गुरुवार, 26 अगस्त 2021

स्वप्निल इंटरव्यू

इंटरव्यूकर्ता - जी, आप लेखक हो?

मैं - जी नहीं, मैं लेखक नहीं हूं।

इंटरव्यूकर्ता - लेकिन आप लिखते तो हो!

मैं - हां लिखता तो हूं।

इंटरव्यूकर्ता - तो आप कैसे लेखक नहीं हुए?

मैं - हां मैं वैसे ही लेखक नहीं हुआ।

इंटरव्यूकर्ता - वैसे ही कैसे?

मैं - ऐसे कि, वैसे मैं लिखने के लिए नहीं लिखता।

इंटरव्यूकर्ता - ऐसे कैसे हो सकता है? साहित्य तो लिखने के लिए लिखने से ही बनता है! 

मैं - तो मैं साहित्य कहां रच रहा हूं!  

इंटरव्यूकर्ता - तो क्या रच रहे हैं आप?

मैं - अरे भाई मैं अपना सुख रच रहा हूँ

इंटरव्यूकर्ता - वह कैसे?

मैं - ऐसे कि लिखने से मुझे सुखनुभूति होती है।

इंटरव्यूकर्ता - ओह! तो आप स्वान्त:सुखाय टाइप के रचनाकार हैं?

मैं - जी आपने सही पकड़ा!

इंटरव्यूकर्ता - फिर तो आप साहित्य के साथ अन्याय कर रहे हैं। ऐसे कि आप केवल अपने लिए लिखते हो और पाठक को उपेक्षित करते हो जबकि लेखक को पाठक की दरकार होती है, इस पर आप क्या कहेंगे?

मैं - वैसे आज पाठक की जरूरत ही कहां है, फेसबुक पर नहीं हैं क्या आप? क्या आप मानते हैं कि जो लिखने के लिए लिख रहे हैं, वे पाठक को दृष्टि में रखकर लिख रहे हैं? बल्कि वे इसलिए लिख रहे हैं कि वे बता सकें कि उन्होंने यह लिखा है या वह लिखा है या फिर वे लेखक हैं, यह बताने के लिए लिखते हैं।

इंटरव्यूकर्ता - आप उल्टा हमसे प्रश्न क्यों कर रहे हैं, इंटरव्यूकर्ता मैं हूं कि आप? 

मैं - आप ही हैं, लेकिन क्या आप गारंटी देते हैं कि लिखने के लिए लिखने वाले के पाठक होंगे ही?

इंटरव्यूकर्ता - क्यों नहीं होंगे, जरूर होंगे, अरे जब लिखा जा रहा है तो पढ़ा भी जा रहा होगा.. इसमें गारंटी देने की कौन सी बात है।

मैं - देखिए इंटरव्यूकर्ता महोदय! इसमें होगा..होंगे की बात नहीं है, फुल गारंटी देने की बात है! आप देते हो तो कहो हाँ और नहीं तो कहो नहीं!!

इंटरव्यूकर्ता - देखिए, गारंटी तो किसी बात की नहीं दी जा सकती।

मैं - लेकिन मैं दे सकता हूं! और वह भी डंके की चोट पर!!

इंटरव्यूकर्ता - क्या दे सकते हैं आप???

मैं - यही कि लिखने के लिए लिखने वाले का पाठक हो या न हो, लेकिन स्वान्त:सुखाय के लिए लिखने वाले का पाठक जरूर होता है!!

इंटरव्यूकर्ता - वाह महोदय! अपने मुंह मियां मिट्ठू मत बनिए! और यदि ऐसा है तो वह कैसे?

मैं - अरे महोदय, यह तो स्वत:सिद्ध है कि जब मैं स्वान्त:सुखाय के लिए लिख रहा हूं तो जरूर इस सुख की प्राप्ति के लिए मैं अपनी रचना छपवाता हूं, इस छपे को देखता हूं और इसे पढ़ता भी हूं! इसीलिए पहले ही मैंने कहा दिया है कि मैं अपने लिए सुख रचता हूं, साहित्य नहीं!!

इंटरव्यूकर्ता - अच्छा..इसका तात्पर्य यह है कि आप महान साहित्यकार बनने की दौड़ में शामिल नहीं हैं?

मैं - देखिए! यह दौड़-औड़ की बात मैं नहीं जानता, यह आपका मत हो सकता है मेरा नहीं। कौन महान बनेगा कौन नहीं यह भी भविष्य के गर्त में है।

इंटरव्यूकर्ता - आपके कहने का आशय है कि आप भविष्य में महानता की श्रेणी में जा सकते हैं?

मैं - अरे भाई क्यों नहीं! यदि पत्नी जाने दे!

इंटरव्यूकर्ता - इसमें बीच में पत्नी कहां से आ गई?

मैं - जैसे हुलसी और विद्योतमा आई थी। पत्नियां किसी को भी तुलसी या कालिदास बना सकती हैं।

इंटरव्यूकर्ता - अपने लिए यह संभावना आप कहां तक पाते हो?

मैं - देखिए, स्वान्त:सुखाय टाइप के लेखन में 'तुलसीत्व' के प्राप्ति की संभावना छिपी होती है। इस टाइप के लेखन से पत्नी भले चिढ़ती हो लेकिन ऐसे लेखन में महान बनने का भविष्य सुरक्षित है। इस संभावना को बरकरार रखने के लिए ही इस टाइप का मेरा लेखन है। 

इंटरव्यूकर्ता - ऐसा लगता है पत्नी की बात करके अपने निजी जीवन पर प्रश्न करने की छूट प्रदान की है, तो क्या मैं आप से पूँछ सकता हूं कि पत्नी से कोई आपका अनबन चल रहा है?

मैं - देखिए! हर पत्नी वाले का पत्नी से अनबन चलता रहता है, क्योंकि बिना उसकी अनुमति के आप एक पत्ता भी नहीं खड़का सकते! अब यही देखिए, पत्नी की उपस्थिति में मैं अपना यह स्वान्त:सुखाय वाला लेखन नहीं कर सकता, उसे देखते ही मैं चुपचाप मोबाइल को परे खिसका देता हूं!     

इंटरव्यूकर्ता - अच्छा अन्त में एक प्रश्न और वह यह कि साहित्य में पुरस्कार के बारे में आपकी अवधारणा क्या है?

मैं - देखिए स्वान्त:सुखाय के लेखन में पुरस्कार की अवधारणा फिट नहीं होती.. मैं यहां एक बार फिर कहुंगा कि इसके पीछे 'तुलसीत्व' की अवधारणा काम करती है। लेकिन फिर भी मैं आपको विश्वास दिलाता हूं पुरस्कार से सुखानुभूति की आवश्यकता पड़ने पर मंडली में शामिल होने से गुरेज नहीं! आज के जमाने में कहां नहीं सेंधमारी की जा सकती। फिर आजकल तो बड़े-बड़ों को फेसबुक पर गप्पें मारते इठलाते और इसपर मिलते आह या वाह पर मदमाते देखता हूं, यह किसी पुरस्कार से क्या कम है!! तो, फिलहाल मेरा इरादा अभी फेसबुकिया होने पर ही अधिक है।

इंटरव्यूकर्ता - (दर्शकों से) तो जैसा कि अभी आपने देखा और सुना, हम एक ऐसी शख्सियत से रुबरु हुए जो लिखने के लिए नहीं लिखता और न यह बताने के लिए ही लिखता है कि वह लेखक हैं, इसलिए वह अपने को पुरस्कारों की दौड़ में भी नहीं पाता। बल्कि वह इस बात की गारंटी देता है कि उसके लिखे का कोई दूसरा पाठक हो या न हो, लेकिन कम से कम वह स्वयं अपने लिखे का पाठक तो है ही.. जबकि आजकल किसी लेखन का पाठक खोजना कितना मुश्किल भरा काम है!! हम कह सकते हैं, इस शख्सियत में लेखन और पाठन दोनों तत्व मौजूद हैं, कोई विरला ही इनका समकालीन होगा!! इसलिए हम इनकी पत्नी से अपील करते हैं कि ऐसे महान संभावनाओं वाले लेखन को महानता की ओर ले जाने में, उनके साथ यदि हुलसी का नहीं तो कम से कम विद्योतमा वाला व्यवहार जरूर करें और मोबाइल पर लेखन करते समय इन पर व्यंग्योक्तियों का प्रहार न करें, क्योंकि इन महाशय में लेखन और पाठन की अद्भुत संगति है।

     इस इंटरव्यू के समाप्त होते ही नींद टूटी। मैं समझ गया कि स्वप्न ने हमें मूर्ख बनाया है। इधर पंखा भी तेजी से गतिमान था, इससे हमें ठंड लगने लगी थी। समय देखने के लिए मोबाइल टटोला तो वह तकिए के नीचे मिला। सुबह हो चुकी थी, फिर भी एक बार और चद्दर तान लिया था।

सिस्टमपंथी

       देश-भक्त ही देश की चिंता कर सकते हैं। मेरे इस कथन पर मुझे दक्षिणपंथी घोषित करते हुए उन्होंने कहा, "देशभक्त हुए बिना भी देशहित की चिंता की जा सकती है।" और फिर यह कहते हुए, "अरे हां भा‌ई! ये तंत्र-मंत्र शक्तिधारी ही देश-भक्त हैं...बाकी हमां-सुमां तो रियाया हैं..हम डाइरेक्ट देश के काम थोड़े ही न आ सकते हैं, देशभक्तों को अपनी पीठ पर ढोना ही हमारी देशभक्ति है! एक बात कहूं..! इस तंत्र-मंत्र ने देश का बेड़ा ग़र्क कर दिया है..दिखाते रहिए अपनी देशभक्ति.." कमरे से बाहर चले ग‌ए। मुझे अपनी देशभक्ति पर थोड़ी शर्मिंदगी जैसी फीलिंग आई। सोचा, आखिर कलाकार भी तो अपनी भावनानुरूप ही मूरत गढ़ता है, तो देशभक्त हुए बिना देश की मूरत कैसे गढ़ी जा सकती है? फिर तो देशभक्त होना भी एक कलाकारी ही है, चूंकि सरकारें देशभक्त होती हैं इसलिए छेनी-हथौड़ा से नहीं, अपने तंत्र से देश को गढ़वाती हैं। मुझे क्षोभ हुआ कि राष्ट्र की मूरत गढ़ने वाले इसी कलाकार-तंत्र को वे महाशय गाली देकर चले ग‌ए थे।

       उल्लेखनीय है कि मेरे ग्रेजुएशन के दिनों में राजनीतिक विषय के रूप में देशभक्ति की ख्याति नहीं थी। इसका ढिंढोरा भी नहीं पीटा जाता था और न ही इसमें कोई प्रतियोगिता थी। इसे मूर्खता का पर्याय भी नहीं माना जाता था। हाँ, खेती-किसानी की इज्जत न तब थी और न अब है। क्योंकि देशभक्तों की वैरायटी में मेहनतकशों की गणना न पहले थी और न आज है‌। लेकिन किसान देशद्रोही भी नहीं हुआ करते थे‌। इधर देश के स्टेनलेस स्टील फ्रेम जैसे तंत्र में जुड़ने वाले सफल अभ्यर्थियों के ऐसे वक्तव्यों से कि, इस फ्रेम से जुड़ने पर देश की अच्छे से सेवा करने का खूब अवसर मिलता है, मैने निष्कर्ष निकाला कि फावड़ा-कुदाल या खेती-किसानी में जिंदगी भर पसीना बहाने की बजाय देश की प्राॅपर तरीके से सेवा करने के लिए सरकारी-तंत्र के फ्रेम वाला प्लेटफार्म चाहिए। स्पष्ट था कि किसी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे के वश में देशसेवा जैसा पवित्र कार्य नहीं, इसके लिए बड़ा बनना होता है। और बड़े लोग ही देशहित के पवित्रनुमा कार्यों को सिस्टमेटिक ढ़ग से सुगम और फलवान बनाकर निपटाते हैैं। फ़िलहाल मुझे देशभक्ति, देशसेवा और सिस्टम के अन्तर्सम्बन्धों द्वारा बड़ा बनने की प्रक्रिया समझ में आ गई थी। अंततः मैंने कम्पटीशन-वम्पटीशन फाइट करना शुरू किया और आयोग ने मुझे भी स्टील फ्रेम का एक छोटा पुर्जा बनाकार बड़ा बनाने वाले कामों को अमलीजामा पहनाने का अवसर प्रदान किया।

      लेकिन उन दिनों की अपनी भावुकता पर मुझे तरस आती है। संयोग से उस वक्त देश में सूखा भी पड़ा था। इथियोपिया से लेकर भारत तक सूखे से लोग बेहाल थे। शायद वह तस्वीर, जिसमें भूख से हड्डी की ठठरी बनी एक जीवित अफ्रीकी बच्ची को एक गिद्ध ताक रहा था, उन्हीं दिनों की है। आज भी जब-तब वायरल होती इस तस्वीर से वह गिद्ध-दृष्टि याद आती है। उस अकाल-काल में किसानों की पीड़ा देख मेरी भावनाएं द्रवित होकर बूंद की तरह सहसा उछल पड़ी थी। यह सच है, जब जोर की भावुकता आती है तो आदमी कविता करने की ओर भागता है और मैं भी उसी ओर भागा था। मैंने अपनी कविता में बादलों से बरसने का आह्वान किया, हे बादल आओ बरसो/ कुछ तो दे जाओ/ खेत हमारे और हम प्यासे हैं/ हलक सूख गया है/ यह पीड़ा है प्यासे इस तन-मन की। लेकिन मुझे यह सोचकर हँसी आती है, यदि मेरी कविता की भावुकता में बहक कर बादल बरस पड़ते तो सूखे की आपदा का क्या होता? जबकि आपदा में मिलने वाले बजटीय डोजों से उत्पन्न देशभक्ति में राहत के काम शुरू होते हैं, जिसके परिणाम देश ही नहीं विदेश में भी पहुंचते हैं। अखबार में छपे इस सर्वे कि लाॅकडाउन की अवधि में स्विटजरलैंड के खातों में भारतीयों ने खूब धन जमा किए जो दुनियां में सर्वश्रेष्ठ है, से इसकी पुष्टि होती है। इसीलिए मैं मानता हूँ कि अकाल-काल में उपजी मेरी वह कवित्व-भावना देशप्रेम नहीं, देशद्रोह वाली थी। जो सूखा खत्म कराके देशभक्तों को बूस्टर डोज जैसे उनके प्राप्तव्य से वंचित कराने जैसा था। खैर अब मुझे भावुकता पसंद नहीं, क्योंकि यह आदमी को अंधा बना देती है, इसमें पड़ा व्यक्ति नफा-नुकसान की नहीं सोच पाता।
 
        वैसे तो सिस्टममय सब जग जाना। लेकिन सरकारी सिस्टम की बात ही निराली है। इसके बगैर देश का बेड़ा ग़र्क हो जाए! इसमें आकर 'मदर इंडिया' का भगवान और शैतान के बीच वाला इंसान, आवश्यकतानुसार वह जो है वह न होने की और जो नहीं है वह हो जाने की अपनी क्षमता से सिस्टम के गुड-बुक में नाम दर्ज कराकर दोनों से भी उच्च कोटि का हो जाता है। जो भी हो, देश के काम आने वाली ऐसी तंत्रात्मक शख्सियतें दक्षिणपंथी ही मानी जाएंगी। यहां महत्वपूर्ण है, जो तंत्रात्मक नहीं वह देशभक्त भी नहीं, चाहे वह दक्षिणपंथी ही क्यों न हो! लेकिन लोकप्रियता की श्रेणी हांसिल कर चुके कुछ लोगों का अंदाज थोड़ा अनोखा है। जैसे कि एक लोकप्रिय महानुभाव ने तंत्र के हम जैसे कल-पुर्जों की एक गोपनीय बैठक में बहुत ही मीठी वाणी में सजेस्ट किया था, "वैसे तो आप लोग अपने हिसाब से काम करो, लेकिन जो करने के लिए हम कहते हैं उसे न मानने वाले से हम दूसरे तरीके से निपटते हैं।" शायद यह एक माफिया किस्म वाली देशभक्ति थी। जो घर बैठे अपने सिस्टम से लोक और तंत्र दोनों का काम अकेले निपटा सकती थी। फ़िलहाल अभी तक संवैधानिक दर्जा प्राप्त न होने से इसे वैधता हांसिल नहीं है, इसके लिए सिस्टम को निजी टाइप से अन्डरवर्ल्डात्मक होने की बजाय सरकारी टाइप का तंत्रात्मक होना चाहिए। इसके रहस्यमयी वातावरण को समझना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है, अन्यथा तंत्र में होते हुए भी वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति हो सकती है। 

        वैसे सिस्टम अदृश्य ही होता है, क्योंकि जो दिखाई पड़े वह सिस्टम ही क्या!! इसका कोई लेखा-जोखा या प्रमाण भी नहीं, बल्कि तंत्र में भाव और अभाव रूप में विद्यमान होकर उसे नियंत्रित और संचालित करता है जैसे ईश्वर सृष्टि को! इसकी अनुभूति सृष्टि में ईश्वर के जैसी इसमें डूबने पर ही होता है। कहते हैं ईश्वर ने सृष्टि को रचा और उसे विकसित होने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया है। लेकिन सिस्टमीय-तंत्र, दांत वाले छोटे-बड़े चक्कों के समूह जैसा है जो अपनी मर्जी से नहीं, आपस में फंसकर एक दूसरे को नचाता है। इसके पीछे मंत्राध्यक्ष का मंत्र-बल होता है। इसे ग्रहण कर तंत्राधीश अपने दंतबल से इस चक्कीय सिस्टम को नचाता है। लेकिन देशभक्ति के कृत्य का श्रेय मंत्राध्यक्ष को जाता है। उसका मंत्र-बल उसे ऋषि-मुनि की श्रेणी में खड़ा कर देता है। इसीलिए भारत को ऋषियों-मुनियों का देश कहा जाता है, इनके सहारे ही इस देश को उसका प्राप्तव्य प्राप्त होता आया है।

         खैर, शुकर हैं भारत माता के नक्शे और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का! जिसके निरंतर अनुश्रवण से मेरे मन में देशभक्ति की तरंगे उठी और मुझे भी आनंदित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। क्योंकि देश सेवा वाले भाव के साथ बजटीय डोज की मिक्सिंग कर सिस्टमीय-तंत्र में जबर्दस्त पेराई होती है, इससे निकलते रस से सराबोर हुआ मन देश-सेवा के कृत्य से सुखी होकर आनंदित होता है। इस प्रकार तंत्राधीश के निर्देशन में तंत्रीय देशभक्त भी देश की मूरत गढ़ते-गढ़ते अपना प्राप्तव्य प्राप्त करता है। यही देशसेवा का सिस्टमेटिक ढंग है, इसमें विवेक, भावना और बुद्धि का कोई स्थान नहीं, बस घूमने के लिए दाँत से दाँत सटे हुए होने चाहिए। खैर, यहां आकर क्या दक्षिणपंथी और क्या वामपंथी! और क्या सिस्टमपंथी!! सबकी गति एक ही है, बाकी जनता को भरमाने की चीजें हैं।

माफिया और गुर्गे

          लिखने की प्रेरणा लेखक होने के पेशे से नहीं, लहू में आए उबाल से मिलती है। इसलिए लेखक डरता नहीं, बल्कि पेशा डराता है! पेशेवर बनकर ही इस डर से मुक्ति पाई जा सकती है। फिलहाल अपने लहू के उबाल से डरने वाले पेशेवर नहीं बन पाते। दो शूटर किसी बड़े सफेदपोश माफिया के लिए काम करते थे। हालांकि उन्हें अपने उस सुप्रीम आका का कभी दीदार नहीं हुआ था लेकिन वाया प्राप्त उसके निर्देशों के अनुसार वे अपने काम को अंजाम देते। एक बार दोनों को किसी बड़े व्यापारी से गुंडा टैक्स वसूलने का काम सौंपा गया। शायद उस व्यापारी ने तयशुदा खोखे की रकम पहुंचाने में देरी की थी। तो, दोनों गुर्गे‌ उसी की वसूली करने उसके घर पहुंचे। 
       इधर व्यापार में घाटे के साथ व्यापारी को अपनी बेटियों के विवाह की चिंता थी। जब वह पेटी लेकर जान छोड़ने के लिए गुर्गे से गिड़गिड़ा रहा था, तो एक गुर्गे की निगाह दरवाजे की ओट में खड़ी उसकी बेटियों पर पड़ी। डर से सहमे उनके भयाक्रांत चेहरे को देख उसे अपनी बेटियों का ध्यान आ गया। इधर उसका दूसरा साथी खोखा न देने पर व्यापारी को मौत की धमकी देता सुनाई पड़ा। स्थितियों का भान होते ही बेटियों के चेहरे में खोए गुर्गे की आंखों में आँसू छलकने को आ ग‌ए थे। उसकी ऐसी बदली हुई भाव-भंगिमा को देख जब उसके दूसरे साथी ने कठोर आवाज में कहा, ये क्या हो रहा है, तो वह गुर्गा सकपका गया और अपने डर से डर गया। वह दूसरा साथी कुछ समझ पाता इसके पहले ही उसकी कनपटी पर उसने गोली चला दी। 
           बड़े माफिया का अपने गुर्गों को निर्देश होता है कि यदि कोई गुर्गा टारगेट के प्रति नरमदिल दिखाए तो तत्काल दूसरा साथी उसे शूट कर दे। दरअसल व्यापारी की बेटियों को देखकर गुर्गे के हृदय में संवेदनशीलता जागी और वह किसी भी दशा में व्यापारी की हत्या नहीं होने देना चाहता था। ऐसी दशा में उसका दूसरा साथी उसे ही शूट कर देता, इसलिए बिना अवसर गंवाए उसने अपने दूसरे साथी को गोली मार दिया और पेशे से मुंह मोड़ पेशेवर बनने से बच गया। खैर यह तो हुई कहानी की बात।
         अमृता प्रीतम 'रसीदी टिकट' में एक जगह लिखती हैं कि "मुझे एक प्रकाशक की ओर से एक लंबा काव्य लिखने के लिए कहा गया था, पर मैंने मना कर दिया था। लिखती, तो वह काव्य मेरे लहू के उबाल में से उठा हुआ न होता।" खैर, मैं यह नहीं कहता कि प्रकाशक माफिया है और लेखक उसका गुर्गा। लेकिन यहां लेखिका जैसे पेशेवर होने से बचना चहती है। और चाहें भी क्यों न, क्योंकि संवेदनाओं में पेशेवराना अंदाज नहीं होता। वैसे भी पैसा और प्रसिद्धि की आकांक्षा लहू के उबाल को ठंडा कर देता है।

रिश्तों का डिजिटलाइजेशन

        नया साल आ गया। आधी रात से लेकर लगभग शाम तक शुभकामनाओं का रेलमपेल लगा रहा। वैसे बचपन में तो नहीं, लेकिन जब कालेज लगभग छोड़ चुका था, तब पता चला था कि न‌ए साल में ग्रीटिंग-कार्ड दिया जाता है। लेकिन वह जमाना भी कब का बीत चुका है। भ‌ई, एक बात यह भी है अब कोई जमाना ज्यादा समय तक ठहरता ही नहीं! जमाना आया नहीं कि गया। बल्कि मैं तो कहूं जमाना भी अब सरपट भाग रहा है जैसे कि आदमी भागता है! आखिर आदमी से ही तो जमाना है। पल-पल छिन-छिन बदलते आदमी का कोई ठिकाना नहीं तो जमाना ही अपना ठिकाना क्यों बनाए? इसीलिए जमाना भी आया नहीं कि सरपट भागते हुए 'क्या जमाना था' में बदल जाता है, खैर।

          तो ग्रीटिंग कार्ड सजाने-सजने का जमाना चला गया और आया मैसेज का! हां मैसेज का!! न रंग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। वैसे मैं नहीं जानता कि फिटकरी का चोखे रंग के साथ क्या ताल्लुक है। लेकिन मुहावरा है सो इसे लिखने में यूज कर लिया। मतलब यही कि बढ़िया से बढ़िया मैसेज रेडीमेड मिल जाता है, इसके लिए बेचारे हृदय को परिश्रम करने की अब जरूरत नहीं होती और वैसे भी आजकल के लोगों का हृदय भी कमजोर होता है, इससे जितना कम से कम काम लिया जाए उतना ही स्वास्थ्यवर्धक है। जबकि पहले ग्रीटिंग-कार्डों की दुकान पर जाना उनमें से बढ़िया ग्रीटिंग छांटना और फिर संबंधित तक इसे पहुंचाने में पर्याप्त जहमत उठानी होती थी। आज प्रदूषण के जमाने में इतनी तिकड़म भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता। खैर फिर बेहतरीन आप्सन के रुप में आया मोबाईल मैसेज का जमाना। इसमें मैसेज लिखने के लिए दिल और दिमाग को एक बार यूज कर उसे बहुतेरे स्वजनों को एक साथ फारवर्ड कर देने की सुविधा भी मिली। तब ये मैसेज भी किसी को बासी नहीं लगता था और लगे क्यूं? क्योंकि इसमें 'फारवर्डेड' का पता नहीं चलता था। मैसेज पाने वाला बेचारा मात्र इसे अपने लिए भेजा हुआ मानकर प्रेषक के वर्जिनल प्रेम से अभिभूत हो जाया करता था।

           लेकिन वह क्या जमाना था! और आज व्हाट्सएप का जमाना आ गया है। अब तो रेडीमेड बने-बनाए संदेश के ऐप भी बन चुके हैं, बस थोड़ी मेहनत कीजिए एक से एक ब‌ढ़िया संदेश या कहें बात, नहीं तो विचार ही कह लीजिए, मिल जाएंगे और व्हाट्स ऐप पर कापी पेस्ट कर अपने मित्रों-सुहृदयों को भेजते जाइए! मतलब शुभकामनाएं और मंगलकामनाएं लिखने के झंझट से भी मुक्ति! कहने का आशय यह है कि आज के महान तकनीकी दौर में डिजिटलाइज्ड मंगलकामनाएं और शुभकामनाएं उपलब्ध हैं जो सुहृदों के हृदय को सुहृदय बनाने के काम आती हैं। गजब का यह संबंधों के डिजिटलाइजेशन का जमाना है। लेकिन इसमें एक ख़तरा बस यही है कि थोड़ी सावधानी की जरूरत होती है क्योंकि 'फारवर्डेड' से आपका कोई अति संवेदनशील साहित्यिक टाइप का इष्ट-मित्र आपके 'फारवर्डेड' संदेश को "प्रकृति के यौवन का श्रृंगार/ करेंगे कभी न बासी फूल" जैसे साहित्यिक भाव से ओवरलुक न कर दे। आखिर ताज़गी तो सबको चाहिए ही होती है।

         लेकिन आजकल के डिजिटलाइजेशन युग में संदेशों के आदान-प्रदान में परफेक्ट टाइमिंग का ख़्याल रखना चाहिए। मतलब किसी के डिजिटलाइज्ड सुख-दुख में तत्काल शरीक हो लेना चाहिए। ऐसा इसलिए कि एक बार मेरी नज़र एक फेसबुकीय फ्रेंड के पोस्ट पर पड़ी जिसमें किसी अतिप्रिय स्वजन के शोक में उनका इज़हार-ए-दुख कुछ ऐसा था कि उनके लिए यह पूरा संसार निरर्थक और बेमानी हो चला था। उनके दुख की इस घड़ी में साथ देने के लिए मैंने दुख में दुखी होने वाले एक सांत्वनापरक संदेश को गूगल से खोजकर कापी किया और उन दुःखी हृदय आत्मा के वाल पर पेस्ट करने ही जा रहा था कि मेरी दृष्टि उनके एक लेटेस्ट पोस्ट पर पड़ी, जिसमें वे डांस टाइप की मुद्रा में किसी पार्टी में मिले 'इंज्वॉय' का बखान करते हुए गौरवान्वित फील कर रहे थे। अब बताइए! मेरा हृदय कौन सी मुद्रा धारण करता? उन्हें सांत्वना देता या कि उनकी डांस मुद्रा के साथ मैं भी गौरवान्वित फील करता? कुछ डिसाइड न कर पाने की स्थिति में चुपचाप उनकी वाल से खिसक लेने में ही मैंने भलाई समझा। ठीक यही स्थिति डिजिटल प्लेटफार्म पर खुशी जाहिर करने वाले भी पैदा कर सकते है।  

           खैर, आजकल के क्षणजीवी इंसान के मनोभाव भी इस डिजिटल जमाने के साथ तालमेल बैठाने के लिए तैयार है। विकासवाद की सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट की थियरी एकदम फिट बैठ रही है, क्योंकि इस ज़माने में युगानुरूप आदमी का हृदय आटोमेटिकली डिजिटलाइज्ड हो चुका है! इसीलिए उसके मनोभाव भी  डिजिटली ढंग से प्रवाहित होते हुए कट-पेस्ट की सुविधा का लाभ ले रहा है।  

         लेकिन मोबाइलीकरण के इस ज़माने में आदमी को तकनीक और वह भी कम्प्यूटर का ज्ञान होना बेहद जरूरी है। अन्यथा मानवीय संबंधों के निर्वहन में वह फिसड्डी साबित होगा। फिर भी इस ज्ञान का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए। नहीं तो टच-बोर्ड आपके संबंधों को दूसरा आयाम भी दे सकता है। क्या है कि मनोभावों के इमोजीकरण के दौर में एकबार एक सुहृद मित्र ने मेरे उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ मुझे एक बेहद खूबसूरत संदेश भेजा। उसे देखते ही मैं आह्लादित हो गया और आव देखा न ताव विनीत भाव से उन्हें धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए उतावला हो उठा। इस उतावलेपन में धोखे से टचस्क्रीन पर अंगुली एक बेहद गुस्से से लाल चेहरे वाली इमोजी पर टच कर गया और वह इमोजी सेंट भी हो गई। उस समय बड़ी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा था मुझे! तबसे उनसे अपने लिए खूबसूरत मैसेज पाने के लिए तरस गया हूँ। दूसरी बार ऐसी ही एक और गलती मैंने एक अन्य मित्र के साथ किया। उन बेचारे ने अपनी सफलता का बखान करते हुए एक संदेश डाला। उनके साथ अपने संबंधों को उच्च आयाम पर पहुंचाने के लिए उनकी इस सफलता पर उन्हें तत्काल बधाई संदेश भेजने की आवश्यकता को महसूसा, लेकिन जल्दबाजी में मोबाइल के टच-स्क्रीन को ऐसा टच किया कि उनके खुशी के इस अवसर पर जार-जार आंसू बहाने वाला इमोजी सेंट कर दिया। मुझे अपनी इस गलती का अहसास होता उसके पहले ही मेरी वह दुखी होने वाली इमोजी उनके द्वारा 'सीन' भी हो चुकी थी! मेरी एक चुटकी बेवकूफी से मित्रता दांव पर लग गई।  

           वैसे हर ज़माने के ख़तरे भी अपनी तरह के ही हैं। लेकिन इन खतरों के पार हमारे डिजिटलाइज्ड सोशल मीडियायी संबंध लाइव रहने चाहिए। हां इतना ज़रूर है कि नव वर्ष पर शुभकामना संदेशों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर इन्हें वर्गीकृत किया जा सकता है। जैसे कि साहित्यकार और उसमें भी व्यंग्यकार का संदेश, श्रेष्ठ-जनों या विशिष्ट-जनों का संदेश, साहब का मातहत के लिए या मातहत का साहब के लिए, मतलब निकालने वाला, दोस्ती जताने वाला, औपचारिक-अनौपचारिक आदि-आदि टाइप से! 

         इस लेख को पाठक-गण कृपया दिल पर न लें बल्कि संदेशों का आदान-प्रदान करते रहें और इनका मज़ा लें। यह दुनिया है जमाना तो बदलता ही रहेगा।

रविवार, 8 नवंबर 2020

तंत्रवाद में कारण-दर्शन

            उस दिन सुबह पाँच बजे घर से निकला। सोचा था कि तीन या चार घंटे में ड्यूटी-स्थल पर पहुँचकर ड्यूटियाने लगेंगे। हाईवे पर डेढ़ घंटे की यात्रा भी पूरी हो चुकी थी। अचानक मेरे सामने चल रहे वाहन एक-एक कर रुकते दिखाई दिए। मुझे भी कार रोकनी पड़ी। यहाँ वाहन क्यों रुक रहे, कार से उतर कर इस बात का जायजा लेना चाहा। प्रथम दृष्टया कुछ समझ में न आने पर एक स्थानीय टाइप के व्यक्ति से वाहनों के रुकने का कारण पूँछा। उसने बताया कि पुलिस वालों की वसूली से बचने के लिए ट्रक ड्राइवर अपने ट्रकों को आड़े-तिरछे निकालने के चक्कर में जाम लगा बैठे हैं। यह सुनते ही मैंने स्वगतालाप किया, लो गई भैंस पानी में ! पता नहीं कितनी देर इस जाम में फंसना पड़े। वैसे इस मुहावरे से मेरा पुराना परिचय है। गाँव में बिजली जाते ही दादा जी के मुँह से यही मुहावरा निकल पड़ता था। मतलब जाम के शीघ्र खुलने का कोई आसार दिखाई नहीं पड़ा। आज हमें कार्यालय पहुँचने में बिलंब होगा, यह सोचते हुए हमारी अकुलाहट बढ़ने लगी। अब मेरी मनःस्थिति वैसी ही हो रही थी जैसे ट्रेन का समय हो चुका है और टिकट के लिए मैं लाइन में खड़ा हूँ कि टिकट बांटने वाला बाबू अचानक काउंटर से उठकर चाय पीने चला जाए और मुझे ट्रेन छूटने की चिंता सताने लगे! उस टिकट बाबू को कोसने की तरह ही मैंने जाम और उसके पीछे के समस्त कारणों को मन ही मन कोस रहा था। 
           
          मैंने सोचा 'तो जाम लगने के कारणों में वसूली भी एक महती कारण है अपने देश में!' मैंने ध्यान दिया इसमें ट्रक, बस, कार जैसे वाहन तो फंसे ही पड़े हैं, दोपहिया वाहनों के भी निकलने की कोई जगह नहीं बच रही है। यही नहीं, हाईवे से मिल रही सड़कों पर भी मोटर गाड़ियों की कतारें लग चुकी थी। दृश्य कुछ ऐसा था जैसे नदी बांध देने से यह उफनाकर आसपास के क्षेत्र को चपेटे में ले रही हो। जाम में फंसे वाहनों के सैलाब से मुझे अपने देश में जबर्दस्त ढंग से विद्यमान पोटैंशियलता का आभास हुआ। लेकिन मैं दुखी सा हो उठा, क्योंकि मुझे प्रतीत हुआ कि अपने देश में विभिन्न कारणों से जगह-जगह लगने वाले जाम में यह पोटैंशियलता ऐसे ही फंसी पड़ी होगी। इस आँखों देखी के बाद भी, 'नाहक ही पुलिस वालों को टारगेट बनाया जाता है' सोचकर मैंने उस व्यक्ति की बातों पर उतना विश्वास नहीं किया जितना कि उस समय कर लेना चाहिए था।  
         
            खैर आधे घंटे बाद मेरे आगे खड़े ट्रक का चक्का ढीलियाता जान पड़ा और धीरे-धीरे ही सही जब यह घूमना शुरू हुआ तो उसी अनुपात में मैंने भी कार को एक्सीलरेट करना आरंभ किया। इसी समय तेज गति से एक अन्य ट्रक मेरे दायीं ओर से आकर मेरी कार और सामने चल रहे ट्रक के बीच के थोड़े से गैप में घुसने का प्रयास किया। उसकी इस कवायद से सामने से आते वाहनों का रास्ता तो अवरुद्ध हुआ ही और मुझे भी थोड़ा भय लगा ! क्या किया जा सकता है, दूसरे को धकियाकर और उनका रास्ता अवरूद्ध कर लेने के बाद ही देशज लोग अपना रास्ता बनाते हैं। थोड़ी खिसियाहट के साथ उस ट्रक वाले को टोकते हुए मैंने कहा “ट्रक को स्कूटी बना लिए हो का..!” इस पर खींसे निपोरकर मुस्कुराते हुए ही सही, “थोड़ा आगे बढ़ा लें..जाम लग रहा है” वह ऐसे बोला जैसे मैंने ही कोई गलती की हो। खैर मैंने भी करे कोई और भरे कोई टाइप वाली स्वराष्ट्रीय रीति के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए कार को आगे बढ़ा लिया। लेकिन इसके साथ ही जाम के मूल कारण-स्थल पर दृष्टिपात करने की तीव्र इच्छा भी मेरे मन में जाग उठी थी। 
      
           वैसे अपने देश की दार्शनिक मान्यताओं में कार्य कारण सिद्धांत बड़ी शिद्दत के साथ आया है। लेकिन ये ॠषि-मुनि बड़े व्यावहारिक नजरिए वाले होते हैं। इसीलिए षडदर्शनों में कारण का अस्तित्व अदृश्यात्मक भाव वाला और अव्याख्येय टाइप का ही रखा गया है, जबकि ज्यादा फोकस कर्म करने पर है। इसका लाभ यह हुआ है कि कार्य के पीछे के कारण की खोज की हमारी प्रैक्टिस ढंग से नहीं हो पाई। फलस्वरूप इस प्राचीन राष्ट्र की अर्वाचीन जाँच एजेंसियाँ किसी घटित कार्य के पीछे वाले कारण का ढंग से पता नहीं लगा पाती और हाथ खड़े कर क्लोजर रिपोर्ट लगा देती हैं। ऐसी रिपोर्टों के पीछे 'बी प्रैक्टिकल' का संदेश भी छिपा होता है। आजकल इससे बढ़कर कोई दूसरा नीति वाक्य नहीं हो सकता। इसके अक्षरशः पालन से व्यक्ति का करैक्टर चमक-दमक वाला और शुद्ध होता चला जाता है। सरकारें भी देश को चमकाने के लिए इसी नीति पर भरोसा करती हैं और इसके तंत्र में जो जितना 'बी प्रैक्टिकल वाला' होता है वह उतनी ही निश्चिंतता के साथ अपने कार्यों को अंजाम तक पहुँचा पाता है। 
       
             एक दिन मुझे ऐसे ही तंत्र के एक छोटे-मोटे मुखिया पदधारक से मिलना हुआ था। उनके क्रांतिकारी विचारों से बड़े से बड़े लोग झटके पर झटके खाते आ रहे थे। कुछ पहुँचे हुए लोगों को लगा कि वे देश की चमक-दमक और उसके विकास में अपना प्रॉपर योगदान नहीं दे पा रहे हैं। अतः वही हुआ जो होता आया है। हायर लेबल से यह सुनिश्चित किया गया कि ये छोटे-मोटे मुखिया महाशय "बी प्रैक्टिकल" जैसे नीति वाक्य को फॉलो नहीं कर पाते, अतः मुखिया बनने के काबिल नहीं और उन्हें दूसरी जगह भेज दिया गया। हाँ उन्हीं से सिम्पैथी जताने गया था मैं। खैर बातों बातों में अपनी यह भावना जताते हुए मैंने उनकी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी की प्रशंसा की। लेकिन मेरे इस भावना प्रकटन पर ज्यादा फोकस न होते हुए उनने जैसे आर्त्र स्वर में अपनी चिंता जाहिर की और कहा,
       
             "ऐसे स्थानान्तरणों से मुझे चिंता नहीं होती.." 

             फिर उनने एक और बात कही कि - 
        
            "कहीं मेरा प्रमोशन न रुक जाए?"
        
            इसे सुनते ही मेरा मुँह अचानक कुछ फटा टाइप सा हो गया था, लेकिन तभी उन्होंने आगे कहा,
      
              "दरअसल वे मेरी एसीआर खराब कर सकते हैं।"  
     
             अब तो मेरे पूर्णतया हक्का-बक्का होने की बारी थी! और इस अवस्था में आकर मैंने सोचा कि - 
      
             "क्या किसी की ईमानदारी ही उसकी एन्युअल कांफिडेंशल रिपोर्ट खराब कर सकती है?" फिर चिंतातुर होते हुए उनकी ओर देखकर मैंने केवल यही सोचा -
       
             "एक अजीब सी प्रणाली में फंसकर बेचारी यह कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी कितनी निरीह और असहाय हो जाती है।" 
         
            लेकिन इस बीच अचानक उनका यह स्वर सुनकर कि "मुझे अपने सामान की पैकेजिंग करानी है" मैं भी उठ खड़ा हुआ और उनसे विदा ली।
        
            वहाँ से निकलकर मैं यही सोच रहा था कि कोई भी तंत्र हो, वह इसी सिद्धांत पर चलता है, या तो उसे तांत्रिक का गुलाम होना पड़ता है या फिर स्वयं तांत्रिक ही तंत्र का गुलाम बने। बिना इस गुलामी के तंत्र सही ढंग से काम नहीं कर सकता। तंत्रवालों ने इसीलिए तंत्र में गुलामी की प्रथा डाल रखी है और इसकी सुदृढ़ता के लिए ही अपने बीच में वार्षिक गोपनीय प्रवृष्टियों का प्रावधान किया हुआ है। 
          
             वाकई में, आखिर जाँच एजेंसियाँ भी तो इसी तंत्र का हिस्सा हैं ! इस तंत्रवाद से परे वे भी नहीं रह सकती। तो, दूसरी ओर इस महान राष्ट् का कारण-दर्शन भी ऐसा है कि ऐसी एजेंसियां करें भी तो क्या करें? कारण खोजने बैठो तो कारण का कारण करते-करते हजार कारण मिल जाते हैं, ऐसे में दृष्टव्य कार्य के पीछे कौन सा कारण उत्तरदायी है तय करना मुश्किल हो जाता है, फिर तो मजबूरी में उन्हें क्लोजर रिपोर्ट लगाना ही पड़ता है। वैसे यह भी तो मानना ही चाहिए कि ऐसी रिपोर्टों से ही व्यवहार जगत का सत्य संवर्धित होता है और इससे व्यावहारिक जगत को बहुत लाभ है तथा तंत्र भी बखूबी काम करता रह सकता है।
         
             खैर जामीय-चाल से मेरी कार उस स्थल पर पहुँची, जिसे जाम का संभावित कारण-स्थल होना चाहिए था। लेकिन वहाँ मुझे किसी कारण के दर्शन नहीं हुए! बल्कि वसूली जैसे पूर्व घटित कार्य की संभावना के सुराग स्वरूप दो पुलिस वाले जरूर दिखाई दिए, लेकिन वे भी जाम खुलवाने में ही व्यस्त थे। इधर सड़क खुलता देखकर मुझे इस शास्त्रीय ज्ञान का स्मरण हुआ कि कारण के हट जाने पर कार्य का स्वतः ही विघटन हो जाता है, और मैंने अब जाम लगने के कारण पर माथापच्ची करना व्यर्थ समझ लिया। दरअसल यहाँ समस्या यह भी थी, कि कहीं कारण खोजते-खोजते बात उपादान कारण से लेकर निमित्त कारण पर न चली जाए! मतलब घड़े का कारण स्वयं मिट्टी है या फिर घड़ा बनाने वाला कुम्हार टाइप से। हलांकि इस जाम के उपादान कारण यानि घड़े के मिट्टी के रूप में हम जैसे, कार, बस, ट्रक वाले तो होंगे ही, लेकिन ये पुलिस वाले? शायद ये भी उपादान कारण के रूप में यूज हुए हों और अब इसी उपादान कारण का विघटन होता दिखाई पड़ रहा है। लेकिन इसे मानने पर निमित्त कारण भी मानना पड़ेगा, और फिर बात इन पुलिसवालों से ऊपर वालों पर जाएगी। क्योंकि किसी निमित्त कारण यानि कि ऊपरवाले के मातहत होकर ही ये अपने काम को अंजाम दे रहे होंगे, जिसके कारण यह जाम लगा होगा !! लेकिन सुराग के हाथ में डंडा देख, मैंने उससे निमित्त कारण अर्थात कुम्हार के बारे में पूँछना उचित नहीं समझा और कारण-कार्य दर्शन का चैप्टर यहीं बंद कर देने में ही अपनी भलाई समझा। 
        
          वैसे जाम के कारण का मुझसे साक्षीकरण नहीं हुआ लेकिन अनुमान से इसका मुझे जो प्रत्यक्षीकरण हुआ वह कारण के रूप नहीं बल्कि कार्य के रूप में था। दर्शनशास्त्र में अनुमान से प्राप्त होने वाले ज्ञान को भी प्रामाणिक और सत्य माना गया है। इसलिए अनुमान से मैंने जान लिया कि, किसी कार्य के पीछे कोई कारण-फारण जैसी चीज नहीं होती, बल्कि कार्य के पीछे केवल कार्य ही होता है। अगर कोई वसूली हो भी रही थी तो वह भी तंत्र द्वारा किया जा रहा एक कार्य ही था, इन्हीं जैसे चिरस्थायी कार्यों से इस महान राष्ट्र का निर्माण होता आया है और बड़े-बड़े कार्य सृजित किए जाते हैं। इसलिए शायद तंत्रवाद भी कार्य करने में ही विश्वास रखता है, कारण तलाशने में नहीं। आखिर इसी से पूरी व्यवस्था गतिमान जो रहती है।  
            
           इस जाम में फंसे होने से मुझे अब गर्व होने लगा था, क्योंकि देश की व्यवस्थाओं को गतिमान रखने में इसमें फंसे-फंसे मैंने भी एक नन्हीं सी भूमिका अदा की थी। इस प्रकार उस दिन आॅफिस में देर से पहुँचे थे। इस देर से पहुँचने की अपनी सफाई में मैंने बताया था कि, क्या करें देश में चल रही व्यवस्थाओं को गतिमान रखने के लिए आयोजित एक जरूरी कार्य के बीच में मैं फंस गया था। मेरी बात सुन लेने के पश्चात आफिसवालों ने भी धार्मिक भाव से मेरी ओर देखा था। अंततः मुझे राम की गिलहरी समझकर मेरे बताए कार्य को एक महान राष्ट्र के निर्माण में इसे मेरा योगदान माना तथा कार्यालय में मेरे विलंबित आगमन को अपराध के रूप में ग्रहण नहीं किया।   
                  ******
(एक संवर्धित पुरानी पोस्ट )

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

मुखपत्र लेखन

         कई दिन से कुछ भी नहीं लिख पाया हूँ और आज भी लिखने का मन नहीं था। लेकिन मेरा खाली-खाली फेसबुक वाल जैसे मुँह चिढ़ाता हुआ जान पड़ा ! तो सोचा इसे जवाब देना जरूरी है। लेकिन लिखना किस बात पर हो ? वैसे सभी की अपनी-अपनी समस्याएँ होती हैं, कुछ लिखने वाले अपनी इन्हीं समस्याओं को नमक-मिर्च लगाकार साहित्य रच डालते हैं, ऐसा लेखन, जिनमें साधारणीकरण का गुण सर्वाधिक होता है, उच्चकोटि की साहित्यिक श्रेणी में आ जाता है, अन्यथा यह लेखन भी 'व्यक्तिगत रोना'  जैसा बनकर रह जाता है। इसीलिए प्राय: देखा जाता है, किसी महान लेखक की एक या दो कृति ही उन्हें इस महानता की श्रेणी में खड़ा करने के लिए उत्तरदायी है, जिसमें उनका भोगा हुआ यथार्थ ही होता है । अपने भोगे हुए यथार्थ के अलावा जो लिखा जाता है उसमें 'सायासपन' की मात्रा कुछ अधिक ही आती है, जिसमें 'जबर्दस्तीपन' या फिर 'व्यवसायपन' की झलक मिलती है।

       

         सच तो यह है, साहित्य समाज को दिशा भी तभी दे सकता है, जब वह भोगे हुए यथार्थ को लेकर चलता है! मेरा तो इस क्रम में, यह भी मानना है कि रचना में अलंकारिकता रचना को जनविरोधी बनाता है, साहित्येतिहास में ऐसी रचनाएँ बहुत दिनों तक याद नहीं की जाती और न ही इनसे समाज प्रभावित होता है, ये पुरस्कृत चाहे भले हो जाएँ! हलांकि कुछ लोग बिना नमक-मिर्च काव्य-सौन्दर्य विहीन लेखन को सपाटबयानी कहकर खारिज करने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन व्यंग्येतिहास में श्रेष्ठ घोषित व्यंग्यकारों की श्रेष्ठ व्यंग्यरचनाएँ सपाटबयानी जैसी ही होती हैं, जो बारीकी के साथ 'अन्योक्ति' में कहे गए होते हैं, बस इनमें कहानीपन होता है। लेकिन आज अधिकांशतया रचनाकार 'सपाटबयानी' से बचने के लिए जबर्दस्ती की वक्रोक्तियों का प्रयोग करते देखे जाते हैं, जिसमें कहानीपन न होकर मात्र कुछ कथनों के संग्रह होते हैं! दरअसल इसे अखबारी लेखन कहा जा सकता है। ऐसे अखबारी लेखन, लेखक की भावनाओं को चिरंजीवी नहीं बना सकते। 

         

           इतना तय है कि जैसे फेसबुक की पोस्टों पर 'लाइकवाद' हॉवी है वैसे कागजी लेखन पर 'बाजारवाद' है। इन दोनों प्रवृत्तियों के बीच पाठक बेचारे की पाठकीय खुराक पूरी नहीं होती और जैसे भूखे को थाली दिखाकर फिर उसके सामने से थाली खींच ली जाए, कुछ ऐसी ही हालत पाठक की बना दी जाती है। इस सब के बीच पाठक भी लेखको से खुन्नस पालता जाता है, लेकिन मजे की बात यह है कि इस 'खुन्नस' को ही लेखक अपनी उपलब्धि के रूप में गिनता है।

           

          कुलमिलाकर मेरी इस फेसबुक पोस्ट का मतलब लेखकों को हतोत्साहित करने का नहीं है, क्योंकि लिखी हुई हर चीज साहित्य ही होती है। खासकर आजकल व्यंग्यविधा पर बड़ा जोर है और इस विधा में यथार्थ लेखन की गुंजाइश भी कम है! तो, बस अगर कोई लेखक की उपाधि पाना चाहता है तो "मुखपत्र" बनकर न लिखे! 

       

         वैसे मेरी इस पोस्ट से कोई पाठक मुझसे खुन्नस न पाले! यह मैंने मजे के लिए और अपने फेसबुक वाल का मुँह बंद करने के लिए लिखा है।

विकास के स्टेकहोल्डर

        विकास एक बहुत बड़ा इश्यू बन चुका है, वैसे तो विकास एक प्रक्रियात्मक चीज है, इसे जानने की कोशिश में पूरा विकास-क्रम परत-दर-परत उघड़ आता है!! लेकिन भगवान की तो भगवान ही जाने, पता नहीं उनके यहाँ सृष्टि के विकास क्रम से संबंधित फाइलें बनती हैं भी या नहीं। लेकिन यहाँ आर्यावर्त का आदमी अपनी सरकारों से पत्रावलियों के माध्यम से विकास कार्यक्रम संपन्न कराता है और इस विकास को जानना, समझना या प्रमाणित करना हो तो सर्वप्रथम इन्हीं पत्रावलियों का अवलोकन करना होता है। हाँ, जितने भी टाइप के विकास दिखाई पड़ते हैं उन सब की फाइलें होती हैं! विकास अपनी इन्हीं फाइलों पर आरूढ़ होकर गतिमान होता है। लेकिन कई बार विकास के लिए लालायित लोग यह भी कहते सुने जाते हैं कि विकास फाइलों में ही कैद होकर रह गया है, या फाइलों में गुम है, तो मामला पेंचीदा हो उठता है! और जाँच का विषय बनता है। फिर जाँच से ही पता चलता है कि विकास हुआ या कि पैदा किया गया। दरअसल विकास के संदर्भ  में 'हुआ' और 'पैदा किया गया' के अलग-अलग मायने हो सकते हैं! 

         लेकिन यह जाँच कार्य, पहले मुर्गी या अंडा वाले प्रश्न की तरह विचित्र धर्मसंकट में ढकेलने वाला होता है। आजकल जमाने पर विकासवाद हॉवी है, ऐसे में विकास और उसकी पत्रावली दोनों ही गड्डमगड्ड हो चुके हैं, इनमें से कौन पहले पैदा हुआ इसे सिद्ध करने का प्रयास करना आफत को गले लगाने से कम नहीं! लेकिन इस पेंचीदे और रहस्यमयी प्रश्न का उत्तर आध्यात्मिक ज्ञानी दूसरे रूप में ढूँढ़ते हैं। ये विकास और उसकी पत्रावली के बीच के संबंध की व्याख्या उसे व्यवहारिक जगत और पारमार्थिक जगत मानकर करते हैं। बस उसी टाइप से कि चाहे भगवान को संसार या संसार को ही भगवान मान लो! सब माया का खेल!! फाइल में, से, के द्वारा, ही विकास है या फिर विकास से, के कारण ही फाइल है, आशय यह कि विकास हो या उसकी फाइल दोनों ही मायावी हैं! माया के खेल को समझ चुके लोग अवसरानुकूल विकास और उसकी फाइल के अन्तर्सम्बन्ध की व्याख्या कर लेते हैं!

     जैसाकि सब जानते हैं, विकास के लिए धमाचौकड़ी तो मची ही रहती है, ऐसे में ये वाला, वो वाला, इस पत्रावली वाला, उस पत्रावली वाला, मने सभी वाला विकास, इसके स्टेकहोल्डरों को गड्डमगड्ड दिखाई पड़ता है और ये विकास में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित कराने के लिए आपस में पिल पड़ते है। मामला गंभीर होने पर विवाद के निपटान हेतु जाँच समितियां गठित की जाती है, और इन्हें निर्देशित किया जाता है कि जाओ पत्रावली और विकास के बीच के 'नेक्सस' को परिभाषित करो, जिससे इसके स्टेकहोल्डर संतुष्ट हो सकें। लेकिन जाँच समितियों का किसी निष्कर्ष पर पहुँचना दुश्वार हो जाता है, क्योंकि ये समितियाँ भी अकसर पत्रावली की मायावी चाल में उलझ जाती हैं। 

       ऐसी ही एक जाँच समिति के सदस्यगण विकास कार्य की किसी फाइल में उलझे हुए थे! और इसकी नोटशीट से लेकर इसका एक-एक प्रपत्र बारीकी से खंगाल रहे थे! इस कमेटी के एक मेंबर ने किसी कागज को देखकर कहा कि विकास हुआ है, तो जाँच समिति के अध्यक्ष जी ने तपाक से कह दिया कि चलो मान लेते हैं कि काम हुआ! लेकिन वहीं जब दूसरे मेंबर ने यह कहा कि इस कागज से काम होना सिद्ध नहीं होता, तो वही अध्यक्ष जी पलटी मारते हुए बोले कि कोई बात नहीं, यही मान लेते हैं कि काम नहीं हुआ! लेकिन तीसरे मेंबर के यह कहने पर कि ऐसे कैसे यह माना जाए? साइट पर तो काम मिला! तब अध्यक्ष महोदय झल्लाकर बोले, तो उसे और पत्रावली पर हुए काम को को-रिलेट करो।" अन्ततः जाँच समिति बिना कोई निष्कर्ष स्थापित किए ही उठ गई। वैसे अगर कमेटी किसी निष्कर्ष पर पहुँचती भी है तो इसके बाद की गठित एक दूसरी रिव्यू कमेटी इस निष्कर्ष को पलट भी सकती है! खैर।

        ऐसेे ही फाइलों से पैदा किया गया विकास अपने स्टेकहोल्डरों के मध्य ही, उनकी चमक-दमक बढ़ाए बिंदास भाव से घूमता रहता है और उसे जहाँ होना चाहिए वहाँ वह नहीं होता। इन स्टेकहोल्डरों को विकास की परत-दर-परत हिस्ट्रीशीट पता होती है! विकास को सही जगह पहुँचाने के लिए किसी पत्रावली की बजाय ऐसे स्टेकहोल्डरों की हिस्ट्रीशीट खंगालनी चाहिए।