मंगलवार, 23 जून 2015

"एसो ही हतो चन्द्रावल..!"

         एक थी चन्द्रावल...! हाँ महोबा में चन्द्रावल नाम की कोई एक सुन्दर राजकुमारी हुआ करती थी...कहते हैं आल्हा-ऊदल और पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बीच उसे लेकर युद्ध हुआ था...बताते हैं कि पृथ्वीराज चौहान चंद्रावल को हासिल करना चाहता था..आल्हा-ऊदल चन्द्रावल की रक्षा के लिए बहादुरी से लड़ते हुए पराजित हुए और यहाँ के लोगों के लिए आल्हा-ऊदल आज भी अमर होकर जीवित हैं, हाँ चंद्रावल पृथ्वीराज के हाथ नहीं आई थी...! दो पहाड़ों के बीच स्थित उस मैदान को दिखाते हुए बताया मुझे गया कि इसी स्थान पर वह युद्ध हुआ था...! इस जनश्रुति के अनुसार चन्द्रावल तो पृथ्वीराज को नहीं मिली थी लेकिन उसी स्थान से निकली एक नदी के रूप में चन्द्रावल आज भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है...जो एक वास्तविकता है....चन्द्रावल नदी...!!
          
       इस जनश्रुति को सुन बचपन में सुनी गयी एक कहानी याद आई...इस कहानी में भी एक राजकुमारी अपना अस्तित्व बचाने के लिए भागती जाती है...और...भागते-भागते नदी बनते हुए गायब होती जाती है तथा अंत में लोगों के बीच कल-कल सी प्रवाहित होने वाली नदी बन गई..! अपनी इस बचपन की सुनी कहानी को जब मैंने साथ चलते लोगों को सुनाई...तो मुझे सुनाई पड़ा, “हाँ साब...एसो ही हतो चन्द्रावल..” खैर....

              कभी की खेलती खिलखिलाती चन्द्रावल आज नदी के रूप में भी अपने अस्तित्व की लड़ाई में बेवश है...चन्द्रावल के खिलखिलाने का कारण उसके आस-पास का परिवेश रहा होगा...उसके अक्षत यौवन की रक्षा स्वाभाविक रूप से स्वतः उसी परिवेश के कारण होता रहा होगा...लेकिन आज हमने उस परिवेश को भी अपनी उद्दाम लालसाओं के कारण नष्ट-भ्रष्ट कर डाला है...सच में परिवेश या पर्यावरण ही किसी के अस्तित्व को बचाए रख सकता है, यह परिवेश भी कृतिम न होकर स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होता रहता है..! हमने इसी परिवेश को छिन्न-भिन्न कर दिया है...इसकी स्वाभाविकता को मार दिया है...इसे तार-तार कर दिया है..! फिर कैसे यहाँ चन्द्रावल सुरक्षित रहेगी...? हाँ इस परिवेश या पर्यावरण की स्वाभाविकता को बनाए बिना चंद्रावल की रक्षा नहीं की जा सकती अन्यथा सारे प्रयास व्यर्थ के ढोंग सिद्ध होंगे...
       
         बताते हैं यह चंद्रावल नदी कभी सदानीरा थी...लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी उसी अनुपात में लोगों की लालसाएँ भी बढ़ती गयी...प्रकृति के बनाए गए गड्ढों को पाटकर तथा पेड़ों को काटकर खेत बनाए गए...हमारी खेती प्रभावित न हो इसलिए स्वाभाविक रूप से संचित वर्षाजल को हमने नाले खोदकर उसमें बहा दिए...नाले भी बनाए तो मात्र जल निकासी के दृष्टिकोण से ही...! पंद्रह दिन भी नहीं बीतता कि बारिश से जलमग्न हुआ क्षेत्र जलविहीन दिखाई देने लगता है, कृतिम तालाबों को भी हम स्वाभाविक आकार नहीं दे पा रहे हैं मात्र खुदी मिटटी का मापांकन ही जैसे हमारा उद्देश्य हो...हमारी लालसा इन तालाबों पर भी भारी पड़ रही है...आखिर जल एकत्रीकरण कहाँ हो...? बाँध भी बनाया तो उसी नदी के जल को रोककर..उस नदी में जल कहाँ से आये जैसे हम इस उद्देश्य को ही भूल से गए...! फिर कैसे होगी चन्द्रावल सदानीरा...?
        
        क्या नदी की तलहटी खोद देने से ही यह नदी सदानीरा बन जाएगी...? मतलब हम बचे-खुचे भूजल को भी बहा देना चाहते है...! उस दिन मैं जंगल में पेड़ गिनते-गिनते धसान नदी को देखने की इच्छा ले उसके किनारे पहुँच गया था...नदी के इस तरफ महोबा जनपद और उस तरफ झाँसी जनपद की सीमा मिलती है...वहाँ नदी का किनारा घने हरे-भरे पेड़-पौधों और झुरमुटों से भरा पड़ा था उसी के मध्य हमें कल-कल बहता हुआ एक झरना दिखाया गया...एक-दम निर्मल और बेहद शीतल जल..! यह अदृश्य से भू-श्रोतों से निकल ढलान से होते हुए नदी में जाकर मिल रहा था...हाँ जैसे दो ट्यूबवेलों का एक साथ पानी बह रहा हो...! इसी तरह इस जल-श्रोत से ही कुछ दूरी पर एक और झरना था...हो सकता है ऐसे ही अन्य जल-श्रोत भी नदी में मिल रहे हों...ये झरने धसान नदी को सदानीरा बना रहे थे...इस दृश्य को देख मुझे बचपन में अपनी रिश्तेदारियों में आते-जाते सई नदी में मिलने वाले नाले याद आ गए...कई बार मैंने मई-जून के महीनों में इन नालों की तलहटियों में पानी देखे थे...! हाँ...इन नालों में पतली सी धार भी बहते हुए मैंने देखा था...एक बार मैं इस बहते पानी का श्रोत जानने की जिज्ञासा में इसके पास पहुँचा...वहाँ कोई श्रोत तो नहीं था फिर भी नाले की तलहटी में एक पतली सी धारा प्रवाहित हो रही थी..मैं आश्चर्य में था कि यह जल-धारा कहाँ से आई...! जब ध्यान दिया तो देखा नाले की तलहटी पानी से चुहचुहाये हुए थे...मैंने उसपर अपनी हथेली रखी तो मेरी हथेली भींग गई...जैसे उस भूमि से पानी रिस रहा हो...और ऐसा था भी...! नाले में यह स्थिति गहराई बढ़ने के साथ बढती गयी थी और यही रिसता पानी उस नाले में एक पतली धारा का रूप ले लिया था...शायद ऐसे ही नाले सई को उस समय सदानीरा बनाए हुए थे...
       
                                                      (चित्र में धसान नदी के तट पर मैं )

               लेकिन आज हो क्या रहा है...भू-जल स्तर नदी, नालों की तलहटी से भी निचले स्तर पर पहुँच गया है कोई झरना, कोई झीर इनमें कैसे फूटेगा..? यहाँ धसान तो काफी गहरी थी और वह क्षेत्र भी भूजल के मामले में ठीक ही था..तो वह झरना दिखाई दे गया...लेकिन महोबा जैसे जिले के अन्य भागों में यह स्थित नहीं है...यहाँ का भू-जल इतने नीचे है कि कम से कम चन्द्रावल के उद्गम पर कोई झीर फूटना असंभव सा है...पहले तो हमें यहाँ ऐसे कई तालाबों का उद्धार करना होगा जिसमें वर्षा का जल पर्याप्त रूप से संचित हो सके...एक बात और है आज हम वर्षा-जल संचयन के लिए जितने गड्ढे खोदते हैं उससे कई गुना भूमि समतल भी कर देते हैं मतलब गड्ढा खोदने और समतलीकरण का अनुपात बराबर...! बल्कि आज समतलीकरण ही अधिक हो रहा है, आखिर...इस समतलीकरण से वर्षा-जल कहाँ संचित होगा..! पहले तो प्राकृतिक रूप से बने गड्ढों में भी जल संचयन हो जाता था...लेकिन आज समतलीकरण (शहरीकृत खेतिहर समाज) के इस दौर में जमीन के नीचे का जल स्तर कैसे बढ़ेगा...? और तो और...हमने पेड़ भी काट डाले हैं...जमीन कैसे नम रहेगी...?
       
        इस नदी की गहराई बढ़ाना भी इस समस्या का समाधान नहीं है...मैंने अपने मित्र की एक बात मजाक मान हँसी में उड़ा दी थी.. ‘यार ये बताओं ये तालाब खोदने से भू-जल स्तर कैसे बढेगा...?’ उनके इस प्रश्न पर मैंने उत्तर दिया था, ‘इसमें बरसात का पानी इकठ्ठा होगा जिससे जमीन में पानी का लेवल बढेगा’ लेकिन उनका उत्तर था, ‘नहीं यार अब तो वर्षा भी कम होती है तिस पर हम गड्ढे खोदकर जमीन की नमी को भी उड़ा देंगे...इससे तो भू-जल स्तर और नीचे चला जाएगा...!” इस पर मैं हँस तो पड़ा था लेकिन इस बात में भी एक वास्तविकता थी..मतलब हमें नमी बचाने के लिए इस स्तर तक सोचना होगा....
       
         हाँ..हमे फिर से एक स्वाभाविक परिवेश बनाना होगा जिससे चन्द्रावल का आँचल हरा-भरा हो और इसके हरियाले आँचल के झुरमुटो के बीच कोई झीर फूट पड़े तथा साथ ही चन्द्रावल की सूखी तलहटी पानी से चुहचुहा पड़े...एक धारा बन फिर से यह दौड़ पड़े..!
        
(चित्र में चंद्रावल के उद्गम क्षेत्र में 'जलपुरुष' श्री राजेंद्र सिंह जी..और जनपद महोबा के उच्चाधिकारीगण)

        
         
     
      
      अंत में एक नदी बलिदानों से ही बनती है...हमें अपनी उद्दाम लालसाओं पर काबू पाना होगा तभी चन्द्रावल अठखेलियाँ भारती हुई पुनर्जीवित होगी...!

गुरुवार, 21 मई 2015

इस 'मीडियापे' में 'मूंदहु आँख' लुभाता है...

       ‘मुदाहूँ आँख कतऊँ कछु नाहीं’ हाँ यही तो लग रहा है अब, क्योंकि इधर कई दिनों से टी.वी. देखना जो बंद हो गया है...! नहीं तो टी.वी. पर रात-दिन चलते वही न्यूज-चैनल देख-देख, ऐसा लगता जैसे देश में समस्याओं-घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है, उथल-पुथल मचा हुआ है..! और तो और इन समाचार चैनलों पर चलते बहस-मुबाहिसों को देख-सुनकर ऐसा प्रतीत होता जैसे देश का अब बंटाधार हुआ या तब, या फिर हमारा यह देश अब फिर से सोने की चिड़िया बन बस फुर्र से उड़ने ही वाला है तथा लोग इसकी टांग खिचाई इसलिए कर रहे हैं कि उड़ने से इस चिड़िया के हाथ से निकल जाने का भय है..! अब इस टांग खिचाई और ऐसे ही अन्य समाचारों को देख-सुन इसके सही गलत में उलझा यह मन दुःख का कारण बन जाता है, लेकिन इन दिनों टी.वी. न्यूज़-चैनलों से दूर रहने के कारण बहुत शान्ति की अनुभूति हो रहीं है, जैसे किसी बोधिसत्व प्राप्ति की दिशा में कदम बढ़ा दिया हो..मतलब समाचार-जनित तमाम दुखों-उलझनों से मुक्ति की ओर..!
           कुछ भाई लोग कहेंगे..आँख बंद कर लेने से, समस्याओं का अंत थोड़ी न होता है,यह तो निरा पलायनवाद है...! लेकिन मेरे भाई यहाँ समझने की बात है, घटनाओं समस्याओं और हमारे लिए दुख का कारण बनने वाले इन समाचारों का न्यूज़-चैनलों द्वारा प्रस्तुतिकरण इन दुखों को बढ़ाता हुआ ही प्रतीत होता है, विज्ञापन और समाचार में विभेद करना मुश्किल हो जाता है..समाचार, समाचार के लिए नहीं होता और हर समाचार के प्रसारण के पीछे जैसे कोई निहितार्थ छिपा होता है...समाचार चैनलों पर दुखद घटनाएं भी विज्ञापन जैसी प्रतीत होती हैं...एकदम उत्तेजनात्मक..!! ऐसे में इनसे बचना भी जरुरी हो जाता है क्योंकि व्यर्थ की उत्तेजना परिणाममूलक नहीं होती बल्कि पागलपन की ही निशानी होती है...

           मन में एक छोटा सा उदाहरण गूँजने लगा है...कोई बालीवुड का एक्टर धमाके के साथ टी.वी. स्क्रीन पर उभरता है उसकी गाथा, उसके हीरोगीरी को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है जैसे वह वास्तव में समाज का नायक हो..! अब लो..अगर आपने उसे नायक बना दिया है तो, यदि उसे सजा होती है तो किसी को अच्छा लगेगा...? उसका नायकत्व उत्तेजना तो पैदा करेगा ही, पागलपन की हद से गुजरकर हम उसे चाहते हैं, इसका लाभ उसे मिलना ही चाहिए...! हमारा नायक खतरे में..! फिर तो सभी प्रभावित होंगे, आम जनता से लेकर फ़िल्मी दुनिया, न्यायिक प्रक्रिया आदि सभी, आखिर इतने बड़े नायक का जो प्रश्न है..! फिर कानून की नजर में सब एक सामान कैसे...? मेरे विचार से कानून भी यह नहीं चाहेगा..! आखिर जब सबने मिलकर किसी को नायक बना दिया है तो कानून भी उसका सम्मान तो करेगा ही...! तब आप क्यों न्यायिक प्रक्रिया पर व्यंग्य करते हो..आखिर किसी चीज को विज्ञापित करने से लेकर उत्तेजना बढ़ाने तक सब कुछ किया धरा तो आपका ही है..!!

           भाई हमारा यह मीडियापा जो जैसा है उसको वैसा ही नहीं रहने देता और न वैसा दिखाता है! एक भ्रमजाल खड़ा कर देता है..आप इसमें भटको तो अपनी बला से..! जिसको इस भ्रमजाल से फायदा उठाना है वह उठा लेगा..! टापते रहो आप घुरहू..कतवारू जी...!! अगर तुममे भ्रम-जाल बुनने की क्षमता हो तो तुम भी आगे बढ़ो....हाँ, आपके कान में धीरे से बताना चाहुँगा अब ये घुरहू..कतवारू भी भ्रमजाल बुनने लगे हैं!! लेकिन यह भी सब के बस की बात नहीं...और यदि कोई इसमें सफल भी हुआ तो इनके बनाए नायकत्व के गुमान में भी मत रहिए क्योंकि फिर से इसी मीडियापे द्वारा घुरहू-कतवारू बना देने की बात तक तो गनीमत है लेकिन सिर पर ये ऐसा सींग जमा देंगे कि सभी लोग लट्ठ ले के पीछे ही पड़ जाएंगे क्योंकि इनके निहितार्थ को समझना बहुत ही कठिन है...इसीलिए टी.वी. समाचारों से ‘मूंदहु आँख’ लुभानेवाला जैसा अनुभव दे रहा है...!

           लेकिन यह मानव-मन चैन से बैठता ही कहाँ है, नहीं कुछ तो फेसबुक के आभासी मित्रों के बीच ही इधर घूमने लगा है...हाँ फेसबुक पर दो मित्रों द्वारा पोस्ट किए गए उनके कंटेंट से मुझमें ईर्ष्या का भाव जाग गया...एक ने ब्लड डोनेट करते हुए अपनी तस्वीर पोस्ट की थी तो दूसरे ने अपने पति-पत्नी प्रोफ़ेसर मित्र की कहानी पोस्ट की थी जिसमें इन्होने अपने वेतन से दो लाख की सहायता राशि का दान बुन्देलखण्ड के किसानों के लिए दिया और इन पति-पत्नी द्वय ने अपने फेसबुकीय साथियों को इतना प्रेरित किया कि इन लोगों ने तैंतीस लाख रुपये की सहायता राशि बिना किसी सरकारी सहायता के इकट्ठी कर ली...और तैंतीस बेहद पीड़ित किसानों को एक-एक लाख रुपये की एफ.डी. कराकर दे दी और एक मैं..तमाम अपीलों-दलीलों के बाद भी एक रूपया तक नहीं दिया है, आगे इसकी सम्भावना भी नहीं है| अब आप ही बताइये ईर्ष्या होगी की नहीं..! हम केवल मीडियापेमें ही खोए रह गए और ये लोग कुछ कर गुजर गए..! सबसे बड़ी कोफ़्त मुझे यह सोचकर हुई कि एक बार मुझे भी ब्लड-डोनेट करने का अवसर मिला था...अगर-मगर..के चक्कर में मैं उससे भी बच निकला था...

            खैर, इस ईर्ष्याभाव से मुक्ति पाने के लिए अखबार की कतरनों पर नजर डाली...तो.. ‘नदी में उतराते दो महिलाओं के क्षत-विक्षत शव मिले’.... ‘दो बहुओं को बांधकर कोड़े बरसाए गए’ ‘एक और निर्भयाकांड’ इसके अलावा तमाम आत्महत्या की खबरों पर निगाह डाली तो महिलाएं ही आत्महत्या करती हुई मिली...पता नहीं क्यों मन संदेहों से भर गया...मुझे लगा टी.वी. समाचार जिस माल को एक बार बेंच लेते हैं, दुबारा उस पर हाथ नहीं डालते तथा सब कुछ सुचारू रूप से उसी तरह चलने लगता है बल्कि ऐसी घटनाओं की बाढ़ सी भी आ जाती है, एक बार दो लडकियों का पेड़ पर फांसी पर लटकना या लटकाए जाने की घटना का प्रस्तुतीकरण इन चैनलों द्वारा इस तरह से किया गया कि दुनियाँ हिल उठी..लगा जैसे अब यह अंतिम घटना ही होगी....लेकिन हुआ क्या...! पेड़ पर लटकने या लटकाने जैसी घटनाएं लगातार दुहराई जाने लगी...मतलब...यह हो-हल्ला बेमतलब का साबित होता है... मैं नहीं समझ पाता कि जब सुचारू रूप से वही सब चलना है जो चलता आ रहा है तो फिर समाचार जानने की जिज्ञासा क्यों...! फिर अखबारों की इन कतरनों से भी मन उचट गया..
        
           खैर, इस जिज्ञासा का क्या करें..यह तो हमारे मस्तिष्क की तन्त्रिका-तंत्र का हिस्सा है..इसके बिना हम जी भी तो नहीं सकते...सो पुनः अपने सोशल-मीडियापे फेसबुक-वाल को यह सोचकर खंगालने लगा कि मित्रों की पोस्ट और तमाम विषयों पर की गयी टिप्पड़ियों से महत्वपूर्ण घटनाओं तथा उसपर लोगों के दृष्टिकोणों से अवगत हो जाऊँगा| तभी ध्यान आया कि एक फेसबुकिया मित्र की तमाम विषयों पर बुद्धिमत्तापूर्ण टिप्पड़ियाँ इधर तीन-चार दिनों से पढ़ने के लिए नहीं मिल रही हैं, आखिर बात क्या है? सो अपने वाल पर उनकी इस अनुपस्थिति का कारण जानने के लिए फ्रेंडलिस्ट देखनी शुरू की..वो मेरे फ्रेंडलिस्ट से नदारत थे...फिर उन्हें उनके नाम से सर्च किया तो पता चला वे फेसबुक पर अपने को अपडेट तो बराबर कर रहे थे लेकिन ‘अनफ्रेंड’ हो जाने के कारण हमारी वाल से गायब थे...हाँ मैंने उन्हें अनफ्रेंड नहीं किया था...क्योंकि उनके लिखे को पसंद करूँ या न करूँ लेकिन उन्हें पढ़ने की तलब जरुर रहती थी...खैर यदि उन्होंने मुझे ‘अनफ्रेंड’ किया है तो वे अपने एक पाठक से वंचित हो चुके हैं...और यदि गलती से मुझसे ही ‘अनफ्रेंड’ हो गए हैं तो मैं किसी को पढने से वंचित हुआ हूँ...
       
          हाँ..मन में विचार उठा कि उन्हें फिर से फ्रेंड-रिक्वेस्ट भेज दूँ लेकिन ऐसा नहीं कर सका, सोचा..हो सकता है मैं उनके बौद्धिक सम्प्रदाय के सदस्यों से मेल न खा रहा होऊँ...! मैंने इनकी पोस्टों को पढ़कर इस बात का अनुभव किया था कि वे अपने विरोधी ‘मीडियापे’ को पसंद नहीं करते हों और जो धृष्टता करता उनके द्वारा अनफ्रेंड की गति को प्राप्त होता...ये फेसबुक के वे ‘सेलिब्रिटी टाइप’ के लोग हैं जो अपनी पोस्टों पर ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ की संख्या गिनकर स्वयंभू इस स्तर की प्राप्ति स्वीकार करते हैं...

         मेरे समझ से इस ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ पर संजीदा होने की आवश्यकता नहीं है...अभी कुछ दिनों पहले मैंने देखा मेरे सुपुत्र महोदय अपने वाल पर मित्रों के पोस्ट किये गए कंटेंट को धडा-धड़ लाइक किये जा रहे थे...और किसी मित्र को अबे-तबे कर रहे थे...मैंने पूँछा, ‘बिना पढ़ें ऐसा क्यों कर रहे हो..और यह क्या..?’ तो बोले, ‘इस लाइक-वाइक को लेकर इतना संजीदा मत बनिए...यह ऐसे ही होता है..इतना सोचने की जरुरत नहीं...’ मतलब ये भी भ्रम पैदा करते हैं...कभी-कभी हम बिना पढ़े ही ‘लाइक’ हो जाते हैं कुछ तो हमारा मन रखने के लिए ठक से हमारे पोस्ट पर ‘लाइक’ ठोंक देते होंगे...हाँ एक बात और है अब यह उस तरह से भी होता जा रहा है जैसे आप पड़ोसी के यहाँ जायेंगे तभी वह भी आप के यहाँ आएगा...मतलब यह ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ आभासी सामाजिक-व्यवहार बन चुका है, जो ऐसा नहीं करते होंगे वे ‘समाज-बहिष्कृत’ का दंश भी झेल सकते है...

        खासकर मीडियापा करने वाले लोग के ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ उनके मित्र-सूची की बौद्धिक-सम्प्रदाय के सदस्यों की संख्या पर निर्भर करता होगा...क्योंकि यहाँ हम सेक्युलर होते-होते बौद्धिक कामरेड टाइप सदस्यों का सम्प्रदाय बनाए हुए होते हैं जहाँ अन्य लोग अवांछित माने जा सकते हैं, वास्तव में यह एक ऐसा ‘मीडियापा’ है जहाँ अपने-अपने गढ़ होते है और इन गढ़ों के विस्तार की क़वायद होती है...! सच्चाई बस यही है कि जो लिखा जाता है वह अवश्य पढ़ा जाता है और पढ़ा जाएगा...!! लिखने की स्वतंत्रता है लेकिन विचारों का संप्रदाय निर्मित करते हुए इसे ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ तक सीमित भी न करें...बाकी अन्य भ्रम न पालें...नहीं तो...हमारे-आपके होने के बाद भी सब कुछ वैसे ही ‘निर्भयाकांड’ की तर्ज पर चलता रहेगा...और...यही ‘मीडियापा’ है...!!!              

सोमवार, 18 मई 2015

'मालिकपने' के शिकार....

                   उस दिन श्रीमती जी ने कहा, 'जो वह मजदूरिन है न..! है तो वह गरीब ही..लेकिन उसकी मालकिन ने उससे कोई काम कहा था...शायद उसने नहीं किया था...'
         
                यह सुन मैंने कहा, 'हाँ ये मजदूर ऐसे होते ही हैं...मन में आया काम किया मन में आया तो न किया..'

              श्रीमती जी ने कहा, 'यह बात नहीं..अरे, इनकी मजदूरी बढ़ा दो तो ये क्यों नहीं कहने पर काम करेंगे..?'

                 'लेकिन जानते हो उसकी मालकिन ने क्या कहा..उन्होंने कहा अरे इस मजदूरिन के पास भी पैसा हो गया है...यह तो बी.सी. भी चलाती है..उसी की बचत होगी इसके पास फिर क्यों सुनेगी यह..?'

                 श्रीमती जी की यह बात पूरी नहीं हुई थी कि मैंने कहा, 'अरे नहीं..! बी.सी.-ऊ सी का ये कौन सा बचत कर पाएंगी...लेकिन ये गरीब न अपनी इसी अकड़बाजी के चक्कर में आगे बढ़ नहीं पाते..और सरकार भी इन्हें मुफ्त का भोजन देती है, ये बी.पी.एल.कार्ड और अन्त्योदय कार्ड जो बिना काम के अनाज दे मुफ्तखोरी ही बढ़ा रहे हैं फिर ये काम क्यों करें..!'

                    'नहीं-नहीं...बात यह नहीं है...हमारा 'मालिकपना' इनकी अकड़बाजी बर्दास्त नहीं कर पाता...यदि सरकार की ये योजनाएं न हों तो हम इनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाते हुए इनसे काम लेने लगे....तथा कदम-कदम पर ये शोषित हों, कम से कम सरकार की इन योजनाओं के कारण ये मजदूर अपने आत्मसम्मान को बचाते हुए अपने लिए इच्छित कार्यों का चयन तो कर सकते हैं, इनकी यह अकड़-बाजी इसी कारण से है...' श्रीमती जी ने हमें जैसे विस्तार से समझाने की कोशिश की...

                  वास्तव में श्रीमती जी ने सही कहा था..कम से कम सरकार के इन सहारों की वजह से ये गरीब धीरे-धीरे कर ही सही आत्मसम्मान को समझने लगे हैं...और हो सकता हैं आगे चलकर ये उन मनोवृत्तियों से टकराएँ जो आज की इनकी स्थिति के लिए जिम्मेदार है...क्योंकि इनकी इस स्थिति का एक कारण यह भी रहा है कि वर्षों से ये हमारे 'मालिकपने' के शिकार बनते आ रहे हैं....

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

जय भीम जय भारत

            मुझे याद आता है सन ८८ की बात होगी उन दिनों मैं इलाहबाद में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था..उन्हीं दिनों बाबा साहब डा० आंबेडकर की मूर्तियों को जगह-जगह स्थापित करने के साथ ही इस सम्बन्ध में कुछ विवाद भी होते हुए दिखाई देते थे...और डा० अम्बेडकर का राजनीतिकरण जैसे होते हुए दिखाई दिया था...लेकिन मेरे मन में उनकी ऐसी छवि नहीं थी उन्हें संविधान निर्माता के साथ ही एक ऐसे सामजिक आन्दोलन की भावनाओं को इसके पन्नों में उकेरते हुए पाया था जो इन्हें भारत के राष्ट्र-नायकों के अग्रिम पंक्ति में स्थापित करता था...और इस तरह सभी का उनपर बराबर का अधिकार था| लेकिन उन दिनों ऐसा लगा था जैसे इनका भी राजनीतिकरण किया जा रहा है तथा इन्हें किसी एक विशेष जाति वर्ग के लिए आरक्षित कर दिया गया हो, इससे मन खिन्न सा हो गया था...तब इसी पीड़ा को मैंने नवभारत टाइम्स में पाठकों के पत्र के रूप में भेजे जाने अपने पत्र में व्यक्त किया था जो उसमें प्रकाशित भी हुआ था... आज बाबा साहब डा० आंबेडकर का जन्मदिन है. दैनिक हिन्दुस्तान’ में उदित राज जी का लेख ‘अंबेडकर की सोच है असल राष्ट्रवाद’ पढ़ा. वास्तव में अम्बेडकर किसी एक जाति या वर्ग के ही महानायक नहीं हैं बल्कि वे भारत के आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य के निर्माता हैं; सबको बराबरी का हक दिलाने वाले पर सब का बराबर अधिकार है और आज समाज का हर वर्ग इस बात को स्वीकार रहा है, यह देश के सामाजिक, आर्थिक और लोकतांत्रिक प्रगति के लिए शुभ लक्षण है...जय भीम जय भारत...!

रविवार, 29 मार्च 2015

दिमाग का स्क्रू ढीला होना कोई बुरी बात नहीं है....!!

            उस दिन श्रीमती जी से मैं अपने परिवार से पाए संस्कारों का डींग हाँके जा रहा था.. “देखो न मेरे दादा जी.., माता-पिता ने मुझे कितने अच्छे संस्कार दिए हैं कि जीवन के तमाम झंझावातों से टकराते-टकराते और अपने विचारों से कोई विशेष समझौता किए बिना आगे बढ़ा जा रहा हूँ..!” श्रीमती जी ने उस समय एक स्थिर और गहरी दृष्टि मुझ पर डाली और बोली, “एक बात कहूँ...?” तत्क्षण मैंने अपने डिग्रियों के लगभग गर्वोन्मत्त भाव से कहा, “हाँ..हाँ..कहो..कहो..क्या कहना चाहती हो...” श्रीमती जी ने लगभग धीमें एवं शान्त स्वर में मुझसे बोली, “तुम्हारा दिमाग नट-बोल्ट से बहुत ज्यादा कस दिया गया है..!” श्रीमती जी ने अपने इस कथन को मेरे लिए बहुत ही नकारात्मकता के अंदाज में कहा था...मैं सोचने लगा अगर उनके लिए ऐसी ही बात है तो उन्हें कहना चाहिए था कि ‘तुम्हारे दिमाग के स्क्रू बहुत ढीले हैं..” क्योंकि नासमझी की परिभाषा अभी तक तो मैं यही सुनते आया हूँ...अब दिमाग का नट-बोल्ट से कसे होने की नई परिभाषा कहाँ से आ गयी...!

       श्रीमती जी द्वारा दिमाग की दी गयी इस नई परिभाषा को समझने के उधेड़बुन में मैं फंस गया..! समझ में न आने पर मैंने श्रीमती जी से ही अपने दिमाग की इस कमजोरी को छिपाने की कोशिश करते हुए पूँछा, “आखिर तुम्हारे कहने का मतलब क्या है..?”
       अब श्रीमती जी ने मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखा, और बोली, “देखो तुम समझने की कोशिश करोगे तभी समझ पाओगे..!” मैं भी पति होने के अंदाज में आ गया और कहा, “पहेली मत बुझाओ मुझसे साफ़-साफ़ बात करो..” यह सुन श्रीमती जी थोड़ा गंभीर सी हो गयी और मुझसे बोली,
       “जब हम छोटे थे न तब भईया..चाचा..आदि जैसे परिवार के बड़े लोग हम बहनों को घर आए किसी नए मेहमान के सामने नहीं निकलने देते थे यहाँ तक कि गाँव में भी किसी के यहाँ कोई बारात आदि जैसे अवसरों पर भी हम लोगों का वहाँ जाना पसंद नहीं करते थे..और तो और जब मैं चौदह-पंद्रह साल की रही होउंगी तभी माँ ने हमें साड़ी पहनाना शुरू कर दिया था तथा कहीं निकलने पर माँ कहती ‘सर पर पल्लू रख लो..’ जरा सोचो...!! अगर हम वही सब पकड़ कर आज तक चल रही होती तो तुम जैसे व्यक्ति के साथ इतने बड़े शहर में बच्चों को लिए अकेले न रह पाते क्योंकि तुम अपने तरीके से अपनी नौकरी में ही व्यस्त रहते हो...!” मुझे यह सुनाते हुए श्रीमती जी मौन हो गयीं...और इधर मेरे लिए भी अब समझने के लिए कुछ बाकी नहीं रह गया था..
       ....मैं चुपचाप सोफे पर पसर टी.वी. देखने लगा था... ‘आप’ में चल रहे जबर्दस्त अंतर्कलह का सजीव प्रसारण चल रहा था...मुझे श्रीमती जी की कही बात याद हो आई...ये बेचारे प्रशांत भूषण...योगेन्द्र यादव...आनंद कुमार जैसे लोग अपने दिमाग को नट-बोल्ट से ज्यादा कस लिए हैं...जबकि देखो न केजरीवाल भी तो उन्हीं के रास्ते के खिलाड़ी थे...! लेकिन उनने अपने दिमाग के पेंच ढीले कर लिए हैं...मतलब साफ़ है..दिमाग का स्क्रू ढीला होना कोई बुरी बात नहीं है....!! 
          अंत में....जीवन में हमें एक विवेकपूर्ण स्पेस लेकर चलना चाहिए...       

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

सत्य और धर्म...!

         हम सब के मन में आज-कल एक प्रश्न घुमड़ पड़ता है कि आखिर आज के सन्दर्भों में सत्य और धर्म किसे माने...? कारण...! आज की तमाम दुनियावी आकांक्षाओं, प्रतिस्पर्धाओं में इन दो शब्दों का मानक बदलता हुआ प्रतीत हो रहा है....
         लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है कि क्या सत्य है; क्या धर्म है; इस विषय पर कन्फ्यूज हो सकते हैं...?
         इस विषय पर मेरा एक चिंतन है कि वास्तव में सत्य और धर्म आपके लिए कब महत्वपूर्ण होता है या फिर आपके जीवन के ये दो वैचारिक तत्व कब प्रकट होना चाहते है...या इनकी आवश्यकता आपको कब पड़ती है..? शायद उन्हीं क्षणों में इसका अर्थ पाया जा सकता है...युद्ध के क्षणों में विचलित अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता के ज्ञान से इसका अर्थ समझाया था...! ठीक उसी प्रकार जीवन के द्वंद्वात्मक क्षणों में सत्य और धर्म अपने आप स्पष्ट होने लगता है...जीन पॉल सार्त्र के आस्तित्ववाद के दर्शन से भी इस तथ्य को समझा जा सकता है...जब कोई व्यक्ति अपने को फेंका हुआ पाता है तो वह अपना अस्तित्व निर्मित करने लगता है...अन्य शब्दों में कहें तो उसके लिए उसका सत्य और धर्म निर्मित होने लगता है....!  
        एक अन्य तथ्य पर भी विचार कर सकते हैं..कल्पना करिए कि इस धरती पर आप एकदम अकेले हैं...उस परिस्थिति में आप के लिए सत्य और धर्म क्या होगा? ऐसी स्थिति में यह भी हो सकता है कि इस अकेलेपन में 'सत्य' और 'धर्म' की कोई आवश्यकता ही न पड़े। इस परिस्थिति में पड़ा व्यक्ति केवल जीना चाहेगा, और तब इसमें सहायक बातें ही उस व्यक्ति के लिए सत्य या धर्म होगा। लेकिन समूह या समाज के बीच व्यक्ति के इस जीने के उद्देश्य में भी परिवर्तन होता है और इसके बरक्स 'सत्य' और 'धर्म' का निर्धारण होने लगता है।..क्योंकि तब व्यक्ति और समाज दोनों का उद्देश्य अपने अस्तित्व को उच्चतम स्तर तक ले जाना होता है।
        इस क्रम में यह स्पष्ट है कि वास्तव में सत्य और धर्म कोई स्वतंत्र या स्थिर तत्व नहीं हैं; इसे व्यक्तिश: या सामूहिक जीवन जीने के परिपेक्ष्य में उसके उद्देश्यों के अनुसार ही परिभाषित किया जा सकता है। इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि प्रकृति के साथ व्यक्ति और समाज या तीनों के आपसी अन्तरक्रिया भी इसमें एक परिवर्तनकारी तत्व माना जा सकता है। अतः: सत्य और धर्म को निस्संग या निरपेक्ष तत्व के रूप में ग्रहण करना इसके प्रति एकांगी दृष्टिकोण होगा, जबकि इसका पैमाना व्यक्ति, समाज और प्रकृति के सापेक्ष ही तय हो सकता है। 
        
         मैं मानता हूं कि सत्य या धर्म की खोज करना एक तरह से मेनीप्यूलेशन है, क्योंकि यह खोज का विषय नहीं ! और न ही एक व्यक्ति का सत्य सबका सत्य बन सकता है। इस प्रकार सत्य कोई गणितीय सूत्र भी नहीं है। सत्य एक फेनामिना है अर्थात जो हमें दिखाई पड़े और समझ में आए वही हमारा सत्य है। जिस प्रकार हम कानून की किताबों को पढ़े बिना ही अपने आचरण को तय करते हैं कि हमारा यह कृत्य कानून का उल्लंघन करेगा या नहीं...उसी प्रकार हमारे लिए सत्य और धर्म भी है...यह स्वतः और सहज रूप में तय होता रहता है...और यह किसी व्यक्ति या समाज के लिए आपके द्वारा किये गए आचरण से स्वतः प्रकट हो जाता है...कानून और धर्म की किताबें तो केवल व्यकित या समाज के प्रति किए गए आपके गलत आचरण के दण्ड प्रक्रिया के लिए है..आप इसे पढ़ कर अपना आचरण तय नहीं कर सकते है...हाँ ये पुस्तक केवल धर्मगुरु या वकीलों के लिए अपने-अपने धंधे चमकाने के लिए उपयोगी हो सकते हैं..कहने का आशय मात्र यह है जब आप अपने व्यक्तिगत हित..आशा..आकांक्षाओं को ही लेकर चलते हैं तभी इन पुस्तकों की जरुरत पड़ती है...!!
       अंत में इतना कह सकते हैं कि आप अपने सत्य और धर्म को नकारात्मक उर्जा से मत निर्मित करें..आपका सत्य दूसरों का भी स्वतः सत्य बन जाए..आपका धर्म दूसरों का भी स्वधर्म बन जाए ऐसा ही सत्य और धर्म हो सकता है...!
 बहुत वर्षों पहले जब मैं अपने को इस जीवन में अपने को फेंका हुआ पाया था...तो इस जीवन के लिए अपनी भूमिका को तय करने की जद्दोजहद में उलझ गया था... “क्या कहूँ..?” का एक अंश...

मैं, मौन अपने में उदास,
देख रहा-
अंतर्तम का गह्वर,
आत्माभिव्यक्ति का पड़ा बीज,
खो रहा सत, निःशेष आवरण,
अनुर्वर भूमि, छीजता बीज,
संतुष्टि नहीं, अन्यत्र देख,
संभाव्य ईश्वरता का बीजांकुर
माल्यार्पण की नहीं अभिलाषा
ईश्वर बनने की आतुरता
पर, विस्मृति, यह कि
मानव हूँ, विवेक
बुद्धि का स्वामी हूँ
रहा न कोई
अब भाव सहज
अपना अपना सा
गढ़ रहा सत्य |

                                ----------------- विनय  

अन्ना के नाम पाती

         मैं मित्र महोदय से अन्ना के आन्दोलनों का बखान किए जा रहा था कि वह किस तरह सरकार को अपने फैंसले बदलने के लिए बाध्य कर देते है...लेकिन मित्र महोदय मेरी बातों पर कान ही नहीं दे रहे थे..धीरे से वे अपना हाथ तकिए के नीचे ले गए और जैसे छिपा कर रखे गए किसी चीज को मेरे सामने निकाल रहे हों...! हाँ उनके हाथ में एक पत्र जैसा मुड़ा कागज था..! उसे निर्विकार भाव से मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, “ज़रा इसे पढो..” मैंने उत्सुकतावश इसे पढ़ना शुरू किया....यह ‘अन्ना के नाम पाती’ थी...    

     “आदरणीय अन्ना जी प्रणाम,
          अभी-अभी हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी कानून के विरोध में दिल्ली में आप (पार्टी नहीं) ने धरना दिया था| उस धरने में लाल झंडा थामें इस कानून का विरोध करती महिलाओं के चेहरों पर क्या आपने गौर किया था..? ध्यान से आप देखते तो निश्चित रूप से वे भूमिहीन महिलायें ही रही होंगी..! यदि आप ने इसे नहीं देखा तो एक बार इनसे पूँछ ही लेते कि कितनी भूमि की मालिकान वे या उनके परिवार वाले है...? लेकिन आप ने इसे भी जरुरी नहीं समझा...! और उनका भी इस्तेमाल झंडा ढोने वाले के रूप में किया गया...आप मंच पर हुंकार भरने का तमाशा करते रहे..!!
          अन्ना जी..! देश के किसी भी सुदूर ग्रामीणांचल की गरीब बस्तियों में चले जाइए तो पायेंगे इन बेचारों के पास पैखाने के लिए अपनी जमीन भी नहीं है..और इसके लिए ये मैदान भी तलाशना चाहें तो जमींदार लट्ठ लिए खड़े मिलेंगे...! शायद इसी कारण इन बस्तियों की ओर जानेवाले मार्ग मल से पटे मिलेंगे..खैर...कहने का आशय यहाँ यह है कि आज भी इस कल्याणकारी राज्य और आपके होते यह गरीब समाज भूमिधरी होने के सुख से वंचित है..और..ये ‘मरजाद’ विहीन लोग खुले में शौच जाने के लिए भी अभिशप्त है..!! हाँ जमींदारी उन्मूलन कानून, विनोबा जी का भूदान आन्दोलन तथा इतने भूमि सुधारों सम्बन्धी कानून होने के बाद भी देश की बहुत बड़ी गरीब आबादी भूमि के एक टुकड़े के लिए तरस रही है और भूमि का मालिकान देश के कुछ प्रतिशत मुट्ठी भर लोगों के ही हाथ में आज भी है...! निश्चित रूप से प्रस्तावित भू-अधिग्रहण कानून का कोई प्रभाव इन पर पड़ने वाला नहीं था...
          हाँ अन्ना जी..! ऐसे में मुझे आश्चर्य होता है की जंतर-मंतर पर आप पता नहीं किसके लिए बैठते हैं...क्या एक बार भी आप ने इन वंचितों को भी कोई भू-अधिकार दिलाने के लिए आन्दोलन खड़ा किया..? मुझे तो अब आपका जंतर-मंतर पर बैठना बनावटी और दिखावटी ही अधिक लगता है...बल्कि जैसे यह किसी अन्य स्वार्थ सिद्धि हेतु प्रायोजित और लोगों को धोखा देने वाला हो...जैसे इस उदाहरण में देखा जा सकता है....
          “किसी विकास सम्बन्धी कार्यालय में सैकड़ों लोगों के नाम की सूची देते हुए कोई कहे कि इन लोगों को रोजगार से अभी तक वंचित रखा गया है और योजना होते हुए भी इन्हें कोई रोजगार नहीं दिया गया है...इस समूह के नेता के तौर पर ‘कोई’ कुछ गरीब मजदूर जैसे दिखने वालों के साथ धरने पर बैठ जाए...और..जब इस सूची की जांच की जाए तो पता चले कि सूची में सम्मिलित लोगों ने न कभी काम माँगा और न ही उन्होंने ऐसे किसी सूची पर हस्ताक्षर ही किये...और तो और...जब धरने में शामिल लोगों से उनकी समस्या पर बात की जाए तो रोजगार की बजाय वे आवास, राशन-कार्ड, पेंशन आदि का रोना रोने लगें..! अब इस आंदोलनरत धरने का नेतृत्व-कर्ता एक बरगलाए समूह का नेतृत्व करते हुए दिखा जिसके पीछे का उद्देश्य कुछ लोगों को ब्लैकमेल करना था और इसके पीछे क्षेत्र में अपनी नेतागीरी की धाक ज़माना भी था...”
          अन्ना जी देखा आप ने..! उक्त उदाहरण में नेतृत्व-कर्ता लोगों की वास्तविक समस्याओं के प्रति आन्दोलन-रत नहीं था बल्कि इसके पीछे उसके निहित उद्देश्य थे जो कम से कम उन गरीबों के वास्तविक हितों को साधता दिखाई नहीं दे रहा है...कम से कम आप से ऐसी आशा नहीं की जाती..!
         अन्ना जी...चीजों पर सार्थक बहस होनी चाहिए...हो सकता है भूमि अधिग्रहण कानून में कोई कमियाँ हो...लेकिन देश भी अब गुलाम नहीं है...जो नहीं समझेगा जनता तो उसे स्वयं अपने मताधिकार से पांच साल बाद कुर्सी से उतार देगी...कानून तो बनते-बिगड़ते रहेंगे...लेकिन किस परिस्थिति में एक दूसरी आजादी के आन्दोलन की बात आप कर रहे हैं...? अभी तो आप असली आजादी ही नहीं ला पाए हैं...इन व्यर्थ के आन्दोलनों से कुछ होने वाला नहीं है...!!
         अन्ना जी एक बात और है..आज शहरों का विकास हो रहा है नए-नए आवासीय क्षेत्र विकसित हो रहे हैं, किसानी के लिए सबसे अधिक उपजाऊ भूमि शहरी आवासीय क्षेत्र में बदलते जा रहे हैं...और..सुदूर ग्रामीणांचल का गरीब भूमिहीन मजदूर इन्हीं नव विकासमान क्षेत्रों में आ-आ कर मजदूरी कर अपनी ‘मरजाद’ बचाने में कामयाब हो पा रहा है...लेकिन फिर भी भूमि के लिए मर-कटने वाले किसान किस लालच में अपनी जमीनों को बेंच अपनी ‘मरजाद’ खो रहे हैं..? वास्तव में यह अर्थ-जगत बहुत ही रहस्यमय है...यहाँ ‘मरजाद’ और ‘भूँख’ बाजार में नीलाम होते हैं...और इस नीलामी में कोई न कोई नेता भी बनता रहता है..! प्लीज अन्ना जी..अगर किसी को बचाना है तो सभी को ऐसी नीलामी और इस तरह के नेता से बचाइए..!!
       अन्ना जी...एक बात और है, हो सकता है...आपको यह बात कड़वी लगे...चेहरे-मोहरे, ओढ़ने-पहनावे, टोपी आदि से आप तो शुद्ध रूप से पारंपरिक, सादगी से परिपूर्ण और सांस्कृतिक लगते हैं और इसी कारण आप में भारतीयों के लिए किसी आन्दोलन को खड़ा कर देने की क्षमता भी दिखाई देती है...लेकिन कभी आप ने यह गौर किया है कि यह सुरुचिपूर्ण सांस्कृतिकता, पारम्परिकता किसी देश के विकास में कितना योगदान दे सकती है..?
        हम अपने देश के प्रति इस बात पर गर्व करते हैं कि हम एक प्राचीन इतिहास वाले सांस्कृतिक रूप से संपन्न देश के लोग हैं...हाँ इसी प्रकार इंग्लैंड, यूरोप के लोग भी अपने ऊपर गर्व कर सकते है.. और...एक देश बेचारा अमेरिका है..! जिसके पास सत्रहवीं सदी के पूर्व का कोई गर्व करने वाला इतिहास या परम्पराएं नहीं है जिस पर वहाँ के लोग गौरवान्वित हों..! लेकिन वह सांस्कृतिक और परम्पराविहीन देश अमेरिका..! आज दुनिया का सिरमौर देश है और वहाँ के राष्ट्रपति का स्वागत हम पलक-पांवड़े विछा कर करते हैं...! जबकि पूर्वज-विहीन एक साधारण से व्यक्ति को वहाँ का जनमानस राष्ट्रपति बना देता है...क्यों..? क्योंकि वे अमेरिकी अपने सांस्कृतिक या ऐतिहासिक जीवन से सीखने की बजाय जीवन की व्यावहारिक और वास्तविक आवश्यकताओं को अपनी प्रगति के लिए अधिक उपयोगी मानते हैं..और इसी को विकास का आधार बनाते हैं|
       हमारे यहाँ हालात क्या हैं..? एक चायवाला केवल विकास की बात कर भारत का प्रधानमन्त्री नहीं बन सकता...बल्कि किसी की टोपी पहनने से मना करने के साथ ही प्रच्छन्नं रूप से उसे तथाकथित नॉन-सेक्युलर होने या फिर साम्प्रदायिक होने का आरोप भी धारण करना पड़ेगा...| कारण..? स्वतंत्रता के बाद के हमारे ज्यादातर आन्दोलन वास्तविकताओं की अनदेखी करते हुए तथा स्वतंत्र होने के अहसास के बगैर खड़े किये जाते रहे हैं...जो कुछ दूर जा कर अपनी बेमौत मर जाते हैं..और..यहाँ का जनमानस इन आन्दोलनों से ठगा हुआ अगली चुनाव प्रक्रिया को क्रान्ति के रूप में इस्तेमाल करता है...! बात यहीं पर बिगड़ती है...कुछ लोग भले ही अपनी ‘मरजाद’ बनाए रखें...लेकिन यदि आप जैसे लोग चीजों पर सार्थक बहस न कर इस तरह के आन्दोलनों से लोगों को गुमराह करते रहेंगे तो चुनाव दर चुनाव देश का समय व्यर्थ होता रहेगा...! और..एक क्रांति लोगों के लिए तरसती रहेगी..! क्योंकि..लोगों को कौन अपनी-अपनी ‘मरजाद’ की खोलों से बाहर निकालेगा..?
      अंत में आदरणीय अन्ना जी एक बात और कहना चाहता हूँ...कुछ लोग कह सकते हैं गरीबी तो मानसिकता में होती है या डार्विन के विकासवाद के ‘उत्तरतम के जीवितता’ के सिद्धांत का उल्लेख कर उनकी यही नियति मान लेते हैं| लेकिन आधुनिक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा एवं आप जैसे लोगों के होते ये तर्क आज बेमानी हैं...बस आवश्यकता है आप जैसे लोग किसी के हाथ का खिलौना न बने..! हम आपका बहुत सम्मान करते हैं..!!
                                                                      आपका ही एक शुभचिंतक”

         इसे पढ़ मैंने एक गहरी स्वांस भरी... “हूँ....तो आप इसे छिपा कर क्यों रखे हैं..डरिए नहीं बगैर आपके नाम के मैं इसे अपने फेसबुक में पोस्ट करूँगा शायद अन्ना जी के पास यह पहुँच जाए और वे या अन्य लोग आपके विरुद्ध कोई आन्दोलन खड़ा नहीं करेंगे....” मैंने थोड़ा विनोदपूर्ण अंदाज में कहा...|