रविवार, 2 सितंबर 2018

मांसाहारी कि शाकाहारी?

           तमाम मानसिक ना-नुकुर के बाद पाँच पैंतालीस..हाँ इसी टाइम सुबह टहलने निकला..सड़क पर कुछ कदम चलने पर आभास हुआ कि पहनी हुई मेरी टी-शर्ट का रंग कुछ बदला हुआ है.. "टी-शर्ट तो वही पहनी थी जिसे रोज पहनता हूँ..फिर रंग कैसे बदल गया इसका...!" ऐसा मैंने सोचा। एक बार फिर मैंने ध्यान से टी-शर्ट को देखा.."अरे! इसे तो, मैंने उल्टा पहन रखा है..!!" जैसे अबकी बार मुझे समझ आयी। खैर, बेवकूफियों के बाद समझ आती है और इस समझ के बाद हम थोड़ा राजनीतिक हो लेते हैं..परिणामत: लम्बे हाथ सड़क पर मैंने निगाह डाली, इक्का-दुक्का लोग आ-जा रहे थे..सड़क पर चलते हुए टी-शर्ट उतारकर फिर सीधा पहना और इस प्रकार अपनी बेवकूफी से निजात पायी।
          टहलते हुए मैं एक दूसरे सड़क मार्ग पर हो लिया...लेकिन कुछ दूर जाकर मुझे वापस होना पड़ा...क्योंकि आगे कुछ लोगों का निधड़क "शौच कार्यक्रम" चल रहा था।  एक व्यक्ति जो अपने हाथ में पानी भरी बोतल लिए हुए था एक अन्य व्यक्ति से बतियाते हुए सुनाई पड़ा, "औरतों के लिए तो पाँच बजे सबेरे तक ही ठीक रहता है.." असल में ये महाशय भी हाथ में पानी का बोतल लिए मैदान खाली होने का इन्तजार कर रहे थे! शायद ये कुछ शर्मीले टाइप के थे। सच में, अभी तक हम खुले में शौच को कुरीति नहीं मान पाए हैं..
           आवास पर लौट आया था और यूँ ही चन्द्रकान्त खोत की पुस्तक "बिम्ब प्रतिबिंब" के पन्ने पलटने लगा था। स्वामी विवेकानंद के मुँह से कहलायी गई इसकी कुछ पंक्तियाँ बरबस ध्यान को आकृष्ट कर रही थी, जैसे, "सिद्धि प्राप्ति की भूख व्यक्ति के बौद्धिक अवनति का लक्षण है। सिद्धि प्राप्त व्यक्ति तमाम वासनाओं का शिकार हो सकता है।"
        
          इसीतरह "सिंह जैसा मांसाहारी प्राणी एक शिकार करके थक जाता है, किंतु बैल जो शाकाहारी होता है, पूरा दिन चलता है। चलते-चलते ही खाता है और सोता है।" "सत्वगुण के विकास के बाद मांसाहार की इच्छा नहीं होती, किंतु सत्व गुण के लक्षण हैं...परहित के लिए सर्वस्व का समर्पण, कामिनी-कंचन के प्रति सम्पूर्णतः अनासक्ति, निरभिमान और अहमभाव का सम्पूर्णतः अभाव। ये सभी लक्षण जब एक व्यक्ति में समाहित हो जाते हैं तो उसे मांसाहार की इच्छा नहीं होती।" " किसी भी प्रकार के राजनीति पर मेरा विश्वास नहीं है। ईश्वर और सत्य - यही विश्व में श्रेष्ठ राजनीति है। शेष सभी झूठ है, तुच्छ है..।" 
           हाँ बस यूँ ही मैं इन पंक्तियों पर भटकता रहा...एक बात है, शाकाहार या मांसाहार की बात से बढ़कर एक दूसरी चीज है, वह है पाखंड रहित आचरण..। खैर.. आज मैंने अपने दिन की सुबहचर्या अपनी बेवकूफी के साथ शुरू किया था, तो..
        #चलते_चलते 
         हम अपने बेवकूफियों के क्षण में राजनीति और पाखंड से दूर शुद्ध मन वाले होते हैं..यह शाकाहारी होने का लक्षण है..!!
            #सुबहचर्या 
             (30.8.2018)

ज्ञान का ज्ञान

          आज जब बाहर सड़क पर टहलने निकले तो वातावरण में धुँधलका छाया हुआ था, एकदम कुहरा के माफिक..इस मौसम में सुबह के छह बजे जैसे कुहरा पड़ रहा हो..! सड़क पर चलते हुए मेरे आगे पीछे से मोटरसाइकिल या अन्य छोटे वाहन आ जा रहे थे..इन्हें देखते हुए मन में खीझ उठ रही थी कि सबेरे की ये शान्ति भंग कर रहे हैं..और इतने सबेरे ही इन सब के निकलने की ऐसी कौन सी आवश्यकता आन पड़ी है..? इस बीच एक मोटरसाइकिल जबर्दस्त ढंग से धुँआ छोड़ते हुए मेरे आगे बढ़ गयी..उसके धुएँ और गंध से मेरे नथुने भर गए..एक अजीब से गुस्से और खीझ में मैं वापस लौटना चाहा, लेकिन मन में आया किसी तरह अपने टहलने का कोटा पूरा कर लें..वैसे भी आजकल टहलने का रूटीन सही नहीं चल रहा है..खैर..
         अखबार पढ़ते हुए "वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का निधन" पर निगाह पड़ी..
         ....हाँ..अखबार पढ़ने का चाव तो मुझे बचपन से ही रहा है, लेकिन धीरे-धीरे समझदारी बढ़ने पर सम्पादकीय पृष्ठों पर लेख भी पढ़ने लगा था..जिनके लेख मुझे अतिप्रिय होते उनमें कुलदीप नैयर भी थे..! उन दिनों इंटर कालेज में पढ़ रहा था..किसी विषय पर कुलदीप नैयर का लेख छपा था..उस लेख के बारे में उस दिन घर पर मेरे दादा जी समेत अन्य लोग बतिया रहे थे..क्योंकि आज से तीस-पैंतीस वर्ष पहले बिना लाग-लपेट के फुर्सत में आपस में लोग खूब बतियाते भी थे..! मैं कुलदीप नैयर का वही लेख पढ़ रहा था...तभी उस बातचीत के दौरान किसी ने मुझसे कहा, "अरे यह कुलदीप नैयरवा तअ.. वामपंथी..है एकर लेख तअ ऐसई ऊटपटांग रहथअ.." और यह कहते हुए मुझे उनके लेख पढ़ने से हतोत्साहित किया गया...लेकिन इस घटना के बाद कुलदीप नैयर के लेख पढ़ने में मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई..और आज तक यह जिज्ञासा बनी रही..इस घटना के बाद से धीरे-धीरे मेरे अंदर अपनी बनायी हुई किसी धारणा के विपरीत वाली धारणा को जानने की जिज्ञासा भी बढ़ चली थी...असल में घटनाओं और बातों पर नैयर जी का बौद्धिक विश्लेषण तार्किक हुआ करते थे..उनके लेखों को पढ़ने से सोचने की एक और दृष्टि का पता चलता था...

             #चलते_चलते 
            अगर हम अपने ज्ञान के विरोधी ज्ञान को नहीं जानते तो हम कुछ नहीं जानते...
               #सुबहचर्या 
               (24.8.2018)
                   श्रावस्ती 

हम क्यों न शरीर को ही आत्मा मानें?

            हम क्यों न शरीर को ही आत्मा माने..? आखिर, आत्मा मानने से अनेकानेक लफड़े जो खड़े हो जाते हैं..! फिर तो, परमात्मा मतलब एक ऊपरवाले का कांसेप्ट भी मानना पड़ता है, और..द्यूलोक वासी परमात्मा की ओर यह शरीरधारी आत्मा निहारती रहती है। ऊपरवाला-ऊपरवाला कहते-निहारते शरीर की भी ऐसी की तैसी हुई रहती है तथा परमात्मा से मिलन की इस व्यग्रता में शरीर जाए भाड़ में टाइप से मनःस्थिति बन जाती है। वैसे तो, शरीर के रहते आत्मा और परमात्मा के मिलन की संभावना नहीं है, लेकिन ख़ुदा-न-खा़स्ता शरीरधारी आत्मा का परमात्मा से मिलन हो भी जाए, तो इस प्रकरण में पूरे दो सौ प्रतिशत चांसेज ऐसे शरीरधारी-आत्मा के पागल घोषित हो जाने की होती है..! 
           हाँ तो, इस आत्मा-परमात्मा वाले कांसेप्ट के कारण नीचेवाले को ऊपरवाले से मिलाने के लिए तमाम तरीके या विधि-विधान के झंझटों वाला खेल भी शुरू हो जाता है। यही नहीं प्योर ऊपरवाले के हिमायती कुछ लोग तो, जैसे अपने-अपने स्वर्गयान लेकर जहाँ-तहाँ पागलों की भाँति घूमते रहते हैं, मतलब उनके स्वर्गयान पर सवार हो जाओ तो ठीक, नहीं तो ये आत्मा को भूत बनाकर छोड़ देते हैं..! इसीलिए इस नीचेवाले-ऊपरवाले के खेल में पूरे मर्त्यलोक में एक अजीब सी धींगामुश्ती मची हुई है..! और ऊपरवाले से अपनी करीबी दिखाने की प्रतिस्पर्धा में ये शरीरधारी आत्मएँ अपनी अच्छी भली देह को जोकर बना देती हैं !! खैर..
        
          कभी-कभी तो ऐसा भी प्रतीत होता है, जैसे इस कांसेप्ट के साथ हम धोखेबाजी कर रहे हों। या तो हम अपने कांसेप्च्युअल परमात्मा से धोखा करते हैं या फिर अपनी इस आत्मा से..! क्यों भाई!! अगर आत्मा को परमात्मा से मिलाने की इतनी ही चिंता है, तो इस शरीर के लिए इतनी जद्दोजहद क्यों..! क्यों आत्मा को शरीर से बाँधने का इतना जतन करते हो..? क्यों आत्मा-परमात्मा के बीच शरीर को रोड़ा बनाते हो? इसीलिए तो, मैं कहता हूँ, तुम्हारा यह चिकित्साशास्त्र आत्मा-परमात्मा के मिलन का पक्का विरोधी है ! क्योंकि ऊपरवाले का कट्टर से कट्टर हिमायती भी अपनी आत्मा या कह सकते हैं रूह को इस शरीर से अलग होने नहीं देना चाहता..!! है कि नहीं..? 
          वैसे एक बात और है..शरीर और आत्मा दो परस्पर विरोधी चीज भी है, दोनों में तालमेल जैसी कोई बात नहीं है..! तो, इस आत्माघोंटू शरीर का रहवासी आत्मा कैसे हो सकती है..मैंने स्वयं न जाने कितनी बार अपनी आत्मा का गला घोंटा है..ऐसे में मैं आत्मा का कांसेप्ट स्वीकार नहीं करता...और इस अस्वीकरण के साथ ही परमात्मा के झंझट से भी मुक्ति मिल जाती है..!!
        ऐसा मैं इसलिए कह रहा, क्योंकि आत्मा की जगह शरीर के कांसेप्ट में विश्वास करनेवालों के जनाजे बड़े दर्शनीय होते हैं..और ऐसे  लोग प्रकृति में व्याप्त क्रिया-प्रतिक्रिया के नियम को मानने वाले होते हैं। 

आदरणीय इंसान

          मित्रों! सच बताएँ...लिखने का कुछ भी मन नहीं करता..फिर भी लिख रहा हूँ...! शायद ऐसा ही लिखना होता है..आखिर कोई संवेदना कितनी बार जगे..? इसकी भी तो कोई सीमा है..वैसे जब लिखना होता है तो हम शान्त बैठते हैं..मन के कोने-कोने टहलते हैं, इसी आशा में कि कोई भाव या संवेदना अपूँछ वाली स्थिति में उदासीन भाव से वहाँ बैठा मिल जाए और तनिक लिखने के बहाने ही सही उससे परिचय भी हो जाए...लेकिन सच बताएँ... उस भाव या संवेदना से मेरा कोई रिलेशन नहीं होता, उसे तो हम यूँ ही लेखकीय विषय बना लेते हैं.... हाँ..वैसे ही जैसे "गाइड" में देवानंद सिद्ध साधू बन जाता है.. बेचारा वह नायक अपने इस साधूपने से मुक्ति चाहता था.... लेकिन...लोगों की भावनाओं का सम्मान करते-करते वर्षा के लिए आमरण अनशन करते हुए प्राण त्याग देता है...और जनता उसको पहुँचा हुआ संत घोषित कर देती है... 
         ...वैसे उस फिल्म का, वह नायक संत न भी रहा हो, लेकिन धूर्त नहीं था..अन्यथा संतई के नाटक में प्राण न गंवाता...तो...संतई करने के लिए धूर्तता एक अत्यन्त आवश्यक गुण है, नहीं तो संतई का नाटक भी बहुत भारी पड़ता है...
           सच में, लेखक बहुत शातिर दिमाग का होता है...जैसे कोई वकील...हाँ, जैसे वकील कानून का ज्ञाता होता है और न्यायाधीश के समक्ष बखूबी बहस कर लेता है...वैसे ही ये लेखकीय कर्म में प्रवृत्त लोग भी होते हैं और भावनाओं-संवेदनाओं को खोज-खोजकर उससे बहस करते हैं...और आप होते हैं कि लेखक को ही महान..महात्मा...हरिश्चंद्र...आदरणीय-फादरणीय जैसे नाना उपाधियों से विभूषित कर देते हैं...!! और इधर आपके उस आदरणीय-फादरणीय लेखक जी, इस बात से हलकान हुए रहते हैं..कि... इस अखबार या उस अखबार में या फिर इस पत्रिका या उस पत्रिका में हम छपे कि नहीं..? खैर 
         कहने का मतलब यही है कि अच्छा लिख देने से हम आदरणीय-फादरणीय या महात्मा नहीं हो जाते..आदरणीय स्थिति में पहुँचने वाला व्यक्ति लेखक नहीं हो सकता...वह ज्यादा से ज्यादा उपदेशक भर हो सकता है..और आजकल उपदेशकों के हालात क्या है..!! यह बात आप सब से छिपी नहीं है...
        इस लेख का मैं लेखक हूँ..मैंने शुरू में ही बता दिया था कि लिखने का मन नहीं है...देखा..! यह लिखते हुए मैंने, आपसे कितना झूँठ बोला था..!! जबकि लिखते-लिखते इतना लिख दिया...आखिर बिना मन के यह कैसे संभव..!!!!! 
        तो...मेरे लिखे को पढ़कर मुझे आदरणीय-फादरणीय की श्रेणी में न पहुँचाएं...अन्यथा लिखना मुश्किल हो जाएगा...
       आज सुबह साढ़े तीन बजे खिड़की से आती वर्षा की बड़ी-बड़ी बूँदों की हर-हर आवाज से जाग उठा था...धीरे-धीरे करके पाँच बज गए..वर्षा जारी थी...कुछ क्षण के लिए फेसबुक वाल चेक किया, बहुत लोगों की कवितामयी भावनाएँ पढ़ने को मिली...पर अफसोस सब फेसबुक वाल तक ही सिमटी हुई..!! फेसबुक पर तो सब अच्छे लोग ही होते हैं...मने इन "फेसबुकिया संतो को सीकरी से क्या काम" टाइप से इस फेसबुकीय-लेखन का क्या..!!  इधर टहलने से बचने के लिए मेरे मन को भी वह "रेनी-डे" वाला बहाना मिल गया था..इस बहाने के साथ एक बार फिर नींद आ गई...लगभग सात बजे दरवाजे पर किसी की जोरदार थाप के साथ उसकी आवाज सुनकर फिर जाग उठा..बाहर निकला..होती वर्षा की एक तस्वीर ली...यही होती वर्षा ही एकदम असली बात है..इस तस्वीर को आप से शेयर कर रहा हूं.... 
#चलते_चलते 
         भाई..जो साधू या महात्मा के वेश में होता है...उसके अंदर भगवान नही...इंसान खोजिए..! निश्चित ही हर वह आदरणीय एकदम आप जैसा ही इंसान निकलेगा...
       #सुबहचर्या 
        (11.8.18)
          श्रावस्ती 

क्या धरती केवल इंसानों के लिए ही बनी है?

        इधर सुबह नींद तो खुल जाती है लेकिन मन अलसाया हुआ होता है, उठते-उठते लगभग पौने छः बज गये थे। किसी तरह मन को तैयार किया कि चलो कुछ टहल सा लिया जाए। हाँ, पता नहीं क्यों इधर इसके लिए मन को तैयार करना पड़ता है, शायद इसके पीछे एक कारण यह भी कि, यहाँ वाकिंग के लिए कोई उचित स्थान का न होना भी है। बस अपने आवास के सामने से गुजरती सड़क है जिसपर टहला जा सकता है। एक दिन पता चला कि यहाँ एक स्टेडियम भी है; लेकिन टहलाई का कोटा उस स्टेडियम तक जाने में ही खर्च हो जाता है और आज के जमाने में सड़क पर टहलना कितना खतरनाक होता है यह सर्वविदित है। यहाँ सड़क पर चलने के नियम को लोग नियम-फियम मान हवा में उड़ा देते हैं! और अपनी जान खतरे में तो डालते ही हैं दूसरे की भी जान साँसत में डाल देते हैं। खैर सब कुछ जानते-फानते हुए भी हम इसी सड़क पर टहलने निकल लिए। 
         टहलते हुए मैं अपने कदम भी गिनता जा रहा था...सड़क से एक खड़जा स्टेडियम का ओर जाता दिखाई पड़ा। स्टेडियम को देखने की जिज्ञासा में उस खड़जे पर मुड़ गया। रास्ते में एक मैदान में कुछ खच्चर नुमा घोड़े घास चरते नजर आए। स्टेडियम के गेट तक पहुँचने में मैं लगभग सोलह सौ कदम चल चुका था। स्टेडियम में चार-छह लोग क्रिकेट खेल रहे थे... एक बच्चा हाथ में हाकी लिए खड़ा था और वहीं एक सयाने शख्स के हाथ में भी हाकी थी..नीचे जमीन पर एक छोटी सी गेंद पड़ी दिखाई दी..कुछ ही क्षणों में वह बच्चा डिबलिंग का प्रयास कर रहा था... फिर एक अन्य व्यक्ति पर निगाह पड़ी जो मेरी ही तरह स्टेडियम के मैदान को भर आँख निहार रहे थे..। मैं उस मैदान को देखते हुए इसका चक्कर कैसे लगाएंगे इसपर विचार करता जा रहा था..असल में टहलने वालों को दृष्टि में रखकर महोबा वाले स्टेडियम की तरह यहाँ चारों ओर कोई कंक्रीट-पथ नहीं बना है। "आज यहाँ पहला दिन है, बाद में टहलने की सोचेंगे" सोचते हुए मैं वापस होने को हुआ तो दूर एक लंबे-चौड़े सीमेंट के फर्श पर एक कुत्ता बड़े आराम से घोड़ा बेचकर सोता हुआ दिखाई दिया..उसके सोने के अंदाज पर मुझे उससे ईर्ष्या हो आई, कि मैं ही बेवकूफ जो टहलने आ गया। खैर लौट पड़ा। इसप्रकार आवास तक वापस आने तक मैं अनमने ही लगभग चौंतीस-पैंतिस सौ कदम चल चुका था। 
           आवास पर पहुँचा तो अखबार उठा लिया..आजकल हम स्वयं चाय नहीं बनाते, खाना बनाने वाला सुबह सात बजे आता है उसी का बनाया हुआ चाय पीते हैं।  सोचा उसके आने तक अखबार पढ़ने का काम खतम कर चुके होंगे.. फिर मोबाइल-शोबाइल पर कुछ खुराफात करेंगे... अखबार में मलिक मुहम्मद जायसी के संबंध में एक खबर थी जिसमें उनकी मृत्यु के बारे में लिखा था कि सिंह के धोखे में वे अमेठी नरेश की बाण का शिकार हो गए थे और जायस कस्बे में उसी स्थल पर उनकी समाधि है...हाँ इस बात को पढ़ते हुए मैं सोच रहा था... तब उस जमाने में इस गंगा के विशाल मैदान में सिंह गर्जना करते रहे होंगे..! लेकिन आज हम कितना कुछ नष्ट या खो चुके हैं..यही नहीं खोते भी जा रहे हैं... 
         अभी कुछ ही दिनों पहले कुत्तों को पकड़ने या मारने की बात का विरोध करनेवालों पर कहीं के हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि कुत्तों के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण मानव जीवन होता है...
      ... लेकिन एक बात है, क्या यह धरती केवल मनुष्यों के लिए ही बनी है...? या मानव का जीवन इतना महत्वपूर्ण है कि अपने इस जीवन के लिए वह जल..जंगल...जानवर...जमीन..सबकी बलि लेकर जिंदा रहना चाहता है...?? 
           #चलते-चलते 
           जैसे-जैसे लोग स्वार्थी होते जाते हैं.. वैसे-वैसे स्वयं को नष्ट करते जाते हैं..
       #सुबहचर्या 
        (6.7.18)

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

व्यंग्य की संतई

          वैसे तो कबीर लिटरेचर मेरा प्रिय विषय रहा है..! लेकिन इधर कबीर राजनीति के क्षेत्र में उतर आए हैं, और व्यंग्यकारों ने इसे ताड़ लिया है !  तभी तो, बेचारे कबीर भी व्यंग्यियाए जा रहे हैं..बाप रे..! जो स्वयं व्यंग्यरूपेण संस्थित हो उसी पर व्यंग्य..!! हाँ..यह सोचने की बात है..! ऐसे ही होता है व्यंग्य का हश्र...! बचपन में सुना था..फागुन माह में "कबीर सsरsरअ.." फिर इसी "कबीर..सsरsरs..अ.." के साथ आने वाले चैत माह की धमकी होती..कि..जितना हँसी-मजाक करना है कर लो अभी समय है आगे फिर कटनी शुरू हो जाएगी..चैत लग जाएगा, यह मौका फिर नहीं मिलेगा..! कहना यही कि हँसी-मजाक खलिहर समय की बात होती है..! चइत माह में फिर यह खाली समय नहीं मिलेगा...।
            हो सकता है, तननां बुनना तजकर कबीर भी खलिहर आदमी बन गये हों, शायद तभी बड़ी शिद्दत से सबकी लानत-मलामत करते थे..! न जाने कितनी बातों पर कितनी बात कही...कबीर की कबीर जाने। लेकिन, इधर खलिहर आदमी की बात को कोई बहुत गंभीरता से नहीं लेता, उसकी बातों पर रस ले लेकर चर्चा तो होती है, लेकिन फिर सब अपनी-अपनी राह हो लेते हैं। हाँ, बड़ा बेढब देश है अपना..! हर गंभीर बात को हँसी में उड़ा कर तरोताजा दिखनेवाला, जैसे कुछ हुआ ही न हो...एकदम से "कबीर सsरsरs.." वाले हँसी-मजाक के अंदाज में..!! कबीर बेचारे भी खूब कहे...जी जान से कहे..लेकिन इस देश का यही नेचर है..कि जब कोई ज्यादा संजीदगी से पेश आए तो तनिक उसकी भी चुटकी ले लो..! तो सुनने वाले का सारा स्ट्रेस गायब..हाँ व्यंग्य न हुआ जैसे झंडू बाम हो गया "मलिये और काम पर चलिए" टाइप का..!!  इसीलिए इस देश में "कठुआ है तो मंदसौर है..या फिर..मंदसौर है तो कठुआ भी है" में सारी बात घूम कर रह जाती है...और बीच में बचा-खुचा मगहर आ जाता है; व्यंग्यियाने का एक नया विषय..नया क्षेत्र..!
         हाँ कबीरदास जी केवल "विवेक बुझाते" रह गए और यहाँ, आज हर बात में "व्यंग्य बुझाया" जाता है..कठुआ और मंदसौर कहने के स्टेशन है; लेकिन यहाँ गाड़ी रुकती नहीं..!! ये व्यंग्यकार हाथ में "लुआठा" लिए मगहर पर खड़े हैं...यह व्यंग्यकारों का स्टेशन है, यहाँ व्यंग्य को राजनीतिक चाशनी मिलती है। बिना राजनीति की चाशनी के व्यंग्य सुस्वादु भी तो नहीं होता..! यह व्यंग्य का स्टंट है, लेकिन जनता भी अब "कबीर गाती" है, वह बातों को खलिहरों का स्टंट समझकर खूब मजे लेती है..और..इसीलिए आज व्यंग्य बेअसर है यह एक स्टंट बन चुका है...बेचारे कबीर नाहक इनके बीच में फंस रहे हैं..! हाँ..बातों के स्टंट में हम उलझ गये हैं...आज व्यंग्यकारों पर "व्यंग्य की संतई" तारी है..।

बुधवार, 27 जून 2018

सरकार की आलोचना

        किसी भी सरकार के कामों नीतियों का विश्लेषण अपने निजी राजनैतिक दृष्टि से परे जाकर करना चाहिए। अभी पिछले दिनों वर्तमान सरकार की नीतियों से उपजे प्रभाव पर एक साथी से कुछ चर्चा हुई। इस चर्चा के कुछ बिंदु इस प्रकार के थे -

           साथी का कहना था कि सरकार की कुछ आर्थिक नीतियों के कारण निजी क्षेत्र में विनिर्माण के कार्य अवरुद्ध होने से विकास और रोजगार के अवसर कम हुए हैं...इसका कारण उन्होंने सरकार के भ्रष्टाचार कम करने हेतु नगद-मुद्रा के रूप में वित्तीय लेन-देन पर नियंत्रण के नियमों को बताया। उनका कथन था कि इन नियमों के कारण लोग पैसा होने के बाद भी उसे विनिर्माण के क्षेत्रों में खर्च नहीं कर पा रहे हैं, इसी का परिणाम है कि शहरी विकास हेतु निजी सेक्टर में शहरी कालोनियों एवं भवन निर्माण का कार्य प्रभावित हुआ है। साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि विकास के लिए भ्रष्टाचार को एक आवश्यक और अनिवार्य बुराई के रूप में स्वीकार करना ही होगा। इन बातों के साथ उनका यह भी तर्क था कि मनरेगा जैसी योजना में सरकार की रुचि कम हो जाने से श्रमिकों में पलायन बढ़ा है और गाँवों में रोजगार के अवसर भी कम हुए हैं, जबकि मनरेगा जैसी योजना के कारण ही एक समय में लोगों की क्रयशक्ति में उछाल आया था।

          मैंने ध्यान दिया साथी ने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही सरकार की उन आर्थिक या वित्तीय लेन-देन के नियमों के प्रभाव और प्रमाणिकता को स्वीकार किया जिसके कारण कुछ हद तक भ्रष्टाचार हतोत्साहित हो सकता है। किसी भी सरकार की भ्रष्टाचार कम करने या इसपर रोक लगाने वाली नीतियों के महत्व को हमें स्वीकार करना ही होगा। उस साथी को समझाते हुए मेरे अपने तर्क थे कि भ्रष्टाचार से सबसे अधिक नुकसान गरीब तबकों को ही होता है और उसमें भी निर्बल वर्ग की जातियाँ भ्रष्टाचार से सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। क्योंकि इन्हीं जातियों की सरकारी सहायता पर निर्भरता भी सर्वाधिक होती है। चिकित्सा, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भ्रष्टाचार से गरीबों को इसकी गुणवत्तापरक सर्वसुलभता प्रभावित होती है। भ्रष्टाचार पर रोक लगने से जनकल्याणकारी  योजनाओं के क्रियान्वयन में गुणात्मक परिवर्तन आता है। निश्चित ही वित्तीय लेन-देन के नियमों से काले धन के व्यय पर अंकुश लगा है तथा सरकार की राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि हुई है। मैंने स्वयं अनेक ऐसे उदाहरण देखे हैं जहाँ पहले किसी वित्तीय लेन-देन में सरकार के टैक्स खाते में महज दो से तीन लाख जाते थे वहीं यह बढ़कर दस से बारह लाख रूपया हो गया है। क्योंकि ऐसे वित्तीय लेन-देन अब बैंकिग प्रणाली के माध्यम से होने लगे हैं, जिससेे ये टैक्स निगरानी प्रणाली के दायरे में आ जाते हैं।

           भ्रष्टाचार के संबंध में मेरे अपने विचार हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार किसी नैतिक चेतना से दूर नहीं हो सकता। यहाँ लोगों के बीच भ्रष्टाचार एक स्वाभाविक प्रवृत्ति बनकर घर कर चुकी है। इसके लिए नगद वित्तीय लेन-देन को निगरानी तंन्त्र की परिधि में लाना होगा, भले ही कठोर कानून बनाना पड़े।

           मैंने साथी से यह भी कहा कि सरकार की राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि से गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं हेतु धन की उपलब्धता बढ़ जाती है। और इस तरह भ्रष्टाचार रुकने से सबसे अधिक लाभ गरीबों को ही होता है। मैंने उन्हें बताया कि जिस मनरेगा जैसी योजना के कारण क्रयशक्ति में उछाल की बात की जाती है, दरअसल यह आम श्रमिकों के आय-वृद्धि का कारण नहीं था, बल्कि मनरेगा में व्यापक भ्रष्टाचार के कारण आटोमोबाइल क्षेत्र में यह उछाल सर्वाधिक देखी गयी थी। मैंने उन्हें समझाया कि भ्रष्टाचार का लाभ सरकारी तंत्र से जुड़े कुछ मुट्ठी भर लोग उठाते हैं और इनमें उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ जाने से तेल या अन्य उपभोक्ता वस्तुओं पर आयात खर्च बढ़ जाता है जिसके कारण देशी पूँजी का प्रवाह विदेशों की ओर होता है और इस तरह के अनुत्पादक व्यय से अर्थव्यवस्था शनैः शनैः कमजोर होती चली जाती है, दरअसल यही प्रवृत्ति बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण भी बनती है। इस तरह भ्रष्टाचार, विकास का केवल भ्रम पैदा करता है जबकि यह किसी भी देश के लिए, आर्थिक और सामाजिक दोनों रूपों में घातक प्रवृत्ति है।

            मेरी इस बात पर मेरे साथी ने कहा कि ठीक है, लेकिन सरकार हमारे टैक्स को उद्योगपतियों पर लुटा रही है उन्हें देश की पूँजी लेकर विदेश भागने दे रही है, या फिर सरकार की कुछ नीतियों से उद्योगपतियों की पूँजी में आशातीत वृद्धि देखी जा रही है। मैंने कहा, हाँ सरकार को इस दिशा में भी अवश्य काम करना होगा, अन्यथा उसके सारे प्रयास निष्फल हो सकते हैं। अनुत्पादक कार्यों या मात्र पोर्टफोलियो टाइप के निवेश को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। बड़े बैंकिंग-ॠण के लिए निगरानी-तंत्र विकसित करते हुए पारदर्शी प्रणाली अपनानी चाहिए।

           मुझे 2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान वर्तमान प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए एक भाषण की याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था, "मुझे कोई नई योजना नहीं चलानी, जो योजनाएं चल रही हैं उन्हीं को ईमानदारीपूर्वक लागू करेंगे।" सरकार को इस दिशा में और ठोस कदम उठाने चाहिए।

          अंत में एक बात पर विशेष रूप से हमें और गौर करना होगा किसी भी सरकार की नीतियों की आलोचना या प्रशंसा करते समय हमें राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को दरकिनार करके ही करना चाहिए। अन्यथा हम जनमानस को भ्रमित करने का कार्य करते हैं, और दुर्भाग्य यही है कि आज यह कुछ ज्यादा ही होने लगा है। हलांकि सरकार को भी इस तरह से कार्य करना चाहिए जिससे आम जनमानस के बीच भय और भ्रम का वातावरण न बनने पाए।