'बतकचरा' में कुछ बातों का संग्रह है, ये बातें किसी को सार्थक, तो किसी को निरर्थक प्रतीत हो सकती है। निरर्थक लगें तो यही मान लीजिएगा कि ये बातें हैं इन बातों का क्या..!
मंगलवार, 25 अप्रैल 2017
लाल बत्ती
रविवार, 16 अप्रैल 2017
कृपया दर्शन को धर्म में न बदलें..
नाहक ही जान चली गई!
आज सुबह टहलने निकला तो देखा गायें, आराम से बैठी पगुरा रहीं थी, लगा इनका पेट भरा हुआ है। ये अन्ना जानवर हैं, मतलब इनका कोई मालिक नहीं या फिर इन्हें ऐसे ही लोग भटकने के लिए छोड़ देते हैं। इधर क्या है कि बुंदेलखंड में अन्नाप्रथा जोरों पर प्रचलित है, गौवंशीय पशुओं को लोग छुट्टा छोड़ देते हैं। यह एक तरह से सामाजिक कुप्रथा का रूप धारण कर चुका है। हमारे पूर्वांचल जौनपुर में, हम बचपन से जिस पशु का कोई राजी-गहकी न हो ऐसे पशु को बहेतू पशु कहते आए हैं। ये अन्ना पशु, बहेतू टाइप के ही पशु होते हैं।
तो, इधर बुंदेलखंड में खेत अब धीरे-धीरे खाली हो चले हैं, फसलें कट चुकी हैं। इन बेचारे अन्ना गौपशुओं को चरने के लिए कम से कम फसल से खाली हुए खेत मिलने लगे हैं, नहीं तो, अभी कुछ दिन पहले झुंड के झुंड अन्ना पशुओं को कोई न कोई इनसे अपनी फसलों को बचाने के चक्कर में इधर से उधर हांकता दिखाई पड़ जाता। खैर आज ये यहाँ बैठे आराम से पगुराते दिखे। इन गौपशुओं को देखते ही मुझे ध्यान आया, कल की ही बात है, जब एक व्यक्ति मुझे बता रहा था, उसके मुहल्ले में एक पंडितजी हैं जो अपनी गाय को एक रोटी खिलाकर दूध दुह लेते हैं, इसके बाद उसे अन्ना पशु की तरह छोड़ देते हैं, और अगर वह गाय बेचारी जाना नहीं चाहती है तो पंडित जी उसके ऊपर पानी छोड़कर उसे जाने पर मजबूर कर देते हैं। यह उनका रोज का काम है, और वह गाय बेचारी दिनभर अन्ना पशु बनकर भटकती रहती है। खैर..
मैंने कई बार यहाँ के लोगों से पूर्वांचल के बारे में बताया कि हमारे यहां जौनपुर में गौवंशीय पशुओं के प्रति ऐसी कोई कुप्रथा नहीं है। कोई अपनी गाय चाहे वह दुधारू न भी हों, फिर भी उन्हें पालते हैं, गौ-सेवा करते हैं। मुझे याद है बचपन में यदि कभी हमारे खेत में कोई छुट्टा जानवर फसल को नुकसान पहुँचाता मिलता तो हम उसे गांव के दूसरे छोर पर हाँक आते थे।
इस बार अपने गाँव जाने पर मैंने बुंदेलखंड के अन्नाप्रथा की चर्चा करते हुए जब कहा कि अपने यहाँ ऐसी कोई प्रथा नहीं है और इसीलिए कोई छुट्टा गौवंशीय पशु दिखाई नहीं पड़ता, तो मुझे बताया गया, "अरे ऐसा नहीं है यहाँ भी लोग अब अपने बेकार हुए गौपशुओं को छोड़ देते हैं, जो फसलों को बहुत नुकसान पहुँचाते हैं, इन पशुओं को हाँक कर फला जगह की बाउंड्री में कर दिया जाता है, वहाँ ऐसे ही जब चार-छह पशु इकट्ठे हो जाते हैं तो फिर वहीं से उन पशुओं को बाहर भेज दिया जाता है इसके लिए पांच-छह हजार रुपये वे उठवाने के ले लेते हैं।" मैं सुनकर दंग हो गया था, सोचा यहां का अन्नाप्रथा तो बुंदेलखंड से भी क्रूर है, कम से कम बुंदेलखंड में ऐसा होता तो नहीं दिखाई देता। यहां हांकने, और पशुओं को चोरी से किसी छोटी गाड़ी में पैसों के लालच में भरकर ले जाने देने वाले सभी गौ को माता कहने वाले लोग ही होते हैं।
उस दिन टीवी पर राजस्थान में गौ तस्कर के नाम पर एक हत्या पर परिचर्चा को देखकर सोचा था, कि इस बात को आपसे शेयर करुँगा, उस बेचारे की नाहक ही जान चली गई! लेकिन फिर भूल गया। सुबह गायों को पगुराते देखकर यह बात याद हो आई।
ईवीएम का व्यवहार
सेल्फी
हम काम तो कर रहे हैं!
बुंदेलखंड में फँसे पड़े हैं और इस खंड में गर्मियों के दिनों में विकास विभाग की नौकरी कुछ ज्यादई दौड़-धूप वाली हो जाती है, मतलब यहाँ काम करते हुए दिखना बहुत जरूरी होता है। इधर यहाँ के लोग हैं कि, मतलब जिनके लिए काम करना है, उनकी जैसी यह चिर-मान्यता चली आ रही है कि सरकारें ही सब काम करती हैं, क्योंकि भाई, हम तो फिजिकल समस्या से पीड़ित हैं, हम तो कुछ कर ही नहीं सकते! यहाँ की राजनीति भी इन सब बातों का खूब फायदा उठाती है। यहाँ विकास का पहिया भी उसी तरह से चलने लगता है, कि देखो भाई, हम काम तो कर रहे हैं, अब तुम फायदा न उठा पाओ तो इसमें हमारी क्या गलती?
जैसे सरकार ने यहाँ छोटी, बड़ी, मझोली जैसे कई स्तरों वाली कृषि मंडियाँ खूब बनवाई, अब अगर यहाँ के लोग इसका फायदा न उठा पाएँ तो बेचारी सरकार का क्या दोष..! एक बात है, मैंने इतनी कृषि उत्पादन मंडियाँ उन क्षेत्रों में भी नहीं देखी हैं जिन क्षेत्रों में बम्पर कृषि उत्पादन होता है। मैंने इन मंडियों को देखकर यही अनुमान लगाया हुआ है कि शायद कोई सरकार इन खाली पड़ी और विरानी मंडियों को देखकर पसीजते हुए अब सिंचाई संसाधनों का विकास करेगी, तब जाकर कृषि उत्पादन बढ़ेगा और मंडियों में उपज आएगी। यह तो निश्चित है कि इन मंडियों में उपज आने में अभी लंबा सफर तय करना होगा। लेकिन चिंता है, तब तक कहीं इन मंडियों की दशा इस क्षेत्र में भ्रमण के दौरान देखे गए अच्छे-भले उस हैंडपंप जैसी न हो जाए जिसे एक ग्रामीण ने चबूतरा बना कर ढक दिया था। नीचे हैंडपंप का फोटू दिए दे रहे हैं देख लीजिएगा।
मैं तो कहता हूँ यहाँ बेचारी सरकारें विकास तो करना चाहती हैं लेकिन यहाँ के लोगों की मानसिकता ही खराब होती है। अब पता नहीं क्यों खराब हुई है यह मानसिकता? यह भी एक शोध का विषय है, या मंडियों जैसे विकास कार्यक्रमों का तो इसमें हाथ नहीं? खैर.. हमसे क्या हम तो काम करते हुए दिखना चाहते हैं, भाई यह हमारी रोजी-रोटी का प्रश्न है, नकारा बनने से बेहतर है कुछ काम करके दिखाओ, कृषि मंडी बनाओ, बावजूद इसके कि अभी तक खेतों तक पानी ही नहीं पहुँचा पाए हैं।
हाँ तो मित्रों, इसी देखने दिखाने के चक्कर में कभी-कभी प्रापर नींद नहीं ले पाते तो सुबह का टहलना कैंसिल कर देते हैं। लेकिन कल जब सुबह पाँच बजे टहलने के लिए घर से निकलने लगे तो पहली ही नजर पतझड़ से पत्ती विहीन हुए पीपल के पेड़ की टहनियों के बीच से झाँकते खूबसूरत चाँद पर पड़ी, ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी कैनवास पर कोई खूबसूरत चित्र दिख गया है, मतलब डंठलनुमा डालियों के बीच से यदि चाँद जैसी रोशनी छिटकते हुए दिखाई दे तो देखने वाले को ऐसा दृश्य, खूबसूरत दिखाई देने लगता है। खैर..अपनी पत्तियाँ खो चुके उस पेड़ को यह चमकाता चाँद कितनी खुशी दे पा रहा होगा यह बेचारा वह पीपल का पेड़ ही जाने..!
अब आगे बढ़े तो एक गौ-माता अपने बछड़े के साथ सड़क के किनारे पालिथीन में कुछ तलाश रही थी, इधर मैं भी आज फोटू लेने के मूड में ही निकला था झट से फोटू खींच लिया। इसके आगे बढ़ा तो एक हैंडपंप से पानी भर कर सिर पर एक के ऊपर एक घड़ा रखे जाते एक महिला दिखी, पीतल टाइप का घड़ा रोशनी में खूबसूरत ढंग से चमक रहा था, सोचा इस दृश्य को भी अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लूँ, जेब से मोबाइल निकाल फोटू लेने को ही हुआ था कि अचानक ध्यान आ गया कि ऐसी गलती नहीं करनी है, और अगर कहीं इस फोटू लेने के चक्कर में रोमियो एंड कम्पनी का सदस्य समझ लिया गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे, फिर बिना फोटू लिए धीरे से मोबाइल को जेब में डाल लिया था।
अंत में, चीजें ऐसे ही चलती रहती हैंं..या हम बदल नहीं पाए..किसी खूबसूरती में खो गए....!!!