शनिवार, 3 अगस्त 2019

नेताजी बुरे फंसे!

           नेता जी बुरे फंसे ! बस इतनी सी ब्रेकिंग न्यूज की हेडिंग पढ़कर दिल बल्लियों उछल पड़ा। जैसे इत्मीनान हो गया कि बच्चू नेता जी! अब ज़्यादा न इतराओ, आप फंसे हो और वह भी बुरे !! नेता जी का बुरा फंसना मुझे खुशी दे गया, क्योंकि मैं ठहरा देशभक्त टाइप का आदमी। इसीलिए नेताजी की इस फंसावट में मुझे मेरी राष्ट्रोद्धार की परिकल्पना सजीव होती प्रतीत हुई। वैसे तो इस जग में जन्मने वाले सभी फंसे होते हैं और इसका प्रमाण भी हमसे ही मिल जाता है जब पूंछने पर कह बैठते हैं कि भइया हम तो दुनियादारी में फंसे भये पड़े हैं। हाँ कहीं भी घुस जाओ हर तरफ और हर चीज की अपनी दुनियादारी होती है।

           खैर टीवी के स्क्रीन पर बार-बार फ्लैश हो रहे इस ब्रेकिंग न्यूज पर अपनी नजरें जमाए हुए मैं देश के महान लोकतांत्रिक स्वरुप के प्रति श्रद्धावनत होकर मन ही मन इसे प्रणाम करने लगा और सोच रहा था कि जब यहां का प्रजातंत्र नेता जी तक पहुँच सकता है तो हम जैसे लोग किस खेत की मूली हैं, हम तो फंसे-फंसाए बैठे हैं। अपने इस आकलन के साथ भयमिश्रित प्रसन्नता महसूस करते हुए मैं राष्ट्र के सुखद भविष्य की कल्पना में मशगूल हो गया।   

           अभी मैं स्क्रीन पर दुप-दुप हो रहे इस न्यूज हेडिंग से उत्पन्न फीलगुडीय टाइप के रोमांच में खोया ही था कि मेरे मन में एक विचार फ्लैश हो उठा। वह यह कि, नेता जी‌ आखिर फंसे तो किसमें फंसे? क्योंकर और कहाँ फंसे? क्योंकि यहाँ फंसने फंसाने की किसिम किसिम की वैरायटियां हैं। किसी घपले-घोटाले में तो नहीं फंस गए बेचारे नेताजी!! 

       यही जानने के लिए मैंने एक बार फिर अपना ध्यान न्यूज को ब्रेक कर रहे हेडिंग पर फोकस किया, जो अभी भी फ्लैश हो रहा था। इसी बीच परचार-सरचार भी शुरू हो गया। लेकिन मैंने टीवी स्क्रीन से नजरें नहीं हटाया, कि क्या पता नजर हटी नहीं कि ये ससुरे टीवी न्यूज वाले इस ब्रेकिंग न्यूज का कोई पार्ट-टू दिखा कर चलता बनें और मैं देश हित के किसी महान पल का साक्षी बनने से रह जाऊँ। इन टीवी वालों ने अपने इस न्यूज से जैसे मुझे भी फांस लिया हो।

       एक देशभक्त टाइप के व्यक्ति की तरह मैं नेताजी के फंसने से होने वाले देशोद्धार के बीच आनुपातिक संबंध के मानसिक विमर्श में फंस गया। वैसे चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार आदि में फंसने को मैं ज्यादा महत्व नहीं देता और ऐसी फंसावट देशोद्धार की क्रिया में बाधक भी नहीं होती, क्योंकि नेता लोग जेल में रहते हुए भी प्राय: येन-केन-प्रकारेण देश सेवा करते हुए देखे जा सकते हैं। 

       मेरा दूसरा अंदेशा नेताजी के घपले-घोटाले में फंसे होने को लेकर था। वैसे घपले-घोटाले को लेकर मेरे अपने कुछ निजी विचार हैं। 

     दर‌असल इस देश का तांत्रिक-सिस्टम घपले-घोटाले को लेकर नहीं, अपितु टारगेट को लेकर  संवेदनशील होता है। और हो भी क्यों न, आखिर इतने पिछड़े और अविकसित देश में यदि टारगेट पूरा नहीं होगा तो देशोद्धार होना संभव नहीं। इसीलिए तांत्रिक-सिस्टम में टारगेट पूरा न करने वाले ही फंसते हैं और उनके विरूद्ध कार्यवाहियाँ होती है।

        घपले-घोटाले तो टारगेट पूरा होने के बाईप्राॅडक्ट है, जिससे भारत देश का लोकतंत्र समृद्ध होता है। अब अगर टारगेट पूरा नहीं होगा, तो घपले-घोटाले भी नहीं होंगे और देशोद्धार का उद्देश्य भी पूरा नहीं होगा। इसीलिए केवल लक्ष्य पूरा करने पर सारा जोर होता है। इस प्रक्रिया में घपला-घोटाला मौज का विषय होता है और टारगेट पूरा न होना सजा का। 

       घपले-घोटाले को तभी सजा का विषय माना जाता है जब इसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता, अन्यथा घोटालेबाज सदैव से पुरस्कृत होते आए हैं। यही कारण है कि चमक-दमक भरी जगहों पर घोटालेबाज ही होते हैं। एक तथ्य और, घपला-घोटाला कभी सिद्ध भी नहीं किया जा सकता।

        इस प्रकार घपले-घोटाले लोकतंत्र को जीवित रखने के काम आते हैं, इसके पीछे राष्ट्रोद्धार की भावना छिपी होती है! निश्चित ही नेता जी का घपले-घोटाले में फंसना देश हित में नहीं होगा और यह बेफालतू की बात होगी।

       अभी मैं नेता जी के फंसने को लेकर अपने इसी मानसिक विमर्श में गोता लगा रहा था कि टीवी स्क्रीन पर बड़े जोर से एक और ब्रेकिंग न्यूज फ्लैश हुई, जो स्क्रीन पर लगातार दुपदुपा  रही थी। 

       “नेता जी आचार-संहिता के उल्लंघन में फंसे” बस यही था ब्रेकिंग न्यूज पार्ट-टू! इस न्यूज ने तो वाकई में मुझे ब्रेक कर दिया। इतनी देर से मैं पहाड़ इसलिए नहीं खोद रहा था कि मुझे चुहिया की तलाश थी और न ही मैं खजूर पर अटकना चाहा था। देशोद्धार के प्रति आशान्वित मेरा हृदय इस समाचार से बैठ गया। 

       आखिर आचार-संहिता के उल्लंघन में फंसना भी कोई फंसना होता है! पता चला कि माननीय ने कुछ ऐसा-वैसा कह दिया था, जिसे कहने का, उनका कहने वाला आशय नहीं था। अब किसे यहां कौन समझाए कि इस देश का टारगेट लोकतंत्र है और नेता का टारगेट चुनाव जीतना, चुनाव जीत कर ही ये देश का टारगेट पूरा कर सकते हैं, जो एकदम से देशहित का विषय है। नेता जी भी अपना टारगेट पूरा कर रहे थे, तो क्या बुरे फंस गए? लेकिन जो टारगेट पूरा करने के चक्कर में फंसते हैं उन्हें मैं निरपराध मानता हूँ।

         फिर भी, चुनाव के पीरियड में अपने देश का थका-मांदा लोकतंत्र इसी आचार-संहिता की मच्छरदानी में आराम फरमाता है। बाकी समय वैसे भी उसकी नोचाई-चोथाई चलती रहती है, लेकिन यहाँ भी उसे चैन नहीं लेने दिया जा रहा। नेता जी ने मच्छरदानी में आराम फरमाते लोकतंत्र को डिस्टर्ब करने की कोशिश किया, लेकिन यह उनका माफीएबल बचपना है। 

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खुलासा

       अभी एक नया-नया टी वी चैनल आया है, वही टी वी चैनल माने समाचार चैनल! आखिर चैनलों में भी तो समाचार चैनल का ही धंधा चोखा जो होता है !! रिमोट का बटन दबाते दबाते मैं इसी नये चैनल पर पहुंच गया था, देखा ऐंकर महाशय उछल-उछल कर कुछ वी आई पी टाइप के लोगों के ऊपर कराये गए अपने चैनलीय स्टिंग आपरेशन के खुलासे ऐसे कर रहे थे जैसे कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया हो, जबकि बात कुछ भी नहीं थी, बस इतनी कि बेचारे ये स्टिंगित नेता येन-केन प्रकारेण चुनाव लड़ने के लिए फंड की तलाश में थे, जबकि अपने लिए फंड कौन नहीं तलाशता? लेकिन ये ऐंकर महाशय इस छोटी सी बात पर भी इन बेचारों की लत्तेरे की धत्तेरे की किए जा रहे थे।
           
          हालांकि इस खुलासित समाचार चैनलीय स्टिंगित नेताओं की चुनावी फंड की डिमांड उन्हें फंडित करने वाले की हितचिंता की गारंटी के साथ और बाकायदे देश के लोकतंत्र के हित में कुछ टिप्स को फालो करने के लिए ही थी। आखिर इस देश में लोकतंत्र की समृद्धि के लिए नेता को भीड़ और नशेड़ी वोटर ही तो चाहिए। क्योंकि यहां का मतदाता बिना नशे का फुल डोज़ लिए लोकतंत्र में जान नहीं फूंकता। वोटर के मदमत्तावस्था में पहुंचते ही भारतीय लोकतन्त्र के पैरों में घुंघरू बंध जाता है और तब भीड़ के सामने इसकी चाल देखने लायक होती है। तो, इस स्टिंगीय खुलासे से यही लब्बोलुआब निकल कर आ रहा था कि भावी उम्मीदवारों की फंड मांगने की सारी क़वायद लोकतंत्र के पैरों में घुंघरू बांध कर उसे भीड़ के सामने नचाने की ही थी।

        लेकिन ऐंकर महोदय भ्रष्टाचार के इस खुलासे को धमाकेदार बताए जा रहे थे। अब उन्हें कौन समझाए कि भ्रष्टाचार में जो 'आचार' शब्द जुड़ा है न, वही जीवन को खुशनुमा बनाता है, नहीं तो इस जीवन में नीरसपने के सिवा और कुछ भी नहीं है। यह बात इस देश के आम से लेकर खास सभी टाइप के मतदाता जानते हैं। शायद यह ऐंकर ही है, जो इसे न जानते हों, अन्यथा अपने खुलासे पर इतना कूद-फांद न मचा रहे होते। हद तो तब हो गई जब अचानक चिल्लाने जैसी ब्रेकिंग आवाज में बोल पड़े कि "स्टिंग में धराये फला नेता को फला पार्टी ने ससम्मान अपने दल में शामिल करा लिया।" मैंने ध्यान दिया इसे ब्रेकिंग टाइप का न्यूज़ बनाते समय उनकी भाव भंगिमा देखने लायक थी। जैसे वे, मने ऐंकर जी ही किसी स्टिंग में धरा लिए गए हों और उनकी टीआरपी घट गई हो। खैर चैनल पर विज्ञापन भी आने शुरू हो गए थे जैसे अपने इस प्रायोजित स्टिंग आपरेशन के खुलासे वाले प्रोग्राम की टीआरपी के घटने के पहले ही उसे भंजा लेना चाहते हों।
         
        ये चैनल वाले भी बड़ी चालू चीज होते हैं, बेबात को बात बना देते हैं और बात को हवा में उड़ा देते हैं। देखिए तो इनके स्टिंग में खुलासे वाली जैसी कोई बात नहीं है, जो बात सबके सामने पहले से ही खुली है उसका क्या खुलासा? लेकिन नहीं, भाई को चैनल चलाना है टीआरपी बढ़ाना है..विज्ञापन पाना है और कमाई करनी है। क्या जनता बेवकूफ है, लेकिन यह जनता है सब कुछ जानती है, इसीलिए इस खुलासे की कहीं कोई चर्चा तक नहीं हुई। हां जनता को पता है कि भीड़ का हिस्सा बनने, मुफ़्त में पीने और यहां तक कि उसके वोट की कीमत भी उसे मिलती है और उसे यह सब देने वाले यही नेता लोग होते हैं। बेचारे स्टिंगित नेता इसी के लिए तो फंड इकट्ठा कर रहे थे! जनता समझ गई है कि यह खुलासा या इस तरह के खुलासे उसके लोकतांत्रिक अधिकारों पर कुल्हाड़ी चलाने के समान है।

        आखिर जनता भी तो जानती है कि यही चुनावी मौसम है, जिसमें उसे कुछ पाना होता है, नहीं तो फिर पांच साल टकटकी लगाए इसका इंतजार करना होता है। अतः वह भी सोचती है कि इसी मौसम में पी पा लो, मदमत्त हो लो और जहां मिले मुफ़्त की रोटी तोड़ लो, नहीं तो यहां कुछ मिलने वाला नहीं है! वैसे भी यहां का लोकतंत्र गरीबों के नाम पर गरीबी दूर करने के लिए मनरेगा टाइप की योजना है!! अरे हां, मनरेगा पर पिछले दिनों मिले घिसइया की बात याद आ गई। वही घिसई जिसकी चर्चा अकसर मैं आप सबसे कर बैठता हूं।
       
          घिसई को नशे में मदमत्त देख, मैंने उस दिन उसे गुस्से में डपटते हुए कहा था कि तूने आज फिर पी ली है, जबकि तू कहता है कि अपने पैसा का नहीं पीता? घिसइया वहीं नशे में लड़खड़ाते हुए मेरे सामने फर्श पर बैठ गया था और हाथ जोड़कर मुझसे बोला था, "नहीं हुजूर..आज भी मैंने अपने पैसे से नहीं, मनरेगा के पैसे से पिया है।" यह सुनकर मेरा सिर चकरा गया था। मैंने उसे फिर से डपटते हुए पूंछा, अरे, बेवकूफ मनरेगा का पैसा क्या तुम्हारा पैसा नहीं है?" मेरी इस बात पर घिसइया ने उसी तरह नशे में झूमते हुए मुझे समझाया था।

      असल में क्या है कि घिसई को बिना काम किए हुए मनरेगा के साढ़े पंद्रह हजार रुपए मजदूरी के मिले थे, और प्रधान जी ने उसमें से पंद्रह हजार रुपए लेकर उसे पांच सौ रुपए दिए थे, उसी पांच सौ रुपए से उसने अपने दोस्तों संग शराब पी थी। घिसईया के इस खुलासे पर मैं विस्फरित नेत्रों से उसे देखने लगा था। मुझे अपनी ओर इस तरह घूरते देख नशे में चूर वह अपनी लाल-लाल मदमाती मिचमिचाती आंखों से मेरी ओर देखते हुए बोला था, "अब बताओ हुजूर..मैंने मुफ़्त में पिया कि नहीं?" मैं घिसई को वैसे ही देखे जा रहा था, मुझे लगा लोकतंत्र में अपना हिस्सा पाकर वह नशे में झूम रहा है।

      ज़रा सोचिए, घिसई के इस खुलासे के सामने चैनल वालों का यह खुलासा कहां ठहरता है !! खैर जो भी हो लेकिन एक बात है, अगर अब घिसई मुझे मिल जाए तो मैं इन खुलासे करने वाले चैनलों के ऊपर उसे विधिक कार्यवाही करने के लिए उकसाउंगा, क्योंकि उसके बचे-खुचे लोकतांत्रिक अधिकारों पर ऐसे खुलासे बाधक के समान है।
       
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अभिभूतीकरण

        घिसई अकसर नेताओं के भाषणों को "आरत के मन रहई न चेतू" टाइप से आब्जर्व करता है और उसी में अपना भाग्य तलाशता है। कभी-कभार मिलने पर इन भाषणों का जिक्र वह मुझसे जरूर करता है, और मैं इन बातों के बीच में छिपे पप्पू-गप्पू-पन से उसे परिचित भी कराता रहता हूँ। असल में क्या है कि डरता हूँ, आम आदमी से भी गया गुजरा अपना यह घिसई कहीं ऐसे भाषणों से अभिभूत होकर चकरघिन्नी में न फंस जाए..! क्योंकि यह चकरघिन्नी बड़ी रोमांटिक चीज होती है। 

        उस दिन गरीबों को जागरूक करने में लगे किसी स्वयंसेवी संस्था के एक नेतानुमा पदाधिकारी सामने बैठे घिसई टाइप आदमियों को समझाते हुए बोल रहे थे, "बोलो, योजनाओं की जानकारी लोगे कि नहीं..बोलो.." और  हुंकार के उठते समवेत स्वर के साथ उनसे नारा लगवाते, "जोर से बोलो..भारत माता की जय।" पहले तो "योजनाओं की जानकारी" और "भारत माता की जय" के बीच का कनेक्शन समझ में नहीं आया, लेकिन मैंने अहसास किया कि इस जयकारे के जस्ट बाद देशभक्ति की भावना में मेरा रोयाँ खड़ा हो चुका है! इस रोमांच के साथ ही मैं इन दोनों के बीच के कनेक्शन को जान गया। अब सभा विसर्जित होने के बाद नेता जी निश्चिंत होकर अपने पीछे 'भारत माता' को छोड़ जाएंगे, जो अपने इन लालों पर कृपा बरसायेगी। मतलब उन नेता जी की बातों से मैं भी अभिभूत था। तो, ऐसेई होता होगा अभिभूतीकरण और अभिभूतावस्था.!! 

          घिसई भी कभी-कभी भाषण सुन लेने के बाद ऐसा ही अभिभूत हुआ रहता है, तब उसका भूत उतारना मुश्किल होता है, और जब-तब समझाने के दौरान मुझसे कह बैठता है, "गुरू..तुहूँ पार्टीबंदी में फंसि गवा ह्यअ.." इसपर कहने को तो मैं उससे यह भी कह सकता हूँ, "मिस्टर घिसई जी..बुद्धिजीवियों की बुद्धि दरअसल पार्टीबंदी में पड़ने पर ही खुलती है, और तभी उनकी बुद्धि की गहराई का पता चलता है" लेकिन कहता नहीं, क्योंकि घिसइया ऐसी बातों को समझ ही नहीं पाएगा। हालाँकि मेरी पत रखने के लिए वह हाँ-हूँ के अंदाज में मूंड़ी जरूर हिलाता रहता है, खैर। 

           आज मिलते ही वह बोल पड़ा था, "गुरु अब तउ ई सरकार बदलै क पड़ी।" इस बात में उसकी दृढ़ता देख मैं समझ गया कि अपनी अभिभूतावस्था में वह ऐसा बोल रहा है, क्योंकि उसकी एकदमै वाली आम-आदमियत उसे इतने दृढ़-निश्चय पर कभी नहीं पहुँचा सकती! हाँ, आजादी के इतने वर्षों बाद पैदा हुए बेचारे घिसई जैसों को आज भी निर्णय लेने के लिए अभिभूतीकरण की प्रक्रिया से गुजरना और गुजारना पड़ता है।      

        मैंने अभिभूतीकृत घिसई का भूत अपने आप उतरने तक, उसे कुछ भी समझाना व्यर्थ समझा और उससे पूँछा, "ऐसा क्यों!" 

         छूटते ही घिसई बोला-

        "अइसा एहि बदे कि गुरू, ई सरकार हमई लोगन के लिए घपलऊ-घोटालऊ नाहीं करइ देत बा, हमरे बेरोजगारी का तनिकऊ खियाल ई सरकार को नाहीं अहै..आसमानी घोटाला कइके बड़कवन को जरूर फायदा पहुँतावत बा..फिर तउ सरकार बदलै क पड़िबइ करी..!" 

          उसकी इन तल्ख बातों से मैंने अनुमान लगाया कि जरूर किसी नेता के भाषण से इसका अभिभूतीकरण सम्पन्न हुआ होगा। लेकिन इधर चुनावी-कार्यक्रम सम्पन्न हो जाने से नेताओं के भाषणबाजी की भी संभावना नगण्य थी। फिर भी मेरे दिमाग में आया कि इस देश के नेता चिर-चुनावी-मुद्रा बनाए रखते हैं, जैसे रनवे पर उड़ान भरने के लिए तैयार खड़ा कोई विमान ! हो न हो, ऐसे ही चुनावी-मोड में किसी चिर-ऐक्टीवेटेड-पर्सन टाइप नेता ने इस घिसई को अपनी बातों से अभिभूत कर दिया हो.!!

        खैर, मेरा अनुमान सही निकला, दरअसल वह एक नेता के लान में घास छिलायी का काम करके वापस आ रहा था। उन नेता जी ने अपने घर पर ही उसे अपनी बातों से अभिभूत कर दिया था। उन्होंने उसे समझाया था कि अगर सरकार घपले-घोटाले करने देती तो शहर में खाली पड़े अपने बड़े "पिलाट" में वे "बेल्डिंग" बनवाते और उस निर्माण कार्य में उसे यानी घिसई को कई महीनों का रोजगार दे देते। साथ में घिसई ने मुझे यह भी बताया कि "गुरू, ऊ बड़ा दयालू हैं, कह रहे थे, पिछली बार हमने अपने पैसे से वृद्धाश्रम बनवाए जहाँ बूढ़े होने पर तुम भी रहि सकत हो और गुरू...ऊ कह रहे थे कि वैकुंठ-धाम को इतना भव्य बनवाया है कि ऊँहा जाने पर बहुत शांति मिलेगी..!" घिसई के ही अनुसार, अंत में नेता जी ने उसे यह भी समझाया था, "देख घिसइया, तुझ जैसे लोग किरांतिकारी-एपरोच नहीं रखते हैं, इसीलिए भुगतते हैं, सरकार बदलो और अबकी बार बड़के-चुनाव में मुझे जिताओ, आखिर तुम्हारे जीने-मरने तक का खयाल हमहीं रख सकते हैं, बताओ हमसे बड़कवा धार्मिक कउन होगा..!"

        मुझे ध्यान आ गया, शायद ये वही नेता जी रहे होंगे जिन्होंने एक दिन अपने द्वारा किए गए कार्यों के उद्घाटन के अवसर पर अपनी उपलब्धियों को गिनाते-गिनाते वृद्धाश्रम और वैकुंठ-धाम की सुख-सुविधा और उसकी भव्यता का ऐसे बखान किया था कि जैसे, सामने बैठी जनता में जल्दी-जल्दी वृद्ध होकर वृद्धाश्रम जाने और फिर मरकर वैकुंठ-धाम की सुख-सुविधा भोगने की लालसा जगा रहे हों..!! मैंने देखा था, उनके पी.ए.जी यह भाषण सुनकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

      खैर, मैं समझ गया कि आज घिसइया का अभिभूतीकरण कस के हुआ है और इसपर से "किरांतिकारी-एपरोच" वाला भूत इतनी आसानी से उतरने वाला नहीं है, क्योंकि इसकी अभिभूतावस्था दीर्घकालिक स्वरूप धारण किए प्रतीत हो रही है। और अपने इन्हीं विचारों के साथ, उसे समझाए बिना मैंने अपनी राह पकड़ ली। 
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शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

अपने-अपने आभामंडल

      अपने-अपने आभामंडल के बडे़ उपयोग हैं। कुछ लोग तो अपने इस आभामंडल के प्रति इतने जागरूक होते हैं कि देवताओं से प्रेरणा लेते देखे जा सकते हैं। मतलब जितना बढ़िया जिसका आभामंडल, उतना ही बढ़िया उसकी पूजा और चढ़ावा। एक बात और, कुछ लोग अपना आभामंडल स्वयं गढ़ते हैं, तो कुछ दूसरों से गढ़वाते हैं! इसके लिए बकायदा अभियान भी चलाते हैं, मतलब इसपर बहुत बारीकी से काम होता है। इस मामले में एक छोटा सा उदाहरण फेसबुकियों का ले सकते हैं, लाईक-कमेंन्ट की चाहत में, इन्हें अपने-अपने आभामंडल को बहुत बारीकी से समृद्ध और चमकीला बनाने का प्रयास करते हुए देखा समझा जा सकता है।

           आखिर, किसी को कुछ तो समझा जाए..! यही समझने-समझाने के लिए यहाँ शूरता-वीरता, आदरणीयता-फादरणीय, स्वघोषित दानवीरता या फिर स्वनामधन्य ख्यातिलब्धता जैसी हरकतों पर फोकस जाता है, हाँ कुछ इसी टाइप से गुणीजन सोशल मीडिया पर नमूदार होते हैं। और, इसके पहले कि कोई अन्य व्यक्ति इन गुणी प्रतिभाओं का सम्मान करे उसके पहले हमें ही यह काम कर देना चाहिए, नहीं तो इसमें चूक अपने स्वयं के लिए गढ़े जा रहे आभामंडल को क्षति पहुँचती है क्योंकि हम अपने और दूसरे का आभामंडल इसी तरह गढ़ सकते हैं। यह गढ़न-प्रक्रिया एकदम से नियत परिक्रमा-पथ पर नक्षत्रीय गति की तरह ही है! इस मामले में चाहे सोशल-मीडिया हो या फिर राह चलते, लोगों की दरियादिली देख मुझे अपनी बेदरियादिली खटकने लगती है और मुझे अपने ऊपर बहुत कोफ्त होती है ! 

               अब यही बात ले लीजिए, आखिर गरीबी का भी तो अपना आभामंडल होता है, मैं किसी को भीख देने में बहुत आनाकानी करता हूँ, भीख देना मुझे लगभग नापसंद है। भीख न देना पड़े इसलिए जेब में सिक्के लेकर नहीं चलता और जेब में सिक्का न होने की बात से भीख न देने के पापबोध से स्वयं को बचा भी लेता हूँ। आखिर भीख में लोग सिक्के ही तो डालते हैं कटोरी में.! 

             एक सुदूर धार्मिक यात्रा-पथ पर जब छोटे बच्चे का हाथ पकड़े एक औरत ने अपनी गरीबी के आभामंडल से मुझे प्रभावित करने का प्रयास किया, तो मैंने उसे नजरअंदाज कर दिया था। अपने इस प्रभाव को असफल होते देख वह मुझसे बरबस बोली थी "अरे, कुछ पुन्य तो कमाई ल्यो.." इसपर मैंने जब उससे कहा "मुझे ऐसे पुन्य नहीं कमाना" तो चिढ़कर यह बोलते हुए, "तो यहाँ पाप कमाई आए हो" दूसरी ओर चली गई थी। इसलिए मैं कहता हूँ, यदि हम किसी के आभामंडल का सम्मान नहीं कर रहे तो हो सकता है पाप कमा रहे हों..! पाप-पुन्य, मतलब दंड-पुरस्कार के फेर में भी हम आभामंडलों के गिरफ्त में आ जाते हैं..!! 

        लेकिन इसमें भी बड़ी समस्या है, उस यात्रा-पथ पर ट्रेन में मैं अनमने ही सही, एक अंधे पर कुछ दयालु टाइप का हुआ तो एक सहयात्री ने मेरी इस दयालुता पर पानी फेरते हुए कहा, "अरे, ये सब बने होते हैं।" और उसने इस मामले में मुझसे अपनी सिद्धानुभूति के हवाले से कहा, "ऐसे ही मैंने एक विकलांग पर दया दिखाई थी, मैंने देखा ट्रेन रूकते ही वह उछलते हुए दूसरी ओर भागा था..वाह! पैर तोड़ने-मरोड़ने का उसे गजब का अभ्यास था।" उसकी इन बातों से मेरी उभर आई दयालुता के उत्साह पर पानी फिर चुका था। फिर भी मन ही मन मुस्कुराते हुए मैं यह सोच रहा था कि "यदि ऐसे भिखमंगों को ओलम्पिक में अवसर मिले तो जिम्नास्ट में एकाध पदक जीत ही लें! और पदकों का जखीरा अपने देश के कब्जे में हो...लेकिन जिम्नास्ट तलाशना सरकार का काम है और सरकार ऐसे काम ऐसे ही नहीं करती..तो इन बेचारों के लिए यह भिखमंगई ही बढ़िया है जिसमें बिना किसी हुचकीधमधम के काम बन जाता है..ऐसी प्रतिभा का इससे अच्छा उपयोग कहाँ होगा..।" खैर 

            हमारी ट्रेन पटरी पर दौड़ती जा रही थी। मैं देख रहा था..एक सहयात्री ने जब एक भिखमंगे को दुत्कारा तो एक अन्य अनुभवी यात्री ने कहा, "आप इसको दुत्कार रहे हो, लेकिन अभी वे ताली बजाते हुए आएंगे तो बड़े आराम से उन्हें दस का नोट पकड़ा दोगे" मैंने इस बात पर गौर जरूर किया लेकिन ट्रेन की खिड़कियों से, पीछे भागते जमीन, पेड़ आदि को देख यह सोच रहा था कि गति अवस्था में चीजें कैसे पीछे छूटती जाती हैं और ट्रेन की गति के साथ मैं भी इन बातों को पीछे छोड़ता रहा।

          थोड़ी देर बाद सही में, मुझे ताली की आवाज सुनाई पड़ी, जो रह-रहकर तेज होती जा रही थी। "आइ दैया..दे दो.." मैंने उस आवाज के श्रोत की ओर ध्यान दिया तो एक शख्स उस तालीबाज को नोट पकड़ाते हुए दिखाई पड़ा! मैं देखा रहा था, जिसकी ओर भी वह हाथ बढ़ाता वही दस का नोट उसे पकड़ा देता..और अगर कोई अानाकानी करता तो उसकी अश्लीलता भरी छेड़खानी शुरू हो जाती ! उसे अपने ओर आते देख मैं साहस बटोर यह निश्चय करने में जुट गया कि "इन्हें एक पैसा भी नहीं देना...जब उन बेचारे टाइप के भिखमंगों को नहीं दिया तो इन्हें देना एकदम ऊसूलों के खिलाफ और कायराना बात होगी..इन्हें दस रूपए देने से बेहतर भिखमंगों को ही दे देना उचित होता..!" और तालीबाजो की इस हरकत को एक तरह से उनकी गुंडागीरी मान रेल-यात्रियों की सुरक्षा व्यवस्था को कोसने लगा था। खैर, इधर मेरे पास बैठे तीन-चार कश्मीरी यात्रियों की ओर ये हाथ बढ़ा-बढ़ाकर दस का नोट देते रहे। लेकिन मैंने गौर किया, पता नहीं क्यों मेरी ओर एक बार भी इनका हाथ नहीं बढ़ा और आसन्न धर्मसंकट से बच गया। जबकि मेरे बगल में बैठे भिखमंगे को दुत्कारने वाले सहयात्री से ये दस का नोट लेकर ही छोड़े। वाकई, कभी-कभी ओढ़ी हुई धीरता और गंभीरता वाला आभामंडल किसी के गुंडागीरी वाले आभामंडल से आपको बचा भी सकती है, यहाँ मुझे आभामंडलों का उपयोग भी समझ में आया।

            एक बात है इस यात्रा से मिली सीख के अनुसार, मुझे तो आभामंडल गढ़ना-गढ़वाना एक प्रकार की भिखमंगई प्रतीत हुई, जो ताली बजाने और बजवाने वाली अपने-अपने टाइप की हिजड़ागीरी ही है..! वैसे ये आभामंडल बड़े कमाल के और रहस्यात्मक होते हैं..!!