शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

सरकारी घोड़े और नेतागीरी

          उस दिन जब मैं बस में चढ़ा तो वह खचाखच भरी थी। उसमें मेरी सीट आरक्षित थी, इसलिए इसके चलने के समय ही मैं इसमें सवार होने को पहुँचा था। सीट आरक्षित इस मायने में कि मेरा फॉलोअर (वैसे इस शब्द से मुझे एतराज है) बस में मेरे लिए सीट कब्जाए हुए था।  हाँ, एक बात तो है, कोई कितना भी बड़ा तोप हो जाएं, लेकिन इस देश का लोकतंत्र अब इतना भी गया गुजरा नहीं रह गया है कि बस की सीट से किसी आम-यात्री को जबरिया उठाकर कोई बैठ जाए। और, ऐसे अलोकतांत्रिक कृत्य से आज का बड़ा से बड़ा तानाशाह भी बचना चाहता है। इन्हीं वजहों से किसी देश में तानाशाही वाले शासन को भी मैं अलोकतांत्रिक नहीं मानता! 

          मुझे बस में चढ़ते देख फॉलोअर उठ खड़ा हुआ। सीट पर बैठते ही मैंने उससे कहा, "यही सीट मिली थी तुम्हें..! अरे, बस में बीच वाली सीट लेते..।" उसके अनुसार, मेरे लिए सीट कब्जियाते समय बस लगभग भर चुकी थी..यही एकदम आगे वाली सीट खाली मिली थी। खैर, मैं बस में बैठ गया, ठीक मेरे बगल में एक पढ़ी-लिखी स्मार्ट सी युवती बैठी थी, जो अपने मोबाइल में खोए हुए ही बीच-बीच में सामने बस की बोनट के बगल की सीट पर बैठी महिला से इशारों में कुछ बात भी करती जा रही थी। हलांकि उसका इशारों में बात करना मुझे कुछ अजीब सा लगा था। 

          इधर बस की गति धीमी ही थी और कंडक्टर टिकट बनाने में मशगूल था। मेरे बगल में बैठी लड़की अपने मोबाइल में अभी भी व्यस्त थी। इस दौरान मैंने अपना टिकट बनवा लिया, फिर मैंने ध्यान दिया, बस की गति अब तेज हो चुकी थी, शायद ड्राइवर को भी यात्रियों के टिकट बन जाने का इंतजार था। वह भी भाई-चारे में ट्रैफिक इंसपेक्टर-फिंस्पेक्टर से कंडक्टर को सुरक्षित रखना चाहता होगा। बस के अंदर सारी स्थितियाँ सामान्य थी और बतियाने वाले एक-दूसरे से बतिया रहे थे। मेरे पीछे सीट पर बैठे किसी व्यक्ति की तेज, तल्ख और भारी आवाज मुझे सुनाई पड़ी-  

     

      "बुंदेलखंड तो, सरकारी घोड़ों के लिए हरी घास का मैदान है।"

        यह उसका किसी से बतियाने का स्वर था। आवाज मुझे रूचिकर प्रतीत हुई। इस पर कान देने की कोशिश के साथ ही मैंने बस की खिड़की से बाहर झाँका, कोई घास का मैदान-वैदान मुझे नजर नहीं आया। बल्कि बड़े-बड़े मैदाननुमा धूल-धूसरित खेत और जमीन से लेकर आसमान तक गर्दोगुबार छाया हुआ दिखाई पड़ा। इसे देखते हुए मैंने सोचा-

       "इस गर्दोगुबार के सिवा यहाँ तो कोई हरा मैदान नहीं दिख रहा..! ये घोड़े घास कहाँ चरते होंगे? "

        कुछ क्षणों बाद पीछे बैठे उसी व्यक्ति की आवाज मेरे कानों में फिर पड़ी-

      

        "यहाँ कोई नेतागीरी नहीं है। अधिकारियों, कर्मचारियों की बल्ले -बल्ले है।"

     

       चलती बस में, खिड़की से बाहर झाँकते हुए मैंने सोचा-

        "वाकई! यहाँ बड़े-बड़े खेतों में लगे इन पत्थर के क्रेशरों से उठते गर्दोगुबार ने वातावरण को जबर्दस्त धुंधमय बना दिया है।"

         अचानक मन-मस्तिष्क में यही गर्दोगुबार, धुंध, घास, हरा-मैदान, सरकारी घोड़े, नेतागीरी सब मिल गड्डमड्ड होकर उछल-कूद करने लगे! एक अजीब सी बेचैनी में, मैंने बस की खिड़की से बाहर झाँकना बंद कर दिया। 

       बगल में बैठी युवती पर ध्यान गया। वह अपने एक हाथ में मोबाइल पकड़े उसकी स्क्रीन पर आँख गड़ाए दूसरे हाथ से इशारे करती हुई बातचीत की भाव-भंगिमा में दिखाई पड़ी। उसके मुँह से कभी-कभी अस्फुट सी ध्वनि निकल जाती। जिज्ञासा वश मैंने एक उड़ती सी निगाह उसके मोबाइल-स्क्रीन पर डाली। स्क्रीन पर भी एक महिला उसी तरह इशारों में बात कर रही थी। अचानक मुझे आभास हुआ -

        "तो..यह स्मार्ट सी लड़की गूँगी-बहरी है..!"

         उसे देख उसके जीवन की सुगमता और सुरक्षा के प्रति हमारी और समाज की संवेदनशीलता को लेकर मन में तरह-तरह के खयाल आए। लेकिन, उस लड़की के चेहरे पर झलक रहे आत्मविश्वास से मुझे राहत की अनुभूति हुई। आगे एक छोटे से कस्बे के अपने गंतव्य पर वह लड़की बस से उतर गई थी। 

        अब उस लड़की के साथ कस्बा भी पीछे छूटता जा रहा था। मैंने सोचा, चीजे ऐसे ही अकसर पीछे छूट जाती हैं। उसी समय मेरे पीछे बैठे उसी व्यक्ति की आवाज मुझे फिर सुनाई पड़ी-

         "ये सब सचिव-फचिव (मैंने ग्राम स्तरीय सचिव माना) सब लाखों में खेलते हैं.. पहले जहाँ पैदल चलते थे, वहीं अब इनके पास एक से एक गाड़ियाँ हो गई हैं..ऐसा कोई नहीं जिसके पास चार-छह प्लाट-जमीन न हो.."  

          इसके बाद फोन पर किसी से बात करती उसकी आवाज सुनाई दी-

         "हलो..कोटेदार..! हाँ.. अच्छा..अच्छा.. दिल्ली में हो.. कल आ जाओगे! यहाँ एस डी एम बदल गया है.. नए वाले से बात की जाएगी.. प्रधानमंत्री पोर्टल वाली शिकायत आ गई है...वो साला इंसपेक्टर बदमाशी कर रहा है...वो उससे (किसी नेता का नाम) डर के ऐसी रिपोर्ट लगा रहा है... अच्छा आ जाओ, तो चलते हैं उस इंसपेक्टर के कमरे पर... साले को कमरे में बंद कर..ठीक कर दिया जाएगा.."

        उसकी इन बातों को सुन मैं पशोपेश में पड़ गया, सोचने लगा -

         "यहाँ आम-आदमी...नेता..गुंडागीरी...अधिकारी...घोड़ा...घास आदि सब तो एक दूसरे में उलझे हुए हैं..! कौन सी कीमोथेरेपी सफल होगी कि इन्हें एक-दूसरे से अलग कर असली कर्ताधर्ता को पहचाना जाए ?" 

    

         और, मैंने सोच-विचार में अपनी विश्लेषणात्मक बुद्धि खर्च किया तथा अपने विचार इस बात पर स्थिर किए-

         "बुंदेलखण्ड में राजनीति और सरकारी घोड़ों के बीच इस बात पर जबर्दस्त आपसी समझ विकसित हो चुकी है कि, सरकारी घोड़े हरी घास चरते रहें और राजनीति गर्दोगुबार उड़ाती रहे..! मने दोनों का काम चलता रहे..!! सच में, इसी वजह से यह क्षेत्र सरकारी घोड़ों के लिए हरी घास का मैदान है..!! कुल मिलाकर मरन तो यहाँ हरी घास की ही है।"

            खैर, उस व्यक्ति के अपने गंतव्य पर उतर जाने के बाद मैंने भी उसकी बातों को पीछे छोड़ते हुए सोचा-

           "अगर कोई जाम-साम न मिला तो समय से यह बस हमें भी पहुँचा देगी..बस-ड्राइवर, ड्राइवरी में होशियार है।"

         लेकिन यह खुशफहमी ज्यादा देर टिकी नहीं। अचानक सड़क पर दिखाई पड़े एक व्यक्ति के इशारे से बस रुक गई। उसके और हमारे बस-ड्राइवर के बीच न जाने कौन सी गुफ्तगूँ हुई और ड्राइवर बस से उतर गया। लगभग सात-आठ मिनट बीतने के बाद "कोई समस्या फंसी है" सुनकर मैं भी अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए बस से उतर लिया। 

          पता चला कि बस-डिपो से, हमारे बस-ड्राइवर को एक अन्य समस्याग्रस्त रोडवेज बस को तीन किमी पीछे पुलिस चौकी पर खड़ा कर आने के निर्देश मिल रहे हैं और ऐसा करके ही वह अपनी बस आगे ले जाए। मैंने अनुमान लगाया कि उस बस को पुलिस चौकी पर खड़ा कर वापस आने में ड्राइवर को लगभग एक घंटे का विलम्ब हो सकता है। मेरे पूँछने पर ड्राइवर ने फोन मेरे हाथ में देकर बस-डिपो वाले से बात करने के लिए कहा, लेकिन डिपो वाले ने मेरी बात नहीं सुनी। डिपो वाले मुझे जानते थे, लेकिन मैंने अपना परिचय देना उचित नहीं समझा। ड्राइवर ने हमसे अपनी मजबूरी बताई और उस बस को पुलिस चौकी पर छोड़ने जाने के लिए तैयार हो गया। 

       

           लेकिन, मैंने बस-ड्राइवर और कंडक्टर दोनों से सैकड़ों यात्रियों के विलम्ब का हवाला दिया, इस बीच एक-दो और यात्रियों ने मेरा साथ दिया। खैर, मेरे समझाने पर ड्राइवर भयभीत-मन से (बस-डिपो के अधिकारियों से) अपनी सीट पर आया और बस चली। ड्राइवर ने मेरा फोन नम्बर भी इस उद्देश्य से लिया कि डिपो से कोई समस्या होने पर हमसे बात करा देगा। 

           इधर चलती बस में, मैं इन प्रश्नों में खो गया - " अगर ऐसी ही समस्या किसी अन्य देश में होती, तो क्या वहाँ भी बस-ड्राइवर से अपनी यात्रियों भरी बस छोड़ दूसरी बस को टोचन करने के ऐसे ही निर्देश दिए जाते? या वहाँ ऐसी समस्याओं के लिए पृथक से कोई व्यवस्था होती होगी..?"

         मैं इसका उत्तर खोजने में मशगूल था कि हमारी बस एक बार फिर झटके के साथ रुक गई। पता चला कि टी. आई. साहब हैं, बस की जाँच करेंगे। अबकी बार कंडक्टर बस से उतरा, और इस प्रकार जाँच-फांच होते-हवाते करीब दस मिनट बाद बस चली। 

            जब हम बस से उतरे, तो हमारी बस-यात्रा के लिए निर्धारित समय में, एक घंटा और जुड़ चुका था। 

सोमवार, 22 जनवरी 2018

'बसंत का सुहाना फन'

        अपने देश के मौसम-तंत्र के क्या कहने ! अब बसंत को ही ले लीजिए ! मने इसी मौसम-तंत्र का हिस्सा यह ॠतुराज बसंत है। अपने देश में जो राजा टाइप का है, उसी का कद्र होता है । फिर काहे न ॠतुराज का कद्र हो! आखिर कभी आपने सुना है जाड़े की शुभकामना या गर्मी की शुभकामना! नहीं न। यही नहीं, हम भले ही प्यासे मर जाएँ, लेकिन वर्षा-ॠतु की शुभकामना देते कभी किसी को नहीं सुनते! जब कि बरखा-रानी भले ही झूम के बरसे। वैसे भी, महिलाएँ सदैव दोयम दर्जे पर ही रहती हैं पुरुषों के मुकाबले ! भले ही उन्हें रानी की पदवी क्यों न मिल जाए! खैर..
        बसंत! की शुभकामनाओं पर श्रीमती जी से बात हुई, तो उन्होंने कहा, "बसंत में सुहाना फन होता है" मैं "सुहाना फन" सुनकर उचका, आखिर मैं भी तो हिन्दी साहित्य का पोस्ट-ग्रेजुएट हूं और उसी के बल पर सरकारी रोटी तोड़ रहा हूँ, सो मैंने श्रीमती जी को समझाया, "फन नहीं पगली, पन ! सुहाना के साथ फन नहीं पन होता है..सुहानापन !" बस फिर क्या था वे मुझपर भड़क उठी, बोलीं, "टी वी सीरियल 'भाभी जी घर पर हैं' का मुझे अंगूरी समझ रखा है क्या..जो समझाने चले हो! मुझे भी सब पता है..लेकिन मैं ऐसे बसंत में सुहाना फन नहीं देख रही..अपनी बेवकूफी छोड़ो तो तुम्हें मेरी बात समझ में आए।"  इसके बाद लगभग बेवकूफी छोड़ने का जताते हुए उनसे बोला, "हाँ यार.. सही कहा..इस फन में तो बड़े गहरे अर्थ छिपे हैं..!" खैर जान बची लाखों पाए के अंदाज में बातचीत समाप्त हुई, तो बसंत के सुहाने-फन पर, मैं भी गौर करने लगा।
          वाकई! बसंत में सुहाना फन होता है.. इसमें गर्मी नहीं जाड़ा नहीं.. और बरसात की किचपिच नहीं। इसीलिए तो बसंत में फन ही फन है...पूरा लोक, बसंत के इस फन में डूब जाता है, और इसके फन में ही होली का हुड़दंग है! लेकिन भइए! अब यह ॠतुराज कहाँ रहा? इसे हम जबर्दस्ती का ॠतुराज माने हुए हैं। क्योंकि यहाँ लोक नहीं, तंत्र है, अब तंन्त्र का राज है ! इसीलिए यह ॠतुराज बसंत अपनी जान बचाने चुपके से लोक के गलियन से, कुंजन से, वन-बाग-तड़ागन से और पहाड़न से भाग कर लोकतंन्त्र में चला आया। मने गलियन में, कुंजन में, खेतन में, पहाड़न में नहीं, लोकतंत्र में बसंत मिलता है। 
          बसंत लोकतांत्रिक हो लिया है!! क्योंकि यह तंन्त्र भी बड़ा 'फनी' टाइप का होता है। इसीलिए तंत्र को "फन" चाहिए और उसने लोक से बसंत को सुड़क लिया ! फिर भी यह लोक इस तसल्ली के साथ अपने में मगन है कि, चलो लोकतंत्र में बसंत है। और इधर, गर्मी और बरसात की चिन्ता किए बिना चौबीसों घंटे बारहों महीने बसंत के नशे में फन फैलाए यह लोक का तंत्र! अपने खूबसूरत लोकभवन में नाचता रहता है। हाँ, जब भी किसी ने इसके 'फन' को कुचलने की कोशिश की, तो बस यही कहा जाता है, वह देखो! वह लोकतंत्र की हत्या कर रहा है। फिर लोक नाराज!! अब तो इतिसिद्धम! कि लोकतंत्र में बसंत है।
         हाँ, श्रीमती जी ने बसंत में "फन" कह कर मेरी आँख खोल दी। जबकि अभी तक मैं अपनी अनिश्चयात्मिका बुद्धि के साथ लोकतंत्र और बसंत के बीच "का" और "से" का संबंध फिट करने में ही उलझा हुआ विचरण कर रहा था। मेरी अपनी अनुभवार्जित मति जैसी मारी गई थी!! मैंने अपने अंदर नहीं झाँका! पहले मैंने यही सोचा था, "हो न हो "लोकतंत्र का बसंत" होता होगा, आखिर चुनावों में कितनी रौनक छायी रहती है, जैसे पूरे लोक का लह लग जाता है!" फिर मन में आया कि ऐसा कैसे? चुनाव तो पाँच साल बाद आते हैं और बसंत तो हर साल आता है, अतः लोकतंत्र का बसंत सही नहीं हो सकता। आखिर में, बड़ी ऊहापोह के बाद "लोकतंत्र से बसंत है" पर जाकर यह सोचकर मन स्थिर कर पाया था कि, "यदि लोकतंत्र न होता तो हर साल बजट भी न मिलता, और यदि बजट खर्च करने को न मिलता, तो मुझे बसंत का अहसास भी न होता..फिर तो मेरे जैसों के लिए लोकतंत्र से ही बसंत है।"
         लेकिन "लोकतंत्र में बसंत" के आप्शन के साथ ही लोकतंत्र और बसंत के बीच "का" और "से" वाला संबंध भी एकदम से खतम। वाकई! मैं लोकतंत्र और बसंत में रिलेशन स्थापित करने में चूक कर गया था। इस मामले में मेरी अपनी दिक्कत भी यही थी कि, बुन्देलखण्ड में बसंत को ढूँढ़ना बहुत बड़ी टेढ़ी खीर है...मुझ जैसे लोक के तंत्र वालों ने अपने फन के चक्कर में सही में, यहाँ के लोक से बसंत को सुड़क लिया ! भले इसे हम सूखे का प्रभाव कह लें या फिर कुछ और, लेकिन यहाँ के लोक से बसंत अपदस्थ हो ही चुका है। इधर हम अपने बचाव में एक मंझे तांत्रिक की तरह यहाँ के लोक को अबरा-का-डबरा सुनाते हुए "बिगरयौ टाइप का बसंत है" जैसी बात कह कर भरमाते रहते हैं। 
          हाँ तो, लोकतंत्र में ही बसंत है, प्रत्येक निश्चयात्मिका बुद्धि वाला नि:सन्देह इसे स्वीकार कर लेगा !! वाकई लोकतंत्र में रहते हुए यह बसंत "बिगरयौ" नहीं "सुधरयौ" टाइप का बन चुका है, जो अब तंन्त्र में बेहद सुरक्षित है। इसे लफ्फाजी समझ, बात को हवा में न उड़ाएँ...यह बात मैं आपको समझाए देता हूँ..!

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

पुस्तक-मेले में लेखक

            इधर सोशल मीडिया पर किसी पुस्तक मेले की खूब चर्चा चली ! मैं भी यहीं से पुस्तक-मेले में हो रही गतिविधियों को वाच करता रहा। जहाँ लेखकों की गहमागहमी के साथ उनकी पुस्तकों के विमोचन की चर्चा खूब होती रही। लेकिन इस दौरान मन में यही प्रश्न बार-बार उठता रहा, कि पुस्तक-मेले में पाठक मँडराएं तो मँडराएं लेकिन ये लेखक क्यों मँडराते हैं..? खैर, इसके बहुत सारे उत्तर हो सकते हैं! और मिला भी। एक उत्तर यही कि बेचारा लेखक भी साहित्यकार बनना चाहता होगा इसीलिए वह पुस्तक-मेले का रुख करता होगा! इस संबंध में अन्य उत्तर पुस्तक-मेले में विचरते बेचारे लेखक ही दे सकते हैं। "बेचारे" इसलिए कि पुस्तक-मेलों में इन बेचारे लेखकों की बड़ी मरन होती है, जैसा कि लेखकों के मुँह से ही मैंने जाना है। 

 

         अब पुस्तक-मेले में कोई लेखक गया होगा तो निश्चय ही उस बेचारे ने पहले प्रकाशक को पटाया होगा, फिर किसी सिद्ध टाइप के साहित्यकार से पुस्तक की भूमिका लिखाई होगी, और इसके बाद पुस्तक-मेले में अपनी पुस्तक के विमोचन के लिए किसी महापुरुष टाइप के विमोचक को ढूँढ़ा होगा! तब कहीं जाकर वह बेचारा लेखक साहित्यकार होने का दर्जा पाया होगा !! पुस्तक-मेले में लेखक शायद इसी वजह से जाते होंगे। बाप रे..!  पुस्तक-मेले में लेखक की यह मरन नहीं तो और क्या है..! मतलब उसे कितना जुगाड़ करना होता होगा।

          वैसे अपन, अपन को बतकचरा टाइप का लेखक समझता है, सो इस मरन से बचा हुआ है। लेकिन वाहवाही का चक्कर बड़ा खराब होता है, यह क्या से क्या न कराए! मने वाहवाही में पड़ एक अच्छा-भला लेखक ही साहित्यकार बन जाता है..! लेकिन हम जैसे बतकचरा करने वाले अगर वाहवाही में फुदकें भी, तो पुस्तक-मेले में नहीं पहुँच पाएंगे, इसके लिए राजधानी जाना पड़ेगा। क्योंकि, यह पुस्तक-मेला गाँव-जवार में नहीं, राजधानी टाइप के शहरों में ही आयोजित होता है। वैसे भी राजधानियाँ, तिकड़मियों का गढ़ और शक्ति का केंद्र होती हैं, जो लोगों को बनाती और बिगाड़ती हैं ! ऐसे में, यहाँ दूर-दराज के गँवारों को कौन पूँछेगा? इसके लिए अलग तौर-तरीके होने चाहिए होते हैं। वाकई, यहाँ के तौर-तरीकों को अपनाए बिना एक बतकचरा टाइप के लेखक के साहित्यकार बनने की तमन्ना धरी की धरी रह जाती होगी। इसीलिए तो, हम पुस्तक-मेले का रुख नहीं करते। 

          वैसे भी, इधर सरकारी फील्ड में रहते हुए अपन को राजधानी में चलने वाले तिकड़मों और तिकड़मी लोगों का हाल, खूब पता है! यह भी पुस्तक-मेले के लेखकों के फील्ड जैसा ही है। लेकिन यहाँ और भी तिकड़मबाज लोग हैं और ये सिद्धहस्त तिकड़मी लोग, तिकड़मार्जित सिद्धि-रस की चुस्कियाँ ले, मुस्कुराते हुए यहाँ खूब देखे जाते हैं! ये फुल्ली विमोचक और लब्ध-प्रतिष्ठित टाइप के होते हैं। जैसे पुस्तक-मेले में किसी लब्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार का प्रत्येक लेखन, बिना विमोचित हुए भी साहित्य होता है, वैसे ही राजधानी के इन सरकारी-फील्ड के लब्ध-प्रतिष्ठित वालों का प्रत्येक कृतित्व स्वत: विमोचित हुआ माना जाता है। सरकारें भी इन पर आँख-मूँद कर विश्वास करती हैं, क्योंकि ये नेताओं से विमोचित हुए लोग होते हैं। यही लोग राजधानी में बैठे-बैठे दूर-दराज के लोगों को उनके कृतित्व के साथ उन्हें अपने तरीके से विमोचित करते रहते हैं। 

           लेकिन मैं ऐसे विमोचनों से बहुत डरता हूँ ! इससे मेरा जी घबराता है और राजधानी जाने से डरता हूँ। और नहीं तो, अन्तरात्मा कचोटती है। मैं इस फील्ड में रहते हुए जानता हूँ कि श्रेष्ठ, उत्तम या उत्कृष्ट की मानद उपाधि हासिल करने के लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं..! लेखक-वेखक की तरह ही यहाँ भी अपने लिखे या किए को श्रेष्ठ घोषित कराने के लिए भूमिका-लेखक, प्रकाशक और महापुरुष टाइप के विमोचक को पटाना पड़ता है, जो अपन के लिए टेढ़ी खीर है। 

         इसलिए अपन इस निश्चय पर पहुँच चुके हैं कि, किसी पुस्तक-मेले के लेखकीय-मंच से साहित्यकार बनने की कामना करना व्यर्थ है। ज्यादा से ज्यादा एक बतकचरा टाइप का लेखक बन, बिना किसी तमगे की अभिलाषा के, एक कोने में पड़े हुए टेंशन-फ्री रहना ही श्रेयस्कर होगा। हाँ, मरे-जिए के बाद की बात देखी जाएगी! यदि तब किसी पाठक ने साहित्यकार घोषित किया भी तो, पुरस्काराधीन लेखकीय ईर्ष्या-द्वेष और तिकड़म से भी तो मुक्त रहेंगे ही! आमीन..!!

रविवार, 14 जनवरी 2018

बात में कोहरा और कोहरे में बात!

            जब से कोहरे पर चर्चा चली है तब से इसपर लिखने का बड़ा मन कर रहा था, लेकिन लिखने का समय ही नहीं मिल रहा था। उस दिन मने दो-तीन दिन पहले, बस में सफर के दौरान मन हो आया कि कोहरे पर कुछ लिख ही डालें। जेब से मोबाइल निकला, दाएँ-बाएँ देखा और लिखना चालू किया। इतने में पास की सीट पर बैठा एक यात्री किसी से कहते सुनाई पड़ा "आज मौसम बहुत साफ है!"  मैंने बस की खिड़की के बाहर झाँका, वाकई मौसम साफ था। सुबह के लगभग आठ बजे की खिली धूप पर निगाह ठहर गई। बस फिर क्या था! सोचा, बात कुछ और..लिख कुछ और रहा.!! और लिखने से मन कुछ-कुछ उचाट टाइप का हो आया। 

          लेखक-वेखक भी शायद कुछ ऐसे ही होते होंगे! ये  "जे बात नहीं..वो बात" टाइप का लिखते होंगे और लिखने के बाद भी बात ज्यों की त्यों रह जाती है। उस व्यक्ति के चेहरे की ओर देख मैंने यही सोचा, "मुझे कोहरे पर लिखता देख...आज मौसम बहुत साफ है...कह कर यह मुझ पर व्यंग्य तो नहीं कस रहा?"

         दरअसल आजकल लोग शब्द या वाक्यों से, अजब-गजब की अठखेलियाँ कराते हैं। लिखने, सुनने या कहने वाला चाहे जो हो, सभी अपने लिखे, सुने या कहे का मतलब उलट-पलट देते हैं, जैसे अब लिखे-कहे में कोई मासूमियत बची ही नहीं। अब हर लिखने, कहने और सुनने वाला नेता टाइप का ही हो चला है। मैं तो अब यही समझता हूँ, मौसम साफ होना भी कोहरे का ही एक प्रकार है !

            हाँ तो, मैंने इस नेता टाइप की अपनी फीलिंग के साथ, उस व्यक्ति पर निगाह गड़ाई। जैसे कोई नेता, आमआदमी को देख तसल्ली करता है, कि यह आदमी अपनी निगाह सीधी रखता है, उससे जो कहा-सुना जाय वह वही समझता और देखता है, वैसे ही मैं भी इस बात से मुतमइन हुआ कि यह व्यक्ति साफ मौसम को साफ ही कह रहा होगा। इसे किसी की व्यक्तिगत आलोचना से क्या मतलब!! असल में आम आदमी व्यंग्य नहीं करता, बल्कि व्यंग्य भुगतता है। चाहे मौसम साफ हो या कुहासा वाला, इसे भुगतना ही होता है। हाँ, अब मौसम से नहीं, बातों से डर लगता है..! खैर.. 

            तो, यह सोचकर मैं इस निश्चय पर पहुँच गया था कि "मौसम साफ है" कहना मेरी आलोचना नहीं ही है। फिर भी साफ मौसम देखने के बाद कोहरे पर लिखने से मन उचट तो गया ही था। सो, इसके बाद बगल में बैठे एक लड़के पर निगाह डाली तो वह भी अपने मोबाइल में खोया दिखा, बस फिर क्या था! मैं अपने लड़कपन पर शर्मिंदा टाइप का हो आया, मोबाइल-शोबाइल बंद कर उसे जेब में डाल लिया और एक सयाने शख्स की भाँति कोहरे पर चिंतन-मनन करते हुए आँखें बंद कर लिया।             

          

            अभी कल की ही बात तो थी जब कोहरा घना था। सुबह उठने से पहले मौसम साफ होने का इन्तजार किया। असल में अपनी कार की सर्विसिंग करानी थी। मौसम साफ देखा, तो पहुँच गए सर्विस स्टेशन! मैं खड़े-खड़े अपनी कार का मुआयना करा ही रहा था, तभी एक शख्स धड़धड़ाते हुए वहाँ आया और लगे हाथ मुझसे बोल बैठा, "मैं अभी कुछ दिनों पहले अपनी कार (कोई यस यू वी टाइप की ) की सर्विसिंग कराया था, मुझे एक जगह जाना पड़ा तो पता चला सर्विसिंग में मेरी कार ही बदल दी." मैं उस पर आश्चर्यमिश्रित निगाह डालते हुए पूँछा, "वह कैसे?" तो उसने बताया कि एक तो उसकी कार अब अस्सी किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ज्यादा नहीं भागती और ढंग से ब्रेक भी काम नहीं कर रहा, और तो और अब उसमें जंग लगा दिखाई दिया। 

    

          उस व्यक्ति की बात, मुझे अपनी इस चिंता के साथ मजेदार लगी कि कहीं मेरी भी कार न बदल दी जाए। एक व्यक्ति को अपनी ओर आते देख मैंने उसकी ओर इशारा करते हुए उससे इतना भर कहा, "हाँ..यहाँ लापरवाही तो होती है!..उनसे कहिए..वही यहाँ के मैनेजर हैं।" मैनेजर द्वारा इंजिनियर से चेक कराने की बात कहने पर वह अपनी कार के पास चला गया।

         उसके जाने के बाद मैंने मैनेजर से पूँछा, "यार यह तो बड़ी लापरवाही है! आप लोग गाड़ी बदल देते हो!!"  उसने कहा, "अरे नहीं...बात यह नहीं है..ये महाशय अपनी कार में फिर से मुफ्त में कुछ काम कराना चाह रहे होंगे इसीलिए ऐसा कह रहे हैं... ऐसे कैसे कोई गाड़ी बदल देगा?" खैर उसकी बात पर मैंने भी सहमति जताई।

          अब मैनेजर मुझसे बतियाते हुए कहने लगा, "अभी सर जी उस दिन की ही बात है, एक आदमी अपनी गाड़ी यहाँ सर्विस कराने आया था और यहीं बगल वाले होटल में वह खाना खाने चला गया...कुछ देर बाद होटल से आती हो-हल्ले की आवाज सुनकर हम लोग भी वहाँ पहुँचे..वह आदमी होटल में खाना परोसने वाले पर विफरते हुए चिल्ला रहा था कि साले..सब्जी इसलिए कम परोस रहे हो कि हम दुबारा सब्जी मांगे और तुम इसका दुबारा चार्ज करो..! बेचारा होटल मालिक उसे...जितना सब्जी लेना चाहो, उतना लो...कहकर उसे शान्त करने की कोशिश कर रहा था।" 

          फिर मैनेजर ने मुझसे कहा, "अब ऐसे लोग और उनकी बातों पर क्या कहा जाए..आप ही बताइए!"

         मैनेजर और आदमी...वैसे मैनेजर भी आदमी ही होता है जैसा कि लिखने, सुनने और कहने वाला होता है...की बात सुनकर मैंने समझ लिया था कि बात में कोहरा है और कोहरे में बात है...! भले ही मौसम साफ है...!! 

         आँख खुली तो देखा, बस अपने अड्डे पर पहुँच चुकी थी। मौसम साफ था, लेकिन मैं बातों से डरा हुआ था। 

पहली जनवरी #सुबहचर्या

          सुबह जब शुक्ला जी का फोन आया, तो मैं भी उठने के लिए कशमशा रहा था। असल में क्या है कि बीती रात से ही सर न जाने क्यों भारी-भारी सा था..नींद आने में भी देरी हुई..करीब आधे घंटे तक गहरी सांसें लेने और दिमाग को भरसक चीजों से खींच लेने के बाद ही नींद आई थी। फोन पर शुक्ला जी से गुड मॉर्निंग और "हैप्पी न्यू ईयर" हुआ। इसके बाद थोड़ा प्राणायाम टाइप का करते हुए मन-मस्तिष्क को और रिलैक्स होने दिया। तब बाहर निकला। मिलने पर एक बार फिर आपस में हैप्पी न्यू ईयर करते हुए हम दोनों स्टेडियम के रास्ते हो लिए। चलते हुए मेरे इस बात "आज भी कोहरा घना है" पर शुक्ला जी ने दुष्यंत कुमार की "मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है" पंक्ति सुनाई।

          रास्ते में एक जगह ठिठकते हुुए शुक्ला जी ने अपना मफलर ठीक से बाँधना चाहा तो उनका छोटा सा "रूल" मने "दंड" मैंने अपने हाथ में ले लिया। खैर, जैसे ही मैंने रूल अपने हाथ में लिया मुझे मेरी चाल बदलती हुई लगी और जैसे मुझे एक तरीके के "अकड़पन" का अहसास हुआ हो! इस पर ध्यान देते हुए मैंने शुक्ला जी से कहा, "मेरे हाथ में यह रूल आते ही मेरी चाल बदल गई, अब मुझे अपने पावरफुल होने का अहसास होने लगा है..!" इस बात पर हम दोनों हँस पड़े। हँसते हुए उन्होंने मुझसे कहा "इस रूल की सबसे ज्यादा आवश्यकता आपको ही है.." लेकिन मफलर बाँधने के बाद मैंने रूल पुनः उन्हें वापस कर दिया और ऐसा कर मैं रिलैक्स भी हो लिया था। वाकई, शक्ति धारण करना भी तो सबके बस की बात नहीं है ! 

     

           अब मैंने रूल हाथ में लेने के बाद अपने अंदर आये अकड़पन के रूप में परिवर्तन पर गौर किया। वास्तव में हमें हमारी क्षमता का अहसास होना, हमारे व्यवहार में परिवर्तन का कारण बन सकता है। हनुमान जी भी "का चुप साधि रहा बलवाना" सुनने के बाद अपनी शक्ति "भूधराकार शरीरा" का अहसास कर वे समुद्र लांघ जाते हैं। मतलब यही कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का अहसास करते रहना जरूरी होता है चाहे इसके लिए "रूल" या "दंड" ही हाथ में क्यों न लेना पड़े !! 

         खैर.. इन्हीं बातों पर सोचते हुए हम स्टेडियम का दो चक्कर पूरा कर लिए। लौटते हुए ध्यान दिया, कुछ युवा लड़के आपस में बतियाते हुए स्टेडियम की ओर जा रहे थे। उनमें से कोई एक कह रहा था "सुबह का भूला अगर शाम को घर वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते, लेकिन अगर वह शाम को भी वापस न आए तो क्या कहेंगे...?" लड़कों के बीच की इस आपसी बात को सुनते ही शुक्ला जी उन्हें सुनाते हुए तपाक से कहा, "भुलक्कड़..! हाँ, जो शाम को भी घर लौट के न आ आए उन्हें भुलक्कड़ कहते हैं..!!" मैं हँस पड़ा था शुक्ला जी की इस हाजिरजवाबी पर!!! बात जो भी हो, हमारी भूलने की आदत प्राकृतिक है! लेकिन भुलक्कड़पने से भी बचना चाहिए, अन्यथा घर ही भूल जाने का डर होता है। वैसे तो हम स्मृतियों का भी बोझ उठाए आगे नहीं बढ़ सकते। 

          इसी आपस की हमारी बातचीत के दौरान आज फोन पर होने वाले नये साल की शुभकामनाओं के आदान-प्रदान पर भी चर्चा हुई।मैंने कहा, "इस मामले में तो मैं बहुत आलसी हूँ..! आलस के चक्कर में किसी को फोन तक नहीं कर पाता.." हालाँकि उनने यही कहा, "आज कोई काल फ्री नहीं है..मतलब आज फुल दरें लागू हैं.." इस बात पर मुस्कुराते हुए मैंने यही सोचा, "यहाँ मेरा आलसपन लाभदायी है।" खैर... 

           

            कुछ लोग "नव वर्ष" या "जन्मदिन" जैसे अवसर पर शुभकामनाओं के आदान-प्रदान को, भारतीय-परंपरा जनित न मानकर इसे पाश्चात्य परंपरा का अंग मानते हैं। मैं, इसके पीछे के कारण के रूप में भारतीय और पश्चिम की नैतिक और खासकर धार्मिक विश्वासों के बीच के अन्तर को मानता हूँ। असल में भारतीय दर्शन में आत्मा की शाश्वतता को स्वीकार किया गया है जिसमें काल-खंड की अवधारणा फिट नहीं बैठती, जबकि वहीं पर पाश्चात्य धर्म-दर्शन में आत्मा या उसकी शाश्वतता की अवधारणा नहीं है, वहाँ केवल अनुभूतियों पर जोर दिया जाता है...वे अपनी प्रत्येक अनुभूतियों को महत्व देते हैं, और इसी वजह वे अपने प्रत्येक पल का स्वागत करते प्रतीत होते हैं। शायद वहाँ इसीलिए परस्पर अभिवादन में "गुड मॉर्निंग" या" गुड इवनिंग" बोला जाता है। 

        

           चलिए कोई बात नहीं..सद्भावना प्रदर्शित करने वाली परंपरा चाहे जिसकी हो, उसे अपनाने में अपने सोच का अहं आड़े नहीं आना चाहिए। 

          आज का अखबार पढ़ा तो वही कल जैसी खबरें!  खबरों में "हैप्पी न्यू ईयर" मनाने जैसी कोई बात नहीं। बल्कि एक दो खबरें पढ़ क्षोभ ही हुआ। "आखिर स्त्रियों के प्रति हमारे पशुवत व्यवहार में कब परिवर्तन आएगा" सोचते हुए आशा की एक किरण के साथ कि "यह खबर इकतीस दिसंबर की है" अखबार पढ़ना बंद कर दिया। खैर.. 

       #चलते_चलते 

            जीवन जीने के लिए हमें समय के प्रवाह में से उल्लासित करने वाले ऐसे प्रत्येक क्षण को अपने लिए काट कर रख लेना चाहिए, शेष के लिए हमारी भूलने की प्राकृतिक आदत तो है ही!

        

          सभी मित्रों को 2018 की शुभकामनाएँ!! 

       #सुबहचर्या