शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

आखिर इनको किस तरह की कानूनी सहायता दी जाए...



           आज 10 अक्टूबर है यानी “विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस” इस अवसर पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण महोबा द्वारा जिला चिकित्सालय परिसर में मानसिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के सहायतार्थ विधिक जागरूकता गोष्ठी का आयोजन किया गया|
         
                विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम १९८७ की धारा १२ (डी) के अंतर्गत मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति निःशुल्क विधिक सहायता के अधिकारी हैं|वे स्वयं अथवा उनकी तरफ से उनके रिश्तेदार अथवा संरक्षक निःशुल्क विधिक सहायता के लिए प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत कर सकते हैं|
         
                   इस गोष्ठी में मुझे भी जाने का अवसर मिला| गोष्ठी में विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए-
       
                डाक्टर गुप्ता ने सर्वप्रथम मानसिक स्वास्थ्य के सम्बन्ध में प्रकाश डाला उनहोंने मेडिकल साइंस में प्रचलित रोगों के नाम का उल्लेख करते हुए इस पर प्रकाश डाला| लेकिन उनके वक्तव्य की एक बात मुझे याद रही| तीन प्रकार के स्वास्थ्य (1)मानसिक स्वास्थ्य, (2)शारीरिक स्वास्थ्य और (3)सामाजिक स्वास्थ्य बताते हुए कहा कि शारीरिक स्वास्थ्य तो दवाओं से ठीक हो सकता है लेकिन मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए सामाजिक स्वास्थ्य को भी ठीक रखना होगा| डाक्टर साहब के कथन का आशय यह भी था कि एक खराब समाज भी व्यक्ति को मानसिक रोगी बना देता है|

              इसके बाद ए.एस.पी. साहब ने बताया कि जब हम निर्णय नहीं ले पाते तब हमारा मानसिक स्वास्थ्य खराब माना जाता है|
        
          मुझे भी इस गोष्ठी के अवसर पर कुछ बातें रखने के लिए कहा गया| मैंने भी कहा कि हमें ऐसे व्यक्तियों की पहचान करते हुए उनके साथ अपने व्यवहार को संवेदनशील बनाएं रखें क्योंकि कभी-कभी हमारा व्यवहार ऐसे व्यक्तियों को खराब मानसिक स्वास्थ्य से उबरने का मौका प्रदान करता है और फिर उनमें भी निर्णय लेने की क्षमता आ जाती है| मैंने उदाहरण के रूप में अपने बचपन की यह घटना सुनाई –एक बार हम तीन-चार बच्चे आपस में कुश्ती की प्रतियोगिता का खेल खेलने का निश्चय किए इस क्रम में एक बच्चा एक दूसरे बच्चे को बार-बार पटकनी दे रहा था लेकिन वह अपनी हार मानने के लिए तैयार नहीं हो रहा था और पुनः लड़ने के लिए तैयार हो जाता...फिर हमने उस बच्चे से हारना तय किया..और वह मिली इस जीत से खुश गया था| मैंने अपने वक्तव्य में यह भी बताया कि मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों के भी विधिक अधिकार प्राप्त होते हैं तथा लोगों को मानसिक समस्या से पीड़ित व्यक्तियों के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों का हनन न हो पाए इसके लिए जागरूक रहना चाहिए तथा आगे बढ़कर सहायता करनी चाहिए|  

               सी.एम.ओ. साहब ने कहा कि पागल किसी को नहीं कहना चाहिए| व्यक्ति की कुछ मानसिक समस्या हो सकती है, इसे समझना चाहिए|

              ए डी. जे. साहब ने भी इस गोष्ठी के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए उन व्यवस्थाओं की चर्चा की जिनसे ऐसे व्यक्तियों को मदद मिल सकती है| उन्होंने यह भी बताया कि वास्तव में कभी-कभी मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति के लिए समस्या बन जाती है ऐसी स्थिति में व्यक्ति कुछ समझने के लिए तैयार ही नहीं होता इस सम्बन्ध में एक कहानी सुनाई...एक बार एक व्यक्ति ने कहा कि मैं मर गया हूँ, उसे लोग बार-बार समझाने का प्रयास कर रहे थे कि नहीं तुम जीवित हो लेकिन वह मानने के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था...तब किसी ने कहा कि तुम्हारा शरीर गर्म है तुम जीवित हो इस पर वह बोला मेरा शरीर गर्म है तब तो मैं मर चुका हूँ..फिर किसी ने उसे सूई चुभो कर निकलते खून को दिखाते हुए कहा कि देखो जीवित के ही खून निकल सकता है इसलिए तुम जीवित हो इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे खून निकल रहा है इसलिए मैं मर चुका हूँ...आशय यह कि वह किसी भी रूप में दूसरों की बात मानने के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था ऐसे व्यक्तियों को समझाना भी कठिन होता है...


           गोष्ठी समाप्त हुई... मुझे लगा “मर चुके हैं” माननेवाले जैसे लोग अब अपने देश में बढ़ते जा रहे हैं उनपर किसी बात का असर नहीं होता यह सोचते ही मुझे अपने देश के सामजिक स्वास्थ्य की चिंता होने लगी..और अब तो राजनीतिक स्वास्थ्य भी गड़बड़ हो गया है...आखिर  इन सब इन सब का स्वास्थ्य कैसे सुधरे..? इनको किस तरह की कानूनी सहायता दी जाए..?    

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