मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

विभाजक रेखाओं का खोखलापन

दुनिया को एक न एक दिन इस महामारी से अवश्य मुक्ति मिलेगी| लेकिन इस बीमारी के जाते-जाते विकास का खोखलापन उजागर हो चुका होगा, वही विकास जिसे इस महामारी से पार पाने में नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं| एक दिन यह होना ही था, आखिर धरती पर इंसानों की गतिविधियों की कोई न कोई सीमा तो होनी ही चाहिए, लेकिन इस सीमा पर हमने कभी सोचने की जरूरत ही नहीं समझी! कहते हैं जंगल के भी अपने कानून होते हैं, और यह कानून प्रत्येक जानवर के लिए एक क्षेत्र निर्धारित करता है और यदि यह क्षेत्र अतिक्रमित होता है, चाहे किसी भी जानवर द्वारा हो, तो इन वन्य जन्तुओं के अस्तित्व पर संकट मँडराने लगता है| लेकिन क्या मनुष्य ने अपने लिए ऐसी कोई सीमा निर्धारित की हुई है? दरअसल आधुनिक मानव ने अब तक अपने लिए किसी सुरक्षित जोन का निर्धारण ही नहीं किया और अगर कुछ किया भी तो राजनीति, धर्म-सम्प्रदाय, जाति आदि जैसी मानवता को दरकिनार करके चलने वाली विभाजक रेखाएं ही उसने खींची| उसकी खींची ये सारी विभाजक रेखाएं उसके बाजारवादी विकास के माडल में कोढ़ में खाज जैसी ही सिद्ध हुई हैं!   
       खैर, अगर उसने अपने लिए किसी जोन का निर्धारण किया भी है तो वह है विकास का जोन! आधुनिक युग में मनुष्य अपना मूल्यांकन इस जोन के लिए अपने द्वारा निर्धारित किए गए मानदंडों के अनुसार ही करता है| लेकिन ये मानदंड अब छिन्न-भिन्न होते दिखाई दे रहे हैं|  ऐसा हो भी क्यों न! दरअसल उसने विकास को अपने लिए नहीं गढ़ा, बल्कि स्वयं को ही विकास के लिए गढ़ने लगा और उसके हवाले हो लिया| विकास के जोन मेें खड़े मनुष्य की अन्तश्चेतना से प्रकृति लुप्त होने लगी| दरअसल इस जोन में खड़ा प्रकृति से उपजा प्रकृति का यह श्रेष्ठतम जीव, स्वयं अप्राकृतिक हो उठा! और यही पैमाना हो गया उसके विकास का तथा इस पैमाने पर इतराने भी लगा|
     यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि अट्ठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी तक महामारियों, व्याधियों से लड़ता आया इंसान कैसे यह सब भूल गया! क्या विकास के उसके गढ़े हुए मानदंड से जीवन बहिष्कृत होता गया है? वास्तव में अट्ठारहवीं- उन्नीसवीं शताब्दी के बाद हुई वैज्ञानिक प्रगति और उसकी खोजों से यह दुनियां जितनी सुंदर और सुरक्षित होनी चाहिए थी क्या ऐसा ही हो पाया है? शायद नहीं, अन्यथा एक महामारी के समक्ष हम निरुपाय से असहाय खड़े हुए बिलबिला न रहे होते! सच तो यह है, हमने रचा बहुत कुछ है, लेकिन इस रचे हुए को बाजार के हवाले कर दिया तथा जीवन ही नहीं मृत्यु को भी हम बेचने लगे| कोई आश्चर्य नहीं कि कोरोना वायरस भी इस बाजार की ही देन हो और इसके द्वारा उत्पन्न किया| 
       बाजार और विकास के चक्कर में हमने अपनी प्यारी धरती को कितना झुठलाया है, यह समझने की बात है! लेकिन यह विडंबना ही है कि कोरोना महामारी के खूनी जबड़े में आज मनुष्य के साथ-साथ उसका यह बाजार और विकास फँसा पड़ा कराह रहा है| आज  कोरोना के समक्ष मनुष्य के गढ़े हुए उसके सुरक्षित जोन, यथा उसकी गढ़ी हुई राजनीति, उसके धर्म, सम्प्रदाय, उसके भगवान, उसका ऊपरवाला सब असहाय हैं| मनुष्य द्वारा निर्मित सारी विभाजक रेखाएं इस कोरोना के सामने अब बेमानी हो रही हैं|

खैर अभी ग़नीमत है कि हम अपने शहरों, सड़कों और गलियों के सूनेपन को देख पा रहे हैं, लेकिन कहीं ऐसा भी दिन न आ जाए जब इस सूनेपन के बीच ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं के कंगूरे ढह रहे हों और इन्हें देखने वाला कोई न हो!! 

रविवार, 15 मार्च 2020

लिल्लीघोड़ी पर सवार कौवा

          "आपके लेखन में साहित्यिकता नहीं है!"  लेखकीय मन से जुड़ने की कोशिश में मेरे सामाजिक सरोकार वाले मन ने मुझसे कहा। 
        "रात-दिन तुम्हारी चिंता में रहता हूँ और इसी कारण लेखकीय कर्म में निरत हूँ, फिर यह कैसे कह सकते हो?" मेरे अंदर का लेखक बोला। 
         "इसलिए कि आपका लेखन मुझे मान्यता दिलाने में असफल है.." मेरे सामाजिक सरोकार ने जैसे रूँआंसेपन से कहा। 
       "सरोकार महोदय! तुम्हें मान्यता की इतनी चिंता हो रही है! क्या बिना मान्यता मिले तुम सरोकार और मैं लेखक नहीं?" मुझे अपने सरोकारी भाव से चिढ़ टाइप हुई।
        "नहीं मैं सरोकार हूँ और रहुंगा, दरअसल तुम मुझसे सीधे आ जुड़ते हो, जबकि तुम्हें साहित्यकार बनना है न कि समाजसेवक! इसलिए साहित्यिक भाव से मुझसे सरोकार रखो, जिससे मूर्धन्य साहित्यकार तुम्हारे लेखन को व्याख्यायित कर अपनी मूर्धन्यता के साथ मुझे भी महिमामंडित कर सकें! क्यों क्या बात है, तुम खामोश क्यों हो गए?" मुझे हाँ-हूँ करते न देख मेरे सामाजिक सरोकार ने मुझे टोका।
       धीर-गंभीर मन:स्थिति में मैंने कहना चाहा, "देखो, एक तो मुझे तुम्हारी बात समझ में नहीं आई, दूजे मेरे लिखे से कोई महिमामंडित हो, इस बात से मेरा कोई सरोकार नहीं, समझे?"
        लेकिन वह, मतलब मेरे सामाजिक सरोकार ने, मुझे चिढ़ाने से बाज नहीं आया और कुटिल मुस्कान लिए बोला, "चलो मान लिया, तुम्हें अपने ही सरोकार से कोई सरोकार नहीं, लेकिन इसमें तुम्हारा नहीं तुम्हारे परिवेश और संस्कारों का दोष है। इस देश की माटी ही ऐसी है कि यहाँ लोग अपने नहीं दूसरे के सरोकार पर हाथ साफ करते फिरते है! और जो तुम ये कह रहे हो कि तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आई तो सुनो..
        ...वो क्या है कि! तुम सब समझते हो, नहीं तो तुम अपनी किताब का नाम "लिल्लीघोड़ी पर सवार कौवा" न रखते! भला किसी पुस्तक का यह भी कोई नाम हुआ!"
        मैं समझ गया कि मेरा लेखकीय सरोकार लथेड़ने की मंशा से आज मुझे कोंचने का अवसर छोड़ना नहीं चाहता। फिर भी मैंने सहज भाव से उसे समझाने की कोशिश की, "देखो जी, हम जो लिखते हैं वही साहित्यिक हो जाता है, रही बात शीर्षक की, तो साहित्यिक कर्म में प्रकाशक का भी हाथ होता है, इसलिए उसका भी कहा मानना जरूरी है! अन्यथा अपनी किताब का कोई दूसरा सरोकारी नाम देता!"
          "गुड..गुड..! तुम मुझसे सरोकार रखो, लेकिन वाया साहित्यिक-भाव से! अब देखना, तुम्हारी इस पुस्तक में लिल्लीघोड़ी पर सवार कौवे का मिलना भले ही असंभव हो लेकिन यह साहित्यिक टाइप का शीर्षक इस किताब का बिजनेस करवा ही देगी! यही मैं समझाना चाह रहा था कि लेखन भी इस शीर्षक जैसा ही होना चाहिए! जिसे पाठक नहीं साहित्यकार ही समझ पाएं! इसी में मुझ जैसे सरोकार और तुम जैसे लेखक की महत्ता है! इतनी छोटी बात तुम्हारा प्रकाशक समझ रहा है और तुम नहीं! यह घोर आश्चर्य का विषय है! लानत है तुम्हारे लेखन पर।" 
        बाप रे ! इसके साथ ही मेरे सरोकारी मन ने मेरे लेखक-मन को झिंझोड़कर रख दिया!! और मैंने लिल्लीघोड़ी पर कौवा की सवारी कराने की जैसे ठान भी लिया! उंगलियों में कलम फँसाए, अरे नही, इसे की-बोर्ड पर रखे हुए, साहित्यिक टाइप का भाव जगाने हेतु चिंतनरत हो गया।   

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

आरे में आरा

टहल-वहल कर लौटा तो झाड़ू-वाड़ू भी लगा डाली, क्योंकि बाहर की खर-पतवार पर क‌ई बार निगाह-सिगाह पड़ी थी। इसके बाद चाय-वाय पिया। अब इत्मीनान से बैठा हूँ। फेसबुक स्क्रॉल किया तो कुछ लिखकर पोस्ट करने के लिए मन ऐसे कुलबुलाया, जैसे अखाड़े को देखकर पहलवानी सूझे! 

सोचा, यह पहलवानी कर ही दी जाए, सो लिखना-फिखना शुरू कर दिया। लेकिन क्या लिखना है और क्या लिखे जा रहे हैं, यह तय-फय किए बिना; यानी लिखने के दांव-पेंच पर कोई विचार-फिचार किए बगैर ही अखाड़े में उतर पड़ा और हाथ-पांव चलाने लगा।

हां चाय-फाय पीते समय अखबार भी पढ़ रहा था। उसके पन्ने-सन्ने पलट-फलट ही रहा था कि एक पन्ने के किनारे छपे संपादक महोदय के 'खेद प्रकाश' पर निगाह पड़ गई।

मजे की बात यह कि ‘खेद प्रकाश’ भी किस पर! एक सच्ची बात जो छप गई थी, उसी पर!

दरअसल खेद प्रकाश कुछ यूँ था, अखबार के पिछले अंक में "एक वाक्य के अंश के रूप में 'अच्छाई पर बुराई की जीत' छप गया है, जबकि इसके स्थान पर 'बुराई पर अच्छाई की जीत' होना चाहिए था।"  संपादक महोदय ने लिखा था कि 'इस गलती का हमें खेद है।' 

यह ‘खेद प्रकाश’ पढ़-सढ़ लेने के बाद मैं सोचने लगा कि संपादक महोदय को खेद शायद मुद्रण-त्रुटि का नहीं, बल्कि उससे निकल आए सच का था!

तो भ‌इया, संपादक महोदय! इसपर खेद-फेद जताने की कोई जरूरत-फरूरत नहीं है। आजकल तो अच्छाई पर बुराई की जीत का ही जलवा है। और बुराई पर अच्छाई के जीतने की नौबत तब आती है, जब उस जीत-फीत का कोई खास अर्थ नहीं रह जाता! 

आपने शायद ध्यान नहीं दिया, मेरी बात की पुष्टि आप चाहें तो अपने ही अखबार में आज छपी इस खबर से कर सकते हैं, "आरे में पेड़ों की कटाई पर रोक।” जब मतलब भर के पेड़ों पर आरा चल गया, तब यह रोक-फोक लगी। 

देखा! पहले बुराई जीतती है, अच्छाई बाद में आती है; और यह अच्छाई भी अकसर जरूरत भर के लिए ही जीतती है। तब जीती हुई अच्छाई की हालत भी कुछ वैसी ही हो जाती है, ‘काम निकाल गया तो पहचानते नहीं।’ यानी वह नजर‌अंदाज करने लायक बनकर रह जाती है।!

तो, संपादक महोदय, खेद-फेद छोड़िए; गलती आपकी नहीं जमाने की है।

और यह जमाने वाले ही हैं कि अच्छाई और बुराई के पटका-पटकी के खेल में दोनों के लिए ताली बजता है! आरे में आरा चला तो विकास वाले ताली बजाए होंगे और जब आरा रुका तो पर्यावरण प्रेमी!

वैसे तो आप संपादक हैं, जानते ही होंगे कि अखबार भी आखिर बेचना ही होता है। व्यापार में अच्छाई और बुराई, दोनों को भुनाने का हुनर आपको भी खूब आता होगा! अब यहीं देखिए, आपके अखबार के पन्ने पलटते समय आपकी प्रस्तुति "आरती संग्रह" वाली पत्रिका फिसलकर जमीन पर गिर पड़ी। मेरी भक्ति भावना को जैसे ठेस लगी। मैंने बिना देर किए श्रद्धाभाव से उसे उठाया और उसके पन्ने पलटने लगा। 

खैर, उसमें छपी आरती इतने बारीक अक्षरों में थी कि आंखें गड़ाकर भी उन्हें पढ़ना मुश्किल था। लेकिन उसी पत्रिका में प्रकाशित विज्ञापन इतने बड़े और चमकीले अक्षरों में थे कि कोई चाहे तो उन्हें एक फर्लांग दूर से भी आराम से पढ़ ले!

तो संपादक महोदय, जैसे भक्ति के कवर पेज की आड़ में दुनियादारी का कारोबार चलता है, वैसे ही अच्छाई की जीत का डंका भी शायद इसलिए पीटा जाता है कि बुराई इत्मीनान से अपना काम करती रहे, है न?

सच तो यह है कि 'अच्छाई' ने ही बड़ी चालाकी से आरे को जरूरत भर के पेड़ काट लेने दिए। इसीलिए वह बाद में प्रकट हुई और पूरे ठसके के साथ घोषणा की, "देखो, यह हुई न बुराई पर अच्छाई की जीत!"

अब इस जीत पर ढोल पीटो, दशहरा मनाओ और अच्छाई की जय-जयकार करो। लेकिन इस उत्सव के बीच यह समझ में नहीं आता कि बुराई हारकर भी आखिर जीत कैसे जाती है और अच्छाई जीतकर भी हार कैसे जाती है! शायद इसीलिए कि अंततः सीता को वनवास भोगना ही पड़ता है।

तो, मेरे समझ से अच्छाई और बुराई की इस नूराकुश्ती में हार-फार या जीत-फीत को कैजुअली-फैजुअली ही लेना चाहिए। इस पर न तो खेद-फेद जताने की जरूरत है और न ही खुशी-फुशी मनाने की। 

यह बाजार और विकास, ये दोनों जुड़वा भाई ही तो हैं। अच्छाई और बुराई की इस पटका-पटकी के खेल के असली रेफरी भी यही हैं। ये जब चाहें, जिसकी चाहें, जीत पर सीटी बजा दें और हम दर्शकों को कभी रुलाएं, कभी हंसाए! 

#चलते_चलते

तो भ‌इया आज चलते-फलते मैं यही सलाह देता हूँ कि आप भी न, इस हार-जीत के चक्कर में ज्यादा न पड़ो आपको जिस बात में खुशी मिले, उसी पर खुशी मनाएं!

#सुबहचर्या

 (८.१०.१९)         

शपथ के मोड में!

            एक गाना मुझे बहुत पसंद है वह कि "भगवान...सुन दर्द भरे मेरे नाले" शायद संविधान में जनता के इसी 'नाले' को सुनने की व्यवस्था की गई है, जिसके तहत शासकों को पद और गोपनीयता की शपथ खानी होती है और शपथ खाते शासकों पर मेरा ध्यान फोकस हो जाता है। आखिर ये देश की जनता के 'नाले' सुनने के लिए भगवान जो बन चुके होते हैं! ऐसे शपथी अकसर खानदानी टाइप के ही होते हैं। वैसे भी अपने देश में खानदानियों का ही जलवा रहता आया है। ये, येन-केन-प्रकारेण पद्धति वाली अपनी शक्ति के प्रयोग से, पीढ़ी दर पीढ़ी शपथ खाने से लेकर खिलाने तक की शक्ति रखते हैं और घुमा-फिराकर इसे खाने का जुगाड़ भी फिट कर लेते हैं। इस देश में क्या नेता, क्या जनता! सभी जुगाड़ से काम चलाते हैं। 


          लेकिन यहाँ की बेचारी जनता को जुगाड़ का भी उतना शऊर नहीं ! उसे अपने भक्ति-भाव पर ही ज्यादा भरोसा होता है, तभी तो भगवान को प्रसन्न करने के लिए वह हजारों वर्ष तपस्या कर सकती है। दूसरे, भगवान से वरदान पाने की यदि ज्यादा जल्दी हो, तो वह मनमाफिक भगवान भी खोज सकती है, मतलब "जाकी रही भावना जैसी हरि मूरत देखी तिन्ह तैसी' टाइप से। खैर, इस जमाने में राजाओं वाला 'राजत्व-गुण' खानदानियों में ही पाया जाता है। और, जनता भी अपने भक्ति-भाव संम्पृक्त सांस्कृतिक-दयालुता के वशीभूत खानदानियों को राजत्व-विहीन नहीं देख पाती तथा पुनि-पुनि सिंहासनारूढ़ कराती रहती है। वैसे भी यह जनता करे भी तो क्या करे? खानदानी टाइप के राजनीतिक लोग तो पैदाइशी मुँह में सोने का चम्मच लिए जैसे शपथ खाए धरती पर अवतरित हुए रहते हैं, शपथ खाना इनके लिए औपचारिकता भर होता है! बिना इसका डोज लिए हुए भी ये काम चला लेते हैं।

         

          यदि किसी गैर-खान‌दानी ने, जनता को धता बताकर या भूले-भटके शपथ खा भी लिया हो तो, वह भी अपनी सात पुश्तों को खानदानी बना जाता है! क्योंकि खानदानीपन शक्ति के साथ राजत्व गुण मापने का भी पैमाना है और जिसके सामने जनता सिर झुकाती है।  इस शक्ति को जनता कम न आंके, इसलिए शपथ अकेले में नहीं, खानदानी-खानदानी मिलकर स्टेज पर बाकायदे समारोह पूर्वक शपथ खा और खिलाकर अपने राजत्व गुण का प्रदर्शन करते हैं, आखिर उन्हें भी यह पता होता है कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा! दरअसल जनता को और कुछ पता हो या ना हो, उसे यह तो पता ही होता है कि कोई ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा नहीं, यही बड़े खानदानी लोग उसकी समस्या हल कर सकते है। क्या है कि जनता इन खानदानियों को समस्याओं से दुनियां को सजाते हुए देख चुकी होती है, खैर।

     

           यहाँ उल्लेखनीय है भारत जैसे देश में 'किरपा' का बड़ा महत्व है, और घुरहू-कतवारू में किरपा बरसाने का गुण नहीं हो सकता, यह गुण राजा महाराजाओं से लेकर खानदानियों में ही रहा है। भारत की महती सभ्यता में माना गया है कि भगवान टाइप के लोग ही किरपा बरसा सकते हैं। इस प्रकार जो शपथ खा रहे होते हैं, मान लीजिए कि वे समस्याओं पर मुस्तैदी के साथ किरपा बरसाने जा रहे हैं और इनके शपथोपरांत सारी समस्याएं ठिकाने लग जएंगी। इसीलिए देशहित में समस्याओं के हलार्थ ये इतने चिंतित रहते हैं कि साल के तीन सौ पैंसठ दिन गुणे चौबीसों घंटे शपथ खाने के ही मोड में रहते हैं। मतलब बिना इसकी चिंता किए कि, हड़बड़-तड़बड़ में खाई गई चीज पचेगी भी या नहीं? ये आनन-फानन में भी शपथ खा लेते हैं। शपथ खाने के बाद जनता को राजत्व का बोध कराना और आसान हो जाता है। 

        

          अंत में इस बात पर और ध्यान फोकस कराना चाहता हूँ, जिसे मैं बचपन से ग्रहण करते हुए चला हूँ, यह कि कसम टूटने पर विद्या माई के प्रकोप से बचने के लिए स्कूली बस्ते को माथे से छुआ कर हम कहते जय विद्यामाई की। वैसे ही आज के लोकतांत्रिक भगवान 'भारत माता की जय' या फिर 'मंदिर गिरता फिर बन जाता' टाइप से बोलकर जनता के बीच उसके प्रकोप से बचते हुए अपने प्रति उसका आस जगाए रखते हैं।

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

आजादी का बखार

        जब १५ अगस्त २०१९ को तिरंगा झंडा फहराया जा रहा था, तो गर्व और देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत होते हुए मैंने सोचा था कि १९४७ में क्या खूब आज़ादी हमें मिली रही होगी, जैसे किसी गरीब भूमिहीन को बोरे भर भर अनाज मिल गया रहा हो।
      उस दिन दूर दराज के एक क्षेत्र में आजादी की जांच-परख करने जाना हुआ था तो वहां घिस‌इया दिखाई दिया था! वही घिस‌इया जो सड़क-चौराहे और गाँव-गिराव में चलते चलाते अकसर टकरा जाता है और जिसकी यदा-कदा चर्चा भी कर देता हूँ। उसे देखते ही मैं औचकते हुए पूँछ बैठा था, "अरे घिस‌ई, तू यहां कैसे, उस दिन तो तू शहर में मिला था!" घिस‌इया ने मुस्कुराते हुए, जैसे अपनी गरीबी पर फ़क्र करते हुए कहा था, "का गुरु, आप गरीबन को अस-तस समझते हो का, अरे ये आपको हर जगह मिल जाइहैं, बस आपका हृदै पवित्तर हो।" मैंने भी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया था, "हाँ सही कहा, अपने देश में गरीब भी भगवान की तरह सर्वव्यापी होते हैं न, और हाँ पवित्तर हृदै वाले ही गरीब खोज पाते हैं।" खैर, उस दिन तो जाँच पड़ताल करके मैं चला आया था, लेकिन इस पंद्रह अगस्त के दिन मेरे दिमाग में चकरघिन्नी की तरह यह प्रश्न नाच रहा था कि सन् सैंतालिस में बोरे भर भर मिली आजादी के वितरण में घिस‌ईया अपना हिस्सा पाने से छूटा क्यों? और मैं उसकी यादों के सहारे अपना भाषण बुनने लगा।
       असल में घिस‌इया के बाप-दादाओं से कहीं चूक हुई होगी। आजादी के मतलब से वे नावाकिफ रहे होंगे इसलिए उनकी दिलचस्पी आज़ादी के लिए मतवाले हो रहे लोगों को कौतूहल से देखने के सिवा और कुछ न रही होगी, और इसे लपकने में वे चूक ग‌ए। एक बात और, जिन्हें आजादी के मायने पता होता है वे ही नेता बनते हैं और बनाते हैं, फिर तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह बनने-बनाने का खेल चल निकलता है। इसीलिए नेताओं की पीढ़ियाँ सबसे ज्यादा आजाद होकर घूमती है। इन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे भारत देश इन्हीं के लिए आजाद हुआ है।
       वैसे ये करते भी तो क्या करते, इस भूखे नंगे देश में सभी को एक साथ आजादी बांटी नहीं जा सकती थी! ऐसा करने से अंग्रेजों से मिली आजादी का बखार खाली हो जाता और आजादी बांटने वालों के बच्चे भी घिस‌ईया की तरह आज मारे मारे फिर रहे होते। इसीलिए पंचवर्षीय प्लान के तहत शनै: शनै: आजादी बांटने की नीति अपनाई गई।   
         फिर क्या था आजादी के मालिकों में अंग्रेजों के लटके-झटके आ ग‌ए और अपनी मदद के लिए ये अंग्रेजियत की फौज खड़ी करते ग‌ए! इस फौज के साथ मिलकर ये आजादी का लुत्फ उठाना शुरू कर दिए। इनके लुत्फ पर कोई और मालिकाना हक़ न जताए इसलिए लबादे बुने ग‌ए, जैसे धर्म, भाषा, क्षेत्र, और तो और एक मायने में जाति के भी, क्योंकि नेताओं की आजादी के लिए ऐसे लबादे बेहद जरूरी हुए। इन लबादों को जनता की ओर उछाला गया, जिन्हें ओढ़-ओढ़ कर पगलाई-धगलाई जनता स्वतंन्त्रता की फुल अनुभूति प्राप्त करती रही है। कुलमिलाकर हुआ यह कि जैसे इन लबादों को बुनने के लिए ही हम स्वतंन्त्र हुए हों। 
       उस दिन गांव में आजादी की जाँच-परख करते करते मेरी निगाह बिना तार के बिजली के खम्भों पर चली गई, गांव वालों ने बताया आजादी के बाद से अभी तक बिजली नहीं आई, तो मैंने कहा "जैसे खम्भे गड़े वैसे बिजली भी आ जाएगी, थोड़ा गम खाओ, आजादी धीरे-धीरे आती है न।" इसी समय 'इंजिनियर कम ठेकेदार' ने कहा, "साहब, यह इंटरलाकिंग ईंटों की रोड मंदिर तक बना दिया है। आइए मंदिर तक चलें।" मैंने मंदिर की ओर जाती उस सड़क को निहारा जिसके एक ओर बस्ती तो दूसरी ओर खेत थे, लेकिन मुझे लगा इससे ज्यादा ज़रूरी उस गांव को जोड़ने वाले कच्चे रास्ते पर पुल की थी, क्योंकि बारिश के पानी ने रास्ते को काटकर तालाब में बदल दिया था। मैंने इंजीनियर की ओर देखते हुए कहा, "पहले पुल बनना चाहिए था।" तब तक साथ चल रहे मंदिर के पुजारी जी ने कहा, "आइए, मंदिर तक तक चलें.." पुजारी की ओर ध्यान से देखते हुए मैंने उसे जर्जर और निष्प्रयोज्य शौचालयों को दिखाते हुए कहा, "अच्छा ये बताइए, ये जो शौचालय बने हैं ध्वस्त होने के कागार पर हैं, कभी गांववासियों को इनका प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया है? नहीं किया है न, तो मंदिर तक मैं क्या जाऊँ! एक बात और पुजारी जी, इस गांव में कितनी गंदगी है! देख रहे हैं न, यहां के लोग बीमार जैसे दिखाई दे रहे हैं, कभी आपने इन्हें समझाया है कि अपने आसपास और स्वयं को साफ-सुथरा रखो? नहीं समझाया है न! तो आपके माथे के इस तिलक का कोई मतलब नहीं!" और वहां से चल दिया था।
         दरअसल यह सब मैंने झटके में बोल दिया था जिसके दो कारण थे। पहला, मंदिर में चढ़ावे के लिए मेरे जेब में प्रर्याप्त 'आजादी' नहीं थी, इसलिए मंदिर तक नहीं गया। दूसरे मुझे इस गांव में फुल आजादी का दर्शन नहीं हुआ। लेकिन पुजारी जी इसके बावजूद मुझे सुनकर मुस्कुरा रहे थे! उनकी इस मुस्कुराहट को मैंने उनके 'धर्म' का बड़प्पन माना जो मेरे प्रति 'क्रूर' नहीं हुआ।
       अरे हां! लबादे की बात पर मैं एक बात भूला ही जा रहा था, वह है स्वतंन्त्रता का लबादा! इस लबादे को बौद्धिकों के संम्प्रदाय के लोग ज़्यादा पसंद करते हैं! ये लोग क्रूरता में भी लोकतंत्र तलाशते हैं, तो गरीबी को आजादी का प्रतीक मानते हैं। यह बौद्धिक संम्प्रदाय जबरदस्त मानवीय होता है। इसमें लेखक, पत्रकार, मानवाधिकारवादी और स्वतंन्त्रता की चाह रखने वाले न जाने कौन-कौन से लोग शामिल हो जाते हैं और ये सुबह-शाम हुँहुँवाते रहते हैं। मुझे लगता है जब इनके जेब में 'आजादी' की कमी होती है, तभी हुँवा-हुँवा करते हैं अन्यथा घिस‌इया जैसों से, जो सत्तर साल से यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई देता रहता है, ये कोई मतलब नहीं रखते। हां, बात की खाल निकालना ये खूब जानते हैं, लेकिन किसी समस्या का हल इनके पास नहीं होता! आजादी का ठेका न मिल पाने पर ये अकसर आजादी के 'कस्टोडियनों' के उठने-बैठने और उनकी हरकतों पर ही फोकस्ड होकर उसमें अपनी 'आजादी' ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन ये बौद्धिक संम्प्रदाय के लोग शेर के सामने मिमियाते हैं। अपनी आजादी का ये ऐसे ही प्रयोग करते हैं।
      खैर, उस गाँव से लौटते ही मुझे अपनी 'आजादी' की फ़िक्र हुई तथा मैं घिस‌इया और उसके गाँव को भूल गया, क्योंकि घिस‌ई या उसके गांव की आजादी में वृद्धि से मेरी आजादी कम होती। वैसे भी इस देश में दो लोगों की आजादी में परस्पर समानांतर रेखाओं जैसा नहीं, तिर्यक रेखाओं जैसा संबंध होता है। इसलिए इनको भूलकर केवल लिखने और भाषण देने के लिए मैंने उसे और उसके गांव को अपनी यादों में सुरक्षित कर लिया।

क्या बेवकूफी की बातें हैं!

         ऊपरवाला बड़ा करामाती होता है, नीचे वालों को नचाता रहता है। यह नीचे वाला बाकायदे बाजे-गाजे के साथ नाचता है। हालांकि यह ऊपरवाला कहीं नजर नहीं आता, इसके ऊपर होने का यही प्रमाण है कि हम इसे मानते हैं कि यह ऊपर है। कभी-कभी लोग हममें-तुममें सबमें इसके होने को प्रमाणित करते हैं, मतलब यह ऊपरवाला ऊपर-नीचे सबमें है। ऐसा हम इसे स्वप्रमाणित भी मानते हैं, हाँ इसके होने के लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं, सोच लेने भर से यह सिद्ध हो जाता है, नहीं तो ऐसा हम सोचते ही न, कि यह है। इसीलिए इस जगती का प्रत्येक चिंतनशील प्राणी अपने तर्कों को अपना परम सत्य मानकर स्वीकार किए बैठा है। ये अंतहीन लत्तेरे की-धत्तेरे की बहसें, इसी ओर संकेत करती है कि मेरी बात मेरे दिमाग से निकली है, तो जरूर मेरी बात का अस्तित्व है, बाकी, सारा डिबेट बेवकूफ बनाने के लिए होता है। 
       
         अब होना और करामाती होना दो चीजें हैं, किसी के होने से ही वह करामाती सिद्ध नहीं होता। ऐसे तो सभी हैं, तो क्या सब करामाती हैं? नहीं हैं न ! तो करामाती होने के लिए ऊपर होना जरूरी है, ऊपरवाला ही करामाती हो सकता है। यह ऊपरवाला ही है, जो नीचे वालों को अपनी अंगुलियों पर नचाता है, भले ही उसकी अंगुलियाँ किसी ने न देखी हो। दरअसल नीचे वालों को तमाम व्याधियों से बचे रहने के लिए, ऊपरवाले की अनदेखी-अंगुलियों के इशारे पर नाचना ही होता है। एक बात है इस ऊपरवाले के चक्कर में ये नीचे वाले ऐसे झूमते-गाते हैं जैसे मनोरोगी!
       
         यह ऊपरवाला वाकई करामाती है, और नहीं तो इसकी माया के वशीभूत हम नाचते न। यह मनोरोग नहीं, मायामय हो जाना है, इसी से ऊपरवाले का अस्तित्व पहचान में आता है !! इस ऊपर वाले के चक्कर में एक बात कहना है, ऊपरवाले और नीचे वाले के बीच इस मनोरोग या यूँ कह लें माया का ही संबंध है। यह संबंध हमें वहां तक ले जाता है कि प्रत्येक ऊपरी चीज हमें इस ऊपरवाले से कम प्रिय नहीं होती। यही कारण है, सब इसके लिए नाचते हैं और इसको पाने के लिए ऊपरवाले का संरक्षण चाहते हैं, जो अदृश्य होते हुए भी अपने नीचे वालों को संरक्षित किए रहता है।
       
        कभी-कभी हमें यह भी आश्चर्य होता है कि जिसके लिए हम इतना कूदते-फांदते हैं, रोते-गाते-हँसते हैं, छीना-झपटी पर भी उतरते हैं , वह तो सिद्ध-असिद्ध से ऊपर की चीज है। वैसे भी ऊपर की चीजें सिद्ध-असिद्ध के पचड़े में नहीं लाई जा सकती। बस इसपर केवल नाचा या कूदा-फांदा जा सकता है, और इसे देखकर ही ऊपरी-तत्त्व के अस्तित्व का अनुमान किया जा सकता है, क्योंकि ऊपर की हवा जिसे लग जाती है, उसकी हालत विचित्र हो जाती है।

           आजकल सकल हिन्दुस्तान को ऊपर की हवा लगी हुई है। सभी को दिव्य अनुभूति प्राप्त हो रही है, सब नाच-गा और कूद-फांद रहे हैं। बड़ी विचित्रता है अपने हिन्दुस्तान में !  एक अजीब सा आध्यात्मिक भाव पसर आया है हिन्दुस्तान में !! हां बड़ा शोर है यहां, कुछ भी पकड़ में नहीं।

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

जीडीपी में परिवर्तन

       आजकल इस देश में जीडीपी के गिरने पर खूब हो-हल्ला मचा है, देश पीछे जा रहा है। अब जब देश पीछे जाएगा, तो कहाँ जाएगा? अगर इस ग्लोब पर देखोगे तो, अमेरिका और भारत भी आपस में आगे-पीछे होते रहते हैं ! चूँकि मामला अर्थव्यवस्था से जुड़ता है, इसलिए पीछे जाने का मतलब आज की अपेक्षा गरीब होने से लगाना यथोचित जान पड़ता है। अब जब देश गरीब होगा तो निश्चित ही इसका समय पीछे की ओर जाएगा। जो पाषाण युग तक देश को पीछे ले जा सकता है, क्यों है न? 
      तो हम मानते हैं, जीडीपी का गिरना इस देश को बाईसवीं सदी की बजाय एक बार फिर पीछे की ओर बीसवीं शताब्दी में ढकेल देगा और निनिहाते भारत का एक बार फिर दर्शन सर्वसुलभ होगा। आखिर क्यों नहीं होगा ? जब अर्थव्यवस्था डाउन होगी तो यही होगा। कुल मिलाकर समय परिवर्तन होगा ही और जीडीपी के गिरने के अनुपात में होगा। जितना यह गिरता जाएगा उतना देश का समय पीछे की ओर खिसकता जाएगा।
          अब अगर ऐसे ही जीडीपी का गिरना जारी रहा तो बीसवीं के बाद अट्ठरहवीं से उन्नीसवीं और फिर सत्रहवीं शताब्दी होते हुए देश की अर्थव्यवस्था मुगलकाल में पहुँच जाएगी। ऐसे में यहाँ एक बात ध्यातव्य है, आज इसके गिरने पर जो फूले नहीं समा रहे हैं, तब यही लोग गिरते-गिरते मुगलकाल की अवस्था तक आई जीडीपी को यहाँ से और नहीं गिरने देना चाहेंगे। तब धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर जीडीपी के स्थिर हो जाने की ये प्रार्थना करेंगे! मतलब धर्मनिरपेक्ष अर्थशास्त्रियों को आज की रेट की तुलना में मुग़ल काल तक ले जाने वाले जीडीपी का रेट स्वीकार होगा। लेकिन तब भक्त टाइप के अर्थशास्त्रियों को यहाँ भिनभिनाने का अवसर मिल जाएगा ! और ये बेचारे जो आज इसके गिरने से तमाम लानत-मलामत तथा ताने झेलकर चिंतित हुए जा रहे हैं, तब जीडीपी के गिरावट को भारत की सेहत के लिए रामबाण औषधि घोषित कर देंगे, क्योंकि वे नहीं चाहेंगे कि भारत की अर्थव्यवस्था मुग़लकाल में स्टे करे।
            मुगलकाल तक पहुंचकर स्थिर हुई जीडीपी के स्तर से दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री खुश होने से रहे। यहाँ आकर जीडीपी की छीछालेदर एक बार फिर तय मानिए। इसकी ऐसी खींचतान शुरू होगी कि दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री इसके गिरने के स्तर को, मुगलकाल से और नीचे ले जाकर भारत के सोने की चिड़िया होने वाले युग में पहुँचाना चाहेंगे। लेकिन वहीं वामपंथी अर्थशास्त्रियों को यह स्थिति नागवार गुजरेगी, क्योंकि इनके अनुसार इससे भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के साथ यहां आजादी और लोकतंत्र को भी खतरा पहुँचेगा। वहीं लगे दाहिने हाथ, दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री जीडीपी को और न गिरने देने की वकालत करने वालों को राष्ट्रद्रोही सिद्ध कर देंगे, इनके अनुसार आखिर क्यों न पहुँचे भारत अपने सोने की चिड़िया वाले युग में! 
           अब जरा कल्पना करिए कि युगों से इस देश के जीडीपी की कितनी उठक-बैठक हुई होगी ! लेकिन पहले यह मसला दक्षिणपंथी और वामपंथी अर्थशास्त्रियों के बीच का नहीं रहा होगा। गरीब बेचारा अपनी गरीबी से संतुष्ट रहा होगा, इसीलिए इतिहास में इसपर इतना हो-हल्ला मचने की जानकारी दर्ज नहीं है। लेकिन इधर जब से विकास को राजनीति का हथियार बनाया जाने लगा है तब से अर्थव्यवस्था के आँकड़ो को गरीबों को दिखाना जरूरी हो चला है कि देखो इस सरकार ने तुम्हारी स्थिति सुधारी कि बिगाड़ी है। लेकिन इन आँकड़ों को देख सुनकर गरीब यह नहीं समझ पाते कि इसे लेकर वे हँसें कि रोयें। यहीं पर आकर मुझे इस बात की चिंता होती है कि इस पर मचे हो-हल्ले से, यदि कहीं इस देश का गरीब जाग गया तो वह जीडीपी को मनरेगा जैसी कोई योजना न समझ बैठें !
          खैर, मुझे जीडीपी और अर्थव्यवस्था पर पड़ते इसके प्रभाव का ज्ञान नहीं है। लेकिन मैं भी, जब से लोग जीडीपी-जीडीपी चिल्लाने लगे हैं, तब से इसे मनरेगा जैसी कोई योजना ही समझने लगा हूँ। साधारण भाषा में इसे हम इस तरह समझा सकते हैं कि भारत जैसे देश में जीडीपी के बढ़ने या घटने से केवल गरीबों के पतरी (पत्तल) चाटने पर असर पड़ता है। अगर बढ़ गई, तो चाटने को कुछ ज्यादा मिल सकता है और घट गई तो चाटने भर को भी कुछ नहीं बचेगा, क्योंकि यहां जो गरीब नहीं होता उसका पेट बहुत बड़ा होता है, और सारी जीडीपी उसी के पेट में जाती है, जैसे मनरेगा की मजदूरी! इसीलिए गरीब बेचारे जीडीपी से मतलब नहीं रखते। इस पर ज़्यादा चर्चा करना दक्षिणपंथी और वामपंथी अर्थशास्त्रियों के खेल को शह देना भर है, जो राजनीति करते हों वही शह-मात का खेल खेलें।