शुक्रवार, 16 जून 2017

टापर

             टापर को अगर व्यंग्यियायें तो कैसे? क्योंकि टापर को व्यंग्यीयाना देश-द्रोह जैसा अपराध होगा यह किसी की देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने जैसा होगा। यह मेरे सामने एक गूढ़ प्रश्न है! सोचता हूँ, देश भर में आजादी के बाद से कितने टापर हो चुके होंगे? हिसाब तो लगाना ही पड़ेगा! हिसाब इसलिए कि देश की जी डी पी या कहिए इससे देश का इकोनामिकली ग्रोथ-रेट पता चलेगा। हमारे कुछ अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि अपने देश का ग्रोथ रेट काफी तेज है, जबकि कुछ इसपर असंतोष भी व्यक्त करते हैं। कहीं देश के ग्रोथ-रेट में यह दृष्टव्य उतार-चढ़ाव देश के टापरों से को-रिलेट तो नहीं करती..? यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। 
          वैसे इतना तो तय है, ये टापरों की संख्या ही देश की जी डी पी में वृद्धि का कारक होती है। क्योंकि ये टापर जी ही हैं, जो जी-जान से देश सेवा में सन्नद्ध होते हैं। बाकी तो सब लफंटूस बने घूमते हैं। कभी-कभी, मैं उनको महा बेवकूफ मानता हूँ, जो आजकल टापरों के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं। अरे भाई!  इन बेचारों को टापर होने का सुख तो लेने दो, तभी देश में भी सुखक्रांति आयेगी और गरीबों के चेहरों पर मुस्कान तैरेगी! टापरों को हतोत्साहित मत कीजिए। बल्कि इनके सुर-लय-ताल की तारीफ करिए। यही तो हैं, जो ताल में ताल मिलाकर, देश में लयबद्ध ढंग से विकास का काम कर रहे हैं।  ये टापर बखूबी बेसुरे राष्ट्र विरोधी तत्व को देश-सेवा जैसे महत्वपूर्ण काम से अलग कर देते हैं। मैं तो कहता हूँ इसीलिए देश को इन टापरों का ॠणी होना चाहिए।          हमको तो लगता है इन टापरों में, टापर होने के पहले और टापर होने के बाद टापरीय टाइप का अन्दरूनी समझौता होता है, और वह होता है देश-सेवा करने का समझौता..! तभी तो न, टाप करने के बाद इनके मुख से बस यही पहला लफ्ज़ निकलता है "हम देश की सेवा करना चाहते हैं।" हाँ भाई ये टापर लोग, आपस में मिल-बाँटकर देश-सेवा करते हैं...वास्तव में देश-सेवा का मूलाधिकार भी इन्हीं टापरों में ही निहित है।
           इधर कुछ लोग देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की शिकायत भी करने लग रहे थे। तथा कुछ देश की आर्थिक प्रगति की धीमी गति पर अपने वित्तमंत्री की खिंचाई करते भी देखे जा सकते हैं। तमाम अर्थवेत्ता अपने-अपने तईं देश के इस घटती अर्थव्यवस्था दर पर अपने कारण भी गिनाते जा रहे हैं...लेकिन, मुझे तो लगता है, इनके गिनाए कोई भी कारण सटीक नहीं है...आईए लगे हाथ मैं आपको कारण बताए दे रहा हूँ... वह भला हो बिहार के उस पत्रकार का, जिसने सोशल-मीडिया पर एक फोटो वायरल की थी! भाई लोग बिहार बोर्ड परीक्षा में बेसीढ़ी चौथे मंजिल की खिड़कियों पर भी लपक-लपक कर टापर बनाने का काम कर रहे थे। इसके बाद ही बिहार में लोग टापरों की खोजबीन में लगे और "प्रोडिकल-साइंस" विषय के टापर को खोजकर सामने धर दिए थे। तो भाई, सामने आ गया टापर-घोटाला! 
           अब आप तो समझ ही गए होंगे यह टापर-घोटाला ही देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर किए हुए है, और देश को घोटाले की ओर धकेल दे रहा है। मतलब, एकमात्र टापर-घोटाला ही, देश के विकास-दर की उठापटक और यहाँ के घोटालों की जड़ में है। हाँ, जो बेचारे अच्छे टापर होते हैं, देश, विकास की चढ़ाई उन्हीं के माथे कर रहा है। देश में विकास की कमी दिखाई देती है तो इसके पीछे इस टापर घोटाले को ही जिम्मेदार माना जाए। मेरी तो अपनी यह मान्यता है कि, जब तक पूरी तरह टापर रूपी देश के इस महा घोटाले की जड़ में न पहुँचा जाए तब तक आजादी के बाद से जो भी चाहे जिस परीक्षा में बैठा हो, उन सभी को टापर ही माना जाए..कम से कम इसी बहाने हमें भी टापर होने का सुख नसीब हो जाएगा...! बाकी देश-सेवा का काम जारी तो हईयै है...जय हो देश के टापर महराजों की..!! 
          अन्त में, चलते-चलते टापरों के व्यंग्यियाने के इस देश विरोधी लेख में 'टापर' और 'देश-सेवा' की खूब पुनरावृत्ति हुई है..! ऐसा इसलिए कि, टापर और देश-सेवा में बेशकीमती अन्योन्याश्रित संबंध होता है। 

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