सोमवार, 25 दिसंबर 2017

छेड़खानी

           तो छेड़खानी का अजीब मसला छाया हुआ है आजकल! यह बहुत चर्चित शब्द बन चुका है। छेड़खानी पर जितना हो-हल्ला मचता है उतना ही घटने के बजाय यह बढ़ रही है। अभी देखिए गुजरात में क्या हुआ..क्या छेड़खानी में कमी हुई? नहीं, खूब छेड़खानी हुई ! वे आरोप लगाते रह गए और छेड़खानी करने वाले मजा मार ले गए! पता नहीं चुनाव आयोग वाला एंटी रोमियो स्क्वाड कहाँ रह गया। 

           वैसे यह ईवीएम तो बड़ी चतुर-सुजान निकली! या हो न हो, यह भी छेड़खानी करने वालों की चालाकी में फँसकर उन्हें कुछ न बोलती हो! लेकिन वहीं पर, भुग्गापन दिखाने वाले को बेरहमी से चांटा जड़ देती है। और बेचारा चांटा खाने वाला मारे शर्म के कुछ न बोलकर, यही सोचता होगा कि एक सीधे-सादे नियम-कायदा मानने वाले को छेड़खानी किए बिना ही चांटा पड़ गया..! वाकई, इस देश में सीधे-सादे लोगों की हालत "सिधुवा का मुँह कुकुर चाटे" जैसा है कि बेचारा चांटा-फांटा खाकर भी कुछ नहीं बोल पाता। यह बात इस कहानी से कुछ मिलती-जुलती सी है, 

            "एक सँकरी गली से गुजरते किसी लड़के को सामने से एक बेचारी इवीएम टाइप की लड़की आती हुई दिखाई पड़ी। अब गली सँकरी तो सँकरी! इस सँकरी गली में दाएँ-बाएँ चलने का नियम तो लागू नहीं हो सकता! सो, यह सोचते हुए लड़का दाएँ होता है कि बेचारी लड़की उसके बाएँ से निकल लेगी। लेकिन जैसे लड़के ने सोचा वैसे ही लड़की ने भी सोच लिया और दोनों आमने-सामने आ गए। फिर लड़का बाएँ हुआ तो लड़की भी अपनी सोच के मुताबिक अपने दाएँ हुई, फिर तो दोनों आमने-सामने!  इस दाएँ-बाएँ के चक्कर में लड़के के गाल पर लड़की का एक जोरदार चांटा रशीद हो चुका था। मतलब लड़के को अपने भुग्गेपने में छेड़खानी के आरोप में लड़की से चांटा खाना पड़ा। और लड़की से चांटा खाकर मनमसोस कर लड़के ने यही सोचा होगा "जरूर पहले किसी ने इसके साथ छेड़खानी की होगी तभी अति सावधानी में इसने चांटा जड़ा।" 

           अब इतना जरूर होता है चांटा खाकर तिलमिलाए हुए वह लड़का अपनी सफाई में उस लड़की के बारे में "जितनी मुँह उतनी टाइप की बातें" कर उसमें मीन-मेख निकालने की कोशिश कर सकता है। यह प्रवृत्ति अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में यहां मने अपने देश में खूब काम अाती है।

           लेकिन, अगर लड़की किसी ताकतवर कुनबे से हुई, तो चांटा खाने वाले लड़के की शिकायत अनसुनी ही रह जाती है और उसके स्वयं के सभ्य होने की दुहाई भी व्यर्थ चली जाती है। लड़की का चुनाव आयोग जैसा ताकतवर कुनबा लड़के को भली-भांति समझाइश देकर वापस पठा देगा कि "भई हमने तो लड़की में इवीएम जैसा सांस्कारिक साफ्टवेयर भरा हुआ है..देख तू ही अपनी लाइन सीधी रख...कभी दाँए तो कभी बाँए के चक्कर में पड़कर तू ही गलतफहमी पैदा करता है...फिर तो चांटा खाएगा ही..! और दोष इवीएम जैसी हमारी लड़की को देगा! जाओ सुधार करो अपने में..!!"  

              हाँ तो, चाहे लड़की हो या इवीएम, इस देश की यही रवायत है, जो अपनी बात पर दृढ़ता से कायम होते हैं, उनमें ही जानबूझकर नुक्स निकाला जाता है और उन्हें ही, जितनी मुँह उतनी बातें कह कर समाज-बहिष्कृत होने का दंश झेलाया जाता है। लेकिन जनता अब धीरे-धीरे होशियार हो रही है, किसी बात पर स्टैंड लेने वाले को ही वह चरित्रवान समझती है। कभी दाँए कभी बाँए चलने वाले को जनता भुग्गा मानती है, और उसे अपने भुग्गेपन का खामियाजा चांटा खाकर भुगतना पड़ता है। मतलब, अब जमाना एडवांस हो चुका है, छेड़खानी को सभ्यता का अंग माना जाने लगा है, मार तो भुग्गेपने की वजह से पड़ती है। 

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