रविवार, 3 दिसंबर 2017

काश! कि हम बे-इतिहासी होते!

             उन्होंने कहा हम अपना इतिहास लिए फिरते हैं, समझे! मैंने देखा जैसे वे अपने इतिहास के दम पर कूद-फाँद रहे थे। मैंने सोचा! भाई, इतिहास में बड़ा दम होता है। फिर थोड़ी देर में उनका इतिहास उनके सिर पर चढ़ कर बोलने लगा था। तत्क्रम में मूँछों पर ताव देते हुए वे बोले, "हम इतिहास बदल देने वाले लोगों में से हैं।" मैंने कहा, "किसका इतिहास बदल देगें? अपना या दूसरे का?" उन्होंने कहा, "उनका, जो हमारा इतिहास बदलने की सोचते हैं"  इस पर मैंने हिम्मत जुटाते हुए, उनकी मूँछों पर हाथ फेरते हुए उसकी नोक थोड़ा झुकाते हुए कहा, "यार! अब इसका जमाना नहीं रहा, इन नुकीली खड़ी-तनी मूँछों को लोग जोकरई मानेंगे...इसपर ताव देना बंद करिए।" खैर, वो मेरे मित्र थे, मेरे ऊपर भड़के नहीं। इधर मैं सोच रहा था, न जाने कहाँ से इनपर इतिहास का भूत सवार हो जाता है, वैसे तो हमारे साथ खेलेंगे-कूदेंगे टाइप का खूब गपियाएंगे, लेकिन मूँछ की बात पर अपना इतिहास याद दिलाने लगते हैं, गोया हम बे-इतिहासी हों। 
             
           मूँछ भी इस देश के लिए समस्या है ! इसके चक्कर में इतिहास, इतिहास नहीं रह गया, बल्कि इसे धर्म मान लिया गया है। यह यहीं है कि इतिहास के बिना पर कुछ लोग अपनी मूँछों पर इतराते हैं, और बे-इतिहासी बेचारे बे-कद्री झेलते हैं! 
       
          अपने देश के लोगों के इतिहास में ऐसी असमानता कि बे-इतिहास वाले जहाँ-तहाँ इतिहासवालों के सामने अपना सा मुँह लेकर, मुँह लटकाए बैठे दिखाई दे जाते हैं, जैसे एक बार मैं जब जमींदारी वाले इतिहास के सामने मुँह लटकाए था, तो मेरे दादा जी मेरा मनोभाव ताड़ गए थे और मुझे बताए कि उनके पिता यानी मेरे परदादा ने भी किसी गाँव में चार आने की जमींदारी खरीदी थी। फिर मैंने भी अपने इतिहास को उस जमींदारी वाले इतिहास के सामने उसके टक्कर में खड़ा कर दिया था। मतलब इधर इतिहास से इतिहास के भिड़न्त की प्रवृत्ति खूब विकसित हुई है। 
              खैर, बाद में बे-इतिहास वालों को भी देश के इतिहास पर गर्व करने की सीख दी गई। लेकिन वर्तमान में इतिहास की इस नोचा-चोंथी में सब अपने-अपने हिस्से का इतिहास लेकर भाग खड़ा होना चाहते हैं। ऐसे में बे-इतिहासी बेचारे गर्व करें तो किस पर गर्व करेंगे ! जब देश का कोई इतिहास ही नहीं बचेगा!! वैसे भी, इतिहास केवल वर्चस्ववादियों का ही होता है, जो जितना वर्चस्वशाली उसका उतना ही तगड़ा इतिहास होता है ! यही इतिहास बनाते हैं, बाकी तो इसे पढ़ते भर हैं। लेकिन सब की आत्मा में परमात्मा का दर्शन करने वाले भारतभूमि में इतिहास-लेखन की परम्परा नहीं रही है। इसीलिए चारण-भाट टाइप का इतिहास लेखन मिले तो मिले लेकिन हेरोडोटस, अलबरूनी वाला इतिहास-लेखन नहीं मिलेगा। शायद तब के जड़ भरत टाइप के भारतीय मनीषी यहाँ की वर्चस्ववादी वितंडावाद को आमजन के लिए अनावश्यक समझ चुके थे, इसीलिए इतिहास-लेखन में हाथ नहीं अजमाए होंगे। 
             यहाँ की जनता जैसे इतिहास में थी वैसे आज भी है। पाँच हजार वर्ष का इतिहास आज भी बदस्तूर जारी है। आजादी की लड़ाई के समय को छोड़ दें तो ये वर्चस्ववादी, जनता को इतिहास में ही ढकेलते रहते हैं। बानगी देखिए! एक ओर एक "माँ" झांसी की रानी आजादी की लड़ाई में "मर्दानी" बनती है, तो दूसरी ओर बिन बच्चे की "पद्मावती" को आज आजादी के बाद "माँ" घोषित किया जा रहा है! मतलब "मर्दानी" पर यह "माँ" भारी है! ऐसी स्थिति में इस आजाद मुल्क में स्वामी दयानंद जी का समाज सुधार भी परवान न चढ़ता, फिर तो गुलामी ही बेहतर होती। ये इतिहास के रखवाले! जौहर-व्रत करने वाले दल के साथ पद्मावती के हाथ में तलवार पकड़ाते तो बाद में एक "माँ" को "मर्दानी" न बनना पड़ता। 
          इस देश के ऐसे दुविधा भरे इतिहास से बेहतर तो यही होगा कि यहाँ का इतिहास कम से कम इतिहास ही बनता रहे, क्योंकि तब किसी की नाक-कान और गर्दन सलामत रहेगी! इसे धर्म बनते देख यही लगता है, काश! कि हमारा देश, बे-इतिहासी देश ही होता! आखिर, आज की दुनियाँ का सिरमौर देश भी तो एक बे-इतिहासी देश रहा है! उसे बनाने वाले भी अपना इतिहास जहाँ का तहाँ छोड़ कर वहाँ आए हैं।

अथ् श्री सीडी-पुराण कथा

            मैं गुस्से से हार्ड-कापी को अपनी टेबल के किनारे सरकाते हुए बिफर पड़ा था। मेरे बिफरने की बात और कुछ नहीं केवल इस हार्ड कापी की सीडी का न मिलना था। हार्ड कापी मेरे सामने थी, लेकिन इसकी सीडी नहीं थी। असल में आजकल सब कुछ डिजिटल हो चुका है, अब हार्ड नहीं साफ्ट की जरूरत होती है, जो पल भर में सीडी से कम्प्यूटर और फिर इंटरनेट की दुनियाँ में पहुँच जाती है। लेकिन कुछ सीडी ऐसी भी होती है जिसकी हार्डकापी बन ही नहीं सकती। वह केवल वायरल की जा सकती है। ऐसी सीडी किसी खास परिस्थिति या क्षण में ही बनती है, जिसका रिक्रियेशन दुबारा संभव नहीं होता जैसे कि उस दिन मेरी बस-यात्रा की बातें थी। 
            उस दिन की बस-यात्रा में कंडक्टर और एक यात्री के बीच होती बहस का स्टिंग कर मोबाइल पर रिकार्ड कर सीडी न बना पाने का मलाल रह गया था। और अगर इस बहस जैसी छोटी घटना का स्टिंग कर पाता तो कैसी सीडी बनती जरा आप भी देखिए - 
            परिवहन विभाग का उड़नदस्ता बस की जाँच कर उतर चुका था और बस चल चुकी थी तथा कंडक्टर बस में यात्रियों की गिनती कर रहा होता है, तभी एक यात्री कंडक्टर से पूँछ बैठता है, 
            यात्री - "कंडक्टर साहब, बस चारबाग तो जाएगी न?" 
            कंडक्टर - "हाँ" 
            यात्री - बस आगे पॉलिटेक्निक चौराहे से ही तो होकर गोरखपुर जाएगी न ?
            कंडक्टर - हाँ, पॉलिटेक्निक चौराहे से ही होकर जाएगी। 
            यात्री - पॉलिटेक्निक चौराहे पर हमें उतार दीजिएगा। 
            कंडक्टर - आपका टिकट चारबाग तक का है, आपको आगे नहीं ले जा सकते। चारबाग में ही उतर लीजियेगा। बस चेक हो जाने पर एक सौ दो रूपए का टिकट कट जाएगा। हम नहीं ले जा सकते। 
             यात्री - अरे, शहर के अन्दर की ही तो बात है.. कौन मिल जाएगा! कोई नहीं मिलेगा। 
             कंडक्टर - देखा नहीं, यहाँ पर गाड़ी चेक हो गई!  हम नहीं ले जा पाएंगे। 
              इस पर यात्री हाथ में मोबाइल लेकर किसी को नंबर मिलाने का दिखावा करते हुए कंडक्टर से कहता है- 
             यात्री - सुनो कंडक्टर, तुम्हारा महाप्रबंधक हमें जानता है.. फलाने ही हैं न, लो अभी मैं बात कराए देता हूँ.. 
               कंडक्टर उस यात्री को ध्यान से देख रहा है! इस बीच यात्री फिर कहता है -
          "अच्छा तुम्हारे विभाग में वित्तीय अधिकारी फला हैं न, उनसे तुम्हारी बात करा देता हूँ... तुम्हारे विभाग में हमें सब जानते हैं।"
          इधर कंडक्टर के ऊपर यात्री का बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था, वह भी यात्री की बातों की उपेक्षा करते हुए आगे बढ़ गया था।           यह हुई यात्री और कंडक्टर के बीच के वार्तालाप का घटनाक्रम जो मेरे स्टिंग में सीडी में रिकार्ड हो जाती। 
           खैर, मान लीजिए उस यात्री को, परिवहन निगम विभाग की बसों का ब्रांड एम्बेसडर चुनना होता, तो उसके विरोधी इस सीडी को वायरल कर उसे परिवहन निगम को चूना लगाने वाला घोषित करा कर अपना उल्लू सीधा कर लेते। 
           
           अब आते हैं एक दूसरी सीडी पर, यह सीडी भी, अगर अपने स्टिंग कौशल से इसे बना पाता, जो मेरी बस-यात्रा से ही जुड़ी है, तो कुछ इस प्रकार की होती। इसे चालू करते हैं, आप इसके दृश्य पर अपना दृष्टिपात करिए -
       
          दृश्य - एक व्यक्ति बस में अनायास भद्दी-भद्दी गालियाँ बके जा रहा था। शायद वह नशे में था। बस में महिलाएँ भी सवार थीं। उसकी गालियों के कारण बस में बैठे लोग बहुत असहज हो रहे थे, फिर भी कोई उसे रोक नहीं रहा था। अंत में जब मुझसे नहीं रहा गया तो, उसे डाट कर पुलिस बुलाने की धमकी दी और चुप रहने की बात कही। फिर वह चुप हुआ था। बाद में, बस से उतरते हुए मेरी ओर देखते हुए उसने कहा, "मैं भी पुलिस हूँ...समझे।"
          उसकी बात पर मैंने यही सोचा, "कभी, जब इसे पुलिस-पदक मिलना होता, तो इसे मजा चखाने के लिए मैं आज की बनाई इसकी सीडी लीक कर देता" अपने किए पर शर्मिंदा होता ही और पदक से भी हाथ धोता। आखिर, हम शर्मिंदा तभी होते हैं जब दूसरे हमें आईना दिखाते हैं। 
             खैर, इन दोनों घटनाओं के पात्रों के प्रति मुझे कोई ऐसा अंदेशा नहीं था कि ये भविष्य के नायक बन सकते हैं अन्यथा इनकी सीडी बनाता और इस सीडी का व्यापार भी करता।
             
           एक बात और, उस दिन बस में घटित इन बातों के और भी प्रत्यक्षदर्शी थे, लेकिन वे सभी खामोश और प्रतिक्रियाविहीन थे। फिर भी, मैं जानता हूँ, यदि इन घटनाओं की सीडी रिलीज होती, तो यही तत्समय के खामोश और घटना के प्रति उदासीन लोग देश भर के नियम-कानून के ठेकेदार बने हुए इन व्यक्तियों को जरूर कोसते और इनके विरुद्ध माहौल बनाते। हम तो कहेंगे अब सरकार को सबकी सीडी के बारे में जानकारी लेनी चाहिए, मल्लब चुप रहने और शेखी बघारने वाले की भी। 
         इस देश में सभ्यता के नए चलन में किसी का काम नहीं, उसकी सीडी देखी जाती है! इसीलिए किसी व्यक्ति के काम से जले-भुने लोग उसकी सीडी ही ढूँढ़ते हैं और उस बेचारे की सीडी मिली नहीं कि एक मच्छर सारे तालाब को गंदा कर देता है टाइप से, एक सीडी उसके सब किए कराए पर पानी फेर देती है। हमारे देश में चीजों पर बहुत लोचा और नाइंसाफी है। किसी जज ने कभी सही कहा था, इस देश की जनता मूर्ख है। वाकई! जनता की मूर्खता के कारण ही अपने देश में आज भी तमाम टाइप की असमानता विद्यमान है, और कोढ़ में खाज की भाँति यह सीडी-पुराण भी इसमें खुजली की तरह है। लोग देश विकास की जगह सीडी-विकास में लगे पड़े हैं। यहाँ अच्छे-भले नई उर्जा वाले ऊर्जाहीन, और बिना कुछ किए धरे उर्जाहीन जैसे लोग उर्जावान हो रहे हैं। 
           अब जब सीडी की इतनी ही चर्चा और महत्व है, तो सरकार को भी चाहिए कि सबसे, बिना भेदभाव के, लोकतांत्रिक समानता के उद्देश्य से, किसी भी चयन प्रक्रिया, मतलब नेता से लेकर संत्री तक के प्रतिभागी से, उसकी सीडी के बारे में अवश्य पूँछा जाए। और, योग्यता के मानक निर्धारण की प्रश्नावली में एक नया प्रश्न, संलग्न नोट के साथ, इस तरह का भी होना चाहिए - 
        "प्रश्न - आपकी कोई ऐसी सीडी तो नहीं है जिसकी हार्डकापी न बनाई जा सके और, जो केवल वायरल हो सके? उत्तर केवल "हाँ" या "ना" में दें।
          नोट - उत्तर देने में प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। भविष्य में सीडी मिलने की दशा में निम्न परिणाम होंगे - "नहीं" उत्तर देने वाला प्रतिभागी अयोग्य माना जाएगा। जबकि "है" उत्तर देने वाला प्रतिभागी योग्य बना रहेगा। अयोग्य माने जाने पर उम्मीदवारी या चयन स्वतः निरस्त समझा जाएगा।"
          अब देखिएगा! नेता से लेकर संत्री तक के उम्मीदवार अपनी-अपनी सीडी होना स्वीकार कर लेंगे। सभी लोग इस प्रश्न का उत्तर "है" ही में देंगे! मतलब "हमाम में सब नंगे" वाली दशा प्रमाणित होगी। क्योंकि, क्या पता जाने-अनजाने, यदि कहीं से किसी की सीडी निकल आई तो उम्मीदवारी या सेलेक्शन से भी हाथ धोना पड़ सकता है !! हाँ इस देश के लोगों का यही हाल है। 
        
          ऐसी स्थिति का एक फायदा यह होगा कि जनता को सीडी-पुराण की झंझट से मुक्ति मिलेगी। 
         
        तो, यही है सीडी-पुराण की कथा! जिस सीडी से हार्डकापी न बन सके वही सीडी-पुराण है और उसी की कथा वायरल भी होती है, यह वायरल सीडी इंटरनेट पर आसानी से मिल जाती है। अब समय आ गया है कि अपने देश में लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए सभी नेता से लेकर संत्री तक की सीडी बना हुआ मान लिया जाए। अन्यथा बड़ा अन्याय होगा। 
             अथ् श्री सीडी-पुराण कथा। 

सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

विकास की बुकलेट

      आजकल लिखने बैठता हूँ तो मन थका-थका सा अलसियाया हुआ होता है और इस चक्कर में नहीं लिखता हूँ तो, ऐसा लगता है जैसे कोई महान साहित्य रचे जाने से रह गया हो! अब अगर महान साहित्य रचे जाने से रह जा रहा हो, तो फेसबुक पर रहना ही बेकार है। सो, मानसिक आलस्य के कारण और इसके निवारण पर मन को यह सोचकर रोजगार देने की सोची; नहीं तो, फेसबुक की टाइमलाईन यूँ ही आलस्य के भेंट चढ़ती रहेगी!!
        अब आलस आया कहाँ से? पहले मन को इसी खोज पर लगाया। असल में इधर हो क्या रहा है कि इतने विकास कार्यों के बुकलेट बनावाने पड़ रहे हैं; और इस महती विकास कार्य ने बेचारे एक अदद मन को यूजलेस टाइप का बना दिया है कि, इस चक्कर में खाली-खाली पड़े यह मन अलसिया गया है। हाँ वाकई! विकास कार्य कराने से अधिक उसका बुकलेट बनाना कठिन है। अगर यह विकास-पुस्तिका बन जाए, तो समझिए कि विकास-कार्य सफलता से संपन्न हो चुका है। मुझे आज भी याद है, एक बड़े साहब थे, एक बार ऐसे ही जब एक विकास-पुस्तिका पलट भये तो, उस बुकलेट को आहिस्ता से बंंद करते हुए बोले थे, "चलिए हो गया विकास.." तब से यही लगता है कि जितने करीने से सजी-सँवरी विकास की बुकलेट होगी वैसा ही मनमोहक विकास होगा। कथन का निहितार्थ यह कि विकास की असली जगह विकास-पुस्तिका में ही होती है। इसीलिए रात-दिन अब विकास- पुस्तिका बनाने में ही गुजरता रहता है, ऐसे सिचुएशन में मन को भटकने के लिए कोई रास्ता नहीं होता।
          
       हाँ,  विकास-पुस्तिका तैयार करना माथापच्ची का भी काम होता है, अगर इसमें तनिक भी चूक हुई तो गए काम से! नहीं कुछ तो, खटिया तो खड़ी ही हो सकती है, इसीलिए इसे बनाने में बहुत दिमाग लगाना पड़ता है। एक बार ऐसे ही एक विकास-पुस्तिका बनवा रहा था.. जिसमें सारा कुछ विकास ओके टाइप का था, लेकिन न जाने कहाँ से एक मैला-कुचैला आदमी टपक पड़ा और मेरे हाथ में एक कागज का टुकड़ा पकड़ाते हुए बोला, "साहब लेव...अभी तक हमारा विकास नहीं हुआ.. सुनवाई करउ" मैंने उसके दिए पुर्जे को पढ़ा...फिर गुस्से से उसकी ओर देखा, मन हुआ कि उससे कह दें, "अबे, विकास कोनउ बुलेट ट्रेन है,जो चली नहीं कि तुम तक पहुँच गई..! अरे, यह चली है, तो तुम तक पहुँचेगी ही..! पुर्जा देने से थोड़ी न पहुँच जाएगी..!!" खैर, मेरीे तमतमाहट भाँप वह बेचारा चला तो गया, लेकिन बुकलेट बनवाने का काम मुझे ठप्प करना पड़ा, अब विकास में हुए इस लैकनेश का उत्तर भी मुझे विकास की बुकलेट में देना था! मतलब विकास-पुस्तिका में कई बार ऐसे प्रश्नों के सटीक उत्तर देने होते हैं, जिसमें सब काम-धाम छोडकर लगना पड़ता है! और, तब कहीं जाकर विकास कार्यों की समीक्षा कराने के लायक एक अदद विकास-पुस्तिका तैयार होती है। मतलब विकास से ज्यादा विकास की एक अदद बुकलेट महत्वपूर्ण है।
          तो, इस चक्कर में ही मन थककर आलसी हो चला है...फेसबुक पर श्रेष्ठ साहित्य रचने के लिए तैयार ही नहीं होता!! अब मन को समझाना पड़ेगा...लिखो, लिखा हुआ अपने-आप साहित्य बन जाता है, जैसे विकास के लेखे से विकास हो जाता है।

खूँटा और विकास

            मेरी समस्या बड़ी अजीब है! वह यह कि विकास कराने और इसकी देखभाल करने वालों के हत्थे चढ़ चुके विकास को क्या कहूँ? मेरे लिए विकास अदृश्य टाइप की चीज नहीं है। कुछ लोग विकास को दुधारू गाय की तरह मानते हैं, ऐसा मैंने लोगों को कहते सुना है और इसी बात पर मुझे अपने बचपन की एक बात याद आती है।
         
           बात मेरे बचपन की है, तब विकास-उकास से मैं नासमझ था, अपने गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ने जाना शुरू ही किया था। उन दिनों मेरे घर में एक गाय हुआ करती थी और शायद गौसेवा के नाम पर वह खूँटे से बँधी रहती थी। कभी कभार जब वह खूँटा तुड़ाकर स्वतंत्र विचरण करना चाहती, तो मेरे बाबा दौड़ाकर उसे पकड़ते और खूँटे से बाँधने के बाद अपने सोंटे से उसकी खूब धुनाई करते। छटांक भर दूध देने वाली वह गाय, ऊपर से दूध दुहते समय लात भी चला देती थी। इस पर भी उसकी धुनाई होती और उस पर पड़ते प्रत्येक सोंटे के वार के साथ बाबा के मुँह से "ही-है" का ठेक निकलता। खैर, उस गाय का दुधारू न होना भी उसमें एक खोट था। तब ज्यादातर देशी गायें इसी तरह की होती थीं; यह तो, अब जाकर विदेशी नस्ल का प्रचार हुआ है और इन विदेशी नस्ल की गायों को पिटते हुए मैंने कभी नहीं देखा है।  
            वैसे तो, आजकल देशी गायों की नस्ल-सुधार का जमाना है और अब इनसे दूध भी बाल्टी भर-भर कर दुहा जाने लगा है। दूध देती इन गायों का स्वयं दूध पिया जाता है तथा मार्केट में भी बेंचा जाता है और विकास का भरपूर एहसास किया जाता है! जो ऐसा नहीं कर पाते उनकी नजरों से विकास ओझल टाइप का होता है। हम अपने शुद्ध देशी टाइप के विकास को, शुद्ध देशी गाय की तरह अब या तो उसे गो-रक्षा दल के हवाले कर धर्मानुभूति करते हैं या फिर इसे बहेतू या अन्ना पशु की तरह लावारिस विचरण करने के लिए छोड़ देते हैं।
           कुल मिलाकर अब अपने देश की आबोहवा बदल चुकी है विकास का मतलब व्यापार, जिससे नोट और वोट दोनों मिलते हों। इसीलिए विकास की खींच-तान बहुत मची हुई है। हर कोई विकास को डंडे के बल पर अपने ही खूँटे से बाँधना चाहता है, खूँटा तुड़ाया नहीं कि डंडा लेकर अपने-अपने तरीके से लोग इस पर पिल पड़ते हैं, या फिर डंडे के बल पर इसे दौड़ाने लगते हैं। अंत में मेरा-तेरा से शुरू होकर विकास की छीछालेदर हो चुकी होती है। अब इसके बाद भी चैन नहीं पड़ता तो, विकास को पगलाया हुआ घोषित कर दिया जाता है। तात्पर्य यह कि, जो विकास को अपने खूँटे से बाँधने में सफल नहीं होता वही विकास के बारे में अनाप-शनाप बोल रहा है। यह बेचारा विकास इस चक्कर में अब राजनीतिक-पशु की तरह हो चला है। इसीलिए विकास को जब भी देखता हूँ, इस छीछालेदर के बीच खूँटे से बँधे इसे हांफते हुए ही देखता हूँ।
           जनता की तो कुछ पूँछो मत, उसे फ्री में विकास नहीं मिलता इसके लिए उसे वोट की कीमत चुकानी पड़ती है, और चुनाव दर चुनाव विकास के खूँटा-बदल में ही भ्रमित होती रहती है। उसके लिए तो खूँटा-बदल ही विकास है। एक बार विकास को लेकर मैं जनता को इसकी असलियत समझाने के चक्कर में पड़ गया कि विकास क्या चीज होती है, इसे समझो! इस चक्कर में मैंने विकास को उसकी सही जगह दिखाने की कोशिश की, तो ऊँचे स्थान पर विराजे ऊँची कुर्सी वाले ने मेरे इस प्रयास को "कुत्सित-प्रयास" कह डाला! मैं डर गया, मैंने समझ लिया, "भइया जो चल रहा है उसी को विकास मान लो, इसमें अपनी टांग मत अड़ाओ!!" और मैंने यही समझा कि, विकास को लेकर ज्यादा "ही-है..ही-है" नहीं करना चाहिए नहीं तो, इसे हिंसक कृत्य मानते हुए ऐसा करने वाले को ही विकास से वंचित कर दिया जाता है।

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

बांध-संस्कृति

        "बंधवा पर महवीर विराजै" बचपन में जब इसे सुना था तब तक बांध से परिचित भी नहीं हो पाया था! इसी दौरान उपमन्यु वाली कहानी जरूर पढ़ी थी और जाना था कि, छोटी सी कोई "बंधी" पानी रोकने के भी काम आती है और ऐसी बंधियों की कितनी जरूरत होती है इसका अहसास उपमन्यु की कथा पढ़कर हो गया था! वाकई!  तब ये छोटी-छोटी बंधियाँ एकदम समाजवाद टाइप की होती होंगी। 
          इसके बाद उस "महवीर" वाले "बँधवा" से परिचित हुआ था! वो क्या कि मैंने सुना था, सन अठहत्तर के बाढ़ में इलाहाबाद में गंगा के बढ़ते जलस्तर को देखकर किसी बड़े इंजिनियर ने इलाहाबाद के डी एम साहब को उसी बाँधवा को काटने का सलाह दिया था कि, इससे बाढ़ का पानी फैल जाएगा और जलस्तर घट जाएगा.. लेकिन डी एम साहब ने यह कहते हुए मना कर दिया था कि "भइ, अगर बाढ़ के कारण बाँध को कटना ही है तो वह वैसे भी कट जाएगा..इसे काटने की जरूरत नहीं.." खैर, इसके बाद गंगा का जलस्तर घटना शुरू हो गया था और "बँधवा" कटने से बच गया था..!  मतलब ऐसे होते हैं हमारे बड़े-बड़े इंजीनियर और इनकी सलाह!! इसी तरह की सलाहों से बड़े-बड़े बाँध बनाए जाते होंगे।
          हाँ, अब तक तो अच्छी तरह से बांधों से परिचित हो चुका हूँ..इनमें रुके पानी से अपन गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत से ऊँचाई से टारबाइन पर गिरते पानी से बिजली बनते हुए जाना है। गुरुत्वाकर्षण-बल ही वह कारण है जिससे कोई भी ऊपर की चीज नीचे चली आती है। यह सहज गति है, प्राकृतिक गति है। हमारी जनता-जनार्दन प्रत्येक पाँच वर्ष बाद कुछ लोगों को पलायन-वेग की गति से ऊपर प्रक्षेपित कर देती है। ये नीचे से ऊपर स्थापित हुए लोग गुरुत्व-बल के विरोधी बन जाते हैं और चीजों पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण-बल धरा का धरा रह जाता है। यही ऊपर पहुँचे हुए लोग नीचे वालों के लिए बड़े-बड़े बाँध बनाते हैं और उसमें फाटक भी लगाए होते हैं तथा चीजों को नीचे आने के लिए अपने मनमाफिक ढंग से फाटक को खोलते और बंद करते हैं..! तदनुसार ही नीचे वाले हरा-भरा और सुखी होते रहते हैं। मतलब, अगर आप को भी बांध से परिचित होना है तो गुरुत्वाकर्षण के विरोधी बनिए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में घुसकर देखिए, नीचे से पलायित होइए...पता चल जाएगा!! 
     
          इधर अपन भी बाँधों के आसपास घूमकर जायजा ले चुके हैं.. वह क्या कि इन बाँधों के आसपास खूब हरियाली रहती है...इस हरियाली को देखकर मेरा भी मन "लकदक" हो जाता है! मेरा मानना है कि बाँध से दूर वाले इस सब्जबाग को देखकर अपना भी मन लकदक कर लेते होंगे, तभी तो अपने देश में "बाँध-संस्कृति" चल पड़ी है! यह "बाँध" बनाना इसलिए भी जरूरी है कि, इस पृथ्वी पर जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी है, वैसे-वैसे पूंजीवाद भी बढ़ता गया है और छीनाझपटी शुरू हो गई, परिणामस्वरूप अब "मेड़बंधी" से काम चलने वाला नहीं है। इस पूँजीवादी जमाने में मेड़बंधी तो समाजवादी प्रवृत्ति है, इसका त्याग कर बड़े बाँध वाली संस्कृति अपनाना अब अपरिहार्य हो चुका है। 
         ये बड़े बाँध हमें प्रतिकूल परिस्थिति में सुरक्षा का वैसे ही भरोसा देते हैं जैसे कि, जनता से अर्जित ताकत के बल पर ऊपर जाता गुरुत्व-बल का विरोधी कोई नेता नीचे वालों को आश्वासन देता है! इस बाँध-संस्कृति ने जनसंख्या-वृद्धि और समाजवाद के आपस के व्युत्क्रमानुपाती संबंध का खूब फायदा उठाया, जिसमें आदमी का विस्थापन होता है। तो, यहाँ हर व्यक्ति दूसरे को विस्थापित कर अपने लिए बाँध बनाकर उस पर फाटक लगाए बैठा है!

ब्राह्मणवाद

       उस दिन एक नए ज्ञान की प्राप्ति हुई थी...वह इस प्रकार है. एक बात तो है, जो ग्यानी-ध्यानी होते हैं लोग उनका बहुत सम्मान करते हैं। अब ग्यानी-ध्यानी कौन होता है? यह वह शख्स होता है जो सामनेवाले का कर्म-अकर्म और उसकी छल-छद्म जानने की शक्ति रखता है। इस शक्ति को वह अपने चिंतन-मनन और अनुभव से अर्जित कर लेता है, और यह तभी संभव होता है जब उसे करने को कुछ न हो। धीरे-धीरे ऐसे ही ग्यानी-ध्यानी को "ब्राह्मण" से नवाजा गया और ये समाज में सम्मान के पात्र और पूजनीय हुए। खैर..यहाँ मतलब किसी जाति से नहीं है और जाति वाले इसे दिल पर भी नहीं लेंगे। 
  1.             अब समाज में हर तरह के लोग तो होते ही हैं तो, प्राचीन काल से ही हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे भी रहे हैं, जो अपने कर्म-अकर्म या छल-छद्म से अर्जित शक्ति के बल पर आमजन पर अपनी मनमानियाँ थोपते आए हैं। अपने यहाँ का आमजन निरा बेवकूफ जो ठहरा! वह ऐसी मनमानियों को डर वश कभी अपनी नियति माना तो कभी अपने कर्मों का फल और फिर सब कुछ सहता रहा। असल में हुआ यह कि यह ज्ञानी-ध्यानी "ब्राह्मण"  सदैव सम्मान का भूखा रहा है जैसा कि अकसर ज्ञानियों की आदत में होता है कि, जब तक इनका यथोचित सम्मान न हो जाए तब तक इन्हें अपने ज्ञानी होने का अहसास भी नहीं होता और इस प्रकार ये सदैव अपने ज्ञान का ही अहसास करते रहना चाहते हैं..! 
  2.             हाँ तो, अकर्मी-विकर्मी या छल-छद्मी की मनमानियों का शिकार आमजन, इन ज्ञानियों या कहें "ब्राह्मणों" की ओर, अपने ऊपर होते इन मनमानियों से त्राण पाने के लिए देखा भी होगा...लेकिन हुआ क्या..? हुआ यह कि, ये महाशय ज्ञानी-ध्यानी सम्मान के भूखे "ब्राह्मण" सम्मान पर बिक गए..क्योंकि अकर्मी-विकर्मी या छल-छद्मी जैसे लोग इन ज्ञानियों को विधिवत किसी आसन पर आसीन करा इनके पाँव पखारते हुए थाल में रोली-चंदन-अक्षत सजाकर चढ़ावे के साथ इनके माथे पर टीका लगाने लगे... और फिर इन ज्ञानियों का ज्ञान आशिर्वाद बन कर इन अकर्मी-विकर्मी और छल-छद्मियों पर ही फूटता रहा तथा यहीं पर इस सम्मान के समक्ष इनका ज्ञान मौन होता रहा। उधर मनमानियों के शिकार आमजन ऐसे "ब्राह्मणों" के ज्ञान से ठगे जाते रहे।
  3.            हाँ, होना तो यह चाहिए था कि इन ज्ञानी-ध्यानी "ब्राह्मणों" को अपने ज्ञान-शक्ति को, अकर्मी-विकर्मी तथा छल-छद्मियों की मनमानियों के शिकार लोगों के हाथों में हथियार बनाकर पकड़ा देना चाहिए था...लेकिन जो नहीं हुआ, बल्कि ये अपने "पूजनीयपने" में ही मस्त हो गए..! यही तो हुआ "ब्राह्मणवाद"..!!!
  4.           मतलब "ब्राह्मणवाद" और कुछ नहीं, बस किसी अत्याचारी-अनाचारी और छल-छद्मी की करतूतों को उजागर न कर उससे चढ़ावे के साथ अपने माथे पर रोली-चंदन-अक्षत का टीका लगवा लेना और इस सम्मान से गद्गद होकर उल्टे उसे ही आशिर्वाद देकर निर्भय बना देना है। 
  5.            मित्रों! इस "ब्राह्मणवाद" को किसी जाति-धर्म तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए...यह प्रवृत्ति किसी भी समाज, संस्था या तंन्त्र में दिखाई पड़ सकता है...यह "ब्राह्मणवाद" ही है जो रोली-चंदन-अक्षत और चढ़ावा ग्रहण कर सब को मौन बना देता है..! और किसी पिछड़े क्षेत्र में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से दिखाई पड़ती है। 
  6.            हाँ, एक बात और...जो "ब्राह्मणवाद" से प्रभावित नहीं होता मुखर होता है, उसके पग-पग पर काँटे बिछाये जाते हैं...कुछ कलम के सिपाही इसके शिकार हो जाते हैं और "ब्रह्मणवादी" लोग उन्हें अपने रास्ते से हटाने का प्रयास करते हैं। 
  7.               तो, अपने-अपने क्षेत्र के "ब्राह्मणवादियों" को पहचानिए...

रविवार, 24 सितंबर 2017

निजता के पैरोकार

           इस देश का गजबै हाल है..किसी की निजता उसे कहाँ से कहाँ ले जाकर खड़ी कर देती है..! हमको तो ई लगता है कि अपन का सुपरीम कोरट ई बात जानता है क्योंकि, उसे भी लगता है, जब हमारा संविधानइ जब व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की बात करता है तो, हम काहे इसमें रोड़ा बनें,  आखिर बिना निजता के व्यक्ति में स्वतंत्रता और गरिमा का प्रवेश हो ही नहीं सकता! तो, कोरट ने झट से निजता को मौलिक अधिकार मान लिया। मानो, अब अपनी गोपनीयता बरकरार रखते हुए खूब स्वतंत्र होकर अपने गरिमा में वृद्धि लाइए..! 
         लो भइया! अभी ये निजता के पैरोकार भाई लोग, खुशी भी नहीं मना पाए थे और निजता पर पहाड़ जैसा टूट पड़ा! ये बाबा लोग भी न, निजता का गुड़ गोबर किए दे रहे हैं..गोपनीयता बरतते-बरतते बाबा तो बन जाते हैं, लेकिन गोपनीयता भंग होने पर बवाली बन जाते हैं। इसका मतलब तो यही निकलता है कि, निजता के ये पैरोकार होते हैं बड़े बवाली..कोई माने या न माने...! शायद कोरट भी यह भांप चुकी है, इसीलिए एक तरफ निजता की चादर देती है तो, दूसरी तरफ चादर सरकने पर यह सरेआम नंगा कर जेल भिजवा देती है..!! मतलब अब आप कहीं यह न कह बैठो कि भाई, यह कोरट तो निजता की कोई इज्जत ही नहीं करती..!
          एक बात बताऊँ..लेकिन अवमानना के लिए क्षमाप्रार्थी होकर.. वह यह कि, उस दिन हमें अपनी न्यायपालिका पर बहुत गुस्सा आया था, निजता के पैरोकारों को उछलते देखकर..! तब मैंने यही सोचा था.. "निजता को मौलिक अधिकार बताकर, अब हमारी न्यायपालिका भी बाबागीरी पर उतर आई है" 
          लेकिन, अपनी न्यायपालिका तो बड़ी चतुर-सुजान निकली, है न?  बिल्कुल कान को घुमाकर पकड़नेवाली है! अगर निजता को मूलाधिकार न मानती तो, अपनी निजता की अक्षुण्णता के बल पर धुरंधर बनने वाले ये बड़े-बड़े लोग यही कहते, "भई, अपने देश में लोकतंत्र का हनन हो रहा है..देश अलोकतांत्रिक बना जा रहा है..न्यायपालिका कुछ कर ही नहीं रही।"
        हाँ, यही सब सोच-विचार कर न्यायपालिका ने कहा, "लो भाई! निजता में लिपटे हुए खूब लोकतांत्रिक बनो, लेकिन निजता हटते ही सलाखों के पीछे तुम्हारी स्वतंत्रता बैठ कर रोएगी भी" और यही कहते हुए कोरट ने बेचारे बाबा को रुला दिया..!! 
       मतलब भइया,  मैं तो कहुंगा, "निजता के ऐ पैरोकारों!  इस न्यायपालिका के झाँसे में मत आओ, नहीं तो निजता-फिजता के चक्कर में किसी दिन यह आपकी स्वतंत्रता भी छीन लेगी।" 
        भाई!  यह सबको पता है.. इस देश के अधिकांश लोग, निजता-विहीन लोग ही हैं...इनके घरों में जाइए तो इनके घरों के दरवाजे खुले मिलते हैं..साँकल भी नहीं चढ़ी होती..इनके चूल्हों तक झाँक लीजिए.. इनके पास छिपाने को कुछ नहीं है...ये बिना निजता के गरिमा-विहीन लोग होते हैं...इनकी स्वतंत्रता दूसरों के रहमोकरम पर निर्भर होती है..और वहीं ये निजता वाले गरिमावान लोग, इन बेचारों की गरिमा और स्वतंत्रता दोनों को खाए हुए बाबा या महामानव बने फिरते हैं..
          हाँ उस दिन निजता के पैरोकारों की खुशी देख मुझे बहुत दु:ख हुआ था...क्योंकि तब कोरट भी बाबागीरी पर मुहर लगाती प्रतीत हुई थी.. लेकिन नहीं, अब जाकर तसल्ली हुई है..आखिर, यह निजता बड़ी खतरनाक चीज है, जेल पहुँचा देती है..! कोरट तो निजता-विहीन लोगों का आदर करती है..!! 
         सुन रहे हो न, निजता के पैरोकारों..?