मंगलवार, 26 सितंबर 2017

बांध-संस्कृति

  "बंधवा पर महवीर विराजै" बचपन में जब इसे सुना था तब तक बांध से परिचित भी नहीं हो पाया था! इसी दौरान उपमन्यु वाली कहानी जरूर पढ़ी थी और जाना था कि, छोटी सी कोई "बंधी" पानी रोकने के भी काम आती है और ऐसी बंधियों की कितनी जरूरत होती है इसका अहसास उपमन्यु की कथा पढ़कर हो गया था! वाकई!  तब ये छोटी-छोटी बंधियाँ एकदम समाजवाद टाइप की होती होंगी। 

          इसके बाद उस "महवीर" वाले "बँधवा" से परिचित हुआ था! वो क्या कि मैंने सुना था, सन अठहत्तर के बाढ़ में इलाहाबाद में गंगा के बढ़ते जलस्तर को देखकर किसी बड़े इंजिनियर ने इलाहाबाद के डी एम साहब को उसी बाँधवा को काटने का सलाह दिया था कि, इससे बाढ़ का पानी फैल जाएगा और जलस्तर घट जाएगा.. लेकिन डी एम साहब ने यह कहते हुए मना कर दिया था कि "भइ, अगर बाढ़ के कारण बाँध को कटना ही है तो वह वैसे भी कट जाएगा..इसे काटने की जरूरत नहीं.." खैर, इसके बाद गंगा का जलस्तर घटना शुरू हो गया था और "बँधवा" कटने से बच गया था..!  मतलब ऐसे होते हैं हमारे बड़े-बड़े इंजीनियर और इनकी सलाह!! इसी तरह की सलाहों से बड़े-बड़े बाँध बनाए जाते होंगे।

          हाँ, अब तक तो अच्छी तरह से बांधों से परिचित हो चुका हूँ..इनमें रुके पानी से अपन गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत से ऊँचाई से टारबाइन पर गिरते पानी से बिजली बनते हुए जाना है। गुरुत्वाकर्षण-बल ही वह कारण है जिससे कोई भी ऊपर की चीज नीचे चली आती है। यह सहज गति है, प्राकृतिक गति है। हमारी जनता-जनार्दन प्रत्येक पाँच वर्ष बाद कुछ लोगों को पलायन-वेग की गति से ऊपर प्रक्षेपित कर देती है। ये नीचे से ऊपर स्थापित हुए लोग गुरुत्व-बल के विरोधी बन जाते हैं और चीजों पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण-बल धरा का धरा रह जाता है। यही ऊपर पहुँचे हुए लोग नीचे वालों के लिए बड़े-बड़े बाँध बनाते हैं और उसमें फाटक भी लगाए होते हैं तथा चीजों को नीचे आने के लिए अपने मनमाफिक ढंग से फाटक को खोलते और बंद करते हैं..! तदनुसार ही नीचे वाले हरा-भरा और सुखी होते रहते हैं। मतलब, अगर आप को भी बांध से परिचित होना है तो गुरुत्वाकर्षण के विरोधी बनिए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में घुसकर देखिए, नीचे से पलायित होइए...पता चल जाएगा!! 

     

          इधर अपन भी बाँधों के आसपास घूमकर जायजा ले चुके हैं.. वह क्या कि इन बाँधों के आसपास खूब हरियाली रहती है...इस हरियाली को देखकर मेरा भी मन "लकदक" हो जाता है! मेरा मानना है कि बाँध से दूर वाले इस सब्जबाग को देखकर अपना भी मन लकदक कर लेते होंगे, तभी तो अपने देश में "बाँध-संस्कृति" चल पड़ी है! यह "बाँध" बनाना इसलिए भी जरूरी है कि, इस पृथ्वी पर जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी है, वैसे-वैसे पूंजीवाद भी बढ़ता गया है और छीनाझपटी शुरू हो गई, परिणामस्वरूप अब "मेड़बंधी" से काम चलने वाला नहीं है। इस पूँजीवादी जमाने में मेड़बंधी तो समाजवादी प्रवृत्ति है, इसका त्याग कर बड़े बाँध वाली संस्कृति अपनाना अब अपरिहार्य हो चुका है। 

         ये बड़े बाँध हमें प्रतिकूल परिस्थिति में सुरक्षा का वैसे ही भरोसा देते हैं जैसे कि, जनता से अर्जित ताकत के बल पर ऊपर जाता गुरुत्व-बल का विरोधी कोई नेता नीचे वालों को आश्वासन देता है! इस बाँध-संस्कृति ने जनसंख्या-वृद्धि और समाजवाद के आपस के व्युत्क्रमानुपाती संबंध का खूब फायदा उठाया, जिसमें आदमी का विस्थापन होता है। तो, यहाँ हर व्यक्ति दूसरे को विस्थापित कर अपने लिए बाँध बनाकर उस पर फाटक लगाए बैठा है!

ब्राह्मणवाद

उस दिन एक नए ज्ञान की प्राप्ति हुई थी...वह इस प्रकार है...

             एक बात तो है, जो ग्यानी-ध्यानी होते हैं लोग उनका बहुत सम्मान करते हैं। अब ग्यानी-ध्यानी कौन होता है? यह वह शख्स होता है जो सामनेवाले का कर्म-अकर्म और उसकी छल-छद्म जानने की शक्ति रखता है। इस शक्ति को वह अपने चिंतन-मनन और अनुभव से अर्जित कर लेता है, और यह तभी संभव होता है जब उसे करने को कुछ न हो। धीरे-धीरे ऐसे ही ग्यानी-ध्यानी को "ब्राह्मण" से नवाजा गया और ये समाज में सम्मान के पात्र और पूजनीय हुए। खैर..यहाँ मतलब किसी जाति से नहीं है और जाति वाले इसे दिल पर भी नहीं लेंगे। 

            अब समाज में हर तरह के लोग तो होते ही हैं तो, प्राचीन काल से ही हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे भी रहे हैं, जो अपने कर्म-अकर्म या छल-छद्म से अर्जित शक्ति के बल पर आमजन पर अपनी मनमानियाँ थोपते आए हैं। अपने यहाँ का आमजन निरा बेवकूफ जो ठहरा! वह ऐसी मनमानियों को डर वश कभी अपनी नियति माना तो कभी अपने कर्मों का फल और फिर सब कुछ सहता रहा। असल में हुआ यह कि यह ज्ञानी-ध्यानी "ब्राह्मण"  सदैव सम्मान का भूखा रहा है जैसा कि अकसर ज्ञानियों की आदत में होता है कि, जब तक इनका यथोचित सम्मान न हो जाए तब तक इन्हें अपने ज्ञानी होने का अहसास भी नहीं होता और इस प्रकार ये सदैव अपने ज्ञान का ही अहसास करते रहना चाहते हैं..! 

            हाँ तो, अकर्मी-विकर्मी या छल-छद्मी की मनमानियों का शिकार आमजन, इन ज्ञानियों या कहें "ब्राह्मणों" की ओर, अपने ऊपर होते इन मनमानियों से त्राण पाने के लिए देखा भी होगा...लेकिन हुआ क्या..? हुआ यह कि, ये महाशय ज्ञानी-ध्यानी सम्मान के भूखे "ब्राह्मण" सम्मान पर बिक गए..क्योंकि अकर्मी-विकर्मी या छल-छद्मी जैसे लोग इन ज्ञानियों को विधिवत किसी आसन पर आसीन करा इनके पाँव पखारते हुए थाल में रोली-चंदन-अक्षत सजाकर चढ़ावे के साथ इनके माथे पर टीका लगाने लगे... और फिर इन ज्ञानियों का ज्ञान आशिर्वाद बन कर इन अकर्मी-विकर्मी और छल-छद्मियों पर ही फूटता रहा तथा यहीं पर इस सम्मान के समक्ष इनका ज्ञान मौन होता रहा। उधर मनमानियों के शिकार आमजन ऐसे "ब्राह्मणों" के ज्ञान से ठगे जाते रहे।

           हाँ, होना तो यह चाहिए था कि इन ज्ञानी-ध्यानी "ब्राह्मणों" को अपने ज्ञान-शक्ति को, अकर्मी-विकर्मी तथा छल-छद्मियों की मनमानियों के शिकार लोगों के हाथों में हथियार बनाकर पकड़ा देना चाहिए था...लेकिन जो नहीं हुआ, बल्कि ये अपने "पूजनीयपने" में ही मस्त हो गए..! यही तो हुआ "ब्राह्मणवाद"..!!!

          मतलब "ब्राह्मणवाद" और कुछ नहीं, बस किसी अत्याचारी-अनाचारी और छल-छद्मी की करतूतों को उजागर न कर उससे चढ़ावे के साथ अपने माथे पर रोली-चंदन-अक्षत का टीका लगवा लेना और इस सम्मान से गद्गद होकर उल्टे उसे ही आशिर्वाद देकर निर्भय बना देना है। 

           मित्रों! इस "ब्राह्मणवाद" को किसी जाति-धर्म तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए...यह प्रवृत्ति किसी भी समाज, संस्था या तंन्त्र में दिखाई पड़ सकता है...यह "ब्राह्मणवाद" ही है जो रोली-चंदन-अक्षत और चढ़ावा ग्रहण कर सब को मौन बना देता है..! और किसी पिछड़े क्षेत्र में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से दिखाई पड़ती है। 

           हाँ, एक बात और...जो "ब्राह्मणवाद" से प्रभावित नहीं होता मुखर होता है, उसके पग-पग पर काँटे बिछाये जाते हैं...कुछ कलम के सिपाही इसके शिकार हो जाते हैं और "ब्रह्मणवादी" लोग उन्हें अपने रास्ते से हटाने का प्रयास करते हैं। 

              तो, अपने-अपने क्षेत्र के "ब्राह्मणवादियों" को पहचानिए...

रविवार, 24 सितंबर 2017

निजता के पैरोकार

           इस देश का गजबै हाल है..किसी की निजता उसे कहाँ से कहाँ ले जाकर खड़ी कर देती है..! हमको तो ई लगता है कि अपन का सुपरीम कोरट ई बात जानता है क्योंकि, उसे भी लगता है, जब हमारा संविधानइ जब व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की बात करता है तो, हम काहे इसमें रोड़ा बनें,  आखिर बिना निजता के व्यक्ति में स्वतंत्रता और गरिमा का प्रवेश हो ही नहीं सकता! तो, कोरट ने झट से निजता को मौलिक अधिकार मान लिया। मानो, अब अपनी गोपनीयता बरकरार रखते हुए खूब स्वतंत्र होकर अपने गरिमा में वृद्धि लाइए..! 

         लो भइया! अभी ये निजता के पैरोकार भाई लोग, खुशी भी नहीं मना पाए थे और निजता पर पहाड़ जैसा टूट पड़ा! ये बाबा लोग भी न, निजता का गुड़ गोबर किए दे रहे हैं..गोपनीयता बरतते-बरतते बाबा तो बन जाते हैं, लेकिन गोपनीयता भंग होने पर बवाली बन जाते हैं। इसका मतलब तो यही निकलता है कि, निजता के ये पैरोकार होते हैं बड़े बवाली..कोई माने या न माने...! शायद कोरट भी यह भांप चुकी है, इसीलिए एक तरफ निजता की चादर देती है तो, दूसरी तरफ चादर सरकने पर यह सरेआम नंगा कर जेल भिजवा देती है..!! मतलब अब आप कहीं यह न कह बैठो कि भाई, यह कोरट तो निजता की कोई इज्जत ही नहीं करती..!

          एक बात बताऊँ..लेकिन अवमानना के लिए क्षमाप्रार्थी होकर.. वह यह कि, उस दिन हमें अपनी न्यायपालिका पर बहुत गुस्सा आया था, निजता के पैरोकारों को उछलते देखकर..! तब मैंने यही सोचा था.. "निजता को मौलिक अधिकार बताकर, अब हमारी न्यायपालिका भी बाबागीरी पर उतर आई है" 

          लेकिन, अपनी न्यायपालिका तो बड़ी चतुर-सुजान निकली, है न?  बिल्कुल कान को घुमाकर पकड़नेवाली है! अगर निजता को मूलाधिकार न मानती तो, अपनी निजता की अक्षुण्णता के बल पर धुरंधर बनने वाले ये बड़े-बड़े लोग यही कहते, "भई, अपने देश में लोकतंत्र का हनन हो रहा है..देश अलोकतांत्रिक बना जा रहा है..न्यायपालिका कुछ कर ही नहीं रही।"

        हाँ, यही सब सोच-विचार कर न्यायपालिका ने कहा, "लो भाई! निजता में लिपटे हुए खूब लोकतांत्रिक बनो, लेकिन निजता हटते ही सलाखों के पीछे तुम्हारी स्वतंत्रता बैठ कर रोएगी भी" और यही कहते हुए कोरट ने बेचारे बाबा को रुला दिया..!! 

       मतलब भइया,  मैं तो कहुंगा, "निजता के ऐ पैरोकारों!  इस न्यायपालिका के झाँसे में मत आओ, नहीं तो निजता-फिजता के चक्कर में किसी दिन यह आपकी स्वतंत्रता भी छीन लेगी।" 

        भाई!  यह सबको पता है.. इस देश के अधिकांश लोग, निजता-विहीन लोग ही हैं...इनके घरों में जाइए तो इनके घरों के दरवाजे खुले मिलते हैं..साँकल भी नहीं चढ़ी होती..इनके चूल्हों तक झाँक लीजिए.. इनके पास छिपाने को कुछ नहीं है...ये बिना निजता के गरिमा-विहीन लोग होते हैं...इनकी स्वतंत्रता दूसरों के रहमोकरम पर निर्भर होती है..और वहीं ये निजता वाले गरिमावान लोग, इन बेचारों की गरिमा और स्वतंत्रता दोनों को खाए हुए बाबा या महामानव बने फिरते हैं..

          हाँ उस दिन निजता के पैरोकारों की खुशी देख मुझे बहुत दु:ख हुआ था...क्योंकि तब कोरट भी बाबागीरी पर मुहर लगाती प्रतीत हुई थी.. लेकिन नहीं, अब जाकर तसल्ली हुई है..आखिर, यह निजता बड़ी खतरनाक चीज है, जेल पहुँचा देती है..! कोरट तो निजता-विहीन लोगों का आदर करती है..!! 

         सुन रहे हो न, निजता के पैरोकारों..? 

रविवार, 20 अगस्त 2017

टेबल पर दौड़ता काम

          "आप तो, काम करते ही नहीं" बहुत पहले यह जुमला मेरे कानों में पड़ा था। तब मैं आश्चर्य से भर उठा था। क्योंकि इस वाक्य को सुनकर मैं सोच बैठा था, "अरे! यह कैसे हो गया कि मैं काम नहीं करता..? मुझे तो काम करने से तो फुर्सत ही नहीं मिलती...! फिर मुझे यह क्यों सुनाया जा रहा..?" असल में तब से बहुत वर्ष गुजर चुके हैं और इस दौरान यह जुमला मेरे कानों में कई बार टकराया..!

      

         इस जुमले को सुन-सुनकर अब मैं सोचने लगा हूँ कि "काम करना" किसको कहते हैं? और लोगों को कब लगता है कि कोई काम कर रहा है?  अतः अब मैं "काम करने की परिभाषा" पर अधिक मशक्कत करने लगा हूँ..और इसकी साधना के लिए वही स्थान चुनता हूँ जहाँ कोई "काम करना" न हो...

           एक बात और...मेरा अपना अनुभव कहता है...हमारे देश में काम के सिद्धिकरण की प्रक्रिया ही काम होता है और इस प्रक्रिया में काम करने वाला अपने सिद्धिकरण का दायित्व निभा-निभाकर बेलगाम घोड़े की भाँति उछल-कूद करते हुए बहुत खुश होता रहता है। इधर काम करने के पूरे सिस्टम में "वशीकरण-मंत्र" का बहुत जोर होता है... इस एक मंत्र के सहारे यह सारा सिस्टम शांतिपूर्ण और सिस्टमेटिक ढंग से काम के प्रवाह में प्रवाहमान होता रहता है। 

         असल में, शायद यही काम करने की मान्यता भी है..!  किसी छोटी सी टेबल पर काम का जन्म होता है, फिर कोई इसे काम का दर्जा देते हुए दूसरी टेबल पर बढ़ाता है...अगला उसे काम मानता है और इसे फिर थोड़े ऊँचे स्थान पर ठेल देता है, वहाँ इसे काम समझ लिया जाता है, यहीं से संस्तुत हुआ यह "काम" और ऊँचे टेबल पर पहुँचता है, कुछ दिनों तक यहाँ पड़े-पड़े यह अपने "काम" होने के गर्वोन्मत्त भाव से भरा रहता है...इसके बाद यह और हाईलेबल से अनुमोदित होकर इतरा उठता है...क्योंकि उसे "काम" होने की मान्यता प्राप्त हो जाती है!!

         अब जाकर इस काम को धरातल पर उतरना होता है, लेकिन नीचे से ऊपर आते-जाते लाल-फीते में बँधा यह काम, या तो अपनी भागा-दौड़ी में थका हुआ होता है या फिर काम मान लिए जाने की गर्वोन्मत्तता में इसे नीचे उतरना रास ही नहीं आता, या फिर यह नीचे आने की अपनी तौहीनी से बचना चाहता है ! खैर, इस मान्यता प्राप्त काम को लाल-फीते वाली उसी फाइल में रहकर आराम फरमाने का भूत सवार हो जाता है।

         और इधर काम करने के सिद्धिकरण पर सारा जोर लगना शुरू हो जाता है काम को दिखना भी तो चाहिए...! अब यहीं से काम के दिखने-दिखाने और करने, न करने का खेल शुरू होता है। इस खेल में "वशीकरण-मंत्र" की जरूरत पड़ती है, क्योंकि कौन काम कर रहा है कौन नहीं..इसे जाँचने और जँचवाने के लिए इसी मंत्र की जरूरत होती है... इस मंत्र में पारंगत होने वाले ही "काम करने वाले" होते हैं, जो इस मंत्र में पारंगत नहीं होते उन्हें "काम न करने वाले की" सिद्धि प्राप्त होती है, और उन्हें "काम न करने" का जुमला सुनाया जाता है...बाकी काम होते हुए देखने की किसी को फुर्सत नहीं है क्योंकि सभी इस वशीकरण-मंत्र के वशीभूत काम को टेबल पर दौड़ाने में लगे होते हैं..!! 

ये गॉडफादर और उनके लोग

      आज उसे अपने गॉडफादर से मिलना था...असल में, यह उसके गॉडफादर ही थे जिनके कारण वह मनचाही जगह पर तैनाती पा जाता था। इस बार भी उसके साथ ऐसा ही हुआ था। उसे एक बार फिर प्राइम स्थान पर तैनाती मिली थी ! हाँ प्रइम स्थान उसके लिए और कुछ नहीं बस उसकी मनचाही पोस्टिंग हुआ करती है। बस ऐसे ही मनचाहे स्थान पर तैनाती पाकर वह एक प्रकार के वीआईपीपने की सुखानुभूति में डूब जाता था और कभी-कभी लोगों पर अपनी पहुँच का रौब भी झाड़ दिया करता। हालांकि लोग उसे बहुत पहुँच वाला भी मान लिया करते थे..फिर तो उसका खूब रंग जमता था..!! इसी का शुक्रिया अदा करने उसे अपने गॉडफादर से मिलने जाना था। 

        

           उसे याद आया, कभी-कभी उसकी टकराहट अपने जैसे लोगों से हो जाया करती है...जिनके भी अपने-अपने गॉडफादर होते हैं..! आज के युग में तो सभी के गॉडफादर होते हैं..! क्योंकि सभी जागरूक हो चुके हैं। लेकिन जिसका गॉडफादर भारी पड़ता है, वही मनचाही जगह पाता है..! अब ऐसे गॉडफादर वालों की भीड़, गॉडफादरों के लिए भी एक समस्या टाइप की बन चुकी है। खैर... 

       

          हाँ तो..वह अपने गॉडफादर के ठौर पर पहुँच गया था...उसने देखा, उसके जैसे अन्य लोग भी गॉडफादर से मिलने आए थे..हो सकता है सभी उसके जैसा ही प्राइम स्थान पाने की अपेक्षा लेकर आए हों..!! खैर.. जो भी हो, उसे गॉडफादर से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ... 

        

         थोड़ी बहुत हाल-चाल लेने देने के बाद गॉडफादर ने उससे पूँछा, "क्यों भई, लोगों के बीच हमारे काम का मूल्यांकन कैसा है..." 

          गॉडफादर की इस बात पर कुछ पल के लिए वह अचकचाया जरूर, लेकिन अगले ही पल उसके मुँह से निकल गया, "लोग अच्छा नहीं कह रहे हैं..लोगों का सोचना है कि कुछ भी तो नहीं बदला..! सब उसी ढर्रे पर चल रहा है..! मेरी सलाह है, आप कुछ नया सोचिए..नए ढंग का करिए, तभी शायद लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरें..?" पता नहीं यह सब उसके मुँह से क्यों और कैसे निकल गया था..जो नहीं निकलना चाहिए था! असल में ये गॉडफादर टाइप के लोग सही बात सुनने के आदी भी तो नहीं होते..! लेकिन, बात मुँह से निकल चुकी थी, तो इसका असर होना ही था... 

          

          गॉडफादर ने अपने पूरे वजूद के साथ उसे घूर कर देखा था...शायद, उसे अपना पालित होने का अहसास कराते हुए वे बोले थे,  "वाह! सही बात बताई! अब हमें गॉडफादर बनना छोड़ ही देना होगा...तभी हम बदलाव का संदेश दे पाएँगे..." इतना कहते हुए उसके उन गॉडफादर ने उसे जाने के लिए भी कह दिया था..

       

            अब तो, काटो तो खून नहीं टाइप से, वह पशोपेश में था कि क्या गॉडफादर होना ही समस्या की जड़ है या फिर उसके जैसे लोग..! लेकिन इसपर उसे सोचने की फुर्सत नहीं थी, वह फिर से उन्हें मनाने के लिए जुट गया था..क्योंकि वह बखूबी जानता था...प्रयासेहिंकार्येणि सिद्धन्ति...आखिर उसे अपना मनचाहा स्थान भी तो लेना था..!! और नियम भी तो यही गॉडफादर जैसे लोग बनाते हैं...बल्कि कहिए कि नियम ही इसलिए बनाए जाते हैं कि गॉडफादर का गॉडफादरत्व कायम रहे..! और ये नियम को मनमाफिक ढाल भी लेते हैं...!!!

यह कील ठोकना

          उस महीने जब सुबह-सुबह मैंने श्रीमती जी को बताया था कि "इस महीने का इतनई वेतन मिला है" सुनते ही वे भड़क उठी थी..! बोली, "फिर क्या जरूरत है वेतन बढ़ाने का..? एक हाथ से दो और दूसरे हाथ से ले लो...ये सरकारें टैक्स के नाम पर नौकरी-पेशा वालों को ही बेवकूफ बनाती हैं.."फिर मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की, "नहीं यार...हम वेतन भोगियों का ऊपरी इनकम से खर्चा बखूबी चल जाता है.. सरकारें यह बात जानती हैं...इसीलिए इनकमटैक्स लगाकर अपना दिया वापस ले लेती है।" इसपर श्रीमती जी ने मुझे गुस्साई नजरों से देखा जैसे कहना चाहती हों "फिर क्यों डरते हो? चलाओ न ऊपरी इनकम से खर्चा..!" लेकिन कहा नहीं और पैर पटकते हुए किचन में चली गई और इधर मैं, मन ही मन सोचने लगा था कि उन्हें कैसे समझाऊँ कि, सरकारों का काम ही टैक्स लगाना होता है, सरकार का अस्तित्व ही टैक्स पर निर्भर करता है, टैक्स सरकार का होना सिद्ध करती है और हम वैसे भी सरकारी वेतनभोगी हैं, वह हमें, अपना दिया जानती है, तो, उसकी वसूली तो हमसे करेगी ही..! क्योंकि यह सरकार जिसको नहीं दे रही है, उसके लिए भी तो उसे कुछ करना होता है..! लेकिन कहने की हिम्मत नहीं हुई, क्योंकि तब वो कहती, "सरकार अपने जिस दिए को न जानती हो, फिर वही करो.! आखिर, वह अपना दिया तो वसूले ही ले रही है..!"

              

           बचपन में साइकिल पर लाल बस्ता लिए जब एक सज्जन हमारे घर आते, तो मेरी जिज्ञासा शांत करते हुए मेरे दादाजी बताते "सरकार इनसे लगान वसूल कराती है।" मतलब, बचपन में इन्हें देखते ही हमें सरकार की याद आ जाती थी कि, हमारे अलावा कोई सरकार भी होती है, और तब मुझे सरकार पर बड़ा विश्वास होता था। हाँ, दो लोगों को ही देखकर पता चलता था कि सरकार होती है; एक पुलिस और दूसरा ये लगान वसूलने वाले! बाकी और कहीं यह सरकार दिखाई नहीं देती थी। खैर, आज तो चारों ओर सरकार ही सरकार दृष्टिगोचर है...सड़क पर, दुकान पर और यहाँ तक कि घर के चप्पे-चप्पे पर सरकार ने कब्जा जमाता हुआ है..! यही नहीं दवा से लेकर दारू तक यानी जीवन से लेकर मरण तक, अब सब कुछ सरकार की नजर से नहीं बच सकता, मतलब चहुँ ओर टैक्स ही टैक्स..!! बिना टैक्स दिए कल्याण नहीं...

           हाँ, यही सब बताकर मैं श्रीमती जी के गुस्से को शांत करना चाहता था! और उन्हें यह भी बताना चाहता था कि "देखो आज कुछ भी बिना सरकार के संभव नहीं है और अगर तुम्हें सरकार के टैक्स से इतनई गुस्सा है तो चलो फिर किसी जंगल में निवास करते हुए कंद-मूल-फल खा कर जीवन गुजारा जाए...वहाँ सरकार से कोई लेना-देना भी नहीं होगा और न टैक्स का झंझट ही, लेकिन यह भी नहीं कह पाया..!" क्योंकि तब श्रीमती जी कहती,  "अब तो, जंगल भी तो सरकार के कब्जे में है..या फिर, सरकार को टैक्स देने वाले उस जंगल को काट-काट कर अपने टैक्स की भरपाई कर रहे होंगे..ये हमें वहाँ भी नहीं रहने देंगे..!" और फिर वे पैर पटकते हुए मुझसे कहती कि, "अरे जंगल में जाने की बात छोड़ो, सरकार को न जनाने वाले काम करो..जिस पर टैक्स न देना पड़ता हो..जंगल काटने-कटवाने वाले भी यही करते हैं !!" 

        

         मेरे मन में अभी यह उथल-पुथल चल रहा था कि, श्रीमती जी दो कप चाय लेकर मेरे पास आ गई.. हम दोनों साथ-साथ चाय पीने लगे थे... उन्होंने मेरे मायूस चेहरे को निहारा...और मुझसे बोली... "देखो, तुम हमेशा मुझे ही दोष देते हो...तुम्हें याद है न...जब तुम्हारी इस सरकार ने नोटबंदी किया तो, तुम्हारे साथ ही मैं भी कितनी खुश थी..! उस खुशी में, मैं तुम्हारे हर बात में, हाँ में हाँ मिलाती रही... कि...अब जाकर असली समाजवाद आया है..! लेकिन हुआ क्या..? अब फिर सब उसी ढर्रे पर आ चुका है, यहीं तुम्हारे मुहल्ले में ये बड़ी-बड़ी कारें आ गई है..!  कहाँ गया तुम्हारा वह समाजवाद..! और कहाँ गई तुम्हारी सरकार...क्या ये सब बिना सरकार के जाने हो रहा है...आखिर.. तुम्हारे इसी दिए हुए टैक्स से ही यह सब हो रहा है...हाँ, अटके रहो तुम वेतन में..! ... झूँठा गर्व पालते रहो कि मैं तो इतना टैक्सपेयी हूँ..!...हम यहाँ झुँझुवाते रहें..और..लोग हमारे ही दिए टैक्स पर गुलछर्रे उड़ाते रहें...सरकार के चोंचलों को तुम नहीं समझोगे..!!"

        

           वाकई!  मैं श्रीमती जी की बात को बड़े ध्यान से सुनता रहा था...मैं समझ गया था.. पत्नी जी के मन में सरकार को लेकर विश्वास का संकट था..! हम दोनों चाय पी चुके थे। 

         हाँ, इधर जी एस टी भी लागू कर दिया गया है...श्रीमती जी की बात याद कर मन में थोड़ा डर बैठा कि "कहीं यह जी एस टी-फी एस टी सरकार के चोंचले तो नहीं है..!!" लेकिन अपने को थोड़ा सान्त्वना दिया "सरकार को गरीबों के लिए भी तो काम करना होता है..!"

           "बेचारी सरकारों को गरीबों के लिए क्या-क्या पापड़ बेलना पड़ता है..! सैकड़ों साल पहले से यह पापड़ बेलना शुरू हुआ है..!!" सोचते हुए, कहीं पढ़ी हुई यह बात याद हो आई, जब अंग्रेज "लाइसेंस टैक्स" को बदल कर "इनकम टैक्स" बिल लाए थे, तो बाल गंगाधर तिलक ने इसे "लकड़ी में कील ठोकना" बताया था!  मतलब लकड़ी में कील धसानें की भाँति यह टैक्स भी जिसपर लगेगा उसी पर लगता चला जाएगा..!! 

           खैर...इसपर सरकार को मेरी यही सलाह रहेगी कि "भाई सरकार साहब..!! हम लकड़ी तो हईयै हैं, हम पर खूब कील ठोकों और यह जी एस टी-फी एस टी भी ठीक है, लेकिन यही कील हमारे दिए टैक्स पर तथा साथ में अन्य जगहों पर भी ठोकने की जरूरत है... नहीं तो, यही हमारा दिया टैक्स गुलछर्रे में उड़ जाएगा और श्रीमती हम जैसे टैक्सपेयी को झुँझलाते हुए, गाहे-बगाहे चार बात सुनाती रहेंगी..और तुम भी ऐसई टैक्स-फैक्स का पापड़ बेलते रहोगे..!!