मंगलवार, 9 जून 2026

बे-खास बातें

आजकल यहां श्रावस्ती में हमरी सुबहचर्या अपने रूटीन-वे पर है, दर‌असल शुक्ला जी सवा पांच बजे से साढ़े पांच के बीच फोन कर देते हैं, उनका फोन सुनते ही आलस को धत् तेरे की कहकर उठना ही पड़ता है। दरअसल उन्हें स्टेडियम में बैडमिंटन खेलना होता है। हम भी साथ में निकल लेते हैं। जबकि पहले मेरी टहलाई सड़क पर ही होती थी। स्टेडियम जाकर पता चला कि यहां से सुबह की बेला खुशनुमा दिखाई देती है। हरी घास का मैदान आंखों को बहुत लुभाता है। यहां आने के बाद जैसे पछतावा-सा हुआ, कि अब तक इस खुशनुमा सुबह से महरूम रहा। 

वैसे स्टेडियम जाकर लौटने में बत्तीस सौ कदम तो हो ही जाते हैं। बाकी बाॅलीबाल भी खेल लेते हैं। यह खेल मैंने कभी नहीं खेला। बचपन में फुटबॉल जरूर खेले हैं। 

खैर पहले तो इस खेल में शामिल होने से मैं हिचका लेकिन जब मुझे खेलने के लिए प्रोत्साहित किया गया तो मैं भी उनके साथ खेलने के लिए तैयार हो गया। कुछ बहुत अच्छा खेलते हैं। तो अब स्टेडियम से घर वापस आने तक सात बज जाते हैं। 

आज के इस लिखे में कोई खास बात नहीं मिलेगी। लेकिन इस लेख को पढ़कर कुछ तो महसूस हुआ होगा! 

#चलते_चलते

खास बातों का ही नहीं, बे-खास चीजें भी महत्वपूर्ण होती हैं। इनमें कोई न कोई गहरा अर्थ छिपा होता है। आज जिनका जन्मदिन पड़ रहा है उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

#सुबहचर्या

(१.८.१९)

रविवार, 7 जून 2026

पोरबंदर और समुद्र का किनारा

 आज सुबह हुई फिर भी नहीं जागा। देर तक सोता रहा। उठा तो घड़ी में सात बज रहे थे। लेकिन वास्तविक समय यही कोई छह पैंतालीस था। दरअसल घड़ी दस-बारह मिनट तेज चलती है। इसे तेज चलने भी देता हूं। बाहर बारिश हो रही है, छत, पत्तों और धरती पर हुई बूँदें कानों में धीमे, सधे हुए संगीत की तरह उतर रही हैं। अभी सावन तो नहीं आया लेकिन यह बारिश सावन की बरसात जैसी ही है।

टहलने का कार्यक्रम स्थगित कर कुर्सी खींचकर दरवाजे पर किया। सुरसुरी-सी ठंडी हवाओं का आनंद लेते हुए मैं टपकती बूंदों को देखने लगा। वे बुलबुले बनाती और अगले ही पल फूट जाती। यहीं बैठे-बैठे मैंने चाय की चुस्कियां लीं और अखबार भी पढ़ता रहा।

पिछले दिनों मैं गुजरात में था, काठियावाड़ क्षेत्र में तो पानी ही नहीं बरसता। पत्नी ने कहा था, 'पानी नहीं बरसता तो क्या हुआ, यहां समुद्र तो है! शायद लोग यही देखकर खुश हो लेते होंगे।' खैर, उन्होंने यह बातें मजाक के अंदाज में ही कहा था गई थी। लेकिन वाकई, कुदरत का अपना भी एक अंदाज होता है। जब तक समुद्र बूंद न बनकर बरसे उसके पानी का क्या आनंद? समुद्र की विराटता से ज्यादा आनंद बारिश की इन नन्हीं बूंदों में है! विराट तो हमारा यह अनंत ब्रह्मांड भी है, लेकिन जीवन इस नन्हीं-सी धरती पर ही है!!

पोरबंदर पहुंचते ही मन में गांधी जी के जन्मस्थान को देखने की इच्छा जाग उठी। हमने अपनी इनोवा उसी दिशा में मुड़वा ली। बचपन में छह या सात पढ़ता था, जब पहली बार महात्मा गांधी की जीवनी पढ़ी। तभी से पोरबंदर नाम से परिचित हूँ, आज संयोग देखिए कि उसी पोरबंदर शहर की गलियों में खड़ा था। 

पोरबंदर शहर के एक पुराने, साफ-सुथरे मुहल्ले में वह घर था, जहां महात्मा गाँधी का जन्म हुआ था। उस घर को देख लेने के बाद हम लोग पोरबंदर के समुद्री किनारे पर आए! यहां समुद्र की लगातार उठती-गिरती लहरें थीं, उन लहरों का आनंद लिया। 

मैंने देखा एक कामगार जैसा आदमी, समुद्र की ओर मुंह किए अकेला बैठा था। वह हरहराकर उठती-गिरती लहरों को ऐसी तल्लीनता से निहार रहा था, जैसे ध्यानमग्न अवस्था में बैठा समुद्र से संवाद कर रहा हो। 

उसका वह दार्शनिक-सा अंदाज मुझे हिंदी फिल्मों के उन नायक की याद दिला गया, जो समुद्र किनारे बैठ अपने भीतर की उथल-पुथल को उठती-गिरती लहरों में टटोलते दिखाई देते हैं। मैंने उससे कुछ बातें की, कि कहीं वह कोई सिरफिरा आदमी तो नहीं। लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला। उसने सामने की ओर इशारा करते हुए नेवी का स्टेशन और पोरबंदर के बंदरगाह को दिखाया। मुझे लगा जहाजों और किनारों के साथ लहरों से उसकी आत्मीयता है। खैर..

पोरबंदर से हम लोग सोमनाथ की ओर चल पड़े थे।

#चलते_चलते

        वाकई! आदमी की महत्वाकांक्षाओं को भी किनारा चाहिए। अन्यथा, उफनकर सिमटना भी होता है, वह समझ भी नहीं पाएगा।

#सुबहचर्या

(२४.७.१९)

शनिवार, 9 मई 2026

विचारों का मैन्यूप्युलेशन

       प्रातःकालीन परिदृश्य जैसे कुछ कह रहा होता है। इसे समझने के लिए मन का खाली और बेलाग होना जरूरी है। और सुबह-सुबह मन कुछ ऐसा ही होता है। इसीलिए सुबहचर्या में मैं दुनियाँ से टकराता हूँ। संवेदित हो उठता हूँ, नवीन विचार प्रस्फुटित होते हैं, लिखास जागती है, और इसे फेसबुक पर अभिव्यक्त करता हूँ। 

       लेकिन कभी-कभी मन 'स्टैग्नेशन' जैसी विरामावस्था में आ जाता है। न कुछ सोच पाता है और न कुछ समझता है। ऐसा मन तब जीवन में रमा हुआ-सा होता है, विचार स्वत:स्फूर्त नहीं होते बल्कि विचारों को ‘मैन्यूप्युलेट’ करना होता है। यदि विचार मैन्यूप्युलेट हों तो इससे स्वाभाविक लेखन नहीं हो पाता। क्योंकि तब पाठक को मात्र प्रभावित करने की इच्छा होती है न! 

       दूसरी स्थिति यह भी बन सकती है विचार सृजन के लिए जब मन को अंतस की दुनियाँ में ढकेलता हूँ, तो वहाँ की दुनिया भी भाव-अभाव से मुक्त मिलती है.. विचार रूखे ही रह जाते हैं! या विचार नहीं निकलते।

          अरे हाँ..! क्या किसी "साहित्य" का सृजन विचारों या कल्पनाओं को बिना "मैन्यूप्युलेट" किए हुए लिखा जा सकता है… और लिख भी दिया गया तो क्या उस लिखे में, उस विषय की आत्मा भी प्रतिष्ठित होती है? मैं मानता हूँ नहीं, क्योंकि संवेदना को कभी "मैन्यूप्युलेट" नहीं किया जा सकता.. हाँ अभिव्यक्ति को तो किया जा सकता है! मतलब सुंदर मूर्तियां तो गढ़ी जा सकती है लेकिन बिना संवेदना के इन मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकती! बिना संवेदना की आंच के शब्द और वाक्य केवल बेजान मूर्तियां ही गढ़ते हैं, और पाठक भी इसे वैसे ही विसर्जित कर देता है।

         आजकल लोग अपनी लिखास मिटा रहे हैं लेखक बन रहे हैं; लेखकों के लिए ही लिख रहे हैं, और लेखकों का लिखा लेखक ही समझ रहे हैं या फिर स्वयं ही अपना लिखा समझते होंगे । 

      मेरी पत्नी मुझे पढ़कर अकसर यही कहती हैं, "तुम्हीं लिखो तुम्हीं समझो या फिर कोई लेखक ही तुम्हारा लिखा समझता होगा।" मैं पत्नी को कभी-कभी अपना पाठक मान लेने के भ्रम में होता हूँ लेकिन इस कथन के बाद यह भ्रम भी जाता रहा..

         आज सुबह टहलने का मन हो आया था, लेकिन ध्यान हो आया कि जूता अभी सूखा ही नहीं है और हवाई चप्पल में ठंड लगती। असल में दो दिन पहले जूता धुल दिया था। वैसे इस समय अन्य क्षेत्रों में मौसम खुश्क हो चुका होगा लेकिन तराई जैसे क्षेत्र में शायद आर्द्रता बनी रहती है, वैसे भी भिनगा में जंगल होने से यहाँ आर्द्रता की मात्रा कुछ ज्यादा ही है। इसीलिए कपड़े वगैरह दिनभर में भी नहीं सूखते, जूता तो खैर कैनवास का है ही। 

       लेकिन आज Morning walk की इच्छा बलवती हो चुकी थी और गीले जूते को पाँव में डाल कर निकल लिया। कुछ देर के बाद अचानक जूते पर ध्यान गया। देखा, जूते के कैनवास के ऊपर साबुन का झाग निकलकर फैल चुका है। शायद यह ठीक से नहीं धुल पाया था! खैर चलतेे हुए इस झाग को हटाने की कोशिश भी करता रहा। क्योंकि यह कुछ अजीब लगता था! 

        यूँ ही चलते-चलते एक कार्यक्रम में नारी सशक्तिकरण पर दिया अपना भाषण याद आया! भाषण स्वभाविक नहीं, बल्कि इसपर अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर बोल रहा था। कि सामने बैठे लोग मेरे भाषण से प्रभावित हो जाएं! श्रोता के रूप में सामने स्त्रियाँ ही थी, मंच पर केवल और केवल पुरूष थे। मतलब उस भाषण में मेरी ‘आत्मा’ नहीं बोल रही थी।

      खैर टहल कर लौटा तो उसी तरह से चाय बनाया और अखबार पढ़ा। अखबार में "असली नारी सशक्तिकरण" पर कोई संपादकीय था, लेकिन नहीं पढ़ा। पढ़ा इसलिए नहीं कि वही घिसी-पिटी बातें, इन बातों को क्या पढ़ना! वैसे पर इस विषय पर घिसी-पिटी बातें ही की जाती हैं!

       इस सुबहचर्या को अभी रात में लिख रहा हूँ, तो दिन में एक और अखबार में एक लेख पढ़ लिया था उस लेख में एक हृदयविदारक घटना का जिक्र था, दिल्ली जैसे शहर में एक पढ़े-लिखे परिवार में एक दादी अपनी पोती को पानी की टंकी में इसलि विचारों का मैन्यूप्युलेशन  ए डुबोकर मार डालती है, क्योंकि वह पहले बच्चे के रूप में पोता चाहती थी। वहीं किसी दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में बी ए की पढ़ाई पूरी करने की इच्छा रखने वाली बहू को कोई सास उसे ही सुनाकर कहती है "बड़ी आई हो अंगर्रा-बीयर्रा करने"। 

      तो इन भाषणों से क्या होने वाला? 

     और यहां मैं सुबह की बातें रात में लिखने के लिए अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर रहा हूँ...

  #चलते_चलते

       "मैन्यूप्युलेशन" उतना बुरा नहीं होता जितना मैं इसे बता रहा हूँ..शरीर को प्रकृति ने "मैन्यूप्युलेट" किया हुआ है, लेकिन इसमें आत्मा डालकर!! तो यह मैन्यूप्युलेशन भी कलात्मक पुनर्सृजन है!

        #सुबहचर्या 

        (22.11.18)

बुधवार, 30 मार्च 2022

बदलता भारत

       अभी हाल ही में टीवी पर मैं भारत में प्रस्तावित और निर्माणाधीन आर्थिक गलियारे पर एक रिपोर्ट देख रहा था। इसे देखते हुए मैंने भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप और विश्व में उसकी आर्थिक हैसियत की कल्पना कर रहा था। यहां इस आर्थिक गलियारे की चर्चा हम बाद में करेंगे पहले प्रधानमंत्री मोदी के 2019 में देखे उस विजन की बात करते हैं, जिसमें उन्होंने 2024-25 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर और विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की कल्पना की थी। लेकिन लगता है इसकी तैयारी उन्होंने 1 जनवरी 2015 से ही नीति आयोग (National Institution For Transforming) के गठन के साथ ही प्रारंभ कर दिया था। क्योंकि बदलते वैश्विक अर्थव्यवस्था में योजना आयोग की भूमिका कम हो रही थी। अब आवश्यकता एक ऐसे थिंक टैंक की थी जो मानव विकास के विभिन्न आयामों के साथ एक स्थिर विकास की आकांक्षा को पूरा करने के लिए नवीन अवधारणात्मक दृष्टिकोण देने के साथ उसे क्रियान्वित भी करा सके। नीति आयोग ने अपने गठन के साथ ही इसपर काम करना आरंभ कर दिया था। नीति आयोग का उद्देश्य राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं को तय करने के साथ ही वंचित समाज के कमजोर वर्गों पर विशेष ध्यान देने का था। इसके लिए आवश्यक था कि दीर्घावधि के लिए नीति तथा कार्यक्रम विकसित करने के साथ साथ एक न्यायसंगत विकास का ढांचा खड़ा करने पर काम किया जा‌ए। इस प्रकार नीति आयोग ने बदलते समय के अनुसार भारत के विकास एजेंडा का कायांतरण करने की भूमिका में आया।

        भारत के कायांतरण के लिए तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था से तालमेल और प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए आधारभूत ढांचे के विकास के साथ रोजगार के अवसर बढ़ाने और विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अनुकूल औद्योगिक वातावरण तैयार किए जाने की आवश्यकता थी। इसके लिए आर्थिक गलियारा निर्माण की नीति अपनाई गई है। इस नीति के क्रियान्वयन से भविष्य में भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने और समग्र विकास का रास्ता प्रशस्त होगा तथा इससे कौशल विकास, रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ ही साथ औद्योगिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। 

       विश्व के कुछ प्रमुख औद्योगिक गलियारों पर यदि दृष्टि दौड़ाएं तो आर्थिक रूप से समृद्ध देशों में उनकी अर्थव्यवस्था में आर्थिक गलियारे का महत्वपूर्ण योगदान है। जैसे अमेरिका में 500 मील का बोस्टन-वाशिंगटन आर्थिक गलियारा दुनिया का सबसे लोकप्रिय आर्थिक गलियारा है। अकेले इस कॉरिडोर से कुल 3.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक उत्पादन होता है, जो जर्मनी के सकल घरेलू उत्पाद और संयुक्त राज्य अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद के 19-20% के बराबर है। यहां तक ​​​​कि संयुक्त राज्य अमेरिका में इस तरह के सबसे छोटे गलियारों में, 29-मील डेनवर-बोल्डर औद्योगिक गलियारा, आर्थिक उत्पादन में 256 बिलियन डॉलर का उत्पादन करता है। आज 13.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के आर्थिक उत्पादन पर, संयुक्त राज्य अमेरिका में बारह औद्योगिक गलियारे चीन के सकल घरेलू उत्पाद का 86.8% हिस्सा हैं। इसी तरह जापान में ओसाका और टोक्यो को जोड़ने वाला 1,200 किलोमीटर का कॉरिडोर अकेले जापान के सकल घरेलू उत्पाद का 80% हिस्सा है।

        कहा जाता है कि अर्थव्यवस्था में हर मील का पत्थर अतीत से उपजता है, अर्थात पूर्व की आर्थिक नीतियों की नींव पर बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। भारत में औद्योगिक गलियारे की पृष्ठभूमि वर्ष 2007 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारा परियोजना की स्वीकृति के साथ ही पड़ गई थी और यह परियोजना 2011 में प्रारभ हुई। लेकिन इस क्षेत्र में तेजी तब आई जब इसे एक नीतिगत विषय मानकर वर्ष 2016 में "राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा कार्यक्रम" के रूप में एक व्यापक योजना पर कार्य शुरू हुआ। औद्योगिक आर्थिक गलियारा एक आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र है जो परिवहन गलियारे के चारों ओर विकसित किया जाता है। इसके पीछे निवेश आकर्षित कर रोजगार के अवसर सृजित करना, सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र के योगदान को बढ़ाना, समान औद्योगिकीकरण और शहरीकरण को बढ़ावा देना तथा श्रम उत्पादकता और आय के स्तर में वृद्धि जैसे उद्देश्य थे। निश्चित रूप से, आर्थिक गलियारों के पूर्ण होने पर भारत में औद्योगीकरण और नियोजित शहरीकरण के साथ समावेशी विकास को बढ़ावा मिलेगा।  

          वर्तमान में, 11 औद्योगिक गलियारा परियोजनाएं हैं जिनमें से भारत सरकार ने पाँच औद्योगिक गलियारा परियोजनाओं के विकास को मंज़ूरी दे दी है, जिन्हें राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास और कार्यान्वयन ट्रस्ट (National Industrial Corridor Development and Implementation Trust- NICDIT) के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है। भारत के प्रमुख आर्थिक केंद्रों को जोड़ने वाले ये पांच प्रमुख आर्थिक गलियारे हैं, 1. दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारा (डीएमआईसी 1504 किमी),। 2. चेन्नई बेंगलुरु औद्योगिक गलियारा (सीबीआईसी 560 किमी), 3. बेंगलुरु-मुंब‌ई आर्थिक गलियारा (1000 किमी), 4. विजाग- चेन्नई आर्थिक गलियारा (800 किमी), 5.अमृतसर कोलकाता औद्योगिक गलियारा (एकेआईसी 1839 किमी)। इन पर "राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा कार्यक्रम" योजना के रूप में समग्र स्वीकृत कोष 20,084 करोड़ में रु में से अब तक 6,115 करोड़ का उपयोग किया जा चुका है और इसके अतिरिक्त अन्य प्रस्तावित परियोजनाओं, हैदराबाद नागपुर औद्योगिक गलियारा (एचएनआईसी), हैदराबाद-बेंगलूरू औद्योगिक गलियारा, ओडिशा इकोनॉमिक कॉरिडोर,  दिल्ली नागपुर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर को स्वीकृति प्रदान की गई है।

         यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है, वर्तमान में उद्योगों और रोजगार के अवसर का संकेंन्द्रण कुछ विशेष क्षेत्रों या शहरों तक ही सीमित है तथा श्रमिक पलायन करने के लिए बाध्य होते हैं। लेकिन औद्योगिक कोरीडोर के पूर्ण और विकसित हो जाने पर देश के पिछड़े क्षेत्रों में भी विकास के साथ रोजगार के अवसर सृजित होंगे। इस प्रकार देश के आर्थिक प्रगति में क्षेत्रीय असमानता दूर होगी तथा भारत के सकल घरेलू उत्पाद में तेजी के साथ उछाल आएगा। आज कोविड काल जैसी विपरीत परिस्थितियों के बाद भी इसका अनुमान 8.3 प्रतिशत लगाया गया है, जो देश के आर्थिक विकास के लिए एक शुभ संकेत भी। लेकिन यहां हम यह भी कह सकते हैं कि आज भारत जी डी पी चाहे जो हो, यदि देश में आर्थिक गलियारे विकसित हो जाते हैं तो भारत की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर से भी कहीं अधिक बड़ी होगी।  
         
        किसी भी राष्ट्र को एक बड़ी अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए, कृषि सुधार, भूमि और श्रम सुधार, रोजगार के अवसर और कौशल विकास के लिए रोड मैप बनाए जाने की भी आवश्यकता होती है। नीति आयोग इस एजेंडे पर रणनीति के साथ काम कर रहा है और ऐसा लगता है कि भारत एक ऊँची अर्थव्यवस्था में छलांग लगाने के लिए तैयार बैठा है। भारत के विमुद्रीकरण (नोटबंदी) की हम चाहे जितनी आलोचना करें लेकिन इसके बाद देश लगभग 1 अरब डेबिट/क्रेडिट कार्ड, 2.25 अरब पीपीआई (प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स) और कई नए पेमेंट मोड के साथ सबसे बड़े और तेजी से बढ़ते डिजिटल पेमेंट बाजार में से एक होने वाला है। मोबाइल से दुकानों में पेमेंट करने के मामले में भारत 20.2 फीसदी के साथ दुनियां में छठे स्थान पर है जबकि अमेरिका सातवें नंबर पर है। यह हमारे कौशल विकास की एक बानगी भर है। 
      
        उस दिन संसद टी वी पर भारत में प्रस्तावित और निर्माणाधीन आर्थिक गलियारे पर डाक्यूमेंट्री देखकर मैं बदलते भारत के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त हो गया था। अंत में एक बात और कहना चाहता हूं, जातिवादी और साम्प्रदायिक शक्तियां अकसर आर्थिक रूप से विपन्न और कमजोर वर्गों का सहारा लेकर ही आगे बढ़ती है। लेकिन भविष्य में, देश में जिस आर्थिक वातावरण का सृजन होने जा रहा है, निश्चित ही ऐसी शक्तियों की धार कुंद होगी तथा आगे चलकर ऐसी विचारधाराएं औचित्यहीन हो जाएंगी।

              (इस लेख के कुछ अंश गूगल से प्राप्त जानकारी के आधार पर है)

मंगलवार, 15 मार्च 2022

अब 'फार्च्यूनर' की नहीं, आम आदमी की राजनीति

              10 मार्च की तारीख थी, पांच राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव परिणाम आ रहे थे। मैं गौर से इन परिणामों का अध्ययन कर रहा था। हालांकि ये परिणाम कुछ-कुछ वैसे ही थे, जैसा कि मैंने अपने कुछ साथियों से हुई निजी बातचीत में अनुमान लगाया था और ये मेरे लिए अप्रत्याशित नहीं थे। लेकिन इन परिणामों में छिपी हुई कुछ बातें ऐसी थी जो बरबस मेरा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। लगभग उन्हीं बातों को अरविंद केजरीवाल जी ने उसी दिन मतदाताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपने संबोधन में कहा था। मैंने उनका पूरा भाषण ध्यान से सुना। उन्होंने उस संबोधन में एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर रेखांकित किया, जैसे कि पंजाब में जिन बड़े दिग्गजों की हार हुई है, उन्हें हराने वाले एकदम से आम आदमी थे। इसके बाद शाम को मैंने प्रधानमंत्री जी का दिल्ली के पार्टी कार्यालय में हुए संबोधन को सुना।

            अपने इस संबोधन में प्रधानमंत्री जी ने दो महत्वपूर्ण तथ्य की ओर इंगित किया। प्रथमत: उन्होंने भ्रष्टाचार और उसकी जांचों को लेकर बहुत कुछ कहा। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जांचों को राजनीतिक रंग देने वाले या इसे भेदभावपूर्ण बताने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों पर तंज कसा। वहीं दूसरी ओर उन्होंने देश से परिवारवादी राजनीति का अंत होने जा रहा है, की बात कही।  प्रधानमंत्री जी की इन दो बातों पर मेरा ध्यान विशेष रूप से गया, ये बातें बेहद महत्वपूर्ण थी और जो उनकी आगे की राजनीतिक रणनीति की ओर संकेत भी दे रही थी। मुझे प्रधानमंत्री जी का उक्त संबोधन प्रकारांतर से केजरीवाल जी के पूर्व के संबोधन का ही विस्तार जान पड़ा। वहां केजरीवाल जी आम आदमी के जीतने की बात कर रहे थे और यहां प्रधानमंत्री जी परिवारवाद के अंत की बात कर रहे थे। उनके इस भाषण को सुनकर ऐसा लगा जैसे पंजाब के चुनाव परिणामों में मिली आम आदमी पार्टी की सफलता से भविष्य में मिलने जा रही चुनौतियों का उन्हें अहसास हो गया होगा। 

          खैर, मैंने इन चुनाव परिणामों में जीत कर आ रहे उम्मीदवारों पर गौर किया। इनमें से ज्यादातर साधारण "नाक-नक्श" वाले और सामान्य पृष्ठभूमि के प्रतीत हुए और जिनमें "इलीट" वर्ग का होने का लक्षण नहीं दिखाई दे रहा था। जब किसी राजनीतिक दल से ऐसे उम्मीदवार जीतते हैं, तो इससे उस दल की सर्वस्वीकार्यता और उसके साथ जुड़ी जनता की आकांक्षा का भी आभास होता है। भारत जैसे देश में जब किसी राजनीतिक दल में "कुलीन वर्ग" और "कुलीन चेहरों" की बहुतायत होने लगती है तो ऐसे दल का पतन भी प्रारंभ होना शुरू हो जाता है। यह "कुलीन वर्ग" और "कुलीन चेहरे" परिवारवाद का भी एक लक्षण है। प्रधानमंत्री जी ने अपने उस संबोधन में अप्रत्यक्षत: इसी के अंत होने की ओर संकेत किया था। इस संदेश में यह बात भी छिपा था कि राजनीतिक दलों के लिए अब यह महत्वपूर्ण हो चला है कि "जनप्रतिनिधित्व" जैसे गुण को किसी "परिवार की बपौती" भी न बनने दें। 

          एक बात तय है जब कानून का शासन होता है, तो आम जनता अपना त्राण सरकार की व्यवस्था में ही खोजती है। इस परिस्थिति में "राबिनहुडीय" छवि वाले नेताओं, परिवारों और माफियाओं का वर्चस्व धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है, क्योंकि आम जनता अपनी समस्याओं को लेकर किसी विधायक या अपने क्षेत्र के माफिया के पास जाना पसंद नहीं करती, बल्कि सीधे सरकार के अंगों, नीतियों से अपनी समस्याओं को सुलझाने की अपेक्षा करती है‌। इसीलिए जो राजनीतिक दल साफ-सुथरे और स्वच्छ प्रशासन देने का विश्वास जनता में जगा देते हैं, जनता उनकी ओर अवश्य आकर्षित होती है। पंजाब में आम आदमी पार्टी का सत्ता में आना और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार का पुनः पदस्थापित होना इसी बात का प्रमाण है। यहां इस ओर भी ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि सुशासन में विधायकों की भूमिका मात्र कानून बनाने तक ही सीमित रह जाती है, उनके लिए प्रशासन में हस्तक्षेप करने का अवसर नहीं होता है। अतः ऐसे किसी सुशासन देने वाली सरकार में "जनप्रतिनिधियों" की न सुनी जाने वाली जैसी शिकायतें या बातों का कोई महत्त्व नहीं होता। दरअसल विधायकों या जनप्रतिनिधियों का महत्व उन्हीं सरकारों में ज्यादा होता है जो सरकारें स्वच्छ और कानून का शासन स्थापित कर पाने में असफल रहती हैं। 

        इन विधानसभाओं के चुनाव परिणामों से भविष्य में देश की राजनीति की दिशा क्या होगी, इसका भी संकेत मिलता है। लोकतंत्र जब कानून और जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में सफल होता दिखाई पड़े तो शायद उसी को जीवंत लोकतंत्र कहा जा सकता है। तो देश में भावी राजनीति इसी जीवंत लोकतंत्र की ओर जाते हुए दिखाई दे रहा है, और आम जनता भी इसके लिए जैसे पलक पांवड़े बिछाए हुए है। जिसमें अब जाति, धर्म और चुनाव जिताने की गणित जैसी बातें बेमानी होने जा रहीं हैं।

          लेकिन जनता की इन आकांक्षाओं के बीच सफल हुए राजनीतिक दलों को और भी सजग और सावधान रहना होगा। यह जनता है जो कि सब जानती है। क्योंकि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और कानून के शासन का सबसे ज्यादा प्रभाव कमजोर वर्गों पर ही पड़ता है। इस व्यवस्था में ही उन्हें सम्मान और सुरक्षा का अहसास होता है । ऐसी व्यवस्था देने में जो राजनीतिक दल जितना सफल होगा सत्ता भी उसके उतने ही करीब होगी और अब जनप्रतिनिधियों की 'फार्च्यूनर' वाली राजनीति सफल नहीं होने जा रही।
                            *****

रविवार, 30 जनवरी 2022

गांधी-मुद्रा पर कंन्फ्यूजन

सुबह-सुबह मुझे गांधी जी की पुण्यतिथि की याद आ गई, जो आज है। सुबह की टहलाई भूलकर मैं गांधी जी पर फोकस हो चुका था। सोच रहा था कि युग बदल रहा है, व्यक्ति की मान्यताएं और धारणाएं बदल रही हैं। लेकिन इधर बेचारे गांधी जी को लेकर बड़ा कंन्फ्यूजन उत्पन्न हो रहा है। पहले ये महात्मा हुए फिर राष्ट्रपिता हुए और जैसे-जैसे राजनीति परवान चढ़ी तो अवतार यानि कि ऊपरवाले की श्रेणी में भी आते ग‌ए। और इस श्रेणी में आते ही इन्हें लेकर विवाद होना शुरू हो गया। यह सही बात है कि ऊपरवाले को लेकर धरती पर और खासकर अपने देश में तो बहुत ही चकल्लस है! इन्हें रिलिजन, पंथ या मजहबी खांचे में फिट करके लोग खूब मेरा-तेरा करते हैं, पता नहीं इससे इनकी भद् पिटती है या रक्षा होती है यह तो वही जानें! लेकिन तेरा-मेरा करने वाले लोग अपने-अपने रसिकों के बीच खूब यश लूटते हैं और लोकतंत्र को परवान चढ़ाते हैं। वैसे तर्क करने के अधिकार का नाम ही लोकतंत्र है और कहते हैं कि तर्क से रौशन-ख़याली बढ़ती है, जिससे व्यक्ति का आत्मिक विकास होता है। लेकिन इस्मत चुगताई ने देश में बढ़ते रौशन-ख़याली को लेकर यह भी लिखा है "जितनी-जितनी मुल्क में रौशन-ख़याली बढ़ती जा रही थी, लोग शिद्दत से फ़िर्क़ापरस्त होते जा रहे थे।" तो क्या लोकतंत्र में फ़िर्कापरस्ती बढ़ती है? शायद बढ़ती भी हो, क्योंकि लोकतंत्र में आप्तवाक्यों का खूब चलन है। जितने प्रकार के महापुरुष हुए हैं उतने ही प्रकार के नेता हो ग‌ए हैं! तथा उतने ही प्रकार के आप्तवाक्यों के खांचे बनाकर लोकतंत्र को विकेंद्रित कर देश में लोकतंत्र को समृद्ध करने का कार्यक्रम चालू है! अब भला आप्तवाक्यों पर कोई तर्क कर सकता है, नहीं न। यही तर्कातीत होना ही तो फ़िर्कापरस्ती है।


         लेकिन मैं फ़िर्कापरस्ती की ज़हमत में नहीं पड़ना चाहता। मेरा कंन्फ्यूजन इस बात पर है कि गांधी जी की कौन सी मुद्रा स्वीकार करूं कि किसी विवाद में पड़े बिना इनका अनुयायी बनकर मैं भी देश के लोकतंत्र को समृद्ध कर इसके मजे ले सकूं! वैसे स्वतंत्रता के बाद महात्मा या राष्ट्रपिता वाली गांधी-मुद्रा का अब कोई अर्थ नहीं, इस रूप में ये महोदय अपनी सेवा समाप्त कर चुके हैं और खाली-पीली इनकी ऐसी अराधना से कोई लाभ भी नहीं, उल्टे लोग फ़िरकी भी ले सकते हैं कि देखो बड़ा गांधीवादी बना फिर रहा है! इस प्रकार इसमें लाभ की बजाय हानि ही ज्यादा है। रही बात गांधी के ऊपरवाले स्वरूप की तो इसमें भी फायदा नहीं! वैसे भी अपने देश में भगवान की वैरायटियों में क्या कोई कमी है, यहां तो प्रत्येक टाइप के संकट दूर करने वाले भगवान विराजमान हैं, यदि इनसे संकट दूर हो रहा होता तो यह देश संकट-मुक्त ही होता! वैसे आधुनिक युग में नाइंटी नाइन पर्सेंट संकटों को पैसे से दूर किया जा सकता है। इसलिए पैसे को खुदा मान लेने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन यदि किसी चीज को खुदा मान लेने से कोई साम्प्रदायिक समस्या उत्पन्न होती है तो फिर यह बात तो मानी ही जा सकती है कि पैसा खुदा भले ही न हो, लेकिन संकट दूर करने में खुदा से कम भी नहीं। इस प्रकार मैं समझता हूं कि पैसे हों तो आदमी हंड्रेड परसेंट संकट से मुक्त हो सकता है। शायद यही कारण है कि आज के युग में पैसे का ही बोलबाला है, लोग गांधी पकड़ा कर काम निकलवाने की बात खुलेआम कहते सुने जाते हैं। शायद संकटों के दृष्टिगत ही चारों ओर केवल गांधी पकड़ाई का ही कार्यक्रम चलन में है।


        अरे वाह! वाकई में गांधी के सब रूपों से बढ़कर यह गांधी-मुद्रा ही तो है जो संकट में ऊपरवाले से भी बढ़कर मदद करती है! और यही गांधी-मुद्रा है जो सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक, सर्वस्वीकार्य है और जिसकी धर्मनिरपेक्षता निर्विवादित रूप से सिद्ध है! बस मुझे समझ आ गया कि इस गांधी-मुद्रा को स्वीकार करने में कोई हीलाहवाली नहीं करनी चाहिए!! बल्कि अपने ऊपर आने वाले संकट की मात्रा और उसके प्रकार की कल्पना कर इस गांधी-मुद्रा को सम्मान के साथ खांचों में संरक्षित करते जाना चाहिए! चाहे इसके लिए घर में बेसमेंट के साथ उसकी दीवारों, आलमारियों में ऐसे गोपनीय खांचे ही क्यों न बनवाने पड़े!! भला इससे बढ़कर गांधी जी के सम्मान और संकट से अपनी रक्षा करने का कोई दूसरा उपाय हो सकता है, नहीं न? 


      तो, जब अकर्मण्य और चुक चुके लोग हाल ही में एक व्यापारी के घर से बरामद बेशुमार गांधी-मुद्रा का उदाहरण देकर और उसके जेल की हवा खाने की बात बताकर कहें कि गांधी का ऐसा सम्मान करने में भी आफत है, तो उसकी बात हवा में उड़ाकर उसपर कान न धरा जाए! क्योंकि उसकी बातें राजनीति से प्रेरित हो सकती है, ऐसा राजनीतिपरस्त व्यक्ति आप और देश के लोकतंत्र, दोनों को हानि पहुंचाना चाहता है।


          इस निष्कर्ष की प्राप्ति के साथ आज की सुबह मुझे बेहद मानसिक शांति की अनुभूति हो रही है। बाहर हॉकर के द्वारा अखबार फेंके जाने की आवाज आई है। अखबार उठाने चल रहा हूं। #चलते_चलते मुझे गांधी के मान पर एक बात याद आई। गांधी के आग्रह पर एक बार गोपाल कृष्ण गोखले दक्षिण अफ्रीका ग‌ए। वहां से लौटते समय उन्होंने गांधी जी को समझाया था कि 'देखो, हम सब बूढ़े हो रहे हैं। हम लोगों का क्या ठिकाना, कब पके आम की तरह झर जाएं। तुम्हारी अपनी मातृभूमि के प्रति भी उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी यहाँ बसे भारतीय भाइयों के प्रति‌। देशभक्ति का किसी भी दूसरी भक्ति से कोई मुकाबला नहीं।... यह एक ऐसी लकीर है जो एक बार खिंच गई तो मृत्यु भी हार जाती है पर वह नहीं मिटती।' इसके बाद गांधी से बोले, 'मैं तुम्हारा इंतज़ार करुंगा। देश को तुम्हें सौंपे बिना नहीं मरुंगा।' और गांधी जी भारत लौटे भी थे। बाकी इतिहास आपको भी पता है, इससे सिद्ध होता है कि गांधी जी इस देश की गुलामी का संकट दूर करने के काम आए थे। इससे यह भी सिद्ध है कि गांधी जी संकट के समय काम आते हैं। 

गुरुवार, 26 अगस्त 2021

स्वप्निल इंटरव्यू

इंटरव्यूकर्ता - जी, आप लेखक हो?

मैं - जी नहीं, मैं लेखक नहीं हूं।

इंटरव्यूकर्ता - लेकिन आप लिखते तो हो!

मैं - हां लिखता तो हूं।

इंटरव्यूकर्ता - तो आप कैसे लेखक नहीं हुए?

मैं - हां मैं वैसे ही लेखक नहीं हुआ।

इंटरव्यूकर्ता - वैसे ही कैसे?

मैं - ऐसे कि, वैसे मैं लिखने के लिए नहीं लिखता।

इंटरव्यूकर्ता - ऐसे कैसे हो सकता है? साहित्य तो लिखने के लिए लिखने से ही बनता है! 

मैं - तो मैं साहित्य कहां रच रहा हूं!  

इंटरव्यूकर्ता - तो क्या रच रहे हैं आप?

मैं - अरे भाई मैं अपना सुख रच रहा हूँ

इंटरव्यूकर्ता - वह कैसे?

मैं - ऐसे कि लिखने से मुझे सुखनुभूति होती है।

इंटरव्यूकर्ता - ओह! तो आप स्वान्त:सुखाय टाइप के रचनाकार हैं?

मैं - जी आपने सही पकड़ा!

इंटरव्यूकर्ता - फिर तो आप साहित्य के साथ अन्याय कर रहे हैं। ऐसे कि आप केवल अपने लिए लिखते हो और पाठक को उपेक्षित करते हो जबकि लेखक को पाठक की दरकार होती है, इस पर आप क्या कहेंगे?

मैं - वैसे आज पाठक की जरूरत ही कहां है, फेसबुक पर नहीं हैं क्या आप? क्या आप मानते हैं कि जो लिखने के लिए लिख रहे हैं, वे पाठक को दृष्टि में रखकर लिख रहे हैं? बल्कि वे इसलिए लिख रहे हैं कि वे बता सकें कि उन्होंने यह लिखा है या वह लिखा है या फिर वे लेखक हैं, यह बताने के लिए लिखते हैं।

इंटरव्यूकर्ता - आप उल्टा हमसे प्रश्न क्यों कर रहे हैं, इंटरव्यूकर्ता मैं हूं कि आप? 

मैं - आप ही हैं, लेकिन क्या आप गारंटी देते हैं कि लिखने के लिए लिखने वाले के पाठक होंगे ही?

इंटरव्यूकर्ता - क्यों नहीं होंगे, जरूर होंगे, अरे जब लिखा जा रहा है तो पढ़ा भी जा रहा होगा.. इसमें गारंटी देने की कौन सी बात है।

मैं - देखिए इंटरव्यूकर्ता महोदय! इसमें होगा..होंगे की बात नहीं है, फुल गारंटी देने की बात है! आप देते हो तो कहो हाँ और नहीं तो कहो नहीं!!

इंटरव्यूकर्ता - देखिए, गारंटी तो किसी बात की नहीं दी जा सकती।

मैं - लेकिन मैं दे सकता हूं! और वह भी डंके की चोट पर!!

इंटरव्यूकर्ता - क्या दे सकते हैं आप???

मैं - यही कि लिखने के लिए लिखने वाले का पाठक हो या न हो, लेकिन स्वान्त:सुखाय के लिए लिखने वाले का पाठक जरूर होता है!!

इंटरव्यूकर्ता - वाह महोदय! अपने मुंह मियां मिट्ठू मत बनिए! और यदि ऐसा है तो वह कैसे?

मैं - अरे महोदय, यह तो स्वत:सिद्ध है कि जब मैं स्वान्त:सुखाय के लिए लिख रहा हूं तो जरूर इस सुख की प्राप्ति के लिए मैं अपनी रचना छपवाता हूं, इस छपे को देखता हूं और इसे पढ़ता भी हूं! इसीलिए पहले ही मैंने कहा दिया है कि मैं अपने लिए सुख रचता हूं, साहित्य नहीं!!

इंटरव्यूकर्ता - अच्छा..इसका तात्पर्य यह है कि आप महान साहित्यकार बनने की दौड़ में शामिल नहीं हैं?

मैं - देखिए! यह दौड़-औड़ की बात मैं नहीं जानता, यह आपका मत हो सकता है मेरा नहीं। कौन महान बनेगा कौन नहीं यह भी भविष्य के गर्त में है।

इंटरव्यूकर्ता - आपके कहने का आशय है कि आप भविष्य में महानता की श्रेणी में जा सकते हैं?

मैं - अरे भाई क्यों नहीं! यदि पत्नी जाने दे!

इंटरव्यूकर्ता - इसमें बीच में पत्नी कहां से आ गई?

मैं - जैसे हुलसी और विद्योतमा आई थी। पत्नियां किसी को भी तुलसी या कालिदास बना सकती हैं।

इंटरव्यूकर्ता - अपने लिए यह संभावना आप कहां तक पाते हो?

मैं - देखिए, स्वान्त:सुखाय टाइप के लेखन में 'तुलसीत्व' के प्राप्ति की संभावना छिपी होती है। इस टाइप के लेखन से पत्नी भले चिढ़ती हो लेकिन ऐसे लेखन में महान बनने का भविष्य सुरक्षित है। इस संभावना को बरकरार रखने के लिए ही इस टाइप का मेरा लेखन है। 

इंटरव्यूकर्ता - ऐसा लगता है पत्नी की बात करके अपने निजी जीवन पर प्रश्न करने की छूट प्रदान की है, तो क्या मैं आप से पूँछ सकता हूं कि पत्नी से कोई आपका अनबन चल रहा है?

मैं - देखिए! हर पत्नी वाले का पत्नी से अनबन चलता रहता है, क्योंकि बिना उसकी अनुमति के आप एक पत्ता भी नहीं खड़का सकते! अब यही देखिए, पत्नी की उपस्थिति में मैं अपना यह स्वान्त:सुखाय वाला लेखन नहीं कर सकता, उसे देखते ही मैं चुपचाप मोबाइल को परे खिसका देता हूं!     

इंटरव्यूकर्ता - अच्छा अन्त में एक प्रश्न और वह यह कि साहित्य में पुरस्कार के बारे में आपकी अवधारणा क्या है?

मैं - देखिए स्वान्त:सुखाय के लेखन में पुरस्कार की अवधारणा फिट नहीं होती.. मैं यहां एक बार फिर कहुंगा कि इसके पीछे 'तुलसीत्व' की अवधारणा काम करती है। लेकिन फिर भी मैं आपको विश्वास दिलाता हूं पुरस्कार से सुखानुभूति की आवश्यकता पड़ने पर मंडली में शामिल होने से गुरेज नहीं! आज के जमाने में कहां नहीं सेंधमारी की जा सकती। फिर आजकल तो बड़े-बड़ों को फेसबुक पर गप्पें मारते इठलाते और इसपर मिलते आह या वाह पर मदमाते देखता हूं, यह किसी पुरस्कार से क्या कम है!! तो, फिलहाल मेरा इरादा अभी फेसबुकिया होने पर ही अधिक है।

इंटरव्यूकर्ता - (दर्शकों से) तो जैसा कि अभी आपने देखा और सुना, हम एक ऐसी शख्सियत से रुबरु हुए जो लिखने के लिए नहीं लिखता और न यह बताने के लिए ही लिखता है कि वह लेखक हैं, इसलिए वह अपने को पुरस्कारों की दौड़ में भी नहीं पाता। बल्कि वह इस बात की गारंटी देता है कि उसके लिखे का कोई दूसरा पाठक हो या न हो, लेकिन कम से कम वह स्वयं अपने लिखे का पाठक तो है ही.. जबकि आजकल किसी लेखन का पाठक खोजना कितना मुश्किल भरा काम है!! हम कह सकते हैं, इस शख्सियत में लेखन और पाठन दोनों तत्व मौजूद हैं, कोई विरला ही इनका समकालीन होगा!! इसलिए हम इनकी पत्नी से अपील करते हैं कि ऐसे महान संभावनाओं वाले लेखन को महानता की ओर ले जाने में, उनके साथ यदि हुलसी का नहीं तो कम से कम विद्योतमा वाला व्यवहार जरूर करें और मोबाइल पर लेखन करते समय इन पर व्यंग्योक्तियों का प्रहार न करें, क्योंकि इन महाशय में लेखन और पाठन की अद्भुत संगति है।

     इस इंटरव्यू के समाप्त होते ही नींद टूटी। मैं समझ गया कि स्वप्न ने हमें मूर्ख बनाया है। इधर पंखा भी तेजी से गतिमान था, इससे हमें ठंड लगने लगी थी। समय देखने के लिए मोबाइल टटोला तो वह तकिए के नीचे मिला। सुबह हो चुकी थी, फिर भी एक बार और चद्दर तान लिया था।

सिस्टमपंथी

       देश-भक्त ही देश की चिंता कर सकते हैं। मेरे इस कथन पर मुझे दक्षिणपंथी घोषित करते हुए उन्होंने कहा, "देशभक्त हुए बिना भी देशहित की चिंता की जा सकती है।" और फिर यह कहते हुए, "अरे हां भा‌ई! ये तंत्र-मंत्र शक्तिधारी ही देश-भक्त हैं...बाकी हमां-सुमां तो रियाया हैं..हम डाइरेक्ट देश के काम थोड़े ही न आ सकते हैं, देशभक्तों को अपनी पीठ पर ढोना ही हमारी देशभक्ति है! एक बात कहूं..! इस तंत्र-मंत्र ने देश का बेड़ा ग़र्क कर दिया है..दिखाते रहिए अपनी देशभक्ति.." कमरे से बाहर चले ग‌ए। मुझे अपनी देशभक्ति पर थोड़ी शर्मिंदगी जैसी फीलिंग आई। सोचा, आखिर कलाकार भी तो अपनी भावनानुरूप ही मूरत गढ़ता है, तो देशभक्त हुए बिना देश की मूरत कैसे गढ़ी जा सकती है? फिर तो देशभक्त होना भी एक कलाकारी ही है, चूंकि सरकारें देशभक्त होती हैं इसलिए छेनी-हथौड़ा से नहीं, अपने तंत्र से देश को गढ़वाती हैं। मुझे क्षोभ हुआ कि राष्ट्र की मूरत गढ़ने वाले इसी कलाकार-तंत्र को वे महाशय गाली देकर चले ग‌ए थे।

       उल्लेखनीय है कि मेरे ग्रेजुएशन के दिनों में राजनीतिक विषय के रूप में देशभक्ति की ख्याति नहीं थी। इसका ढिंढोरा भी नहीं पीटा जाता था और न ही इसमें कोई प्रतियोगिता थी। इसे मूर्खता का पर्याय भी नहीं माना जाता था। हाँ, खेती-किसानी की इज्जत न तब थी और न अब है। क्योंकि देशभक्तों की वैरायटी में मेहनतकशों की गणना न पहले थी और न आज है‌। लेकिन किसान देशद्रोही भी नहीं हुआ करते थे‌। इधर देश के स्टेनलेस स्टील फ्रेम जैसे तंत्र में जुड़ने वाले सफल अभ्यर्थियों के ऐसे वक्तव्यों से कि, इस फ्रेम से जुड़ने पर देश की अच्छे से सेवा करने का खूब अवसर मिलता है, मैने निष्कर्ष निकाला कि फावड़ा-कुदाल या खेती-किसानी में जिंदगी भर पसीना बहाने की बजाय देश की प्राॅपर तरीके से सेवा करने के लिए सरकारी-तंत्र के फ्रेम वाला प्लेटफार्म चाहिए। स्पष्ट था कि किसी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे के वश में देशसेवा जैसा पवित्र कार्य नहीं, इसके लिए बड़ा बनना होता है। और बड़े लोग ही देशहित के पवित्रनुमा कार्यों को सिस्टमेटिक ढ़ग से सुगम और फलवान बनाकर निपटाते हैैं। फ़िलहाल मुझे देशभक्ति, देशसेवा और सिस्टम के अन्तर्सम्बन्धों द्वारा बड़ा बनने की प्रक्रिया समझ में आ गई थी। अंततः मैंने कम्पटीशन-वम्पटीशन फाइट करना शुरू किया और आयोग ने मुझे भी स्टील फ्रेम का एक छोटा पुर्जा बनाकार बड़ा बनाने वाले कामों को अमलीजामा पहनाने का अवसर प्रदान किया।

      लेकिन उन दिनों की अपनी भावुकता पर मुझे तरस आती है। संयोग से उस वक्त देश में सूखा भी पड़ा था। इथियोपिया से लेकर भारत तक सूखे से लोग बेहाल थे। शायद वह तस्वीर, जिसमें भूख से हड्डी की ठठरी बनी एक जीवित अफ्रीकी बच्ची को एक गिद्ध ताक रहा था, उन्हीं दिनों की है। आज भी जब-तब वायरल होती इस तस्वीर से वह गिद्ध-दृष्टि याद आती है। उस अकाल-काल में किसानों की पीड़ा देख मेरी भावनाएं द्रवित होकर बूंद की तरह सहसा उछल पड़ी थी। यह सच है, जब जोर की भावुकता आती है तो आदमी कविता करने की ओर भागता है और मैं भी उसी ओर भागा था। मैंने अपनी कविता में बादलों से बरसने का आह्वान किया, हे बादल आओ बरसो/ कुछ तो दे जाओ/ खेत हमारे और हम प्यासे हैं/ हलक सूख गया है/ यह पीड़ा है प्यासे इस तन-मन की। लेकिन मुझे यह सोचकर हँसी आती है, यदि मेरी कविता की भावुकता में बहक कर बादल बरस पड़ते तो सूखे की आपदा का क्या होता? जबकि आपदा में मिलने वाले बजटीय डोजों से उत्पन्न देशभक्ति में राहत के काम शुरू होते हैं, जिसके परिणाम देश ही नहीं विदेश में भी पहुंचते हैं। अखबार में छपे इस सर्वे कि लाॅकडाउन की अवधि में स्विटजरलैंड के खातों में भारतीयों ने खूब धन जमा किए जो दुनियां में सर्वश्रेष्ठ है, से इसकी पुष्टि होती है। इसीलिए मैं मानता हूँ कि अकाल-काल में उपजी मेरी वह कवित्व-भावना देशप्रेम नहीं, देशद्रोह वाली थी। जो सूखा खत्म कराके देशभक्तों को बूस्टर डोज जैसे उनके प्राप्तव्य से वंचित कराने जैसा था। खैर अब मुझे भावुकता पसंद नहीं, क्योंकि यह आदमी को अंधा बना देती है, इसमें पड़ा व्यक्ति नफा-नुकसान की नहीं सोच पाता।
 
        वैसे तो सिस्टममय सब जग जाना। लेकिन सरकारी सिस्टम की बात ही निराली है। इसके बगैर देश का बेड़ा ग़र्क हो जाए! इसमें आकर 'मदर इंडिया' का भगवान और शैतान के बीच वाला इंसान, आवश्यकतानुसार वह जो है वह न होने की और जो नहीं है वह हो जाने की अपनी क्षमता से सिस्टम के गुड-बुक में नाम दर्ज कराकर दोनों से भी उच्च कोटि का हो जाता है। जो भी हो, देश के काम आने वाली ऐसी तंत्रात्मक शख्सियतें दक्षिणपंथी ही मानी जाएंगी। यहां महत्वपूर्ण है, जो तंत्रात्मक नहीं वह देशभक्त भी नहीं, चाहे वह दक्षिणपंथी ही क्यों न हो! लेकिन लोकप्रियता की श्रेणी हांसिल कर चुके कुछ लोगों का अंदाज थोड़ा अनोखा है। जैसे कि एक लोकप्रिय महानुभाव ने तंत्र के हम जैसे कल-पुर्जों की एक गोपनीय बैठक में बहुत ही मीठी वाणी में सजेस्ट किया था, "वैसे तो आप लोग अपने हिसाब से काम करो, लेकिन जो करने के लिए हम कहते हैं उसे न मानने वाले से हम दूसरे तरीके से निपटते हैं।" शायद यह एक माफिया किस्म वाली देशभक्ति थी। जो घर बैठे अपने सिस्टम से लोक और तंत्र दोनों का काम अकेले निपटा सकती थी। फ़िलहाल अभी तक संवैधानिक दर्जा प्राप्त न होने से इसे वैधता हांसिल नहीं है, इसके लिए सिस्टम को निजी टाइप से अन्डरवर्ल्डात्मक होने की बजाय सरकारी टाइप का तंत्रात्मक होना चाहिए। इसके रहस्यमयी वातावरण को समझना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है, अन्यथा तंत्र में होते हुए भी वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति हो सकती है। 

        वैसे सिस्टम अदृश्य ही होता है, क्योंकि जो दिखाई पड़े वह सिस्टम ही क्या!! इसका कोई लेखा-जोखा या प्रमाण भी नहीं, बल्कि तंत्र में भाव और अभाव रूप में विद्यमान होकर उसे नियंत्रित और संचालित करता है जैसे ईश्वर सृष्टि को! इसकी अनुभूति सृष्टि में ईश्वर के जैसी इसमें डूबने पर ही होता है। कहते हैं ईश्वर ने सृष्टि को रचा और उसे विकसित होने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया है। लेकिन सिस्टमीय-तंत्र, दांत वाले छोटे-बड़े चक्कों के समूह जैसा है जो अपनी मर्जी से नहीं, आपस में फंसकर एक दूसरे को नचाता है। इसके पीछे मंत्राध्यक्ष का मंत्र-बल होता है। इसे ग्रहण कर तंत्राधीश अपने दंतबल से इस चक्कीय सिस्टम को नचाता है। लेकिन देशभक्ति के कृत्य का श्रेय मंत्राध्यक्ष को जाता है। उसका मंत्र-बल उसे ऋषि-मुनि की श्रेणी में खड़ा कर देता है। इसीलिए भारत को ऋषियों-मुनियों का देश कहा जाता है, इनके सहारे ही इस देश को उसका प्राप्तव्य प्राप्त होता आया है।

         खैर, शुकर हैं भारत माता के नक्शे और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का! जिसके निरंतर अनुश्रवण से मेरे मन में देशभक्ति की तरंगे उठी और मुझे भी आनंदित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। क्योंकि देश सेवा वाले भाव के साथ बजटीय डोज की मिक्सिंग कर सिस्टमीय-तंत्र में जबर्दस्त पेराई होती है, इससे निकलते रस से सराबोर हुआ मन देश-सेवा के कृत्य से सुखी होकर आनंदित होता है। इस प्रकार तंत्राधीश के निर्देशन में तंत्रीय देशभक्त भी देश की मूरत गढ़ते-गढ़ते अपना प्राप्तव्य प्राप्त करता है। यही देशसेवा का सिस्टमेटिक ढंग है, इसमें विवेक, भावना और बुद्धि का कोई स्थान नहीं, बस घूमने के लिए दाँत से दाँत सटे हुए होने चाहिए। खैर, यहां आकर क्या दक्षिणपंथी और क्या वामपंथी! और क्या सिस्टमपंथी!! सबकी गति एक ही है, बाकी जनता को भरमाने की चीजें हैं।

माफिया और गुर्गे

          लिखने की प्रेरणा लेखक होने के पेशे से नहीं, लहू में आए उबाल से मिलती है। इसलिए लेखक डरता नहीं, बल्कि पेशा डराता है! पेशेवर बनकर ही इस डर से मुक्ति पाई जा सकती है। फिलहाल अपने लहू के उबाल से डरने वाले पेशेवर नहीं बन पाते। दो शूटर किसी बड़े सफेदपोश माफिया के लिए काम करते थे। हालांकि उन्हें अपने उस सुप्रीम आका का कभी दीदार नहीं हुआ था लेकिन वाया प्राप्त उसके निर्देशों के अनुसार वे अपने काम को अंजाम देते। एक बार दोनों को किसी बड़े व्यापारी से गुंडा टैक्स वसूलने का काम सौंपा गया। शायद उस व्यापारी ने तयशुदा खोखे की रकम पहुंचाने में देरी की थी। तो, दोनों गुर्गे‌ उसी की वसूली करने उसके घर पहुंचे। 
       इधर व्यापार में घाटे के साथ व्यापारी को अपनी बेटियों के विवाह की चिंता थी। जब वह पेटी लेकर जान छोड़ने के लिए गुर्गे से गिड़गिड़ा रहा था, तो एक गुर्गे की निगाह दरवाजे की ओट में खड़ी उसकी बेटियों पर पड़ी। डर से सहमे उनके भयाक्रांत चेहरे को देख उसे अपनी बेटियों का ध्यान आ गया। इधर उसका दूसरा साथी खोखा न देने पर व्यापारी को मौत की धमकी देता सुनाई पड़ा। स्थितियों का भान होते ही बेटियों के चेहरे में खोए गुर्गे की आंखों में आँसू छलकने को आ ग‌ए थे। उसकी ऐसी बदली हुई भाव-भंगिमा को देख जब उसके दूसरे साथी ने कठोर आवाज में कहा, ये क्या हो रहा है, तो वह गुर्गा सकपका गया और अपने डर से डर गया। वह दूसरा साथी कुछ समझ पाता इसके पहले ही उसकी कनपटी पर उसने गोली चला दी। 
           बड़े माफिया का अपने गुर्गों को निर्देश होता है कि यदि कोई गुर्गा टारगेट के प्रति नरमदिल दिखाए तो तत्काल दूसरा साथी उसे शूट कर दे। दरअसल व्यापारी की बेटियों को देखकर गुर्गे के हृदय में संवेदनशीलता जागी और वह किसी भी दशा में व्यापारी की हत्या नहीं होने देना चाहता था। ऐसी दशा में उसका दूसरा साथी उसे ही शूट कर देता, इसलिए बिना अवसर गंवाए उसने अपने दूसरे साथी को गोली मार दिया और पेशे से मुंह मोड़ पेशेवर बनने से बच गया। खैर यह तो हुई कहानी की बात।
         अमृता प्रीतम 'रसीदी टिकट' में एक जगह लिखती हैं कि "मुझे एक प्रकाशक की ओर से एक लंबा काव्य लिखने के लिए कहा गया था, पर मैंने मना कर दिया था। लिखती, तो वह काव्य मेरे लहू के उबाल में से उठा हुआ न होता।" खैर, मैं यह नहीं कहता कि प्रकाशक माफिया है और लेखक उसका गुर्गा। लेकिन यहां लेखिका जैसे पेशेवर होने से बचना चहती है। और चाहें भी क्यों न, क्योंकि संवेदनाओं में पेशेवराना अंदाज नहीं होता। वैसे भी पैसा और प्रसिद्धि की आकांक्षा लहू के उबाल को ठंडा कर देता है।

रिश्तों का डिजिटलाइजेशन

        नया साल आ गया। आधी रात से लेकर लगभग शाम तक शुभकामनाओं का रेलमपेल लगा रहा। वैसे बचपन में तो नहीं, लेकिन जब कालेज लगभग छोड़ चुका था, तब पता चला था कि न‌ए साल में ग्रीटिंग-कार्ड दिया जाता है। लेकिन वह जमाना भी कब का बीत चुका है। भ‌ई, एक बात यह भी है अब कोई जमाना ज्यादा समय तक ठहरता ही नहीं! जमाना आया नहीं कि गया। बल्कि मैं तो कहूं जमाना भी अब सरपट भाग रहा है जैसे कि आदमी भागता है! आखिर आदमी से ही तो जमाना है। पल-पल छिन-छिन बदलते आदमी का कोई ठिकाना नहीं तो जमाना ही अपना ठिकाना क्यों बनाए? इसीलिए जमाना भी आया नहीं कि सरपट भागते हुए 'क्या जमाना था' में बदल जाता है, खैर।

          तो ग्रीटिंग कार्ड सजाने-सजने का जमाना चला गया और आया मैसेज का! हां मैसेज का!! न रंग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। वैसे मैं नहीं जानता कि फिटकरी का चोखे रंग के साथ क्या ताल्लुक है। लेकिन मुहावरा है सो इसे लिखने में यूज कर लिया। मतलब यही कि बढ़िया से बढ़िया मैसेज रेडीमेड मिल जाता है, इसके लिए बेचारे हृदय को परिश्रम करने की अब जरूरत नहीं होती और वैसे भी आजकल के लोगों का हृदय भी कमजोर होता है, इससे जितना कम से कम काम लिया जाए उतना ही स्वास्थ्यवर्धक है। जबकि पहले ग्रीटिंग-कार्डों की दुकान पर जाना उनमें से बढ़िया ग्रीटिंग छांटना और फिर संबंधित तक इसे पहुंचाने में पर्याप्त जहमत उठानी होती थी। आज प्रदूषण के जमाने में इतनी तिकड़म भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता। खैर फिर बेहतरीन आप्सन के रुप में आया मोबाईल मैसेज का जमाना। इसमें मैसेज लिखने के लिए दिल और दिमाग को एक बार यूज कर उसे बहुतेरे स्वजनों को एक साथ फारवर्ड कर देने की सुविधा भी मिली। तब ये मैसेज भी किसी को बासी नहीं लगता था और लगे क्यूं? क्योंकि इसमें 'फारवर्डेड' का पता नहीं चलता था। मैसेज पाने वाला बेचारा मात्र इसे अपने लिए भेजा हुआ मानकर प्रेषक के वर्जिनल प्रेम से अभिभूत हो जाया करता था।

           लेकिन वह क्या जमाना था! और आज व्हाट्सएप का जमाना आ गया है। अब तो रेडीमेड बने-बनाए संदेश के ऐप भी बन चुके हैं, बस थोड़ी मेहनत कीजिए एक से एक ब‌ढ़िया संदेश या कहें बात, नहीं तो विचार ही कह लीजिए, मिल जाएंगे और व्हाट्स ऐप पर कापी पेस्ट कर अपने मित्रों-सुहृदयों को भेजते जाइए! मतलब शुभकामनाएं और मंगलकामनाएं लिखने के झंझट से भी मुक्ति! कहने का आशय यह है कि आज के महान तकनीकी दौर में डिजिटलाइज्ड मंगलकामनाएं और शुभकामनाएं उपलब्ध हैं जो सुहृदों के हृदय को सुहृदय बनाने के काम आती हैं। गजब का यह संबंधों के डिजिटलाइजेशन का जमाना है। लेकिन इसमें एक ख़तरा बस यही है कि थोड़ी सावधानी की जरूरत होती है क्योंकि 'फारवर्डेड' से आपका कोई अति संवेदनशील साहित्यिक टाइप का इष्ट-मित्र आपके 'फारवर्डेड' संदेश को "प्रकृति के यौवन का श्रृंगार/ करेंगे कभी न बासी फूल" जैसे साहित्यिक भाव से ओवरलुक न कर दे। आखिर ताज़गी तो सबको चाहिए ही होती है।

         लेकिन आजकल के डिजिटलाइजेशन युग में संदेशों के आदान-प्रदान में परफेक्ट टाइमिंग का ख़्याल रखना चाहिए। मतलब किसी के डिजिटलाइज्ड सुख-दुख में तत्काल शरीक हो लेना चाहिए। ऐसा इसलिए कि एक बार मेरी नज़र एक फेसबुकीय फ्रेंड के पोस्ट पर पड़ी जिसमें किसी अतिप्रिय स्वजन के शोक में उनका इज़हार-ए-दुख कुछ ऐसा था कि उनके लिए यह पूरा संसार निरर्थक और बेमानी हो चला था। उनके दुख की इस घड़ी में साथ देने के लिए मैंने दुख में दुखी होने वाले एक सांत्वनापरक संदेश को गूगल से खोजकर कापी किया और उन दुःखी हृदय आत्मा के वाल पर पेस्ट करने ही जा रहा था कि मेरी दृष्टि उनके एक लेटेस्ट पोस्ट पर पड़ी, जिसमें वे डांस टाइप की मुद्रा में किसी पार्टी में मिले 'इंज्वॉय' का बखान करते हुए गौरवान्वित फील कर रहे थे। अब बताइए! मेरा हृदय कौन सी मुद्रा धारण करता? उन्हें सांत्वना देता या कि उनकी डांस मुद्रा के साथ मैं भी गौरवान्वित फील करता? कुछ डिसाइड न कर पाने की स्थिति में चुपचाप उनकी वाल से खिसक लेने में ही मैंने भलाई समझा। ठीक यही स्थिति डिजिटल प्लेटफार्म पर खुशी जाहिर करने वाले भी पैदा कर सकते है।  

           खैर, आजकल के क्षणजीवी इंसान के मनोभाव भी इस डिजिटल जमाने के साथ तालमेल बैठाने के लिए तैयार है। विकासवाद की सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट की थियरी एकदम फिट बैठ रही है, क्योंकि इस ज़माने में युगानुरूप आदमी का हृदय आटोमेटिकली डिजिटलाइज्ड हो चुका है! इसीलिए उसके मनोभाव भी  डिजिटली ढंग से प्रवाहित होते हुए कट-पेस्ट की सुविधा का लाभ ले रहा है।  

         लेकिन मोबाइलीकरण के इस ज़माने में आदमी को तकनीक और वह भी कम्प्यूटर का ज्ञान होना बेहद जरूरी है। अन्यथा मानवीय संबंधों के निर्वहन में वह फिसड्डी साबित होगा। फिर भी इस ज्ञान का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए। नहीं तो टच-बोर्ड आपके संबंधों को दूसरा आयाम भी दे सकता है। क्या है कि मनोभावों के इमोजीकरण के दौर में एकबार एक सुहृद मित्र ने मेरे उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ मुझे एक बेहद खूबसूरत संदेश भेजा। उसे देखते ही मैं आह्लादित हो गया और आव देखा न ताव विनीत भाव से उन्हें धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए उतावला हो उठा। इस उतावलेपन में धोखे से टचस्क्रीन पर अंगुली एक बेहद गुस्से से लाल चेहरे वाली इमोजी पर टच कर गया और वह इमोजी सेंट भी हो गई। उस समय बड़ी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा था मुझे! तबसे उनसे अपने लिए खूबसूरत मैसेज पाने के लिए तरस गया हूँ। दूसरी बार ऐसी ही एक और गलती मैंने एक अन्य मित्र के साथ किया। उन बेचारे ने अपनी सफलता का बखान करते हुए एक संदेश डाला। उनके साथ अपने संबंधों को उच्च आयाम पर पहुंचाने के लिए उनकी इस सफलता पर उन्हें तत्काल बधाई संदेश भेजने की आवश्यकता को महसूसा, लेकिन जल्दबाजी में मोबाइल के टच-स्क्रीन को ऐसा टच किया कि उनके खुशी के इस अवसर पर जार-जार आंसू बहाने वाला इमोजी सेंट कर दिया। मुझे अपनी इस गलती का अहसास होता उसके पहले ही मेरी वह दुखी होने वाली इमोजी उनके द्वारा 'सीन' भी हो चुकी थी! मेरी एक चुटकी बेवकूफी से मित्रता दांव पर लग गई।  

           वैसे हर ज़माने के ख़तरे भी अपनी तरह के ही हैं। लेकिन इन खतरों के पार हमारे डिजिटलाइज्ड सोशल मीडियायी संबंध लाइव रहने चाहिए। हां इतना ज़रूर है कि नव वर्ष पर शुभकामना संदेशों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर इन्हें वर्गीकृत किया जा सकता है। जैसे कि साहित्यकार और उसमें भी व्यंग्यकार का संदेश, श्रेष्ठ-जनों या विशिष्ट-जनों का संदेश, साहब का मातहत के लिए या मातहत का साहब के लिए, मतलब निकालने वाला, दोस्ती जताने वाला, औपचारिक-अनौपचारिक आदि-आदि टाइप से! 

         इस लेख को पाठक-गण कृपया दिल पर न लें बल्कि संदेशों का आदान-प्रदान करते रहें और इनका मज़ा लें। यह दुनिया है जमाना तो बदलता ही रहेगा।

रविवार, 8 नवंबर 2020

तंत्रवाद में कारण-दर्शन

            उस दिन सुबह पाँच बजे घर से निकला। सोचा था कि तीन या चार घंटे में ड्यूटी-स्थल पर पहुँचकर ड्यूटियाने लगेंगे। हाईवे पर डेढ़ घंटे की यात्रा भी पूरी हो चुकी थी। अचानक मेरे सामने चल रहे वाहन एक-एक कर रुकते दिखाई दिए। मुझे भी कार रोकनी पड़ी। यहाँ वाहन क्यों रुक रहे, कार से उतर कर इस बात का जायजा लेना चाहा। प्रथम दृष्टया कुछ समझ में न आने पर एक स्थानीय टाइप के व्यक्ति से वाहनों के रुकने का कारण पूँछा। उसने बताया कि पुलिस वालों की वसूली से बचने के लिए ट्रक ड्राइवर अपने ट्रकों को आड़े-तिरछे निकालने के चक्कर में जाम लगा बैठे हैं। यह सुनते ही मैंने स्वगतालाप किया, लो गई भैंस पानी में ! पता नहीं कितनी देर इस जाम में फंसना पड़े। वैसे इस मुहावरे से मेरा पुराना परिचय है। गाँव में बिजली जाते ही दादा जी के मुँह से यही मुहावरा निकल पड़ता था। मतलब जाम के शीघ्र खुलने का कोई आसार दिखाई नहीं पड़ा। आज हमें कार्यालय पहुँचने में बिलंब होगा, यह सोचते हुए हमारी अकुलाहट बढ़ने लगी। अब मेरी मनःस्थिति वैसी ही हो रही थी जैसे ट्रेन का समय हो चुका है और टिकट के लिए मैं लाइन में खड़ा हूँ कि टिकट बांटने वाला बाबू अचानक काउंटर से उठकर चाय पीने चला जाए और मुझे ट्रेन छूटने की चिंता सताने लगे! उस टिकट बाबू को कोसने की तरह ही मैंने जाम और उसके पीछे के समस्त कारणों को मन ही मन कोस रहा था। 
           
          मैंने सोचा 'तो जाम लगने के कारणों में वसूली भी एक महती कारण है अपने देश में!' मैंने ध्यान दिया इसमें ट्रक, बस, कार जैसे वाहन तो फंसे ही पड़े हैं, दोपहिया वाहनों के भी निकलने की कोई जगह नहीं बच रही है। यही नहीं, हाईवे से मिल रही सड़कों पर भी मोटर गाड़ियों की कतारें लग चुकी थी। दृश्य कुछ ऐसा था जैसे नदी बांध देने से यह उफनाकर आसपास के क्षेत्र को चपेटे में ले रही हो। जाम में फंसे वाहनों के सैलाब से मुझे अपने देश में जबर्दस्त ढंग से विद्यमान पोटैंशियलता का आभास हुआ। लेकिन मैं दुखी सा हो उठा, क्योंकि मुझे प्रतीत हुआ कि अपने देश में विभिन्न कारणों से जगह-जगह लगने वाले जाम में यह पोटैंशियलता ऐसे ही फंसी पड़ी होगी। इस आँखों देखी के बाद भी, 'नाहक ही पुलिस वालों को टारगेट बनाया जाता है' सोचकर मैंने उस व्यक्ति की बातों पर उतना विश्वास नहीं किया जितना कि उस समय कर लेना चाहिए था।  
         
            खैर आधे घंटे बाद मेरे आगे खड़े ट्रक का चक्का ढीलियाता जान पड़ा और धीरे-धीरे ही सही जब यह घूमना शुरू हुआ तो उसी अनुपात में मैंने भी कार को एक्सीलरेट करना आरंभ किया। इसी समय तेज गति से एक अन्य ट्रक मेरे दायीं ओर से आकर मेरी कार और सामने चल रहे ट्रक के बीच के थोड़े से गैप में घुसने का प्रयास किया। उसकी इस कवायद से सामने से आते वाहनों का रास्ता तो अवरुद्ध हुआ ही और मुझे भी थोड़ा भय लगा ! क्या किया जा सकता है, दूसरे को धकियाकर और उनका रास्ता अवरूद्ध कर लेने के बाद ही देशज लोग अपना रास्ता बनाते हैं। थोड़ी खिसियाहट के साथ उस ट्रक वाले को टोकते हुए मैंने कहा “ट्रक को स्कूटी बना लिए हो का..!” इस पर खींसे निपोरकर मुस्कुराते हुए ही सही, “थोड़ा आगे बढ़ा लें..जाम लग रहा है” वह ऐसे बोला जैसे मैंने ही कोई गलती की हो। खैर मैंने भी करे कोई और भरे कोई टाइप वाली स्वराष्ट्रीय रीति के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए कार को आगे बढ़ा लिया। लेकिन इसके साथ ही जाम के मूल कारण-स्थल पर दृष्टिपात करने की तीव्र इच्छा भी मेरे मन में जाग उठी थी। 
      
           वैसे अपने देश की दार्शनिक मान्यताओं में कार्य कारण सिद्धांत बड़ी शिद्दत के साथ आया है। लेकिन ये ॠषि-मुनि बड़े व्यावहारिक नजरिए वाले होते हैं। इसीलिए षडदर्शनों में कारण का अस्तित्व अदृश्यात्मक भाव वाला और अव्याख्येय टाइप का ही रखा गया है, जबकि ज्यादा फोकस कर्म करने पर है। इसका लाभ यह हुआ है कि कार्य के पीछे के कारण की खोज की हमारी प्रैक्टिस ढंग से नहीं हो पाई। फलस्वरूप इस प्राचीन राष्ट्र की अर्वाचीन जाँच एजेंसियाँ किसी घटित कार्य के पीछे वाले कारण का ढंग से पता नहीं लगा पाती और हाथ खड़े कर क्लोजर रिपोर्ट लगा देती हैं। ऐसी रिपोर्टों के पीछे 'बी प्रैक्टिकल' का संदेश भी छिपा होता है। आजकल इससे बढ़कर कोई दूसरा नीति वाक्य नहीं हो सकता। इसके अक्षरशः पालन से व्यक्ति का करैक्टर चमक-दमक वाला और शुद्ध होता चला जाता है। सरकारें भी देश को चमकाने के लिए इसी नीति पर भरोसा करती हैं और इसके तंत्र में जो जितना 'बी प्रैक्टिकल वाला' होता है वह उतनी ही निश्चिंतता के साथ अपने कार्यों को अंजाम तक पहुँचा पाता है। 
       
             एक दिन मुझे ऐसे ही तंत्र के एक छोटे-मोटे मुखिया पदधारक से मिलना हुआ था। उनके क्रांतिकारी विचारों से बड़े से बड़े लोग झटके पर झटके खाते आ रहे थे। कुछ पहुँचे हुए लोगों को लगा कि वे देश की चमक-दमक और उसके विकास में अपना प्रॉपर योगदान नहीं दे पा रहे हैं। अतः वही हुआ जो होता आया है। हायर लेबल से यह सुनिश्चित किया गया कि ये छोटे-मोटे मुखिया महाशय "बी प्रैक्टिकल" जैसे नीति वाक्य को फॉलो नहीं कर पाते, अतः मुखिया बनने के काबिल नहीं और उन्हें दूसरी जगह भेज दिया गया। हाँ उन्हीं से सिम्पैथी जताने गया था मैं। खैर बातों बातों में अपनी यह भावना जताते हुए मैंने उनकी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी की प्रशंसा की। लेकिन मेरे इस भावना प्रकटन पर ज्यादा फोकस न होते हुए उनने जैसे आर्त्र स्वर में अपनी चिंता जाहिर की और कहा,
       
             "ऐसे स्थानान्तरणों से मुझे चिंता नहीं होती.." 

             फिर उनने एक और बात कही कि - 
        
            "कहीं मेरा प्रमोशन न रुक जाए?"
        
            इसे सुनते ही मेरा मुँह अचानक कुछ फटा टाइप सा हो गया था, लेकिन तभी उन्होंने आगे कहा,
      
              "दरअसल वे मेरी एसीआर खराब कर सकते हैं।"  
     
             अब तो मेरे पूर्णतया हक्का-बक्का होने की बारी थी! और इस अवस्था में आकर मैंने सोचा कि - 
      
             "क्या किसी की ईमानदारी ही उसकी एन्युअल कांफिडेंशल रिपोर्ट खराब कर सकती है?" फिर चिंतातुर होते हुए उनकी ओर देखकर मैंने केवल यही सोचा -
       
             "एक अजीब सी प्रणाली में फंसकर बेचारी यह कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी कितनी निरीह और असहाय हो जाती है।" 
         
            लेकिन इस बीच अचानक उनका यह स्वर सुनकर कि "मुझे अपने सामान की पैकेजिंग करानी है" मैं भी उठ खड़ा हुआ और उनसे विदा ली।
        
            वहाँ से निकलकर मैं यही सोच रहा था कि कोई भी तंत्र हो, वह इसी सिद्धांत पर चलता है, या तो उसे तांत्रिक का गुलाम होना पड़ता है या फिर स्वयं तांत्रिक ही तंत्र का गुलाम बने। बिना इस गुलामी के तंत्र सही ढंग से काम नहीं कर सकता। तंत्रवालों ने इसीलिए तंत्र में गुलामी की प्रथा डाल रखी है और इसकी सुदृढ़ता के लिए ही अपने बीच में वार्षिक गोपनीय प्रवृष्टियों का प्रावधान किया हुआ है। 
          
             वाकई में, आखिर जाँच एजेंसियाँ भी तो इसी तंत्र का हिस्सा हैं ! इस तंत्रवाद से परे वे भी नहीं रह सकती। तो, दूसरी ओर इस महान राष्ट् का कारण-दर्शन भी ऐसा है कि ऐसी एजेंसियां करें भी तो क्या करें? कारण खोजने बैठो तो कारण का कारण करते-करते हजार कारण मिल जाते हैं, ऐसे में दृष्टव्य कार्य के पीछे कौन सा कारण उत्तरदायी है तय करना मुश्किल हो जाता है, फिर तो मजबूरी में उन्हें क्लोजर रिपोर्ट लगाना ही पड़ता है। वैसे यह भी तो मानना ही चाहिए कि ऐसी रिपोर्टों से ही व्यवहार जगत का सत्य संवर्धित होता है और इससे व्यावहारिक जगत को बहुत लाभ है तथा तंत्र भी बखूबी काम करता रह सकता है।
         
             खैर जामीय-चाल से मेरी कार उस स्थल पर पहुँची, जिसे जाम का संभावित कारण-स्थल होना चाहिए था। लेकिन वहाँ मुझे किसी कारण के दर्शन नहीं हुए! बल्कि वसूली जैसे पूर्व घटित कार्य की संभावना के सुराग स्वरूप दो पुलिस वाले जरूर दिखाई दिए, लेकिन वे भी जाम खुलवाने में ही व्यस्त थे। इधर सड़क खुलता देखकर मुझे इस शास्त्रीय ज्ञान का स्मरण हुआ कि कारण के हट जाने पर कार्य का स्वतः ही विघटन हो जाता है, और मैंने अब जाम लगने के कारण पर माथापच्ची करना व्यर्थ समझ लिया। दरअसल यहाँ समस्या यह भी थी, कि कहीं कारण खोजते-खोजते बात उपादान कारण से लेकर निमित्त कारण पर न चली जाए! मतलब घड़े का कारण स्वयं मिट्टी है या फिर घड़ा बनाने वाला कुम्हार टाइप से। हलांकि इस जाम के उपादान कारण यानि घड़े के मिट्टी के रूप में हम जैसे, कार, बस, ट्रक वाले तो होंगे ही, लेकिन ये पुलिस वाले? शायद ये भी उपादान कारण के रूप में यूज हुए हों और अब इसी उपादान कारण का विघटन होता दिखाई पड़ रहा है। लेकिन इसे मानने पर निमित्त कारण भी मानना पड़ेगा, और फिर बात इन पुलिसवालों से ऊपर वालों पर जाएगी। क्योंकि किसी निमित्त कारण यानि कि ऊपरवाले के मातहत होकर ही ये अपने काम को अंजाम दे रहे होंगे, जिसके कारण यह जाम लगा होगा !! लेकिन सुराग के हाथ में डंडा देख, मैंने उससे निमित्त कारण अर्थात कुम्हार के बारे में पूँछना उचित नहीं समझा और कारण-कार्य दर्शन का चैप्टर यहीं बंद कर देने में ही अपनी भलाई समझा। 
        
          वैसे जाम के कारण का मुझसे साक्षीकरण नहीं हुआ लेकिन अनुमान से इसका मुझे जो प्रत्यक्षीकरण हुआ वह कारण के रूप नहीं बल्कि कार्य के रूप में था। दर्शनशास्त्र में अनुमान से प्राप्त होने वाले ज्ञान को भी प्रामाणिक और सत्य माना गया है। इसलिए अनुमान से मैंने जान लिया कि, किसी कार्य के पीछे कोई कारण-फारण जैसी चीज नहीं होती, बल्कि कार्य के पीछे केवल कार्य ही होता है। अगर कोई वसूली हो भी रही थी तो वह भी तंत्र द्वारा किया जा रहा एक कार्य ही था, इन्हीं जैसे चिरस्थायी कार्यों से इस महान राष्ट्र का निर्माण होता आया है और बड़े-बड़े कार्य सृजित किए जाते हैं। इसलिए शायद तंत्रवाद भी कार्य करने में ही विश्वास रखता है, कारण तलाशने में नहीं। आखिर इसी से पूरी व्यवस्था गतिमान जो रहती है।  
            
           इस जाम में फंसे होने से मुझे अब गर्व होने लगा था, क्योंकि देश की व्यवस्थाओं को गतिमान रखने में इसमें फंसे-फंसे मैंने भी एक नन्हीं सी भूमिका अदा की थी। इस प्रकार उस दिन आॅफिस में देर से पहुँचे थे। इस देर से पहुँचने की अपनी सफाई में मैंने बताया था कि, क्या करें देश में चल रही व्यवस्थाओं को गतिमान रखने के लिए आयोजित एक जरूरी कार्य के बीच में मैं फंस गया था। मेरी बात सुन लेने के पश्चात आफिसवालों ने भी धार्मिक भाव से मेरी ओर देखा था। अंततः मुझे राम की गिलहरी समझकर मेरे बताए कार्य को एक महान राष्ट्र के निर्माण में इसे मेरा योगदान माना तथा कार्यालय में मेरे विलंबित आगमन को अपराध के रूप में ग्रहण नहीं किया।   
                  ******
(एक संवर्धित पुरानी पोस्ट )

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

मुखपत्र लेखन

         कई दिन से कुछ भी नहीं लिख पाया हूँ और आज भी लिखने का मन नहीं था। लेकिन मेरा खाली-खाली फेसबुक वाल जैसे मुँह चिढ़ाता हुआ जान पड़ा ! तो सोचा इसे जवाब देना जरूरी है। लेकिन लिखना किस बात पर हो ? वैसे सभी की अपनी-अपनी समस्याएँ होती हैं, कुछ लिखने वाले अपनी इन्हीं समस्याओं को नमक-मिर्च लगाकार साहित्य रच डालते हैं, ऐसा लेखन, जिनमें साधारणीकरण का गुण सर्वाधिक होता है, उच्चकोटि की साहित्यिक श्रेणी में आ जाता है, अन्यथा यह लेखन भी 'व्यक्तिगत रोना'  जैसा बनकर रह जाता है। इसीलिए प्राय: देखा जाता है, किसी महान लेखक की एक या दो कृति ही उन्हें इस महानता की श्रेणी में खड़ा करने के लिए उत्तरदायी है, जिसमें उनका भोगा हुआ यथार्थ ही होता है । अपने भोगे हुए यथार्थ के अलावा जो लिखा जाता है उसमें 'सायासपन' की मात्रा कुछ अधिक ही आती है, जिसमें 'जबर्दस्तीपन' या फिर 'व्यवसायपन' की झलक मिलती है।

       

         सच तो यह है, साहित्य समाज को दिशा भी तभी दे सकता है, जब वह भोगे हुए यथार्थ को लेकर चलता है! मेरा तो इस क्रम में, यह भी मानना है कि रचना में अलंकारिकता रचना को जनविरोधी बनाता है, साहित्येतिहास में ऐसी रचनाएँ बहुत दिनों तक याद नहीं की जाती और न ही इनसे समाज प्रभावित होता है, ये पुरस्कृत चाहे भले हो जाएँ! हलांकि कुछ लोग बिना नमक-मिर्च काव्य-सौन्दर्य विहीन लेखन को सपाटबयानी कहकर खारिज करने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन व्यंग्येतिहास में श्रेष्ठ घोषित व्यंग्यकारों की श्रेष्ठ व्यंग्यरचनाएँ सपाटबयानी जैसी ही होती हैं, जो बारीकी के साथ 'अन्योक्ति' में कहे गए होते हैं, बस इनमें कहानीपन होता है। लेकिन आज अधिकांशतया रचनाकार 'सपाटबयानी' से बचने के लिए जबर्दस्ती की वक्रोक्तियों का प्रयोग करते देखे जाते हैं, जिसमें कहानीपन न होकर मात्र कुछ कथनों के संग्रह होते हैं! दरअसल इसे अखबारी लेखन कहा जा सकता है। ऐसे अखबारी लेखन, लेखक की भावनाओं को चिरंजीवी नहीं बना सकते। 

         

           इतना तय है कि जैसे फेसबुक की पोस्टों पर 'लाइकवाद' हॉवी है वैसे कागजी लेखन पर 'बाजारवाद' है। इन दोनों प्रवृत्तियों के बीच पाठक बेचारे की पाठकीय खुराक पूरी नहीं होती और जैसे भूखे को थाली दिखाकर फिर उसके सामने से थाली खींच ली जाए, कुछ ऐसी ही हालत पाठक की बना दी जाती है। इस सब के बीच पाठक भी लेखको से खुन्नस पालता जाता है, लेकिन मजे की बात यह है कि इस 'खुन्नस' को ही लेखक अपनी उपलब्धि के रूप में गिनता है।

           

          कुलमिलाकर मेरी इस फेसबुक पोस्ट का मतलब लेखकों को हतोत्साहित करने का नहीं है, क्योंकि लिखी हुई हर चीज साहित्य ही होती है। खासकर आजकल व्यंग्यविधा पर बड़ा जोर है और इस विधा में यथार्थ लेखन की गुंजाइश भी कम है! तो, बस अगर कोई लेखक की उपाधि पाना चाहता है तो "मुखपत्र" बनकर न लिखे! 

       

         वैसे मेरी इस पोस्ट से कोई पाठक मुझसे खुन्नस न पाले! यह मैंने मजे के लिए और अपने फेसबुक वाल का मुँह बंद करने के लिए लिखा है।

विकास के स्टेकहोल्डर

        विकास एक बहुत बड़ा इश्यू बन चुका है, वैसे तो विकास एक प्रक्रियात्मक चीज है, इसे जानने की कोशिश में पूरा विकास-क्रम परत-दर-परत उघड़ आता है!! लेकिन भगवान की तो भगवान ही जाने, पता नहीं उनके यहाँ सृष्टि के विकास क्रम से संबंधित फाइलें बनती हैं भी या नहीं। लेकिन यहाँ आर्यावर्त का आदमी अपनी सरकारों से पत्रावलियों के माध्यम से विकास कार्यक्रम संपन्न कराता है और इस विकास को जानना, समझना या प्रमाणित करना हो तो सर्वप्रथम इन्हीं पत्रावलियों का अवलोकन करना होता है। हाँ, जितने भी टाइप के विकास दिखाई पड़ते हैं उन सब की फाइलें होती हैं! विकास अपनी इन्हीं फाइलों पर आरूढ़ होकर गतिमान होता है। लेकिन कई बार विकास के लिए लालायित लोग यह भी कहते सुने जाते हैं कि विकास फाइलों में ही कैद होकर रह गया है, या फाइलों में गुम है, तो मामला पेंचीदा हो उठता है! और जाँच का विषय बनता है। फिर जाँच से ही पता चलता है कि विकास हुआ या कि पैदा किया गया। दरअसल विकास के संदर्भ  में 'हुआ' और 'पैदा किया गया' के अलग-अलग मायने हो सकते हैं! 

         लेकिन यह जाँच कार्य, पहले मुर्गी या अंडा वाले प्रश्न की तरह विचित्र धर्मसंकट में ढकेलने वाला होता है। आजकल जमाने पर विकासवाद हॉवी है, ऐसे में विकास और उसकी पत्रावली दोनों ही गड्डमगड्ड हो चुके हैं, इनमें से कौन पहले पैदा हुआ इसे सिद्ध करने का प्रयास करना आफत को गले लगाने से कम नहीं! लेकिन इस पेंचीदे और रहस्यमयी प्रश्न का उत्तर आध्यात्मिक ज्ञानी दूसरे रूप में ढूँढ़ते हैं। ये विकास और उसकी पत्रावली के बीच के संबंध की व्याख्या उसे व्यवहारिक जगत और पारमार्थिक जगत मानकर करते हैं। बस उसी टाइप से कि चाहे भगवान को संसार या संसार को ही भगवान मान लो! सब माया का खेल!! फाइल में, से, के द्वारा, ही विकास है या फिर विकास से, के कारण ही फाइल है, आशय यह कि विकास हो या उसकी फाइल दोनों ही मायावी हैं! माया के खेल को समझ चुके लोग अवसरानुकूल विकास और उसकी फाइल के अन्तर्सम्बन्ध की व्याख्या कर लेते हैं!

     जैसाकि सब जानते हैं, विकास के लिए धमाचौकड़ी तो मची ही रहती है, ऐसे में ये वाला, वो वाला, इस पत्रावली वाला, उस पत्रावली वाला, मने सभी वाला विकास, इसके स्टेकहोल्डरों को गड्डमगड्ड दिखाई पड़ता है और ये विकास में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित कराने के लिए आपस में पिल पड़ते है। मामला गंभीर होने पर विवाद के निपटान हेतु जाँच समितियां गठित की जाती है, और इन्हें निर्देशित किया जाता है कि जाओ पत्रावली और विकास के बीच के 'नेक्सस' को परिभाषित करो, जिससे इसके स्टेकहोल्डर संतुष्ट हो सकें। लेकिन जाँच समितियों का किसी निष्कर्ष पर पहुँचना दुश्वार हो जाता है, क्योंकि ये समितियाँ भी अकसर पत्रावली की मायावी चाल में उलझ जाती हैं। 

       ऐसी ही एक जाँच समिति के सदस्यगण विकास कार्य की किसी फाइल में उलझे हुए थे! और इसकी नोटशीट से लेकर इसका एक-एक प्रपत्र बारीकी से खंगाल रहे थे! इस कमेटी के एक मेंबर ने किसी कागज को देखकर कहा कि विकास हुआ है, तो जाँच समिति के अध्यक्ष जी ने तपाक से कह दिया कि चलो मान लेते हैं कि काम हुआ! लेकिन वहीं जब दूसरे मेंबर ने यह कहा कि इस कागज से काम होना सिद्ध नहीं होता, तो वही अध्यक्ष जी पलटी मारते हुए बोले कि कोई बात नहीं, यही मान लेते हैं कि काम नहीं हुआ! लेकिन तीसरे मेंबर के यह कहने पर कि ऐसे कैसे यह माना जाए? साइट पर तो काम मिला! तब अध्यक्ष महोदय झल्लाकर बोले, तो उसे और पत्रावली पर हुए काम को को-रिलेट करो।" अन्ततः जाँच समिति बिना कोई निष्कर्ष स्थापित किए ही उठ गई। वैसे अगर कमेटी किसी निष्कर्ष पर पहुँचती भी है तो इसके बाद की गठित एक दूसरी रिव्यू कमेटी इस निष्कर्ष को पलट भी सकती है! खैर।

        ऐसेे ही फाइलों से पैदा किया गया विकास अपने स्टेकहोल्डरों के मध्य ही, उनकी चमक-दमक बढ़ाए बिंदास भाव से घूमता रहता है और उसे जहाँ होना चाहिए वहाँ वह नहीं होता। इन स्टेकहोल्डरों को विकास की परत-दर-परत हिस्ट्रीशीट पता होती है! विकास को सही जगह पहुँचाने के लिए किसी पत्रावली की बजाय ऐसे स्टेकहोल्डरों की हिस्ट्रीशीट खंगालनी चाहिए।   

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

विभाजक रेखाओं का खोखलापन

दुनिया को एक न एक दिन इस महामारी से अवश्य मुक्ति मिलेगी| लेकिन इस बीमारी के जाते-जाते विकास का खोखलापन उजागर हो चुका होगा, वही विकास जिसे इस महामारी से पार पाने में नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं| एक दिन यह होना ही था, आखिर धरती पर इंसानों की गतिविधियों की कोई न कोई सीमा तो होनी ही चाहिए, लेकिन इस सीमा पर हमने कभी सोचने की जरूरत ही नहीं समझी! कहते हैं जंगल के भी अपने कानून होते हैं, और यह कानून प्रत्येक जानवर के लिए एक क्षेत्र निर्धारित करता है और यदि यह क्षेत्र अतिक्रमित होता है, चाहे किसी भी जानवर द्वारा हो, तो इन वन्य जन्तुओं के अस्तित्व पर संकट मँडराने लगता है| लेकिन क्या मनुष्य ने अपने लिए ऐसी कोई सीमा निर्धारित की हुई है? दरअसल आधुनिक मानव ने अब तक अपने लिए किसी सुरक्षित जोन का निर्धारण ही नहीं किया और अगर कुछ किया भी तो राजनीति, धर्म-सम्प्रदाय, जाति आदि जैसी मानवता को दरकिनार करके चलने वाली विभाजक रेखाएं ही उसने खींची| उसकी खींची ये सारी विभाजक रेखाएं उसके बाजारवादी विकास के माडल में कोढ़ में खाज जैसी ही सिद्ध हुई हैं!   
       खैर, अगर उसने अपने लिए किसी जोन का निर्धारण किया भी है तो वह है विकास का जोन! आधुनिक युग में मनुष्य अपना मूल्यांकन इस जोन के लिए अपने द्वारा निर्धारित किए गए मानदंडों के अनुसार ही करता है| लेकिन ये मानदंड अब छिन्न-भिन्न होते दिखाई दे रहे हैं|  ऐसा हो भी क्यों न! दरअसल उसने विकास को अपने लिए नहीं गढ़ा, बल्कि स्वयं को ही विकास के लिए गढ़ने लगा और उसके हवाले हो लिया| विकास के जोन मेें खड़े मनुष्य की अन्तश्चेतना से प्रकृति लुप्त होने लगी| दरअसल इस जोन में खड़ा प्रकृति से उपजा प्रकृति का यह श्रेष्ठतम जीव, स्वयं अप्राकृतिक हो उठा! और यही पैमाना हो गया उसके विकास का तथा इस पैमाने पर इतराने भी लगा|
     यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि अट्ठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी तक महामारियों, व्याधियों से लड़ता आया इंसान कैसे यह सब भूल गया! क्या विकास के उसके गढ़े हुए मानदंड से जीवन बहिष्कृत होता गया है? वास्तव में अट्ठारहवीं- उन्नीसवीं शताब्दी के बाद हुई वैज्ञानिक प्रगति और उसकी खोजों से यह दुनियां जितनी सुंदर और सुरक्षित होनी चाहिए थी क्या ऐसा ही हो पाया है? शायद नहीं, अन्यथा एक महामारी के समक्ष हम निरुपाय से असहाय खड़े हुए बिलबिला न रहे होते! सच तो यह है, हमने रचा बहुत कुछ है, लेकिन इस रचे हुए को बाजार के हवाले कर दिया तथा जीवन ही नहीं मृत्यु को भी हम बेचने लगे| कोई आश्चर्य नहीं कि कोरोना वायरस भी इस बाजार की ही देन हो और इसके द्वारा उत्पन्न किया| 
       बाजार और विकास के चक्कर में हमने अपनी प्यारी धरती को कितना झुठलाया है, यह समझने की बात है! लेकिन यह विडंबना ही है कि कोरोना महामारी के खूनी जबड़े में आज मनुष्य के साथ-साथ उसका यह बाजार और विकास फँसा पड़ा कराह रहा है| आज  कोरोना के समक्ष मनुष्य के गढ़े हुए उसके सुरक्षित जोन, यथा उसकी गढ़ी हुई राजनीति, उसके धर्म, सम्प्रदाय, उसके भगवान, उसका ऊपरवाला सब असहाय हैं| मनुष्य द्वारा निर्मित सारी विभाजक रेखाएं इस कोरोना के सामने अब बेमानी हो रही हैं|

खैर अभी ग़नीमत है कि हम अपने शहरों, सड़कों और गलियों के सूनेपन को देख पा रहे हैं, लेकिन कहीं ऐसा भी दिन न आ जाए जब इस सूनेपन के बीच ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं के कंगूरे ढह रहे हों और इन्हें देखने वाला कोई न हो!! 

रविवार, 15 मार्च 2020

लिल्लीघोड़ी पर सवार कौवा

          "आपके लेखन में साहित्यिकता नहीं है!"  लेखकीय मन से जुड़ने की कोशिश में मेरे सामाजिक सरोकार वाले मन ने मुझसे कहा। 
        "रात-दिन तुम्हारी चिंता में रहता हूँ और इसी कारण लेखकीय कर्म में निरत हूँ, फिर यह कैसे कह सकते हो?" मेरे अंदर का लेखक बोला। 
         "इसलिए कि आपका लेखन मुझे मान्यता दिलाने में असफल है.." मेरे सामाजिक सरोकार ने जैसे रूँआंसेपन से कहा। 
       "सरोकार महोदय! तुम्हें मान्यता की इतनी चिंता हो रही है! क्या बिना मान्यता मिले तुम सरोकार और मैं लेखक नहीं?" मुझे अपने सरोकारी भाव से चिढ़ टाइप हुई।
        "नहीं मैं सरोकार हूँ और रहुंगा, दरअसल तुम मुझसे सीधे आ जुड़ते हो, जबकि तुम्हें साहित्यकार बनना है न कि समाजसेवक! इसलिए साहित्यिक भाव से मुझसे सरोकार रखो, जिससे मूर्धन्य साहित्यकार तुम्हारे लेखन को व्याख्यायित कर अपनी मूर्धन्यता के साथ मुझे भी महिमामंडित कर सकें! क्यों क्या बात है, तुम खामोश क्यों हो गए?" मुझे हाँ-हूँ करते न देख मेरे सामाजिक सरोकार ने मुझे टोका।
       धीर-गंभीर मन:स्थिति में मैंने कहना चाहा, "देखो, एक तो मुझे तुम्हारी बात समझ में नहीं आई, दूजे मेरे लिखे से कोई महिमामंडित हो, इस बात से मेरा कोई सरोकार नहीं, समझे?"
        लेकिन वह, मतलब मेरे सामाजिक सरोकार ने, मुझे चिढ़ाने से बाज नहीं आया और कुटिल मुस्कान लिए बोला, "चलो मान लिया, तुम्हें अपने ही सरोकार से कोई सरोकार नहीं, लेकिन इसमें तुम्हारा नहीं तुम्हारे परिवेश और संस्कारों का दोष है। इस देश की माटी ही ऐसी है कि यहाँ लोग अपने नहीं दूसरे के सरोकार पर हाथ साफ करते फिरते है! और जो तुम ये कह रहे हो कि तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आई तो सुनो..
        ...वो क्या है कि! तुम सब समझते हो, नहीं तो तुम अपनी किताब का नाम "लिल्लीघोड़ी पर सवार कौवा" न रखते! भला किसी पुस्तक का यह भी कोई नाम हुआ!"
        मैं समझ गया कि मेरा लेखकीय सरोकार लथेड़ने की मंशा से आज मुझे कोंचने का अवसर छोड़ना नहीं चाहता। फिर भी मैंने सहज भाव से उसे समझाने की कोशिश की, "देखो जी, हम जो लिखते हैं वही साहित्यिक हो जाता है, रही बात शीर्षक की, तो साहित्यिक कर्म में प्रकाशक का भी हाथ होता है, इसलिए उसका भी कहा मानना जरूरी है! अन्यथा अपनी किताब का कोई दूसरा सरोकारी नाम देता!"
          "गुड..गुड..! तुम मुझसे सरोकार रखो, लेकिन वाया साहित्यिक-भाव से! अब देखना, तुम्हारी इस पुस्तक में लिल्लीघोड़ी पर सवार कौवे का मिलना भले ही असंभव हो लेकिन यह साहित्यिक टाइप का शीर्षक इस किताब का बिजनेस करवा ही देगी! यही मैं समझाना चाह रहा था कि लेखन भी इस शीर्षक जैसा ही होना चाहिए! जिसे पाठक नहीं साहित्यकार ही समझ पाएं! इसी में मुझ जैसे सरोकार और तुम जैसे लेखक की महत्ता है! इतनी छोटी बात तुम्हारा प्रकाशक समझ रहा है और तुम नहीं! यह घोर आश्चर्य का विषय है! लानत है तुम्हारे लेखन पर।" 
        बाप रे ! इसके साथ ही मेरे सरोकारी मन ने मेरे लेखक-मन को झिंझोड़कर रख दिया!! और मैंने लिल्लीघोड़ी पर कौवा की सवारी कराने की जैसे ठान भी लिया! उंगलियों में कलम फँसाए, अरे नही, इसे की-बोर्ड पर रखे हुए, साहित्यिक टाइप का भाव जगाने हेतु चिंतनरत हो गया।   

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

आरे में आरा

टहल-वहल कर लौटा तो झाड़ू-वाड़ू भी लगा डाली, क्योंकि बाहर की खर-पतवार पर क‌ई बार निगाह-सिगाह पड़ी थी। इसके बाद चाय-वाय पिया। अब इत्मीनान से बैठा हूँ। फेसबुक स्क्रॉल किया तो कुछ लिखकर पोस्ट करने के लिए मन ऐसे कुलबुलाया, जैसे अखाड़े को देखकर पहलवानी सूझे! 

सोचा, यह पहलवानी कर ही दी जाए, सो लिखना-फिखना शुरू कर दिया। लेकिन क्या लिखना है और क्या लिखे जा रहे हैं, यह तय-फय किए बिना; यानी लिखने के दांव-पेंच पर कोई विचार-फिचार किए बगैर ही अखाड़े में उतर पड़ा और हाथ-पांव चलाने लगा।

हां चाय-फाय पीते समय अखबार भी पढ़ रहा था। उसके पन्ने-सन्ने पलट-फलट ही रहा था कि एक पन्ने के किनारे छपे संपादक महोदय के 'खेद प्रकाश' पर निगाह पड़ गई।

मजे की बात यह कि ‘खेद प्रकाश’ भी किस पर! एक सच्ची बात जो छप गई थी, उसी पर!

दरअसल खेद प्रकाश कुछ यूँ था, अखबार के पिछले अंक में "एक वाक्य के अंश के रूप में 'अच्छाई पर बुराई की जीत' छप गया है, जबकि इसके स्थान पर 'बुराई पर अच्छाई की जीत' होना चाहिए था।"  संपादक महोदय ने लिखा था कि 'इस गलती का हमें खेद है।' 

यह ‘खेद प्रकाश’ पढ़-सढ़ लेने के बाद मैं सोचने लगा कि संपादक महोदय को खेद शायद मुद्रण-त्रुटि का नहीं, बल्कि उससे निकल आए सच का था!

तो भ‌इया, संपादक महोदय! इसपर खेद-फेद जताने की कोई जरूरत-फरूरत नहीं है। आजकल तो अच्छाई पर बुराई की जीत का ही जलवा है। और बुराई पर अच्छाई के जीतने की नौबत तब आती है, जब उस जीत-फीत का कोई खास अर्थ नहीं रह जाता! 

आपने शायद ध्यान नहीं दिया, मेरी बात की पुष्टि आप चाहें तो अपने ही अखबार में आज छपी इस खबर से कर सकते हैं, "आरे में पेड़ों की कटाई पर रोक।” जब मतलब भर के पेड़ों पर आरा चल गया, तब यह रोक-फोक लगी। 

देखा! पहले बुराई जीतती है, अच्छाई बाद में आती है; और यह अच्छाई भी अकसर जरूरत भर के लिए ही जीतती है। तब जीती हुई अच्छाई की हालत भी कुछ वैसी ही हो जाती है, ‘काम निकाल गया तो पहचानते नहीं।’ यानी वह नजर‌अंदाज करने लायक बनकर रह जाती है।!

तो, संपादक महोदय, खेद-फेद छोड़िए; गलती आपकी नहीं जमाने की है।

और यह जमाने वाले ही हैं कि अच्छाई और बुराई के पटका-पटकी के खेल में दोनों के लिए ताली बजता है! आरे में आरा चला तो विकास वाले ताली बजाए होंगे और जब आरा रुका तो पर्यावरण प्रेमी!

वैसे तो आप संपादक हैं, जानते ही होंगे कि अखबार भी आखिर बेचना ही होता है। व्यापार में अच्छाई और बुराई, दोनों को भुनाने का हुनर आपको भी खूब आता होगा! अब यहीं देखिए, आपके अखबार के पन्ने पलटते समय आपकी प्रस्तुति "आरती संग्रह" वाली पत्रिका फिसलकर जमीन पर गिर पड़ी। मेरी भक्ति भावना को जैसे ठेस लगी। मैंने बिना देर किए श्रद्धाभाव से उसे उठाया और उसके पन्ने पलटने लगा। 

खैर, उसमें छपी आरती इतने बारीक अक्षरों में थी कि आंखें गड़ाकर भी उन्हें पढ़ना मुश्किल था। लेकिन उसी पत्रिका में प्रकाशित विज्ञापन इतने बड़े और चमकीले अक्षरों में थे कि कोई चाहे तो उन्हें एक फर्लांग दूर से भी आराम से पढ़ ले!

तो संपादक महोदय, जैसे भक्ति के कवर पेज की आड़ में दुनियादारी का कारोबार चलता है, वैसे ही अच्छाई की जीत का डंका भी शायद इसलिए पीटा जाता है कि बुराई इत्मीनान से अपना काम करती रहे, है न?

सच तो यह है कि 'अच्छाई' ने ही बड़ी चालाकी से आरे को जरूरत भर के पेड़ काट लेने दिए। इसीलिए वह बाद में प्रकट हुई और पूरे ठसके के साथ घोषणा की, "देखो, यह हुई न बुराई पर अच्छाई की जीत!"

अब इस जीत पर ढोल पीटो, दशहरा मनाओ और अच्छाई की जय-जयकार करो। लेकिन इस उत्सव के बीच यह समझ में नहीं आता कि बुराई हारकर भी आखिर जीत कैसे जाती है और अच्छाई जीतकर भी हार कैसे जाती है! शायद इसीलिए कि अंततः सीता को वनवास भोगना ही पड़ता है।

तो, मेरे समझ से अच्छाई और बुराई की इस नूराकुश्ती में हार-फार या जीत-फीत को कैजुअली-फैजुअली ही लेना चाहिए। इस पर न तो खेद-फेद जताने की जरूरत है और न ही खुशी-फुशी मनाने की। 

यह बाजार और विकास, ये दोनों जुड़वा भाई ही तो हैं। अच्छाई और बुराई की इस पटका-पटकी के खेल के असली रेफरी भी यही हैं। ये जब चाहें, जिसकी चाहें, जीत पर सीटी बजा दें और हम दर्शकों को कभी रुलाएं, कभी हंसाए! 

#चलते_चलते

तो भ‌इया आज चलते-फलते मैं यही सलाह देता हूँ कि आप भी न, इस हार-जीत के चक्कर में ज्यादा न पड़ो आपको जिस बात में खुशी मिले, उसी पर खुशी मनाएं!

#सुबहचर्या

 (८.१०.१९)         

शपथ के मोड में!

            एक गाना मुझे बहुत पसंद है वह कि "भगवान...सुन दर्द भरे मेरे नाले" शायद संविधान में जनता के इसी 'नाले' को सुनने की व्यवस्था की गई है, जिसके तहत शासकों को पद और गोपनीयता की शपथ खानी होती है और शपथ खाते शासकों पर मेरा ध्यान फोकस हो जाता है। आखिर ये देश की जनता के 'नाले' सुनने के लिए भगवान जो बन चुके होते हैं! ऐसे शपथी अकसर खानदानी टाइप के ही होते हैं। वैसे भी अपने देश में खानदानियों का ही जलवा रहता आया है। ये, येन-केन-प्रकारेण पद्धति वाली अपनी शक्ति के प्रयोग से, पीढ़ी दर पीढ़ी शपथ खाने से लेकर खिलाने तक की शक्ति रखते हैं और घुमा-फिराकर इसे खाने का जुगाड़ भी फिट कर लेते हैं। इस देश में क्या नेता, क्या जनता! सभी जुगाड़ से काम चलाते हैं। 


          लेकिन यहाँ की बेचारी जनता को जुगाड़ का भी उतना शऊर नहीं ! उसे अपने भक्ति-भाव पर ही ज्यादा भरोसा होता है, तभी तो भगवान को प्रसन्न करने के लिए वह हजारों वर्ष तपस्या कर सकती है। दूसरे, भगवान से वरदान पाने की यदि ज्यादा जल्दी हो, तो वह मनमाफिक भगवान भी खोज सकती है, मतलब "जाकी रही भावना जैसी हरि मूरत देखी तिन्ह तैसी' टाइप से। खैर, इस जमाने में राजाओं वाला 'राजत्व-गुण' खानदानियों में ही पाया जाता है। और, जनता भी अपने भक्ति-भाव संम्पृक्त सांस्कृतिक-दयालुता के वशीभूत खानदानियों को राजत्व-विहीन नहीं देख पाती तथा पुनि-पुनि सिंहासनारूढ़ कराती रहती है। वैसे भी यह जनता करे भी तो क्या करे? खानदानी टाइप के राजनीतिक लोग तो पैदाइशी मुँह में सोने का चम्मच लिए जैसे शपथ खाए धरती पर अवतरित हुए रहते हैं, शपथ खाना इनके लिए औपचारिकता भर होता है! बिना इसका डोज लिए हुए भी ये काम चला लेते हैं।

         

          यदि किसी गैर-खान‌दानी ने, जनता को धता बताकर या भूले-भटके शपथ खा भी लिया हो तो, वह भी अपनी सात पुश्तों को खानदानी बना जाता है! क्योंकि खानदानीपन शक्ति के साथ राजत्व गुण मापने का भी पैमाना है और जिसके सामने जनता सिर झुकाती है।  इस शक्ति को जनता कम न आंके, इसलिए शपथ अकेले में नहीं, खानदानी-खानदानी मिलकर स्टेज पर बाकायदे समारोह पूर्वक शपथ खा और खिलाकर अपने राजत्व गुण का प्रदर्शन करते हैं, आखिर उन्हें भी यह पता होता है कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा! दरअसल जनता को और कुछ पता हो या ना हो, उसे यह तो पता ही होता है कि कोई ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा नहीं, यही बड़े खानदानी लोग उसकी समस्या हल कर सकते है। क्या है कि जनता इन खानदानियों को समस्याओं से दुनियां को सजाते हुए देख चुकी होती है, खैर।

     

           यहाँ उल्लेखनीय है भारत जैसे देश में 'किरपा' का बड़ा महत्व है, और घुरहू-कतवारू में किरपा बरसाने का गुण नहीं हो सकता, यह गुण राजा महाराजाओं से लेकर खानदानियों में ही रहा है। भारत की महती सभ्यता में माना गया है कि भगवान टाइप के लोग ही किरपा बरसा सकते हैं। इस प्रकार जो शपथ खा रहे होते हैं, मान लीजिए कि वे समस्याओं पर मुस्तैदी के साथ किरपा बरसाने जा रहे हैं और इनके शपथोपरांत सारी समस्याएं ठिकाने लग जएंगी। इसीलिए देशहित में समस्याओं के हलार्थ ये इतने चिंतित रहते हैं कि साल के तीन सौ पैंसठ दिन गुणे चौबीसों घंटे शपथ खाने के ही मोड में रहते हैं। मतलब बिना इसकी चिंता किए कि, हड़बड़-तड़बड़ में खाई गई चीज पचेगी भी या नहीं? ये आनन-फानन में भी शपथ खा लेते हैं। शपथ खाने के बाद जनता को राजत्व का बोध कराना और आसान हो जाता है। 

        

          अंत में इस बात पर और ध्यान फोकस कराना चाहता हूँ, जिसे मैं बचपन से ग्रहण करते हुए चला हूँ, यह कि कसम टूटने पर विद्या माई के प्रकोप से बचने के लिए स्कूली बस्ते को माथे से छुआ कर हम कहते जय विद्यामाई की। वैसे ही आज के लोकतांत्रिक भगवान 'भारत माता की जय' या फिर 'मंदिर गिरता फिर बन जाता' टाइप से बोलकर जनता के बीच उसके प्रकोप से बचते हुए अपने प्रति उसका आस जगाए रखते हैं।

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

आजादी का बखार

        जब १५ अगस्त २०१९ को तिरंगा झंडा फहराया जा रहा था, तो गर्व और देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत होते हुए मैंने सोचा था कि १९४७ में क्या खूब आज़ादी हमें मिली रही होगी, जैसे किसी गरीब भूमिहीन को बोरे भर भर अनाज मिल गया रहा हो।
      उस दिन दूर दराज के एक क्षेत्र में आजादी की जांच-परख करने जाना हुआ था तो वहां घिस‌इया दिखाई दिया था! वही घिस‌इया जो सड़क-चौराहे और गाँव-गिराव में चलते चलाते अकसर टकरा जाता है और जिसकी यदा-कदा चर्चा भी कर देता हूँ। उसे देखते ही मैं औचकते हुए पूँछ बैठा था, "अरे घिस‌ई, तू यहां कैसे, उस दिन तो तू शहर में मिला था!" घिस‌इया ने मुस्कुराते हुए, जैसे अपनी गरीबी पर फ़क्र करते हुए कहा था, "का गुरु, आप गरीबन को अस-तस समझते हो का, अरे ये आपको हर जगह मिल जाइहैं, बस आपका हृदै पवित्तर हो।" मैंने भी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया था, "हाँ सही कहा, अपने देश में गरीब भी भगवान की तरह सर्वव्यापी होते हैं न, और हाँ पवित्तर हृदै वाले ही गरीब खोज पाते हैं।" खैर, उस दिन तो जाँच पड़ताल करके मैं चला आया था, लेकिन इस पंद्रह अगस्त के दिन मेरे दिमाग में चकरघिन्नी की तरह यह प्रश्न नाच रहा था कि सन् सैंतालिस में बोरे भर भर मिली आजादी के वितरण में घिस‌ईया अपना हिस्सा पाने से छूटा क्यों? और मैं उसकी यादों के सहारे अपना भाषण बुनने लगा।
       असल में घिस‌इया के बाप-दादाओं से कहीं चूक हुई होगी। आजादी के मतलब से वे नावाकिफ रहे होंगे इसलिए उनकी दिलचस्पी आज़ादी के लिए मतवाले हो रहे लोगों को कौतूहल से देखने के सिवा और कुछ न रही होगी, और इसे लपकने में वे चूक ग‌ए। एक बात और, जिन्हें आजादी के मायने पता होता है वे ही नेता बनते हैं और बनाते हैं, फिर तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह बनने-बनाने का खेल चल निकलता है। इसीलिए नेताओं की पीढ़ियाँ सबसे ज्यादा आजाद होकर घूमती है। इन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे भारत देश इन्हीं के लिए आजाद हुआ है।
       वैसे ये करते भी तो क्या करते, इस भूखे नंगे देश में सभी को एक साथ आजादी बांटी नहीं जा सकती थी! ऐसा करने से अंग्रेजों से मिली आजादी का बखार खाली हो जाता और आजादी बांटने वालों के बच्चे भी घिस‌ईया की तरह आज मारे मारे फिर रहे होते। इसीलिए पंचवर्षीय प्लान के तहत शनै: शनै: आजादी बांटने की नीति अपनाई गई।   
         फिर क्या था आजादी के मालिकों में अंग्रेजों के लटके-झटके आ ग‌ए और अपनी मदद के लिए ये अंग्रेजियत की फौज खड़ी करते ग‌ए! इस फौज के साथ मिलकर ये आजादी का लुत्फ उठाना शुरू कर दिए। इनके लुत्फ पर कोई और मालिकाना हक़ न जताए इसलिए लबादे बुने ग‌ए, जैसे धर्म, भाषा, क्षेत्र, और तो और एक मायने में जाति के भी, क्योंकि नेताओं की आजादी के लिए ऐसे लबादे बेहद जरूरी हुए। इन लबादों को जनता की ओर उछाला गया, जिन्हें ओढ़-ओढ़ कर पगलाई-धगलाई जनता स्वतंन्त्रता की फुल अनुभूति प्राप्त करती रही है। कुलमिलाकर हुआ यह कि जैसे इन लबादों को बुनने के लिए ही हम स्वतंन्त्र हुए हों। 
       उस दिन गांव में आजादी की जाँच-परख करते करते मेरी निगाह बिना तार के बिजली के खम्भों पर चली गई, गांव वालों ने बताया आजादी के बाद से अभी तक बिजली नहीं आई, तो मैंने कहा "जैसे खम्भे गड़े वैसे बिजली भी आ जाएगी, थोड़ा गम खाओ, आजादी धीरे-धीरे आती है न।" इसी समय 'इंजिनियर कम ठेकेदार' ने कहा, "साहब, यह इंटरलाकिंग ईंटों की रोड मंदिर तक बना दिया है। आइए मंदिर तक चलें।" मैंने मंदिर की ओर जाती उस सड़क को निहारा जिसके एक ओर बस्ती तो दूसरी ओर खेत थे, लेकिन मुझे लगा इससे ज्यादा ज़रूरी उस गांव को जोड़ने वाले कच्चे रास्ते पर पुल की थी, क्योंकि बारिश के पानी ने रास्ते को काटकर तालाब में बदल दिया था। मैंने इंजीनियर की ओर देखते हुए कहा, "पहले पुल बनना चाहिए था।" तब तक साथ चल रहे मंदिर के पुजारी जी ने कहा, "आइए, मंदिर तक तक चलें.." पुजारी की ओर ध्यान से देखते हुए मैंने उसे जर्जर और निष्प्रयोज्य शौचालयों को दिखाते हुए कहा, "अच्छा ये बताइए, ये जो शौचालय बने हैं ध्वस्त होने के कागार पर हैं, कभी गांववासियों को इनका प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया है? नहीं किया है न, तो मंदिर तक मैं क्या जाऊँ! एक बात और पुजारी जी, इस गांव में कितनी गंदगी है! देख रहे हैं न, यहां के लोग बीमार जैसे दिखाई दे रहे हैं, कभी आपने इन्हें समझाया है कि अपने आसपास और स्वयं को साफ-सुथरा रखो? नहीं समझाया है न! तो आपके माथे के इस तिलक का कोई मतलब नहीं!" और वहां से चल दिया था।
         दरअसल यह सब मैंने झटके में बोल दिया था जिसके दो कारण थे। पहला, मंदिर में चढ़ावे के लिए मेरे जेब में प्रर्याप्त 'आजादी' नहीं थी, इसलिए मंदिर तक नहीं गया। दूसरे मुझे इस गांव में फुल आजादी का दर्शन नहीं हुआ। लेकिन पुजारी जी इसके बावजूद मुझे सुनकर मुस्कुरा रहे थे! उनकी इस मुस्कुराहट को मैंने उनके 'धर्म' का बड़प्पन माना जो मेरे प्रति 'क्रूर' नहीं हुआ।
       अरे हां! लबादे की बात पर मैं एक बात भूला ही जा रहा था, वह है स्वतंन्त्रता का लबादा! इस लबादे को बौद्धिकों के संम्प्रदाय के लोग ज़्यादा पसंद करते हैं! ये लोग क्रूरता में भी लोकतंत्र तलाशते हैं, तो गरीबी को आजादी का प्रतीक मानते हैं। यह बौद्धिक संम्प्रदाय जबरदस्त मानवीय होता है। इसमें लेखक, पत्रकार, मानवाधिकारवादी और स्वतंन्त्रता की चाह रखने वाले न जाने कौन-कौन से लोग शामिल हो जाते हैं और ये सुबह-शाम हुँहुँवाते रहते हैं। मुझे लगता है जब इनके जेब में 'आजादी' की कमी होती है, तभी हुँवा-हुँवा करते हैं अन्यथा घिस‌इया जैसों से, जो सत्तर साल से यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई देता रहता है, ये कोई मतलब नहीं रखते। हां, बात की खाल निकालना ये खूब जानते हैं, लेकिन किसी समस्या का हल इनके पास नहीं होता! आजादी का ठेका न मिल पाने पर ये अकसर आजादी के 'कस्टोडियनों' के उठने-बैठने और उनकी हरकतों पर ही फोकस्ड होकर उसमें अपनी 'आजादी' ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन ये बौद्धिक संम्प्रदाय के लोग शेर के सामने मिमियाते हैं। अपनी आजादी का ये ऐसे ही प्रयोग करते हैं।
      खैर, उस गाँव से लौटते ही मुझे अपनी 'आजादी' की फ़िक्र हुई तथा मैं घिस‌इया और उसके गाँव को भूल गया, क्योंकि घिस‌ई या उसके गांव की आजादी में वृद्धि से मेरी आजादी कम होती। वैसे भी इस देश में दो लोगों की आजादी में परस्पर समानांतर रेखाओं जैसा नहीं, तिर्यक रेखाओं जैसा संबंध होता है। इसलिए इनको भूलकर केवल लिखने और भाषण देने के लिए मैंने उसे और उसके गांव को अपनी यादों में सुरक्षित कर लिया।

क्या बेवकूफी की बातें हैं!

         ऊपरवाला बड़ा करामाती होता है, नीचे वालों को नचाता रहता है। यह नीचे वाला बाकायदे बाजे-गाजे के साथ नाचता है। हालांकि यह ऊपरवाला कहीं नजर नहीं आता, इसके ऊपर होने का यही प्रमाण है कि हम इसे मानते हैं कि यह ऊपर है। कभी-कभी लोग हममें-तुममें सबमें इसके होने को प्रमाणित करते हैं, मतलब यह ऊपरवाला ऊपर-नीचे सबमें है। ऐसा हम इसे स्वप्रमाणित भी मानते हैं, हाँ इसके होने के लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं, सोच लेने भर से यह सिद्ध हो जाता है, नहीं तो ऐसा हम सोचते ही न, कि यह है। इसीलिए इस जगती का प्रत्येक चिंतनशील प्राणी अपने तर्कों को अपना परम सत्य मानकर स्वीकार किए बैठा है। ये अंतहीन लत्तेरे की-धत्तेरे की बहसें, इसी ओर संकेत करती है कि मेरी बात मेरे दिमाग से निकली है, तो जरूर मेरी बात का अस्तित्व है, बाकी, सारा डिबेट बेवकूफ बनाने के लिए होता है। 
       
         अब होना और करामाती होना दो चीजें हैं, किसी के होने से ही वह करामाती सिद्ध नहीं होता। ऐसे तो सभी हैं, तो क्या सब करामाती हैं? नहीं हैं न ! तो करामाती होने के लिए ऊपर होना जरूरी है, ऊपरवाला ही करामाती हो सकता है। यह ऊपरवाला ही है, जो नीचे वालों को अपनी अंगुलियों पर नचाता है, भले ही उसकी अंगुलियाँ किसी ने न देखी हो। दरअसल नीचे वालों को तमाम व्याधियों से बचे रहने के लिए, ऊपरवाले की अनदेखी-अंगुलियों के इशारे पर नाचना ही होता है। एक बात है इस ऊपरवाले के चक्कर में ये नीचे वाले ऐसे झूमते-गाते हैं जैसे मनोरोगी!
       
         यह ऊपरवाला वाकई करामाती है, और नहीं तो इसकी माया के वशीभूत हम नाचते न। यह मनोरोग नहीं, मायामय हो जाना है, इसी से ऊपरवाले का अस्तित्व पहचान में आता है !! इस ऊपर वाले के चक्कर में एक बात कहना है, ऊपरवाले और नीचे वाले के बीच इस मनोरोग या यूँ कह लें माया का ही संबंध है। यह संबंध हमें वहां तक ले जाता है कि प्रत्येक ऊपरी चीज हमें इस ऊपरवाले से कम प्रिय नहीं होती। यही कारण है, सब इसके लिए नाचते हैं और इसको पाने के लिए ऊपरवाले का संरक्षण चाहते हैं, जो अदृश्य होते हुए भी अपने नीचे वालों को संरक्षित किए रहता है।
       
        कभी-कभी हमें यह भी आश्चर्य होता है कि जिसके लिए हम इतना कूदते-फांदते हैं, रोते-गाते-हँसते हैं, छीना-झपटी पर भी उतरते हैं , वह तो सिद्ध-असिद्ध से ऊपर की चीज है। वैसे भी ऊपर की चीजें सिद्ध-असिद्ध के पचड़े में नहीं लाई जा सकती। बस इसपर केवल नाचा या कूदा-फांदा जा सकता है, और इसे देखकर ही ऊपरी-तत्त्व के अस्तित्व का अनुमान किया जा सकता है, क्योंकि ऊपर की हवा जिसे लग जाती है, उसकी हालत विचित्र हो जाती है।

           आजकल सकल हिन्दुस्तान को ऊपर की हवा लगी हुई है। सभी को दिव्य अनुभूति प्राप्त हो रही है, सब नाच-गा और कूद-फांद रहे हैं। बड़ी विचित्रता है अपने हिन्दुस्तान में !  एक अजीब सा आध्यात्मिक भाव पसर आया है हिन्दुस्तान में !! हां बड़ा शोर है यहां, कुछ भी पकड़ में नहीं।

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

जीडीपी में परिवर्तन

       आजकल इस देश में जीडीपी के गिरने पर खूब हो-हल्ला मचा है, देश पीछे जा रहा है। अब जब देश पीछे जाएगा, तो कहाँ जाएगा? अगर इस ग्लोब पर देखोगे तो, अमेरिका और भारत भी आपस में आगे-पीछे होते रहते हैं ! चूँकि मामला अर्थव्यवस्था से जुड़ता है, इसलिए पीछे जाने का मतलब आज की अपेक्षा गरीब होने से लगाना यथोचित जान पड़ता है। अब जब देश गरीब होगा तो निश्चित ही इसका समय पीछे की ओर जाएगा। जो पाषाण युग तक देश को पीछे ले जा सकता है, क्यों है न? 
      तो हम मानते हैं, जीडीपी का गिरना इस देश को बाईसवीं सदी की बजाय एक बार फिर पीछे की ओर बीसवीं शताब्दी में ढकेल देगा और निनिहाते भारत का एक बार फिर दर्शन सर्वसुलभ होगा। आखिर क्यों नहीं होगा ? जब अर्थव्यवस्था डाउन होगी तो यही होगा। कुल मिलाकर समय परिवर्तन होगा ही और जीडीपी के गिरने के अनुपात में होगा। जितना यह गिरता जाएगा उतना देश का समय पीछे की ओर खिसकता जाएगा।
          अब अगर ऐसे ही जीडीपी का गिरना जारी रहा तो बीसवीं के बाद अट्ठरहवीं से उन्नीसवीं और फिर सत्रहवीं शताब्दी होते हुए देश की अर्थव्यवस्था मुगलकाल में पहुँच जाएगी। ऐसे में यहाँ एक बात ध्यातव्य है, आज इसके गिरने पर जो फूले नहीं समा रहे हैं, तब यही लोग गिरते-गिरते मुगलकाल की अवस्था तक आई जीडीपी को यहाँ से और नहीं गिरने देना चाहेंगे। तब धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर जीडीपी के स्थिर हो जाने की ये प्रार्थना करेंगे! मतलब धर्मनिरपेक्ष अर्थशास्त्रियों को आज की रेट की तुलना में मुग़ल काल तक ले जाने वाले जीडीपी का रेट स्वीकार होगा। लेकिन तब भक्त टाइप के अर्थशास्त्रियों को यहाँ भिनभिनाने का अवसर मिल जाएगा ! और ये बेचारे जो आज इसके गिरने से तमाम लानत-मलामत तथा ताने झेलकर चिंतित हुए जा रहे हैं, तब जीडीपी के गिरावट को भारत की सेहत के लिए रामबाण औषधि घोषित कर देंगे, क्योंकि वे नहीं चाहेंगे कि भारत की अर्थव्यवस्था मुग़लकाल में स्टे करे।
            मुगलकाल तक पहुंचकर स्थिर हुई जीडीपी के स्तर से दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री खुश होने से रहे। यहाँ आकर जीडीपी की छीछालेदर एक बार फिर तय मानिए। इसकी ऐसी खींचतान शुरू होगी कि दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री इसके गिरने के स्तर को, मुगलकाल से और नीचे ले जाकर भारत के सोने की चिड़िया होने वाले युग में पहुँचाना चाहेंगे। लेकिन वहीं वामपंथी अर्थशास्त्रियों को यह स्थिति नागवार गुजरेगी, क्योंकि इनके अनुसार इससे भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के साथ यहां आजादी और लोकतंत्र को भी खतरा पहुँचेगा। वहीं लगे दाहिने हाथ, दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री जीडीपी को और न गिरने देने की वकालत करने वालों को राष्ट्रद्रोही सिद्ध कर देंगे, इनके अनुसार आखिर क्यों न पहुँचे भारत अपने सोने की चिड़िया वाले युग में! 
           अब जरा कल्पना करिए कि युगों से इस देश के जीडीपी की कितनी उठक-बैठक हुई होगी ! लेकिन पहले यह मसला दक्षिणपंथी और वामपंथी अर्थशास्त्रियों के बीच का नहीं रहा होगा। गरीब बेचारा अपनी गरीबी से संतुष्ट रहा होगा, इसीलिए इतिहास में इसपर इतना हो-हल्ला मचने की जानकारी दर्ज नहीं है। लेकिन इधर जब से विकास को राजनीति का हथियार बनाया जाने लगा है तब से अर्थव्यवस्था के आँकड़ो को गरीबों को दिखाना जरूरी हो चला है कि देखो इस सरकार ने तुम्हारी स्थिति सुधारी कि बिगाड़ी है। लेकिन इन आँकड़ों को देख सुनकर गरीब यह नहीं समझ पाते कि इसे लेकर वे हँसें कि रोयें। यहीं पर आकर मुझे इस बात की चिंता होती है कि इस पर मचे हो-हल्ले से, यदि कहीं इस देश का गरीब जाग गया तो वह जीडीपी को मनरेगा जैसी कोई योजना न समझ बैठें !
          खैर, मुझे जीडीपी और अर्थव्यवस्था पर पड़ते इसके प्रभाव का ज्ञान नहीं है। लेकिन मैं भी, जब से लोग जीडीपी-जीडीपी चिल्लाने लगे हैं, तब से इसे मनरेगा जैसी कोई योजना ही समझने लगा हूँ। साधारण भाषा में इसे हम इस तरह समझा सकते हैं कि भारत जैसे देश में जीडीपी के बढ़ने या घटने से केवल गरीबों के पतरी (पत्तल) चाटने पर असर पड़ता है। अगर बढ़ गई, तो चाटने को कुछ ज्यादा मिल सकता है और घट गई तो चाटने भर को भी कुछ नहीं बचेगा, क्योंकि यहां जो गरीब नहीं होता उसका पेट बहुत बड़ा होता है, और सारी जीडीपी उसी के पेट में जाती है, जैसे मनरेगा की मजदूरी! इसीलिए गरीब बेचारे जीडीपी से मतलब नहीं रखते। इस पर ज़्यादा चर्चा करना दक्षिणपंथी और वामपंथी अर्थशास्त्रियों के खेल को शह देना भर है, जो राजनीति करते हों वही शह-मात का खेल खेलें।