मंगलवार, 8 सितंबर 2015

वृंदावन की उजड़ी गलियाँ

         आधी रात गुजर चुकी थी...अर्ध-निद्रित अवस्था में ही मैंने चलती बस की खिड़की से बाहर देखने का प्रयास किया... बाहर भादों की काली रात..! नहीं-नहीं..चाँदनी रात में भादों की सप्तमी का चाँद दिखाई दिया..! दूर पानी में इस चाँद की परछाई भी दिखी...तभी आभास हुआ कि किसी पुल के ऊपर से गुजर रहे हैं...इस समय हम यमुना नदी के पुल से गुजर रहे थे... हाँ ध्यान आ गया कल अष्टमी की रात होगी...कृष्ण जन्माष्टमी..!! सोचा ऐसे ही किसी भादों की अष्टमी की रात को नवजात कृष्ण को सूप में लिटाकर और इसे सिर पर ले वसुदेव ने इसी यमुना को पार किया होगा...तब घने बादलों से घिरी वह काली रात थी...और तो और...यमुना भी उस दिन अपने उफान पर थी तथा कृष्ण के पाँव के अँगूठे को छूकर ही मानी थी...

          मैं बस की खिड़की से ही इस रात के आकाश में बादलों को खोजने लगा...इस भादों की सप्तमी की रात में हमें बादल का कोई टुकड़ा नजर नहीं आया...हाँ आकाश में चाँदनी के साथ तारे भी छिटके दिखे...! सोचा कल जब जन्माष्टमी होगी तो निश्चित रूप से भादों की वह काली रात नहीं होगी... वृन्दावन के उस ग्वाले के लिए अब हम रेगिस्तान निर्मित करते जा रहे हैं.. अगर वह जन्म भी लेगा तो उसमें वे संवेदनाएं कहाँ से आएंगी...क्योंकि वृन्दावन की वे कुंज गलियाँ अब खो गई हैं...

          हमारे किए धरे पर प्रकृति भी हमसे रूठ चुकी है...आखिर भादों की यह चाँदनी रात क्या कहती है...!! कुछ लोगों के लिए यह एक नकारात्मक सोच से उपजा विचार लगा सकता है... लेकिन ऊपर के इस चित्र को देखिए...
          
          जब मैं यहाँ इस गाँव में पहुँचा तो महिलाओं के बीच आपस में पानी भरने को लेकर बतकही हो रही थी... बुन्देलखण्ड में महोबा का यह क्षेत्र अब सूखे से पीड़ित हो चला है.. महीनों से यहाँ ढंग से पानी नहीं बरसा है..खेत और तालाब दोनों सूख रहे हैं... आने वाला दिन यहाँ और भयावह हो सकता है...सूखे जैसी स्थिति बन रही है..!
          
         उधर कुछ दिनों पहले यमुना और बेतवा में बाढ़ की जलराशि और इसे यूँ ही बहता देख मन में एक लालच जाग जाता था कि काश..! इसे हम महोबा के सूखते तालाबों तक पहुँचा पाते...!! लेकिन आजादी के इतने सालों के बाद भी अपने किए-धरे पर शर्मिंदा होने का मन कर आया...!
         
        आखिर हम लोगों ने किया क्या..? हम अब तक एक लिफ्ट कैनाल की योजना भी नहीं बना पाए हैं कि इन नदियों के बाढ़ के दिनों की व्यर्थ होती जलराशि को इसके माध्यम से महोबा जैसे जनपद के तालाबों तक पहुँचा कर उसे भर सके...जो सूखे जैसे गाढ़े दिनों के लिए काम आए...और सूखते हैंडपंपों में भी जलस्रोत निकल पड़े...और तो और...हमने यहाँ खेतों की सिंचाई के लिए कोई भी ढंग का सिंचाई संसाधन विकसित नहीं कर पाए हैं...लेकिन बुंदेलखंड पैकेज में बड़ी-बड़ी कृषि-मंडियां जरुर बना दिए हैं....खेत तो सूखे हैं फिर इन कृषि-मंडियों का क्या काम...!
         
        यहाँ बस इतना ही कहना है कि उस नटखट कान्हा के लिए पहले हम वृन्दावन की वैसी ही कुंज गलियाँ बना दें फिर उसके जन्म का सोहर गाएं... ये रूठे बादल भी तब शायद हमसे खुश हो जाएं...                                

                        

शनिवार, 25 जुलाई 2015

मूँछों के नीचे मुस्कुराने का खेल…!

             यहाँ भ्रष्टाचार वहाँ भ्रष्टाचार.!  सर्वत्र भ्रष्टाचार…!! हाँ..इसे हम जानते हैं क्योंकि जैसा कि इसकी चर्चाएं भी आम हैं.…जैसे फलाना का फलाना बंद…फलाना बार-बार बाधित हुई.…फलाने का चिट्ठी बम…फर्जी फलाने चीज के जांच की माँग…फलाने में  हेराफेरी…फलाने का डेरा बना है फलाना कार्यालय…फलानी चीज के वितरण में धांधली…फलाने निर्माण में फलानों की लूट…गाँव-गाँव में फलाना मिटाओ आंदोलन…अब सोचिए जरा…! फलानी चीज इतनी आम है.…फिर भी यह रूक नहीं रही…!! जबकि सारे लोग इसे रोकने के लिए लगे है.…मैं तो बस इतना कहना चाहता हूँ यह सर्वव्यापी है..... ईश्वर प्रदत्त गुण है अब आप कहते रहिए इसे दुर्गुण…!

              अब आप जरा सोचिए....! सारे लोग इसके पीछे लगे हैं… यही नहीं....सभी यह भी जानते हैं कि यह कहाँ छुपा बैठा है…क्योंकि यह सर्वव्यापी होते हुए भी दृश्यमान है…लेकिन है यह पारदर्शी…! और हर दो के बीच यह पारदर्शी दीवार बनकर खड़ा हो जाता है…! फिर भी इसकी खोजाई-ढूढ़ाई का नाटक चालू है.... इसके चक्कर में जैसे देश का सारा काम ठप्प पड़ा है…यहाँ तक की संसद भी ठप्प है…!

             यह विचारणीय है कि इतना पारदर्शी और सर्वव्यापी होने के बाद भी इसे खोजने का नाटक चल रहा है...? शायद इसका कारण यही है कि इस पारदर्शी दीवार के आर-पार दोनों की नजरें इनायत होती हैं और फिर चलने लगता है मूँछों के नीचे मुस्कुराने का खेल....!! यह खेल होता है बड़ा रोचक…और हाँ…यह लुका-छिपी जैसा खेल भी नहीं है.…यह तो इस पारदर्शी दीवार के आर-पार एक दूसरे को देख मूँछों के नीचे मुस्कुराने का खेल है.....! और यह मूँछों के नीचे मुस्कुराने की प्रतियोगिता भी है जो एक दूसरे से बढ़-चढ़ कर होती है.…!! अब आप ही बताइए… इस देश का चाहे जो ठप्प कर दीजिए इस प्रतियोगिता के चक्कर में भला कोई इसे खोज पाएगा…? एक बात और है…! और वह यह कि हम्माम की बात अब पुरानी हो गई है वहाँ कोई एक दूसरे को देखकर कम से कम मुस्कुराता तो नहीं था…! लेकिन यहाँ तो एक दूसरे को देख सब जबदस्त तरीके से मुस्कुराए जा रहे हैं… वह भी ताव देने वाली मूँछों के नीचे....!!                

शनिवार, 18 जुलाई 2015

एक अदद 'न्यूज़' की तलाश में यह 'शो-मंडी'

      दिल्ली में मीनाक्षी की चाकुओं से गोदकर की गयी हत्या पर टी.वी. चैनलों पर बहस चल रही है|
       बहस के विषय शायद ये हैं..
१.      दिल्ली में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहद ख़राब खासकर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर|
२.      दिल्ली में नागरिकों की सुरक्षा का उत्तरदायित्व किसका है केंद्र या राज्य..?
३.      हमारी पुलिसिंग प्रणाली कैसी है..?
४.      ऐसी आपराधिक घटनाओं को आँखों के सामने होते देखते हुए भी नागरिकों का मुंह मोड़ अनदेखी करना और पीड़ित व्यक्ति की सहायता के लिए आगे न आना|
    
         यहाँ लिखने का उद्देश्य उपरोक्त बिन्दुओं पर बहस करना नहीं है और न ही इसपर अपनी कोई राय रखना है|
         वैसे मैंने टी.वी. पर चल रही इन बहसों को पूरा नहीं देखा और देखने की इच्छा भी नहीं हुई| मीनाक्षी की सरेआम हत्या और इस पर अब चल रही बहस मात्र एक ‘न्यूज़’ बन रही थी अर्थात मीनाक्षी की हत्या की खबर के साथ ही इन बहसों में भी एक ‘न्यूज़’ की तलाश प्रतीत हो रही थी| ये बहस उद्वेलित करते हुए प्रतीत नहीं हो रहे थे बल्कि किसी बात या घटना पर एक राजनीतिक वाक्य ‘रोटी सेंकना’ जैसे ही प्रतीत हुए| शायद यही कारण है कि निर्भया काण्ड से लेकर आज तक हो रही इन तमाम घटनाओं पर इन ‘बहसों’ और ‘न्यूजों’ का कोई प्रभाव नहीं पड़ा चीजें वैसी ही अपनी भयावहता में चल रही हैं|

        हमारी मीडिया अपने को बहुत ‘बाँक-बहादुर’ मानती है और चीजों को ‘न्यूज़’ बनाकर उसी अंदाज में प्रस्तुत भी करती है| यह मीडिया वहीँ दिखाई देती है जहाँ उसे ‘किसी’ ‘न्यूज़’ का आभास होता है| यहाँ यह मीडिया कह सकती है भाई हम तो ‘न्यूज़’ तलाशने के लिए ही बने हैं वही तो कर रहे हैं| लेकिन मेरे भाई, फिर तो मेरा कहना है आप ‘चौथा खम्भा’ बनने का दंभ छोड़ दीजिये| दो साल पहले उस लड़की की माँ की ओर से पुलिस स्टेशन पर गुंडों की शिकायत की गयी थी लेकिन इस घटना में तब मीडिया को कोई ‘न्यूज़’ नजर नहीं आया होगा या मीडिया वहाँ तक पहुँची ही नहीं होगी| इसका कारण हो सकता है उसके अपने डर या पूर्वाग्रह हों और शायद इसी कारण पहले वह चीजों को होने देता है जब तक कि इसमें से कोई ‘न्यूज़’ निकलकर न आये और जब ‘न्यूज़’ निकल आता है तब सब “निर्भया” के स्तर पर पहुँच जाते हैं|  

       अगर आप मीडिया पर निगाह डालेंगे तो 90% से अधिक ‘न्यूज़’ केवल ‘राजनीतिक’ खबर भर होती है| यहाँ मार्मिक और दर्दनाक घटनाओं का प्रस्तुतीकरण भी ‘राजनीतिक’ हो जाता है| इस मीडिया की दृष्टि में इसका सामाजिक सरोकार जैसे इसके ‘राजनीतिक सरोकार’ से ही होकर गुजरता है|

       एक बात और है इस मीडिया ने दृश्य-मीडिया को एक “शो-मंडी” में तब्दील कर दिया है| यहाँ हर कोई ‘न्यूज़’ बन कर इस ‘शो-मंडी’ में आना चाह रहा है| इस ‘शो-मंडी’ का क्रेज पिछले दिनों एक टी.वी. शो देखकर मुझे पता चला| इस शो में दिखाया गया कि एक व्यक्ति खरीददारी कर अपने सामान के थैलों के साथ जैसे ही मॉल से बाहर आता है उसी समय एक अन्य व्यक्ति उसके सामानों से भरे थैलों को छीनकर वहीँ अपने पैरों से रौंद देता है, पहले तो व्यक्ति की प्रतिक्रिया गुस्सेवाली होती है लेकिन जब उसे बताया जाता है कि वह टी.वी. पर है तो वह बेहद खुश होकर रौंदने वाले के गले लग जाता है, इसी प्रकार अपनी गाड़ी के शीशों को तुड़वाकर भी व्यक्ति खुश हो जाता है| बात यहाँ मानसिकता की है; हम धीरे-धीरे ऐसा परिवेश बनाते जा रहे हैं जहाँ घटनाओं में ‘नैतिक मूल्य’ नदारत हैं| ऐसे में यह पुलिस चाहे जिसके नियंत्रण में रहे या इसकी चाहे जो प्रणाली हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और भीड़ भी तो केवल ‘शो’ ही तलाशती है|

          बातें तो बहुत हैं लेकिन शो चालू आहे!      

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

हमारा ‘इज्म’ हमें बहकाकर हमारा ही शिकार करता है...

         
          अभी पिछले दिनों एक समाचार पर बरबस ध्यान चला गया था; वह यह कि मध्यप्रदेश में एक पति-पत्नी ने शर्म-वश आत्महत्या कर लिया क्योंकि स्वयं उनके निजी पलों का वीडियो जो स्वयं उन्हीं के द्वारा बनाया गया था उन्हीं की गलतियों के कारण वायरल हो गया था| इस समाचर ने मन को उद्वेलित करने के साथ दुःख और विक्षोभ से भी भर दिया| निश्चित रूप से पति-पत्नी द्वारा इस आत्महत्या का कारण उनके अपने निजी पलों के विडियो का वायरल होना नहीं रहा होगा अपितु इसके पीछे उस सामाजिक अवधारणा का दुष्प्रेरण रहा होगा जिसके कारण वे ऐसी स्थितियों का सामना नहीं कर पाए होंगे| यहाँ इस बात को समझना होगा कि चीजों के प्रति हम कैसी अवधारणाएँ बनाते हैं? जो हमें कुंद मनःस्थिति में धकेल सामाजिक या व्यक्तिगत विद्रूपताओं की एक अंधी सी गली में छोड़ देती हैं, जहाँ से निकल पाना बहुत ही दुष्कर होता है| यहाँ हम भूलते हैं कि जीवन का आनंद उसकी समग्रता में है; ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, युद्ध, प्रेम, शान्ति जैसे भाविक तत्व जीवन की समग्रता के हिस्से हैं और जीवन इन सब में संतुलन का नाम है| हम जीवन को समस्याग्रस्त वहीँ बनाते हैं जब इस समग्रता के किसी एक तत्व पर ही ध्यान केन्द्रित कर देते हैं और यह ध्यानाकर्षण व्यक्ति तथा समाज दोनों स्तरों पर होता है|

         ‘खजुराहो’ जैसे शब्द को सुन मन में कैसी अवधारणाएँ बनती हैं? निश्चित रूप से इसे अश्लीलता का पर्यायवाची मान लिया गया है; यहाँ तक कि हम अपने बड़ों के सामने इस शब्द के उच्चारण से भी बचना चाहते हैं| शायद निजी पलों के वायरल होने पर उस दंपति की आत्महत्या के पीछे कुछ ऐसी ही सामाजिक अवधारणा का दुष्प्रभाव पड़ा होगा|

         हजारों वर्ष पूर्व के भारतीयों का जीवन के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोंण रखने वाली उस मानसिकता का क्षरण इस स्तर पर पहुँच गया है कि खजुराहो जैसे भारतीय स्थापत्य-कला के इस बेजोड़ नमूने से स्वयं हम भारतीय आज भी अपरिचित से हैं| आश्चर्य है; जहाँ की कला के अवलोकन हेतु विदेशियों के लिए हवाई-सेवा से उस स्थल को हम जोड़ते हैं वहीँ अपने लिए इसकी चर्चा बस थोड़े से सामान्य ज्ञान की सीमा तक करते हुए मौन हो जाते हैं| शायद इस स्थापत्य-कला के कई पक्षों में से एक पक्ष इसकी मिथुन-मूर्तियों से, हमने अपनी नैतिकता को इस तरह से समन्वित कर लिया है कि इस सम्बन्ध में हमारा विमर्श नैतिकता और बौद्धिकता की अंधी गलियों में खो जाता है| जीवन में जब हम किसी एक ही भाव पर केन्द्रित होते हैं तो फिर इसका कोई न कोई पक्ष कमजोर होने लगता है; यहाँ तक कि चीजों के प्रति ‘नैतिक’ और ‘अनैतिक’ जैसा हमारा दृष्टिकोंण भी अपने ‘अति’ में स्वयं उन्हीं चीजों को नैतिक और अनैतिक नहीं रहने देता; यह तब होता है जब हमारी दृष्टि से ‘समग्रता का भाव’ ओझल हो जाता है|

         यहीं पर एक कहानी याद आती है; राजा नृग को एक मृग के बच्चे से बहुत प्रेम हो गया था वह रात-दिन उसी की सेवा-सुश्रुषा में खोए रहते थे, उस मृग के बच्चे के प्रति उन्हें इतना लगाव हो गया था कि अपने परिवेश के प्रति वह अनजान से हो गए| इसी एक भाव से लिपटे रहने के कारण एक बार घर आये कुछ ऋषियों की वे उपेक्षा कर बैठे, उन ऋषियों ने राजा को शाप दिया कि ‘जिस मृग के कारण वे उनकी उपेक्षा करने के लिए विवश हुए उसी मृग के रूप को प्राप्त होंगे” अंत में राजा नृग मृत्यु के बाद मृग-योनि में जन्म लिए| यहाँ हम देख सकते हैं कि मृग के बच्चे से राजा का प्रेम अनैतिक नहीं था बल्कि राजा का यह एक नैतिक कृत्य ही था लेकिन फिर भी एकांगी ही था, इसीलिए राजा को शापित होना पड़ा|    

         पिछले दिनों के खजुराहो भ्रमण में जीवन के इसी ‘समग्रता सम्बन्धी भाविक-तत्व’ से परिचित हुए; सच में यह जीवन बड़े ही सहज ढंग से प्रकृति के अवदानों से ही ‘भौतिक’ और ‘भाविक तत्वों’ को ग्रहण कर आत्मनियंत्रित होता रहता है| खजुराहो के मंदिरों का स्थापत्य और इन मंदिरों की दीवालों के पत्थरों पर तराशी गयी मूर्तियाँ भारतीय स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने तो हैं ही, लेकिन इनका दर्शन एक अलग दर्शनानुभूति कराता है| खजुराहो का यह स्थापत्य भारतीय जीवन-दर्शन के चारों प्रमुख स्तंभों अर्थात धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का श्रेष्ठतम कलात्मक अभिव्यक्ति होने के साथ ही एक संतुलित जीवन-दर्शन की अर्थवत्ता ग्रहण किए हुए है| खजुराहो के मंदिरों की इस कलात्मक अभिव्यक्ति का अवलोकन करते समय जब मेरे सहकर्मी ने मुझसे सकुचाते हुए कहा, “सर, इन्हें केवल कला की दृष्टि से ही देखना चाहिए...” तो इस पर मैंने ध्यान नहीं दिया क्योंकि तब तक इसे मैं भारतीय जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति मान चुका था| मेरे एक सहकर्मी का इस तरह सकुचाते हुए सलाह देना खजुराहो की प्रचारित ‘अश्लीलता’ को लेकर था| लेकिन मैंने इन्हें देखते हुए अनुभव किया कि जब एक पूर्ण दृष्टि खजुराहो के स्थापत्य पर पड़ती है तो अश्लीलता का लेश-मात्र भी दर्शन नहीं होता बल्कि अपनी सम्पूर्णता में यहाँ का स्थापत्य जीवंतता की अनुभूति कराता है| इसे देखते हुए मेरे मन में यही कौंधा कि जीवन एक समन्वित दृष्टि का ही नाम है; और इस समन्वय में ही आनंदानुभूति है|
    
          खजुराहो के मन्दिरों को निहारते हुए मैंने देखा कि यहाँ की लगभग सभी मूर्तियाँ को खण्डित करने का प्रयास किया गया था| इन खंडित मूर्तियों के सम्बन्ध में एक स्थानीय व्यक्ति जो मेरे ही साथ चल रहा था उसने बताया, “औरंगजेब ने अपने सैनिकों को इन मंदिरों को पूर्णतया नष्ट करने का आदेश दिया था, सैनिकों ने उसके आदेश का पालन करना शुरू किया तो उन्हें आभास हुआ कि यहाँ की कलाकृतियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं और दुबारा ऐसी कलाकृतियों को निर्मित किया जाना संभव नहीं होगा तब सैनिकों ने यहाँ के मंदिरों को पूर्ण रूप से नष्ट करने से इनकार कर दिया| इसके बाद औरंगजेब ने मूर्तियों को खंडित करने का आदेश दिया और इस प्रकार ये मंदिर पूर्णरूप से नष्ट होने से बच गए तथा केवल मूर्तियों को ही आंशिक रूप से क्षति पहुँचाई गयी|” खजुराहो के मंदिरों की मूर्तियों को औरंगजेब या उसके पहले के किसी अन्य आक्रांता ने क्षति पहुँचाई हो लेकिन मुझे यह एक प्रकार की हिंसा ही प्रतीत हुई क्योंकि ऐसा करके जीवन्तता को क्षति पहुँचाई गयी थी जिसकी भरपायी होना असंभव था| वास्तव में जो समाज जीवन की सर्वांगीर्णता को समझता है वह हिंसक नहीं होता, समाज या व्यक्ति के स्तर पर हिंसा जैसी वृत्ति की उत्पत्ति का कारण एक समग्र-दृष्टि का खंडित होना ही होता है|
        
         एक वृहद् जीवन-दृष्टि वाला व्यक्ति ही कलाकार हो सकता है और यह कलाकार हिंसक नहीं होता| अपने इसी विचार के साथ ही चंदेल कालीन उन कलाकारों की मनःस्थितियों को टटोलने का मैंने मन ही मन प्रयास किया जिसकी प्रेरणाओं के कारण खजुराहो के ये बेजोड़ नमूने आकार ग्रहण कर सके| चंदेलकालीन वे शिल्पी अपनी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि के साथ छेनी और हथौड़े से जीवन की कलात्मकता को अभिव्यक्ति प्रदान किए| निश्चित रूप से वे शिल्पी जिन्होंने खजुराहो को गढ़ा पाखंडी नहीं रहे होंगे, तभी तो बिना लाग-लपेट के यहाँ का स्थापत्य जीवन के विविध रूपों को अंगीकृत करते हुए एक समन्वित-दृष्टि के साथ उसे उस आध्यात्मिकता की ओर ले जाते हुए दिखाई देता है जो ‘जियो और जीने दो’ का सन्देश देते हुए मानव-जीवन में असीम शान्ति का मार्ग प्रशस्त करता है| शायद यही कारण है कि जिस खजुराहो को हम अश्लीलता का पर्यायवाची मान बैठे हैं वहीँ पर महावीर का जैन मंदिर भी अवस्थित है जो उसी शैली में निर्मित है| वास्तव में जीवन को जब हम समन्वित दृष्टिकोंण के साथ देखते हैं तो न तो इसमें अश्लीलता होती है और न ही हिंसा का स्थान होता है; शायद खजुराहो के मंदिरों के साथ निर्मित जैन मंदिर इसी तथ्य की ओर संकेत करता है|

        यहाँ हम समझ सकते हैं कि पति-पत्नी द्वारा शर्म-वश आत्महत्या करना, कहानी में राजा नृग की मनोदशा, आक्रांताओं द्वारा खजुराहो के स्थापत्य को क्षति पहुँचाना और यहाँ तक कि खजुराहो को अश्लीलता का पर्याय समझ लेना एकांगी दृष्टिकोंण का परिणाम हैं| इसी एकांगी दृष्टिकोंण के कारण समाज या व्यक्ति में एक तरह का ‘इज्म’ विकसित होता चला जाता है|

         अपने-अपने ‘इज्म’ का मुझे ध्यान तब आया जब किसी ने मुझसे कहा कि ‘आज हम ऐसी कलाकृतियाँ नहीं गढ़ सकते..!’ उसी समय मैंने उससे कहा, “नहीं आज तो हम हवाई जहाज से लेकर न जाने क्या-क्या बना रहे हैं ये भी तो आज की ही कलाकृतियाँ है..!” यह कहते ही मेरा ध्यान इस पर गया कि खजुराहो की कलाकृतियाँ तो भारतीयों की ही देन है लेकिन आज का यह सारा वैज्ञानिक प्रगति इसमें भारतीयों की सोच का कितना योगदान है? शायद न के बराबर..! इसका कारण यही है कि शुरुवाती भारतीय सभ्यता किसी ‘इज्म’ का शिकार नहीं थी लेकिन समय बदलने के साथ ही हम अपने-अपने ‘इज्म’ के शिकार होते चले गए और एक कुंद मनःस्थिति में पहुँच गए जिसमें किसी वैज्ञानिक सोच का स्थान नहीं होता और जिसका परिणाम यही हो सकता है कि हम ऐसी महान कलाकृतियाँ नहीं गढ़ सकते|

          वास्तव में कुछ का ‘इज्म’ खजुराहो के मंदिरों में भी किसी न किसी तरह का ‘इज्म’ खोज लेगा लेकिन खजुराहो की स्थापत्य-कला जीवन-सापेक्ष होते हुए स्वयं के जीने और दूसरों को जीने देने की प्रेरणा देती है तथा यहाँ की कला किसी को अपने ‘इज्म’ का शिकार नहीं बनाती जबकि हमारा ‘इज्म’ हमें बहकाता है और हमारा ही शिकार करता है|
                    

                               -----------------------विनय   

मंगलवार, 23 जून 2015

"एसो ही हतो चन्द्रावल..!"

         एक थी चन्द्रावल...! हाँ महोबा में चन्द्रावल नाम की कोई एक सुन्दर राजकुमारी हुआ करती थी...कहते हैं आल्हा-ऊदल और पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बीच उसे लेकर युद्ध हुआ था...बताते हैं कि पृथ्वीराज चौहान चंद्रावल को हासिल करना चाहता था..आल्हा-ऊदल चन्द्रावल की रक्षा के लिए बहादुरी से लड़ते हुए पराजित हुए और यहाँ के लोगों के लिए आल्हा-ऊदल आज भी अमर होकर जीवित हैं, हाँ चंद्रावल पृथ्वीराज के हाथ नहीं आई थी...! दो पहाड़ों के बीच स्थित उस मैदान को दिखाते हुए बताया मुझे गया कि इसी स्थान पर वह युद्ध हुआ था...! इस जनश्रुति के अनुसार चन्द्रावल तो पृथ्वीराज को नहीं मिली थी लेकिन उसी स्थान से निकली एक नदी के रूप में चन्द्रावल आज भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है...जो एक वास्तविकता है....चन्द्रावल नदी...!!
          
       इस जनश्रुति को सुन बचपन में सुनी गयी एक कहानी याद आई...इस कहानी में भी एक राजकुमारी अपना अस्तित्व बचाने के लिए भागती जाती है...और...भागते-भागते नदी बनते हुए गायब होती जाती है तथा अंत में लोगों के बीच कल-कल सी प्रवाहित होने वाली नदी बन गई..! अपनी इस बचपन की सुनी कहानी को जब मैंने साथ चलते लोगों को सुनाई...तो मुझे सुनाई पड़ा, “हाँ साब...एसो ही हतो चन्द्रावल..” खैर....

              कभी की खेलती खिलखिलाती चन्द्रावल आज नदी के रूप में भी अपने अस्तित्व की लड़ाई में बेवश है...चन्द्रावल के खिलखिलाने का कारण उसके आस-पास का परिवेश रहा होगा...उसके अक्षत यौवन की रक्षा स्वाभाविक रूप से स्वतः उसी परिवेश के कारण होता रहा होगा...लेकिन आज हमने उस परिवेश को भी अपनी उद्दाम लालसाओं के कारण नष्ट-भ्रष्ट कर डाला है...सच में परिवेश या पर्यावरण ही किसी के अस्तित्व को बचाए रख सकता है, यह परिवेश भी कृतिम न होकर स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होता रहता है..! हमने इसी परिवेश को छिन्न-भिन्न कर दिया है...इसकी स्वाभाविकता को मार दिया है...इसे तार-तार कर दिया है..! फिर कैसे यहाँ चन्द्रावल सुरक्षित रहेगी...? हाँ इस परिवेश या पर्यावरण की स्वाभाविकता को बनाए बिना चंद्रावल की रक्षा नहीं की जा सकती अन्यथा सारे प्रयास व्यर्थ के ढोंग सिद्ध होंगे...
       
         बताते हैं यह चंद्रावल नदी कभी सदानीरा थी...लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी उसी अनुपात में लोगों की लालसाएँ भी बढ़ती गयी...प्रकृति के बनाए गए गड्ढों को पाटकर तथा पेड़ों को काटकर खेत बनाए गए...हमारी खेती प्रभावित न हो इसलिए स्वाभाविक रूप से संचित वर्षाजल को हमने नाले खोदकर उसमें बहा दिए...नाले भी बनाए तो मात्र जल निकासी के दृष्टिकोण से ही...! पंद्रह दिन भी नहीं बीतता कि बारिश से जलमग्न हुआ क्षेत्र जलविहीन दिखाई देने लगता है, कृतिम तालाबों को भी हम स्वाभाविक आकार नहीं दे पा रहे हैं मात्र खुदी मिटटी का मापांकन ही जैसे हमारा उद्देश्य हो...हमारी लालसा इन तालाबों पर भी भारी पड़ रही है...आखिर जल एकत्रीकरण कहाँ हो...? बाँध भी बनाया तो उसी नदी के जल को रोककर..उस नदी में जल कहाँ से आये जैसे हम इस उद्देश्य को ही भूल से गए...! फिर कैसे होगी चन्द्रावल सदानीरा...?
        
        क्या नदी की तलहटी खोद देने से ही यह नदी सदानीरा बन जाएगी...? मतलब हम बचे-खुचे भूजल को भी बहा देना चाहते है...! उस दिन मैं जंगल में पेड़ गिनते-गिनते धसान नदी को देखने की इच्छा ले उसके किनारे पहुँच गया था...नदी के इस तरफ महोबा जनपद और उस तरफ झाँसी जनपद की सीमा मिलती है...वहाँ नदी का किनारा घने हरे-भरे पेड़-पौधों और झुरमुटों से भरा पड़ा था उसी के मध्य हमें कल-कल बहता हुआ एक झरना दिखाया गया...एक-दम निर्मल और बेहद शीतल जल..! यह अदृश्य से भू-श्रोतों से निकल ढलान से होते हुए नदी में जाकर मिल रहा था...हाँ जैसे दो ट्यूबवेलों का एक साथ पानी बह रहा हो...! इसी तरह इस जल-श्रोत से ही कुछ दूरी पर एक और झरना था...हो सकता है ऐसे ही अन्य जल-श्रोत भी नदी में मिल रहे हों...ये झरने धसान नदी को सदानीरा बना रहे थे...इस दृश्य को देख मुझे बचपन में अपनी रिश्तेदारियों में आते-जाते सई नदी में मिलने वाले नाले याद आ गए...कई बार मैंने मई-जून के महीनों में इन नालों की तलहटियों में पानी देखे थे...! हाँ...इन नालों में पतली सी धार भी बहते हुए मैंने देखा था...एक बार मैं इस बहते पानी का श्रोत जानने की जिज्ञासा में इसके पास पहुँचा...वहाँ कोई श्रोत तो नहीं था फिर भी नाले की तलहटी में एक पतली सी धारा प्रवाहित हो रही थी..मैं आश्चर्य में था कि यह जल-धारा कहाँ से आई...! जब ध्यान दिया तो देखा नाले की तलहटी पानी से चुहचुहाये हुए थे...मैंने उसपर अपनी हथेली रखी तो मेरी हथेली भींग गई...जैसे उस भूमि से पानी रिस रहा हो...और ऐसा था भी...! नाले में यह स्थिति गहराई बढ़ने के साथ बढती गयी थी और यही रिसता पानी उस नाले में एक पतली धारा का रूप ले लिया था...शायद ऐसे ही नाले सई को उस समय सदानीरा बनाए हुए थे...
       
                                                      (चित्र में धसान नदी के तट पर मैं )

               लेकिन आज हो क्या रहा है...भू-जल स्तर नदी, नालों की तलहटी से भी निचले स्तर पर पहुँच गया है कोई झरना, कोई झीर इनमें कैसे फूटेगा..? यहाँ धसान तो काफी गहरी थी और वह क्षेत्र भी भूजल के मामले में ठीक ही था..तो वह झरना दिखाई दे गया...लेकिन महोबा जैसे जिले के अन्य भागों में यह स्थित नहीं है...यहाँ का भू-जल इतने नीचे है कि कम से कम चन्द्रावल के उद्गम पर कोई झीर फूटना असंभव सा है...पहले तो हमें यहाँ ऐसे कई तालाबों का उद्धार करना होगा जिसमें वर्षा का जल पर्याप्त रूप से संचित हो सके...एक बात और है आज हम वर्षा-जल संचयन के लिए जितने गड्ढे खोदते हैं उससे कई गुना भूमि समतल भी कर देते हैं मतलब गड्ढा खोदने और समतलीकरण का अनुपात बराबर...! बल्कि आज समतलीकरण ही अधिक हो रहा है, आखिर...इस समतलीकरण से वर्षा-जल कहाँ संचित होगा..! पहले तो प्राकृतिक रूप से बने गड्ढों में भी जल संचयन हो जाता था...लेकिन आज समतलीकरण (शहरीकृत खेतिहर समाज) के इस दौर में जमीन के नीचे का जल स्तर कैसे बढ़ेगा...? और तो और...हमने पेड़ भी काट डाले हैं...जमीन कैसे नम रहेगी...?
       
        इस नदी की गहराई बढ़ाना भी इस समस्या का समाधान नहीं है...मैंने अपने मित्र की एक बात मजाक मान हँसी में उड़ा दी थी.. ‘यार ये बताओं ये तालाब खोदने से भू-जल स्तर कैसे बढेगा...?’ उनके इस प्रश्न पर मैंने उत्तर दिया था, ‘इसमें बरसात का पानी इकठ्ठा होगा जिससे जमीन में पानी का लेवल बढेगा’ लेकिन उनका उत्तर था, ‘नहीं यार अब तो वर्षा भी कम होती है तिस पर हम गड्ढे खोदकर जमीन की नमी को भी उड़ा देंगे...इससे तो भू-जल स्तर और नीचे चला जाएगा...!” इस पर मैं हँस तो पड़ा था लेकिन इस बात में भी एक वास्तविकता थी..मतलब हमें नमी बचाने के लिए इस स्तर तक सोचना होगा....
       
         हाँ..हमे फिर से एक स्वाभाविक परिवेश बनाना होगा जिससे चन्द्रावल का आँचल हरा-भरा हो और इसके हरियाले आँचल के झुरमुटो के बीच कोई झीर फूट पड़े तथा साथ ही चन्द्रावल की सूखी तलहटी पानी से चुहचुहा पड़े...एक धारा बन फिर से यह दौड़ पड़े..!
        
(चित्र में चंद्रावल के उद्गम क्षेत्र में 'जलपुरुष' श्री राजेंद्र सिंह जी..और जनपद महोबा के उच्चाधिकारीगण)

        
         
     
      
      अंत में एक नदी बलिदानों से ही बनती है...हमें अपनी उद्दाम लालसाओं पर काबू पाना होगा तभी चन्द्रावल अठखेलियाँ भारती हुई पुनर्जीवित होगी...!

गुरुवार, 21 मई 2015

इस 'मीडियापे' में 'मूंदहु आँख' लुभाता है...

       ‘मुदाहूँ आँख कतऊँ कछु नाहीं’ हाँ यही तो लग रहा है अब, क्योंकि इधर कई दिनों से टी.वी. देखना जो बंद हो गया है...! नहीं तो टी.वी. पर रात-दिन चलते वही न्यूज-चैनल देख-देख, ऐसा लगता जैसे देश में समस्याओं-घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है, उथल-पुथल मचा हुआ है..! और तो और इन समाचार चैनलों पर चलते बहस-मुबाहिसों को देख-सुनकर ऐसा प्रतीत होता जैसे देश का अब बंटाधार हुआ या तब, या फिर हमारा यह देश अब फिर से सोने की चिड़िया बन बस फुर्र से उड़ने ही वाला है तथा लोग इसकी टांग खिचाई इसलिए कर रहे हैं कि उड़ने से इस चिड़िया के हाथ से निकल जाने का भय है..! अब इस टांग खिचाई और ऐसे ही अन्य समाचारों को देख-सुन इसके सही गलत में उलझा यह मन दुःख का कारण बन जाता है, लेकिन इन दिनों टी.वी. न्यूज़-चैनलों से दूर रहने के कारण बहुत शान्ति की अनुभूति हो रहीं है, जैसे किसी बोधिसत्व प्राप्ति की दिशा में कदम बढ़ा दिया हो..मतलब समाचार-जनित तमाम दुखों-उलझनों से मुक्ति की ओर..!
           कुछ भाई लोग कहेंगे..आँख बंद कर लेने से, समस्याओं का अंत थोड़ी न होता है,यह तो निरा पलायनवाद है...! लेकिन मेरे भाई यहाँ समझने की बात है, घटनाओं समस्याओं और हमारे लिए दुख का कारण बनने वाले इन समाचारों का न्यूज़-चैनलों द्वारा प्रस्तुतिकरण इन दुखों को बढ़ाता हुआ ही प्रतीत होता है, विज्ञापन और समाचार में विभेद करना मुश्किल हो जाता है..समाचार, समाचार के लिए नहीं होता और हर समाचार के प्रसारण के पीछे जैसे कोई निहितार्थ छिपा होता है...समाचार चैनलों पर दुखद घटनाएं भी विज्ञापन जैसी प्रतीत होती हैं...एकदम उत्तेजनात्मक..!! ऐसे में इनसे बचना भी जरुरी हो जाता है क्योंकि व्यर्थ की उत्तेजना परिणाममूलक नहीं होती बल्कि पागलपन की ही निशानी होती है...

           मन में एक छोटा सा उदाहरण गूँजने लगा है...कोई बालीवुड का एक्टर धमाके के साथ टी.वी. स्क्रीन पर उभरता है उसकी गाथा, उसके हीरोगीरी को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है जैसे वह वास्तव में समाज का नायक हो..! अब लो..अगर आपने उसे नायक बना दिया है तो, यदि उसे सजा होती है तो किसी को अच्छा लगेगा...? उसका नायकत्व उत्तेजना तो पैदा करेगा ही, पागलपन की हद से गुजरकर हम उसे चाहते हैं, इसका लाभ उसे मिलना ही चाहिए...! हमारा नायक खतरे में..! फिर तो सभी प्रभावित होंगे, आम जनता से लेकर फ़िल्मी दुनिया, न्यायिक प्रक्रिया आदि सभी, आखिर इतने बड़े नायक का जो प्रश्न है..! फिर कानून की नजर में सब एक सामान कैसे...? मेरे विचार से कानून भी यह नहीं चाहेगा..! आखिर जब सबने मिलकर किसी को नायक बना दिया है तो कानून भी उसका सम्मान तो करेगा ही...! तब आप क्यों न्यायिक प्रक्रिया पर व्यंग्य करते हो..आखिर किसी चीज को विज्ञापित करने से लेकर उत्तेजना बढ़ाने तक सब कुछ किया धरा तो आपका ही है..!!

           भाई हमारा यह मीडियापा जो जैसा है उसको वैसा ही नहीं रहने देता और न वैसा दिखाता है! एक भ्रमजाल खड़ा कर देता है..आप इसमें भटको तो अपनी बला से..! जिसको इस भ्रमजाल से फायदा उठाना है वह उठा लेगा..! टापते रहो आप घुरहू..कतवारू जी...!! अगर तुममे भ्रम-जाल बुनने की क्षमता हो तो तुम भी आगे बढ़ो....हाँ, आपके कान में धीरे से बताना चाहुँगा अब ये घुरहू..कतवारू भी भ्रमजाल बुनने लगे हैं!! लेकिन यह भी सब के बस की बात नहीं...और यदि कोई इसमें सफल भी हुआ तो इनके बनाए नायकत्व के गुमान में भी मत रहिए क्योंकि फिर से इसी मीडियापे द्वारा घुरहू-कतवारू बना देने की बात तक तो गनीमत है लेकिन सिर पर ये ऐसा सींग जमा देंगे कि सभी लोग लट्ठ ले के पीछे ही पड़ जाएंगे क्योंकि इनके निहितार्थ को समझना बहुत ही कठिन है...इसीलिए टी.वी. समाचारों से ‘मूंदहु आँख’ लुभानेवाला जैसा अनुभव दे रहा है...!

           लेकिन यह मानव-मन चैन से बैठता ही कहाँ है, नहीं कुछ तो फेसबुक के आभासी मित्रों के बीच ही इधर घूमने लगा है...हाँ फेसबुक पर दो मित्रों द्वारा पोस्ट किए गए उनके कंटेंट से मुझमें ईर्ष्या का भाव जाग गया...एक ने ब्लड डोनेट करते हुए अपनी तस्वीर पोस्ट की थी तो दूसरे ने अपने पति-पत्नी प्रोफ़ेसर मित्र की कहानी पोस्ट की थी जिसमें इन्होने अपने वेतन से दो लाख की सहायता राशि का दान बुन्देलखण्ड के किसानों के लिए दिया और इन पति-पत्नी द्वय ने अपने फेसबुकीय साथियों को इतना प्रेरित किया कि इन लोगों ने तैंतीस लाख रुपये की सहायता राशि बिना किसी सरकारी सहायता के इकट्ठी कर ली...और तैंतीस बेहद पीड़ित किसानों को एक-एक लाख रुपये की एफ.डी. कराकर दे दी और एक मैं..तमाम अपीलों-दलीलों के बाद भी एक रूपया तक नहीं दिया है, आगे इसकी सम्भावना भी नहीं है| अब आप ही बताइये ईर्ष्या होगी की नहीं..! हम केवल मीडियापेमें ही खोए रह गए और ये लोग कुछ कर गुजर गए..! सबसे बड़ी कोफ़्त मुझे यह सोचकर हुई कि एक बार मुझे भी ब्लड-डोनेट करने का अवसर मिला था...अगर-मगर..के चक्कर में मैं उससे भी बच निकला था...

            खैर, इस ईर्ष्याभाव से मुक्ति पाने के लिए अखबार की कतरनों पर नजर डाली...तो.. ‘नदी में उतराते दो महिलाओं के क्षत-विक्षत शव मिले’.... ‘दो बहुओं को बांधकर कोड़े बरसाए गए’ ‘एक और निर्भयाकांड’ इसके अलावा तमाम आत्महत्या की खबरों पर निगाह डाली तो महिलाएं ही आत्महत्या करती हुई मिली...पता नहीं क्यों मन संदेहों से भर गया...मुझे लगा टी.वी. समाचार जिस माल को एक बार बेंच लेते हैं, दुबारा उस पर हाथ नहीं डालते तथा सब कुछ सुचारू रूप से उसी तरह चलने लगता है बल्कि ऐसी घटनाओं की बाढ़ सी भी आ जाती है, एक बार दो लडकियों का पेड़ पर फांसी पर लटकना या लटकाए जाने की घटना का प्रस्तुतीकरण इन चैनलों द्वारा इस तरह से किया गया कि दुनियाँ हिल उठी..लगा जैसे अब यह अंतिम घटना ही होगी....लेकिन हुआ क्या...! पेड़ पर लटकने या लटकाने जैसी घटनाएं लगातार दुहराई जाने लगी...मतलब...यह हो-हल्ला बेमतलब का साबित होता है... मैं नहीं समझ पाता कि जब सुचारू रूप से वही सब चलना है जो चलता आ रहा है तो फिर समाचार जानने की जिज्ञासा क्यों...! फिर अखबारों की इन कतरनों से भी मन उचट गया..
        
           खैर, इस जिज्ञासा का क्या करें..यह तो हमारे मस्तिष्क की तन्त्रिका-तंत्र का हिस्सा है..इसके बिना हम जी भी तो नहीं सकते...सो पुनः अपने सोशल-मीडियापे फेसबुक-वाल को यह सोचकर खंगालने लगा कि मित्रों की पोस्ट और तमाम विषयों पर की गयी टिप्पड़ियों से महत्वपूर्ण घटनाओं तथा उसपर लोगों के दृष्टिकोणों से अवगत हो जाऊँगा| तभी ध्यान आया कि एक फेसबुकिया मित्र की तमाम विषयों पर बुद्धिमत्तापूर्ण टिप्पड़ियाँ इधर तीन-चार दिनों से पढ़ने के लिए नहीं मिल रही हैं, आखिर बात क्या है? सो अपने वाल पर उनकी इस अनुपस्थिति का कारण जानने के लिए फ्रेंडलिस्ट देखनी शुरू की..वो मेरे फ्रेंडलिस्ट से नदारत थे...फिर उन्हें उनके नाम से सर्च किया तो पता चला वे फेसबुक पर अपने को अपडेट तो बराबर कर रहे थे लेकिन ‘अनफ्रेंड’ हो जाने के कारण हमारी वाल से गायब थे...हाँ मैंने उन्हें अनफ्रेंड नहीं किया था...क्योंकि उनके लिखे को पसंद करूँ या न करूँ लेकिन उन्हें पढ़ने की तलब जरुर रहती थी...खैर यदि उन्होंने मुझे ‘अनफ्रेंड’ किया है तो वे अपने एक पाठक से वंचित हो चुके हैं...और यदि गलती से मुझसे ही ‘अनफ्रेंड’ हो गए हैं तो मैं किसी को पढने से वंचित हुआ हूँ...
       
          हाँ..मन में विचार उठा कि उन्हें फिर से फ्रेंड-रिक्वेस्ट भेज दूँ लेकिन ऐसा नहीं कर सका, सोचा..हो सकता है मैं उनके बौद्धिक सम्प्रदाय के सदस्यों से मेल न खा रहा होऊँ...! मैंने इनकी पोस्टों को पढ़कर इस बात का अनुभव किया था कि वे अपने विरोधी ‘मीडियापे’ को पसंद नहीं करते हों और जो धृष्टता करता उनके द्वारा अनफ्रेंड की गति को प्राप्त होता...ये फेसबुक के वे ‘सेलिब्रिटी टाइप’ के लोग हैं जो अपनी पोस्टों पर ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ की संख्या गिनकर स्वयंभू इस स्तर की प्राप्ति स्वीकार करते हैं...

         मेरे समझ से इस ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ पर संजीदा होने की आवश्यकता नहीं है...अभी कुछ दिनों पहले मैंने देखा मेरे सुपुत्र महोदय अपने वाल पर मित्रों के पोस्ट किये गए कंटेंट को धडा-धड़ लाइक किये जा रहे थे...और किसी मित्र को अबे-तबे कर रहे थे...मैंने पूँछा, ‘बिना पढ़ें ऐसा क्यों कर रहे हो..और यह क्या..?’ तो बोले, ‘इस लाइक-वाइक को लेकर इतना संजीदा मत बनिए...यह ऐसे ही होता है..इतना सोचने की जरुरत नहीं...’ मतलब ये भी भ्रम पैदा करते हैं...कभी-कभी हम बिना पढ़े ही ‘लाइक’ हो जाते हैं कुछ तो हमारा मन रखने के लिए ठक से हमारे पोस्ट पर ‘लाइक’ ठोंक देते होंगे...हाँ एक बात और है अब यह उस तरह से भी होता जा रहा है जैसे आप पड़ोसी के यहाँ जायेंगे तभी वह भी आप के यहाँ आएगा...मतलब यह ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ आभासी सामाजिक-व्यवहार बन चुका है, जो ऐसा नहीं करते होंगे वे ‘समाज-बहिष्कृत’ का दंश भी झेल सकते है...

        खासकर मीडियापा करने वाले लोग के ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ उनके मित्र-सूची की बौद्धिक-सम्प्रदाय के सदस्यों की संख्या पर निर्भर करता होगा...क्योंकि यहाँ हम सेक्युलर होते-होते बौद्धिक कामरेड टाइप सदस्यों का सम्प्रदाय बनाए हुए होते हैं जहाँ अन्य लोग अवांछित माने जा सकते हैं, वास्तव में यह एक ऐसा ‘मीडियापा’ है जहाँ अपने-अपने गढ़ होते है और इन गढ़ों के विस्तार की क़वायद होती है...! सच्चाई बस यही है कि जो लिखा जाता है वह अवश्य पढ़ा जाता है और पढ़ा जाएगा...!! लिखने की स्वतंत्रता है लेकिन विचारों का संप्रदाय निर्मित करते हुए इसे ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ तक सीमित भी न करें...बाकी अन्य भ्रम न पालें...नहीं तो...हमारे-आपके होने के बाद भी सब कुछ वैसे ही ‘निर्भयाकांड’ की तर्ज पर चलता रहेगा...और...यही ‘मीडियापा’ है...!!!              

सोमवार, 18 मई 2015

'मालिकपने' के शिकार....

                   उस दिन श्रीमती जी ने कहा, 'जो वह मजदूरिन है न..! है तो वह गरीब ही..लेकिन उसकी मालकिन ने उससे कोई काम कहा था...शायद उसने नहीं किया था...'
         
                यह सुन मैंने कहा, 'हाँ ये मजदूर ऐसे होते ही हैं...मन में आया काम किया मन में आया तो न किया..'

              श्रीमती जी ने कहा, 'यह बात नहीं..अरे, इनकी मजदूरी बढ़ा दो तो ये क्यों नहीं कहने पर काम करेंगे..?'

                 'लेकिन जानते हो उसकी मालकिन ने क्या कहा..उन्होंने कहा अरे इस मजदूरिन के पास भी पैसा हो गया है...यह तो बी.सी. भी चलाती है..उसी की बचत होगी इसके पास फिर क्यों सुनेगी यह..?'

                 श्रीमती जी की यह बात पूरी नहीं हुई थी कि मैंने कहा, 'अरे नहीं..! बी.सी.-ऊ सी का ये कौन सा बचत कर पाएंगी...लेकिन ये गरीब न अपनी इसी अकड़बाजी के चक्कर में आगे बढ़ नहीं पाते..और सरकार भी इन्हें मुफ्त का भोजन देती है, ये बी.पी.एल.कार्ड और अन्त्योदय कार्ड जो बिना काम के अनाज दे मुफ्तखोरी ही बढ़ा रहे हैं फिर ये काम क्यों करें..!'

                    'नहीं-नहीं...बात यह नहीं है...हमारा 'मालिकपना' इनकी अकड़बाजी बर्दास्त नहीं कर पाता...यदि सरकार की ये योजनाएं न हों तो हम इनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाते हुए इनसे काम लेने लगे....तथा कदम-कदम पर ये शोषित हों, कम से कम सरकार की इन योजनाओं के कारण ये मजदूर अपने आत्मसम्मान को बचाते हुए अपने लिए इच्छित कार्यों का चयन तो कर सकते हैं, इनकी यह अकड़-बाजी इसी कारण से है...' श्रीमती जी ने हमें जैसे विस्तार से समझाने की कोशिश की...

                  वास्तव में श्रीमती जी ने सही कहा था..कम से कम सरकार के इन सहारों की वजह से ये गरीब धीरे-धीरे कर ही सही आत्मसम्मान को समझने लगे हैं...और हो सकता हैं आगे चलकर ये उन मनोवृत्तियों से टकराएँ जो आज की इनकी स्थिति के लिए जिम्मेदार है...क्योंकि इनकी इस स्थिति का एक कारण यह भी रहा है कि वर्षों से ये हमारे 'मालिकपने' के शिकार बनते आ रहे हैं....