास का आधार बनाते हैं|
       हमारे यहाँ हालात क्या हैं..? एक चायवाला केवल विकास की बात कर भारत का प्रधानमन्त्री नहीं बन सकता...बल्कि किसी की टोपी पहनने से मना करने के साथ ही प्रच्छन्नं रूप से उसे तथाकथित नॉन-सेक्युलर होने या फिर साम्प्रदायिक होने का आरोप भी धारण करना पड़ेगा...| कारण..? स्वतंत्रता के बाद के हमारे ज्यादातर आन्दोलन वास्तविकताओं की अनदेखी करते हुए तथा स्वतंत्र होने के अहसास के बगैर खड़े किये जाते रहे हैं...जो कुछ दूर जा कर अपनी बेमौत मर जाते हैं..और..यहाँ का जनमानस इन आन्दोलनों से ठगा हुआ अगली चुनाव प्रक्रिया को क्रान्ति के रूप में इस्तेमाल करता है...! बात यहीं पर बिगड़ती है...कुछ लोग भले ही अपनी ‘मरजाद’ बनाए रखें...लेकिन यदि आप जैसे लोग चीजों पर सार्थक बहस न कर इस तरह के आन्दोलनों से लोगों को गुमराह करते रहेंगे तो चुनाव दर चुनाव देश का समय व्यर्थ होता रहेगा...! और..एक क्रांति लोगों के लिए तरसती रहेगी..! क्योंकि..लोगों को कौन अपनी-अपनी ‘मरजाद’ की खोलों से बाहर निकालेगा..?
      अंत में आदरणीय अन्ना जी एक बात और कहना चाहता हूँ...कुछ लोग कह सकते हैं गरीबी तो मानसिकता में होती है या डार्विन के विकासवाद के ‘उत्तरतम के जीवितता’ के सिद्धांत का उल्लेख कर उनकी यही नियति मान लेते हैं| लेकिन आधुनिक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा एवं आप जैसे लोगों के होते ये तर्क आज बेमानी हैं...बस आवश्यकता है आप जैसे लोग किसी के हाथ का खिलौना न बने..! हम आपका बहुत सम्मान करते हैं..!!
                                                                      आपका ही एक शुभचिंतक”

         इसे पढ़ मैंने एक गहरी स्वांस भरी... “हूँ....तो आप इसे छिपा कर क्यों रखे हैं..डरिए नहीं बगैर आपके नाम के मैं इसे अपने फेसबुक में पोस्ट करूँगा शायद अन्ना जी के पास यह पहुँच जाए और वे या अन्य लोग आपके विरुद्ध कोई आन्दोलन खड़ा नहीं करेंगे....” मैंने थोड़ा विनोदपूर्ण अंदाज में कहा...|        

शनिवार, 31 जनवरी 2015

पत्रकार का धर्म, प्रचारक का नहीं होता...

       मेरे एक मित्र हैं कुछ लिखते पढ़ते रहते हैं....मैं उन्हें कभी-कभी पत्रकार मानने की भूल भी कर बैठता हूँ, आज मिलने पर मुझे उनके मुखमंडल पर कुछ-कुछ प्रसन्नता जैसी तिरती हुई महसूस हुई...जो उन्हें शायद स्वयं की लेखनी के प्रति था, मैंने जब इसका कारण पूँछा तो उनका उत्तर इस प्रकार था,
        “देखो यार तुम तो जानते ही हो मैं अन्दर से तथाकथित दक्षिणपंथी राजनीति का समर्थक हूँ और वह भी अपनी कुछ निजी मान्यताओं के कारण...! लेकिन मेरे लिखे को पढ़कर लोग मुझे वामपंथी विचारधारा से मिलते-जुलते विचारों को मानने वाला घोषित किए दे रहे हैं, लेकिन मुझे प्रसन्नता इस बात की है कि लोगों के ऐसा कहने पर यह तो सिद्ध हो ही रहा है कि चीजों के विश्लेषण के क्रम में मैं अपने निजी विचारों को परे रखकर निष्पक्ष रहा हूँ..!” फिर उन्होंने यह कहते ही तत्काल आगे और जोड़ा, “और मेरी तरह बेचारे अन्य भी होंगे जो हो सकता है वामपंथी हो, लेकिन लोग उन्हें दक्षिणपंथी मान रहे हों..हाँ नाहक ही हम गाली भी खाते होंगे...लेकिन...फिर भी मजा आता है..!”

       मित्र का यह लम्बा उद्बोधन सुन मेरे मुँह से अचानक निकला, “तो...तुम असली पत्रकार हो..! और...अपने विचारों के प्रचारक नहीं हो...सच भी है यार...! पत्रकार का धर्म प्रचारक का नहीं होता। "

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

खोए गणतन्त्र का गौरव गान....

             एक के बाद एक कतार में..., साहब..! हमार नाली नाहीं बनइ देत हैं..., हमार पेड़ कट लिए..., हम गरीब हैं हमका राशनकार्ड नाहीं मिला..., हमार राशन-कार्ड काट दिहेन..., हमें मनरेगा में काम नहीं मिला..., हमरे जमीन पर कब्जा कर लिए है..., हमका आवास चाहे..., साहब हमका मरा देखाई दिहेन..., जमीन हड़प लिए..., हमका मारेन हैं..., साहब समस्यई-समस्या है..., हाँ...यही सब तो सुनने को मिलता है...राज्य-दिवसों में..!
        और साहबों की समस्या क्या है..? वह यह कि लोगों की इन समस्याओं का निदान होना चाहिए...लेकिन जैसा कि एक साहब के शब्दों में.. “समस्याओं का हल होना तो जरुरी है लेकिन हमारे अस्तित्व के लिए कुछ न कुछ समस्याओं का बना रहना भी जरुरी है...” सही बात है...समस्याओं के इस खेल में रोजी-रोटी भी छिपी हुई है...नहीं तो...बिन समस्याओं के हम भूंखे रह जायेंगे...बेरोजगार हो जाएंगे...! और यह राज्य-व्यवस्था...! हाँ...यह भी तो इस समस्या के खेल की ही उपज है...न हम समस्या उत्पन्न करते..न इसके नियमन की और न राज्य की...जरुरत पड़ती...फिर सबका खेल ठप होता...
        अंग्रेजों से लड़ाई...स्वाधीनता....और फिर....हमारा यह गणतन्त्र...! मतलब हमारी समस्या से दूसरे क्यों खेलें...? फिर तो इसे खेलने के लिए हम ही पर्याप्त हैं...समस्याओं की छीना-झपटी...चलो हमारा स्वतंत्रता आन्दोलन हमें समस्याओं के साम्राज्यवाद से समस्याओं के राज्य-वाद पर आकर टिका दिया...एक साम्राज्यवादी तत्व से छीन कर हम अपनी समस्याएं निकाल लाए...और...अब समस्याएं केवल हमारी थी...लेकिन फिर भी ये बनी रहीं..! अब आया गणतंत्र का राज्य-वाद...! क्या इस अवधारणा को बनाए रखना होगा...और...यह गणतंत्र हमारा...क्या समस्याओं के नियमन की व्यवस्था भर है...?
       तो...क्या व्यक्ति व्यपहरित है...? किसके द्वारा...? क्या साम्राज्यवादियों द्वारा...? क्योंकि समस्याओं की कतार बनी हुई है...समस्याओं से रोजी रोटी है...समस्याओं का महत्त्व है...इसका अंत नहीं होना है...फिर तो...इन समस्याओं ने ही व्यक्ति को व्यपहरित कर लिया है...मतलब राज्य ने व्यक्ति को व्यपहरित किया है...क्योंकि समस्याओं से राज्य..! नहीं...नहीं...व्यक्ति से उसका राज्य चूस लिया गया है...अब तुम व्यक्ति भी नहीं रह गए हो...बस मात्र समस्या भर हो...क्या यही राज्य-व्यपहरण का सिद्धांत है...? या हम मान लें अब हम साम्राज्यवादी होते जा रहे हैं..,व्यक्ति से उसका राज्य छीनते जा रहे है...और...साम्राज्यवादियों से हर तरफ से अतिक्रमित यह व्यक्ति समस्या भर है...साहब भी साम्राज्यवादी और उनसे भी बड़े तमाम तरह के साम्राज्यवादी...! फिर गणतंत्र काहे का....किस राज्य के लिए...! 
        क्या हमने गणतंत्र को इसीलिए हासिल किया था की साम्राज्यवादी-समस्या से छुटकारा पा जाएँ...और...राज्यवादी-समस्या बना उसका नियमन अपने हाथ में कर ले बस..!! और यह कतार अब भी हमारे लिए यूँ ही बनी रहे..? फिर वह आजादी...और...लालकिले का गणतंत्र...! ये सब इन्हीं समस्याओं में साम्राज्यवादियों के चंगुल में खो से गए है...!
        वास्तव में....व्यक्ति..! तुम अपने राज्य के नियम-विधायक सदस्य नहीं हो..., मान लो..! तुम व्यपहरित हो समस्याओं से.., किसी रोजी-रोटी वाले साम्राज्यवाद से...!! क्योंकि उनके जाने के बाद इस राज्य ने अपने साम्राज्यवादी पैदा कर लिए हैं...! तुम्हें तो स्वयं राज्य होना था...जिसके तुम स्वयं ही नियम विधायक सदस्य बनते...तुम खुद अपना गणतंत्र होते...!! लेकिन हुआ क्या तुम्हारा स्वराज तो दूसरे के साम्राज्य में खो गया...और...खोने का यह खेल बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि अब साम्राज्यवादी पैदा हो रहे है...कतार दर कतार...साम्राज्यवादी..! चलो किसी दिन यह कह कर हम चैन की बंसी बजा लेंगे देखो...हमारे यहाँ साम्राज्यवादियों की संख्या बढ़ गयी है हमारा उद्देश्य पूरा हुआ..हम प्रगति किए...गणतंत्र तो इस प्रगति में बाधक होता...!
         लेकिन हमारी तो रोजी-रोटी चलती रहेगी हमारे अपने साम्राज्य में.., और तुम.., तुम्हारा तो राज्य ही खो गया है तुम्हारी इन समस्याओं की कतार में.., जाओं अपना राज्य और अपना गणतन्त्र खोजो...छब्बीस जनवरी के दिन शायद झंडा फहराना हो..., लेकिन वह झंडा भी तुम नहीं फहरा पाओगे..वह गर्वाधिकार हमारे पास सुरक्षित है...क्योंकि तुम राज्य विहीन हो...!
         हाँ तुम्हारे हिस्से तुम्हारा वह कागज का टुकड़ा, जिसे तुम समस्याओं की कतार में से निकल कर हमें पकड़ा रहे थे...और मैं गर्वित अपने साम्राज्य के ऊंचे पायदान से तुम्हें फटेहाल अर्धविक्षिप्त समझ.., तुमसे उस कागज के टुकड़े को थाम लिया था..., उत्सुकतावश उस मुड़े-तुड़े कागज को जब खोला तो यह लिखा मिला जो शायद तुम्हारे द्वारा ही लिखा गया होगा...पढ़ा....
         “सामने से जो चिड़िया गुजरती है
         भारत माता की जय,जय वह भी कहती है
         समाज देश में
         देश संसार में
         और ऐ देशवासियों
         कोशिश करो
         राष्ट्रहित से भिन्न
         कोई काम न हो
राष्ट्रकवि - ********” (इन स्वघोषित राष्ट्रकवि का नाम न दे पाने के लिए क्षमाप्रार्थी क्योंकि मैंने उन्हें फटेहाल अर्ध-विक्षिप्त कहा है, अवमानना का दोषी बन सकता हूँ)   

            अब मैं समझ गया था तुम्हारे इस फटेहालपने का कारण..., पता नहीं तुम किस मन के अधिनायक हो...! जाओ समस्या के राज्य-वाद के विधाता बन लुटे-पिटे अपने भाग्य पर इतराओ..., यह झंडा तो हम साहबों के हाथ से ही फहरेगा...और तुम राष्ट्रकवि बन...झंडे को सलामी दे अपने खोए गणतन्त्र का यह गौरव-गान गुनगुनाओ...तुम्हारा राष्ट्रहित इसी में..., बेशक...! यही तुम्हारे हिल्ले...भारत माता की जय....       

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

क्या भारतीय ज्ञान पद्धति गँवई है...?

            “हमारा पंचांग विज्ञान से कम नहीं”- गृहमंत्री भारत सरकार। लेकिन कुछ लोगों ने गृहमंत्री के इस बयान की खिल्ली उड़ाई तथा एक प्रकार से उनके इस कथन को पोंगापंथी के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। 
           मेरे दादा पञ्चांग रखते थे...और वह पञ्चांग हिंदी माह के प्रारम्भ होने के पहले ही खरीद लिया करते थे...हालांकि वह पञ्चांग पंडिताई करने या ज्योतिष शाश्त्र में विश्वास रखने के कारण नहीं खरीदते थे, और न ही इन पर विश्वास करते हुए मैंने उन्हें देखा था...हाँ गाहे-बगाहे परिवार के सदस्य उनसे किसी ब्रत की तिथि, सूर्य-ग्रहण, चन्द्र-ग्रहण या फिर आवश्यकता पड़ने पर कभी-कभी सूर्योदय या सूर्यास्त का समय तथा चन्द्र-दर्शन की अवधि या फिर किसी शुभ मुहूर्त आदि के बारे जानकारी प्राप्त करते रहते थे या फिर वे स्वयं इस पञ्चांग से अपने एकादशी ब्रत की जानकारी कर लिया करते थे..। एक बार मैंने उनसे पूँछा था कि समय की इतनी सटीक गणना इसमें कैसे की गई है तो उन्होंने बताया था कि पंडितजन (विद्वत्जन) नक्षत्रों की चाल को भांप कर समय की गणना कर लेते हैं..। वास्तव में पञ्चांग की काल गणनाएं एकदम सही होती। हाँ इस पञ्चांग में ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति या राशिफल के आधार पर की गयी भाग्यफल जैसी भविष्यवाणियों पर मैंने कभी विश्वास नहीं किया। यदि इन भविष्यवाणियों के अनुरूप कुछ घटनाएं घटित भी हुई तो मैंने उन घटनाओं को उन्हें उनके घटने की संभाव्यता के आधार पर ही माना।             
         निश्चित रूप से पञ्चांग भारतीय पद्धति में काल-गणना है, इसमें भूत, वर्तमान तथा भविष्य की काल-गणना होती है, जिसमें दिन, तिथिवार समय की गणना होती है जिसके आधार पर कुछ खगोलीय घटनाओं की भविष्यवाणी भी की गयी होती है जो एकदम सटीक होती है। मैं उस समय आश्चर्य में पड़ जाता था कि बिना किसी आधुनिक वैज्ञानिक यंत्रों के हमारे पंडित जनों के लिए यह गणना कैसे संभव होता है तथा यह काल-गणना आधुनिक विज्ञान की भविष्यवाणियों से भी मेल खाती है। कुछ प्रबुद्धजनों द्वारा इस भारतीय ज्ञान पद्धति की खिल्ली उड़ाना समझ के परे है। यह खिल्ली एक अमेरिकी अखबार में छपे उस कार्टून के सामान ही है जिसमें मंगल-यान की सफलता पर विश्व के तीन देशों के ग्रुप में शामिल होने की घटना को पगड़ी और धोती पहने तथा बैल का पगहा पकड़े हमारे प्रधानमन्त्री को इस एलीट ग्रुप के दरवाजे पर दस्तक देते हुए दिखाया गया था। 
           वास्तव में आज देखा जाए तो विज्ञान की दृष्टि में ब्रह्माण्ड की जो अवधारणा है वह एक तरह से रूपकों में हमारे पुराणों में बहुत पहले से ही व्यक्त है। बचपन में ही पुराणों में तीन सर्वोपरि देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ महाविष्णु की भी कल्पना की गयी है, जो पुराणों में ईश्वर के विराट स्वरुप का वर्णन करती है। मैंने बचपन में पुराणों में यह भी पढ़ा था कि महा-विष्णु स्वयं अपने आदि-अंत के बारे में भी नहीं जानते और ये विश्व-रूप हैं। हालांकि बचपन में पढ़ी विष्णु और महाविष्णु की इस अवधारणा से मैं कन्फ्यूज सा हो जाता तो दादा जी से पूंछता, फिर वे बताते कि विष्णु ही स्वयं में महाविष्णु हैं...हाँ यह भगवान का विराट रूप है, इसमें यह पूरा विश्व या ब्रहमांड समाया हुआ है बल्कि यह उसके भी पार तक जाता है, इसीलिए भगवान् भी अपनी सीमा को नहीं जान पाते...। मैं सुनकर बड़े पशोपेश में पड़ जाता, लेकिन चीजें धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी..!
            वास्तव में पुराणों में रूपक के माध्यम से ब्रह्माण्ड के बारे में दिया गया यह ज्ञान ही तो है जिसे आज का विज्ञान भी स्वीकार करता है, फिर भारतीय ज्ञान-पद्धति की इस तरह से खिल्ली उड़ाना समझ में नहीं आता...। हाँ हमें किसी अतिरंजना से बचना चाहिए लेकिन चीजों को समझने की कोशिश भी करनी चाहिए। क्या कोई पश्चिमी देश हमारे इस ज्ञान के महत्त्व को रेखांकित करे तभी हम इसे स्वीकार करे..? 
          वास्तव में सड़क पर पड़ा हुआ पैरों के तले रौंदा जा रहा कागज़ का वह टुकड़ा भी जिसमें कुछ लिखा हो ज्ञानार्जन के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है...! 

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

राष्ट्रीय न्यायिक आयोग अधिनियम

         एक अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर मैंने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम २०१४  के सम्बन्ध में पढ़ा जो संविधान संशोधन १२१ के माध्यम से पारित किया गया। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 में संशोधन किए गए। उक्त संविधान संशोधनों के द्वारा उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के नियुक्ति के प्रावधान हैं। इस आयोग में छह सदस्य होंगे- भारत के प्रधान न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठ जज, केन्द्रीय विधि व न्याय मंत्री और दो प्रतिष्ठित व्यक्ति। इनका चयन प्रधान न्यायाधीश, प्रधान मंत्री एवं लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता की एक समिति करेगी। सुधांशु रंजन के लेख में उपरोक्त जानकारी देते हुए अदालत में इस अधिनियम के विरोध में दायर याचिका, जिनमें कहा गया है कि इससे न्याय पालिका की स्वायत्तता पर आघात पहुँचेगा, की चर्चा करते हुए कुछ प्रश्न भी उठाये हैं। लेख के अंत में लेखक ने अपने विचार दिए है कि सरकार को आयोग में दो विशिष्ट व्यक्तियों में कम से कम एक सिविल सोसायटी से लेना चाहिए। लेकिन निम्नलिखित प्रश्न लेखक ने नहीं उठाए। 
       प्रश्न यह नहीं है कि यह आयोग कैसे काम करेगा या इससे न्यायपालिका की स्वायत्तता  पर आघात पंहुचेगा या नहीं। मेरे लिए प्रश्न यही है कि इस अधिनियम में आयोग के लिए दो प्रतिष्ठित सदस्यों के चयन की जो व्यवस्था है कहीं वह संविधान के मूल ढाचे के विरुद्ध तो नहीं है, जिसके कारण न्यायपालिका की स्वायत्तता पर चोट पहुँच सकती है, क्योंकि संविधान के अनुसार संवैधानिक संस्थाओं में पदाभिहित व्यक्ति ही अपने पद की सीमाओं में विशेषाधिकार संपन्न या विशिष्ट व्यक्ति माने जाते हैं तथा भारत के शेष अन्य सामान्य नागरिक उन्हें संविधान प्रदत्त समानता संबंधी संवैधानिक मूलाधिकार प्राप्त है। तो फिर प्रश्न यही है कि क्या संविधानेतर किसी भी व्यक्ति को विशिष्ट या प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जा सकता है? यदि हम ऐसा मानते हैं तो क्या यह संविधान प्रदत्त नागरिकों के समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं है? और यदि ऐसा है तो स्वयं में यह आयोग ही संविधान की मूलभावना के विरुद्ध है तथा न्यायपालिका की स्वायत्तता का भी अतिक्रमण करेगा। 
           चलिए हम यदि यह भी मान लें कि सिविल सोसायटी से विशिष्ट व्यक्तियों का चयन कर लें तो फिर वही प्रश्न उठता है कि आखिर क्या सिविल सोसायटी कोई संवैधानिक संस्था है? अन्ना का आंदोलन भी तो सिविल सोसायटी का आंदोलन माना गया था, लेकिन एक एक कर उसके सदस्य राजनीतिक दलों के सदस्य बनते गए। यदि ऐसे लोग विशिष्ट माने जाएँ तो भी इनकी निष्पक्षता की क्या गारंटी होगी? मानते हैं कि संविधान में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्तियों को राज्य सभा में सदस्य नामित किये जाने का प्रावधान है लेकिन वह दूसरे अर्थों में है। उसकी तुलना हम इस आयोग के सदस्यों से नहीं कर सकते। इन सब बातों पर ध्यान देने की जरुरत है।