रविवार, 14 जनवरी 2018

बात में कोहरा और कोहरे में बात!

            जब से कोहरे पर चर्चा चली है तब से इसपर लिखने का बड़ा मन कर रहा था, लेकिन लिखने का समय ही नहीं मिल रहा था। उस दिन मने दो-तीन दिन पहले, बस में सफर के दौरान मन हो आया कि कोहरे पर कुछ लिख ही डालें। जेब से मोबाइल निकला, दाएँ-बाएँ देखा और लिखना चालू किया। इतने में पास की सीट पर बैठा एक यात्री किसी से कहते सुनाई पड़ा "आज मौसम बहुत साफ है!"  मैंने बस की खिड़की के बाहर झाँका, वाकई मौसम साफ था। सुबह के लगभग आठ बजे की खिली धूप पर निगाह ठहर गई। बस फिर क्या था! सोचा, बात कुछ और..लिख कुछ और रहा.!! और लिखने से मन कुछ-कुछ उचाट टाइप का हो आया। 

          लेखक-वेखक भी शायद कुछ ऐसे ही होते होंगे! ये  "जे बात नहीं..वो बात" टाइप का लिखते होंगे और लिखने के बाद भी बात ज्यों की त्यों रह जाती है। उस व्यक्ति के चेहरे की ओर देख मैंने यही सोचा, "मुझे कोहरे पर लिखता देख...आज मौसम बहुत साफ है...कह कर यह मुझ पर व्यंग्य तो नहीं कस रहा?"

         दरअसल आजकल लोग शब्द या वाक्यों से, अजब-गजब की अठखेलियाँ कराते हैं। लिखने, सुनने या कहने वाला चाहे जो हो, सभी अपने लिखे, सुने या कहे का मतलब उलट-पलट देते हैं, जैसे अब लिखे-कहे में कोई मासूमियत बची ही नहीं। अब हर लिखने, कहने और सुनने वाला नेता टाइप का ही हो चला है। मैं तो अब यही समझता हूँ, मौसम साफ होना भी कोहरे का ही एक प्रकार है !

            हाँ तो, मैंने इस नेता टाइप की अपनी फीलिंग के साथ, उस व्यक्ति पर निगाह गड़ाई। जैसे कोई नेता, आमआदमी को देख तसल्ली करता है, कि यह आदमी अपनी निगाह सीधी रखता है, उससे जो कहा-सुना जाय वह वही समझता और देखता है, वैसे ही मैं भी इस बात से मुतमइन हुआ कि यह व्यक्ति साफ मौसम को साफ ही कह रहा होगा। इसे किसी की व्यक्तिगत आलोचना से क्या मतलब!! असल में आम आदमी व्यंग्य नहीं करता, बल्कि व्यंग्य भुगतता है। चाहे मौसम साफ हो या कुहासा वाला, इसे भुगतना ही होता है। हाँ, अब मौसम से नहीं, बातों से डर लगता है..! खैर.. 

            तो, यह सोचकर मैं इस निश्चय पर पहुँच गया था कि "मौसम साफ है" कहना मेरी आलोचना नहीं ही है। फिर भी साफ मौसम देखने के बाद कोहरे पर लिखने से मन उचट तो गया ही था। सो, इसके बाद बगल में बैठे एक लड़के पर निगाह डाली तो वह भी अपने मोबाइल में खोया दिखा, बस फिर क्या था! मैं अपने लड़कपन पर शर्मिंदा टाइप का हो आया, मोबाइल-शोबाइल बंद कर उसे जेब में डाल लिया और एक सयाने शख्स की भाँति कोहरे पर चिंतन-मनन करते हुए आँखें बंद कर लिया।             

          

            अभी कल की ही बात तो थी जब कोहरा घना था। सुबह उठने से पहले मौसम साफ होने का इन्तजार किया। असल में अपनी कार की सर्विसिंग करानी थी। मौसम साफ देखा, तो पहुँच गए सर्विस स्टेशन! मैं खड़े-खड़े अपनी कार का मुआयना करा ही रहा था, तभी एक शख्स धड़धड़ाते हुए वहाँ आया और लगे हाथ मुझसे बोल बैठा, "मैं अभी कुछ दिनों पहले अपनी कार (कोई यस यू वी टाइप की ) की सर्विसिंग कराया था, मुझे एक जगह जाना पड़ा तो पता चला सर्विसिंग में मेरी कार ही बदल दी." मैं उस पर आश्चर्यमिश्रित निगाह डालते हुए पूँछा, "वह कैसे?" तो उसने बताया कि एक तो उसकी कार अब अस्सी किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ज्यादा नहीं भागती और ढंग से ब्रेक भी काम नहीं कर रहा, और तो और अब उसमें जंग लगा दिखाई दिया। 

    

          उस व्यक्ति की बात, मुझे अपनी इस चिंता के साथ मजेदार लगी कि कहीं मेरी भी कार न बदल दी जाए। एक व्यक्ति को अपनी ओर आते देख मैंने उसकी ओर इशारा करते हुए उससे इतना भर कहा, "हाँ..यहाँ लापरवाही तो होती है!..उनसे कहिए..वही यहाँ के मैनेजर हैं।" मैनेजर द्वारा इंजिनियर से चेक कराने की बात कहने पर वह अपनी कार के पास चला गया।

         उसके जाने के बाद मैंने मैनेजर से पूँछा, "यार यह तो बड़ी लापरवाही है! आप लोग गाड़ी बदल देते हो!!"  उसने कहा, "अरे नहीं...बात यह नहीं है..ये महाशय अपनी कार में फिर से मुफ्त में कुछ काम कराना चाह रहे होंगे इसीलिए ऐसा कह रहे हैं... ऐसे कैसे कोई गाड़ी बदल देगा?" खैर उसकी बात पर मैंने भी सहमति जताई।

          अब मैनेजर मुझसे बतियाते हुए कहने लगा, "अभी सर जी उस दिन की ही बात है, एक आदमी अपनी गाड़ी यहाँ सर्विस कराने आया था और यहीं बगल वाले होटल में वह खाना खाने चला गया...कुछ देर बाद होटल से आती हो-हल्ले की आवाज सुनकर हम लोग भी वहाँ पहुँचे..वह आदमी होटल में खाना परोसने वाले पर विफरते हुए चिल्ला रहा था कि साले..सब्जी इसलिए कम परोस रहे हो कि हम दुबारा सब्जी मांगे और तुम इसका दुबारा चार्ज करो..! बेचारा होटल मालिक उसे...जितना सब्जी लेना चाहो, उतना लो...कहकर उसे शान्त करने की कोशिश कर रहा था।" 

          फिर मैनेजर ने मुझसे कहा, "अब ऐसे लोग और उनकी बातों पर क्या कहा जाए..आप ही बताइए!"

         मैनेजर और आदमी...वैसे मैनेजर भी आदमी ही होता है जैसा कि लिखने, सुनने और कहने वाला होता है...की बात सुनकर मैंने समझ लिया था कि बात में कोहरा है और कोहरे में बात है...! भले ही मौसम साफ है...!! 

         आँख खुली तो देखा, बस अपने अड्डे पर पहुँच चुकी थी। मौसम साफ था, लेकिन मैं बातों से डरा हुआ था। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें